आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

Archive for the day “दिसम्बर 16, 2010”

आस-पड़ोस की बातें

मेरा मोहल्ला संभवतः दिल्ली का सबसे इंटरेस्टिंग मोहल्ला होगा. इसके ऊपर मैंने कुछ दिन पहले एक लेख भी लिखा था मोहल्ला मोहब्बत वाला 🙂 . यहाँ पिछले पाँच सालों से रह रही हूँ. इसलिए काफी लोगों से परिचय भी हो गया है. लोगों से मेरा मतलब दुकानदारों से है, बकिया दोस्त-वोस्त तो हैं ही.

यहाँ सुबह से ही सब्जी की दुकानें लग जाती हैं, पर शाम को काफी ठेले होते हैं, जिनमें हर तरह की मौसमी सब्जियां मिल जाती हैं. एक दिन एक सब्जी वाले के पास हरी-हरी भिन्डी देखकर ठिठक गयी. उसके पास कुछ ही भिन्डी बची थी. मैंने दाम पूछा तो बोला, “वइसे तो आठ रूपिया पौव्वा हैं. मुला किलो-खांड लेइहो तो सस्ता लगा देबे.” (वैसे तो आठ रूपये पाव हैं, पर अगर किलो के लगभग लेना हो तो सस्ता लगा दूँगा.) मैं अपनी परिचित बोली सुनकर चौंकी. मैंने झट से पूछा, “उन्नाव के हो का भईया?”  “हाँ, मुला आपका कईसे मालूम?” वो आश्चर्य से पूछने लगा. मैंने कहा, “हमहूँ हुवन कि अहिन. पर तुम  हियाँ का करि रह्यो? उन्नावे के बगल मा तो कानपुर-लखनऊ जइसे बड़े सहर हैं.”( मैं भी वहीं की हूँ, पर तुम यहाँ क्या कर रहे हो. उन्नाव के बगल में तो वैसे भी लखनऊ-कानपुर जैसे शहर हैं?) तो बोला, “वी हमरी सास रहती रहैं हियाँ, तौ बुला लिहिन कि आओ हियाँ कमाव-खाव आके.” (मेरी सास रह रही थीं यहाँ पर, तो हमें भी बुला लिया कि तुम भी यहीं आकर कमाओ)  इस तरह मुझे मेरे बचपन के शहर का एक आदमी मिला और मुझे उससे वैसा ही अपनापन महसूस हुआ जैसा लड़कियों-औरतों को अपने पीहर के किसी भी व्यक्ति से होता है 🙂 . वो मेरा दोस्त बन गया था. पर इधर कई दिनों से वो नहीं दिख रहा है. लगता है कहीं और चला गया कमाने-खाने.

एक सेबवाला है. मुझे देखते ही बुलाता है, “बहिनजी, आपकी पसंद वाला जूस वाला किन्नौर सेब आया है.” एक-दो बार तो झेंप जाती हूँ कि कमबख्त को इतनी ज़ोर से चिल्लाकर बताने की क्या ज़रूरत है? पर उस बेचारे की गलती नहीं है. उससे बहुत दिनों से सेब खरीद रही हूँ. पर जब वो सुनहरे शिमला वाले सेब लाता है, तब नहीं लेती. मुझे वो खुसखुसे होने के कारण अच्छे नहीं लगते. तो जब वो लाल वाले जूसी सेब लाता है तो चिल्लाकर बताता है और गारंटी भी देता है कि अगर सेब में जूस नहीं हुआ तो वापस ले लेगा :-). है ना मजेदार इंसान?

एक आंटी हैं, जिनकी वीडियो लाइब्रेरी है. किराए पर सी.डी. देती हैं. उनके यहाँ से इतनी पिक्चरें लेती हूँ कि उन्हें मेरे घर का नम्बर तो याद ही हो गया है, ये भी याद है कि मैं कौन-कौन सी पिक्चरें देख चुकी हूँ? ( ये अलग बात है कि मेरा नाम नहीं मालूम :-)) एक-दो बार वो खुद ही मेरी पसंद की फ़िल्में सजेस्ट कर देती हैं. एक दिन उन्होंने मुझे “रेड एलर्ट” फिल्म देखने का सुझाव दिया. ये एकदम नयी फिल्म है और नक्सलवाद पर बनी ठीक-ठाक फिल्म है और मज़े की बात ये कि फिल्मों की इतनी शौक़ीन होने के बाद भी मैंने इसका नाम तक नहीं सुना था. जब उनके यहाँ मोज़रबियर की  पुरानी क्लासिक हिन्दी फिल्म की सी.डी. आती है, तो मुझे बता देती हैं. आज ही उन्होंने ‘नया-दिन नयी रात’ और ‘गोदान’ की सी.डी. दिखाई. उनके पास और भी कई पुरानी फिल्मों की सी.डी. हैं, जो मुझे देखनी हैं.

एक फ्रूटी है, जो अपने पति पेप्सी के साथ कोने के एक घर में पाली हुयी है. हाँ, क्योंकि वो एक डॉगी है. प्यारी सी फ्रूटी के यहाँ पिछले साल जब हम उसकी पपी “कली” को लेने गए थे, तो इतनी नाराज़ हुयी थी कि भौंक-भौंककर पूरे मोहल्ला सर पर उठा लिया था. पर अब मुझे देखकर भौंकती नहीं है. आकर मेरे पैरों पर खड़ी हो जाती है और कूँ-कूँ करती है, जैसे पूछती हो कि “मैंने अपनी बच्ची तुम्हें दी थी, देखभाल के लिए. अब वो कहाँ है बताओ?” कौन कहता है कि जानवर बोल नहीं सकते? वो बोलते हैं, अपनी आँखों से, अपने हाव-भाव से. फ्रूटी ने जब पहली बार मेरे पैरों पर खड़े होकर मेरी आँखों में प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा था, तो मैं उससे आँखें नहीं मिला पायी, मेरी आँखें भीग गयीं थीं…

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