आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

आस-पड़ोस की बातें

मेरा मोहल्ला संभवतः दिल्ली का सबसे इंटरेस्टिंग मोहल्ला होगा. इसके ऊपर मैंने कुछ दिन पहले एक लेख भी लिखा था मोहल्ला मोहब्बत वाला 🙂 . यहाँ पिछले पाँच सालों से रह रही हूँ. इसलिए काफी लोगों से परिचय भी हो गया है. लोगों से मेरा मतलब दुकानदारों से है, बकिया दोस्त-वोस्त तो हैं ही.

यहाँ सुबह से ही सब्जी की दुकानें लग जाती हैं, पर शाम को काफी ठेले होते हैं, जिनमें हर तरह की मौसमी सब्जियां मिल जाती हैं. एक दिन एक सब्जी वाले के पास हरी-हरी भिन्डी देखकर ठिठक गयी. उसके पास कुछ ही भिन्डी बची थी. मैंने दाम पूछा तो बोला, “वइसे तो आठ रूपिया पौव्वा हैं. मुला किलो-खांड लेइहो तो सस्ता लगा देबे.” (वैसे तो आठ रूपये पाव हैं, पर अगर किलो के लगभग लेना हो तो सस्ता लगा दूँगा.) मैं अपनी परिचित बोली सुनकर चौंकी. मैंने झट से पूछा, “उन्नाव के हो का भईया?”  “हाँ, मुला आपका कईसे मालूम?” वो आश्चर्य से पूछने लगा. मैंने कहा, “हमहूँ हुवन कि अहिन. पर तुम  हियाँ का करि रह्यो? उन्नावे के बगल मा तो कानपुर-लखनऊ जइसे बड़े सहर हैं.”( मैं भी वहीं की हूँ, पर तुम यहाँ क्या कर रहे हो. उन्नाव के बगल में तो वैसे भी लखनऊ-कानपुर जैसे शहर हैं?) तो बोला, “वी हमरी सास रहती रहैं हियाँ, तौ बुला लिहिन कि आओ हियाँ कमाव-खाव आके.” (मेरी सास रह रही थीं यहाँ पर, तो हमें भी बुला लिया कि तुम भी यहीं आकर कमाओ)  इस तरह मुझे मेरे बचपन के शहर का एक आदमी मिला और मुझे उससे वैसा ही अपनापन महसूस हुआ जैसा लड़कियों-औरतों को अपने पीहर के किसी भी व्यक्ति से होता है 🙂 . वो मेरा दोस्त बन गया था. पर इधर कई दिनों से वो नहीं दिख रहा है. लगता है कहीं और चला गया कमाने-खाने.

एक सेबवाला है. मुझे देखते ही बुलाता है, “बहिनजी, आपकी पसंद वाला जूस वाला किन्नौर सेब आया है.” एक-दो बार तो झेंप जाती हूँ कि कमबख्त को इतनी ज़ोर से चिल्लाकर बताने की क्या ज़रूरत है? पर उस बेचारे की गलती नहीं है. उससे बहुत दिनों से सेब खरीद रही हूँ. पर जब वो सुनहरे शिमला वाले सेब लाता है, तब नहीं लेती. मुझे वो खुसखुसे होने के कारण अच्छे नहीं लगते. तो जब वो लाल वाले जूसी सेब लाता है तो चिल्लाकर बताता है और गारंटी भी देता है कि अगर सेब में जूस नहीं हुआ तो वापस ले लेगा :-). है ना मजेदार इंसान?

एक आंटी हैं, जिनकी वीडियो लाइब्रेरी है. किराए पर सी.डी. देती हैं. उनके यहाँ से इतनी पिक्चरें लेती हूँ कि उन्हें मेरे घर का नम्बर तो याद ही हो गया है, ये भी याद है कि मैं कौन-कौन सी पिक्चरें देख चुकी हूँ? ( ये अलग बात है कि मेरा नाम नहीं मालूम :-)) एक-दो बार वो खुद ही मेरी पसंद की फ़िल्में सजेस्ट कर देती हैं. एक दिन उन्होंने मुझे “रेड एलर्ट” फिल्म देखने का सुझाव दिया. ये एकदम नयी फिल्म है और नक्सलवाद पर बनी ठीक-ठाक फिल्म है और मज़े की बात ये कि फिल्मों की इतनी शौक़ीन होने के बाद भी मैंने इसका नाम तक नहीं सुना था. जब उनके यहाँ मोज़रबियर की  पुरानी क्लासिक हिन्दी फिल्म की सी.डी. आती है, तो मुझे बता देती हैं. आज ही उन्होंने ‘नया-दिन नयी रात’ और ‘गोदान’ की सी.डी. दिखाई. उनके पास और भी कई पुरानी फिल्मों की सी.डी. हैं, जो मुझे देखनी हैं.

एक फ्रूटी है, जो अपने पति पेप्सी के साथ कोने के एक घर में पाली हुयी है. हाँ, क्योंकि वो एक डॉगी है. प्यारी सी फ्रूटी के यहाँ पिछले साल जब हम उसकी पपी “कली” को लेने गए थे, तो इतनी नाराज़ हुयी थी कि भौंक-भौंककर पूरे मोहल्ला सर पर उठा लिया था. पर अब मुझे देखकर भौंकती नहीं है. आकर मेरे पैरों पर खड़ी हो जाती है और कूँ-कूँ करती है, जैसे पूछती हो कि “मैंने अपनी बच्ची तुम्हें दी थी, देखभाल के लिए. अब वो कहाँ है बताओ?” कौन कहता है कि जानवर बोल नहीं सकते? वो बोलते हैं, अपनी आँखों से, अपने हाव-भाव से. फ्रूटी ने जब पहली बार मेरे पैरों पर खड़े होकर मेरी आँखों में प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा था, तो मैं उससे आँखें नहीं मिला पायी, मेरी आँखें भीग गयीं थीं…

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31 thoughts on “आस-पड़ोस की बातें

  1. मेंन इज ए सोशल एनीमल ….सही कहा गया है … अच्छा मोहल्ला है आराधना तुम्हारा और दोस्त भी.

  2. जड़-चेतन-मय परिवेश से सहज ही अपनापन हो जाता है – शायद इसे ही ‘परचना’ कहते हैं – और यह मानव मन के चेतन सह अवचेतन तक की व्यवस्था का हिस्सा हो जाता है . इस परचे जीवों का रचनात्मक परिचय अच्छा लगा . आभार !

    , और टेम्पलेट पर ऊपर से गिरती हुई श्वेत बूँदें – अकारण ही – मात्राओं की कालिख मिटाने का कालिख-कार्य करती हैं !

  3. सारी पुरानी फिल्में संभल कर रखना(अगर उसे save करके रखती हो तो).. जब भी मिलूँगा तब तकाजा करूँगा.. कली कि याद दिला दी कमबख्त..
    मुझे तुम्हारी उन्नाव वाली भाषा के बीच हिंदी खटक रही है.. मैं हूँ तो बिहार का, मगर यूं.पी., बंगाल और बिहार कि किसी भी भाषा को उसके हिंदी अनुवाद में पढ़ना पसंद नहीं है(भले ही उस भाषा का मुझे बहुत अधिक ज्ञान ना हो, मगर सिखने कि ललक उसका हिंदी अनुवाद पढ़ने से रोकती है)

    बहुत बढ़िया रहा ये भी.. 🙂

    • सेव नहीं करती प्रशांत, मेरे लैपटॉप की मेमोरी बहुत कम है. एक्सटरनल हार्ड डिस्क लेने वाली हूँ.
      और रही बात संवादों के अनुवाद की तो कुछलोगों को अवधी बिल्कुल समझ नहीं आती, तो लिखना पड़ा. वैसे तो मैं भी नहीं पसंद करती पोस्ट के बीच में अनुवाद, ये प्रवाह में बाधा बनती है.

  4. फ्रूटी की शिकायत ठीक ही है…तुम उसकी कर्ज़दार रहोगी ताउम्र …..समझने की बात है बस …

  5. बढ़िया पोस्ट.
    हिंदी और अंगरेजी की सर्वकालिक महान फिल्मों को शेयर करना हो तो मुझे ई मेल करो. मैं वसंत कुञ्ज में रहता हूँ.
    बहुत खूबसूरत थीम है. सब कुछ उजला और स्पष्ट. फॉण्ट भी खूबसूरत है.
    बर्फ तो चार जनवरी तक ही गिरेगी न?

    • धन्यवाद निशांत,
      मैं आपसे संपर्क करूँगी अगर कोई फिल्म नहीं मिलेगी तो… अमरेन्द्र की शिकायत पर मैंने बर्फ का गिरना रोक दिया है 🙂

  6. मोहल्लेकी बात और उससके लोग सच में ये आपका मोहल्ला है…..जहान लोग आपको पहचानते हों….दूर से देख कर ही पुकारते हों…..

  7. आस पड़ोस का जीवंत वर्णन -वैसे कहावत तो यह है कि ऐ मैन इज नोन बाई द कंपनी ही कीप्स….औरतों के बारे में भी यही सच होता होगा मगर दावे के साथ नहीं कह सकता! 🙂

  8. प्रवीण पाण्डेय on said:

    आपका मुहल्ला तो सचमुच जीवन्त है। आजकल सरल और अच्छा व्यवहार बहुत विरल हो गया है। जहाँ से भी मिल पाता है, लोग लपकने के लिये तैयार रहते हैं। वैसे हमारी ननिहाल उन्नाव की है, बोली समझ में आती है, बोली नहीं जाती है।

  9. फोटो, फोटो। इतनी बढ़िया पोस्ट पर एक अदद फोटो और होती!

    • जी ज्ञान जी, चूँकि पोस्ट पास-पड़ोस की है, इसलिए फोटो भी यहीं की होनी चाहिए थी. पर इतना सोचने के बाद भी अपने मोहल्ले की फोटो नहीं ले पायी.

  10. इस मोहल्ले पर तो फिल्म बननी चाहिए.. क्या बोलती हो?

  11. अडोस पड़ोस की बातें ही जीवन में जीवन्तता बनाये रखती हैं …फ्रूटी की आँखों की भाषा पढने में तुम सक्षम रहीं यह जान कर अच्छा लगा ..

  12. आपकी पोस्ट की चर्चा कल (18-12-2010 ) शनिवार के चर्चा मंच पर भी है …अपनी प्रतिक्रिया और सुझाव दे कर मार्गदर्शन करें …आभार .

    http://charchamanch.uchcharan.com/

  13. अच्छा लगा,तुम्हारे मोहल्ले के लोगो से मिलना….पहले भी एक झलकी देखी थी…और बड़ा आत्मीय सा लगा था ,सबकुछ .
    फिल्मे देखने का जिक्र पढ़ती हूँ तो एक कसक सी होती है…कितनी फिल्मे ड्यू हैं और देख नहीं पा रही. लकी हो तुम, यूँ बुला कर अच्छी फिल्मे थमा देती हैं वो आंटी.

  14. हमहूँ हुवन कि अहिन. पर तुम हियाँ का करि रह्यो? उन्नावे के बगल मा तो कानपुर-लखनऊ जइसे बड़े सहर हैं.”
    “वी हमरी सास रहती रहैं हियाँ, तौ बुला लिहिन कि आओ हियाँ कमाव-खाव आके.”
    …sach mein apni boli bolne walon se jab aprashit dhang se ham bhi bolte hai to wah chaounk jaata hai… tone se bahut baar pahchal lete hai ham logon ko… bahut din baad apni boli mein bolna bahut achha lagta hai n!

    bahut hi rochakta se aapne ados-pados ke bahane bahut achhi baaten kee.. bahut achha laga ..

  15. ”मेरा मोहल्ला संभवतः दिल्ली का सबसे इंटरेस्टिंग मोहल्ला होगा”. यह दृष्टिकोण ही है, जो किसी भी चीज को रोचक बना देता है. सपाट तो नहीं, लेकिन सरल बयानी का रस है पोस्‍ट में.

  16. हमने जबसे आस-पड़ोस को समझना, प्यार करना, आदर करना, हाल-चाल पूछना छोड़ दिया तभी से जिंदगी इतनी बेनूर हो चली है। संग रहने और रंग भरते रहने के लिए आपको साधुवाद।

  17. बहुत बढिया पोस्ट …..

  18. बेहतरीन! प्यारी और अंत में भावुक कर देने वाली पोस्ट!

  19. .
    .
    .
    आराधना जी,

    अच्छा लगा आपका मौहल्ला… अपना तो छोड़ आये पीछे कहीं… अब ‘कॉलोनी’ में जो रहते हैं 😦

  20. छोटी-छोटी बातों और घटनाओं में आत्मीयता का पुट आपके ब्लॉग को महत्वपूर्ण बना देता है. एक अच्छे ब्लॉग के लिये बधाई.

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