आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

Archive for the day “दिसम्बर 22, 2010”

अम्मा और मैं- एक अनोखा रिश्ता (3.)

कुछ महीने पहले एक कोशिश की थी, अठारह साल पहले इस दुनिया से रूठ गयी अपनी माँ से अपने रिश्ते को समझने की, उसे शब्दों में बाँधने की. सोचा था तीन कड़ियों में कुछ समेट पाऊँगी. वैसे तो माँ की यादों को कुछ शब्दों में नहीं समाया जा सकता, पर ये कोशिश, कुछ लिखने के बहाने इस अनोखे रिश्ते को समझने की थी- माँ-बेटी का रिश्ता, एक अनुशासनप्रिय माँ और एक उद्दंड बेटी का.

पर लिखने का ये सिलसिला साहस की कमी के कारण रुक गया, इस बात के डर से कि अम्मा के इस दुनिया से जाने के बारे में कैसे लिखूँगी? फिर सोचा कि जब खुद ही ये मानती हूँ कि वो हमेशा एक साये की तरह मेरे साथ हैं, तो फिर ये डर कैसा? इसलिए हिम्मत कर पायी कि ये पोस्ट लिखूँ. ये मेरा कन्फेशन होगा … जो शायद मेरे इस अपराधबोध को दूर कर सके कि मैंने उनके जीते जी कभी उन्हें समझने की कोशिश नहीं की, मेरी इस आत्मग्लानि को मिटा सके कि मैं कभी उनकी कोई सेवा नहीं कर सकी. हो सकता है कि इस बहाने मैं अपने आप को माफ़ कर पाऊँ या किसी तरह खुद को समझा पाऊँ.

किसी अपने के चले जाने पर हमें ना सिर्फ़ उसके ना होने का दुःख होता है, बल्कि उन तमाम बातों का भी दुःख होता है, जो उसके होने पर होतीं या जो हमने उससे कही होतीं. अम्मा का जाना अचानक नहीं हुआ. वो अक्सर बीमार रहती थीं. उन्हें आँतों की टी.बी. थी और मारे जिद के कभी ठीक से दवा नहीं कराती थीं. इस कारण बहुत अधिक दुबली हो गयीं और एक दिल के दौरे ने उनकी जान ले ली. पर उनके जाने के ठीक एक दिन पहले तक नहीं मालूम था कि कल वो नहीं होंगी. नहीं तो मैं वो सारी बात कह देती, जो उनके ना होने पर सोच-सोचकर रोती रहती.

मैं उनसे कहती कि मैं पूरी कोशिश करूँगी एक अच्छी लड़की बनने की, मन लगाकर पढूँगी, घर के काम में दीदी का हाथ बटाऊँगी, हमेशा दीदी का कहना मानूँगी, छोटे भाई से लड़ाई नहीं करूँगी, किसी को पलटकर जवाब नहीं दूँगी, लड़कों के साथ नहीं खेलूँगी, ज़ोर-ज़ोर से हँसूँगी नहीं और ऊँची आवाज़ में गाना भी नहीं गाऊँगी और… और भी बहुत कुछ. मैं उनसे बताती कि मैं उनकी बात का जवाब इसलिए देती हूँ कि वो डाँटकर बात करती हैं, अगर वो प्यार से कहें तो मैं हर काम कर दूँगी… अगर मुझे ज़रा सा भी पता होता कि कल वो हमारे बीच नहीं होंगी तो मैं अपने स्वभाव के विपरीत उनके गले लग जाती और कहती कि “अम्मा, तुम हमें सबसे प्यारी हो. हमें छोड़कर मत जाओ. तुम भले ही बिस्तर पर पड़ी रहो. हम तुम्हारी पूरी सेवा करेंगे, पर तुम रहो. तुम्हारा होना ही सब कुछ है.” पर, मैं नहीं कह पायी, कुछ नहीं कह पायी और एक पल में ही मेरे देखते-देखते वो विदा हो गयीं. मुझे लगा मानो वो मेरे ही व्यवहार से रूठकर इस दुनिया से चली गयीं.

किसी के जाने के ठीक पहले तक हमें नहीं पता होता कि कल वो हमारे बीच नहीं रहेगा. किसी के रहने ना रहने की बात छोड़ भी दें, तो भी हमें अपने अगले पलों के बारे में कुछ नहीं पता होता. आज जो हमारे साथ चल रहे हैं, कल रहें ना रहें. हम ही आज जैसे हैं, वैसे कल हों कि नहीं. पता नहीं आज जो हैं, कल वो परिस्थितियाँ रहें ना रहें. पता नहीं कल आज के जैसा हो कि नहीं… तो जब हमें कल का पता नहीं तो आज को क्यों गवाएँ? हमें आज को जीना चाहिए, उसे समझने की कोशिश करनी चाहिए. हमें जिसके लिए जो महसूस होता है कह देना चाहिए, किसी के दिल को दुखाये बिना…कोई काम ऐसा नहीं छोड़ना चाहिए, जिसके ना करने के कारण कल पछताना पड़े…

आज रुककर सोचती हूँ कि ये बातें तब समझ में आ गयी होतीं, तो शायद मुझे इस तरह पछताना नहीं पड़ता. हाँ, मैं छोटी थी, पर इतनी ज्यादा छोटी भी नहीं थी कि ये बातें ना समझ सकती. ये अपराधबोध मुझे अब भी सताता है कि मैंने अम्मा को कभी वो सम्मान नहीं दिया, जिसकी वो हकदार थीं. मैं हमेशा अपने में ही रहती थी. अम्मा के पास जाने से कतराती थी. उनके आख़िरी दिनों में मैंने कभी उनके पास बैठने की ज़रूरत नहीं समझी, कभी नहीं पूछा कि उन्हें किसी चीज़ की ज़रूरत तो नहीं, कि वो कुछ कहना तो नहीं चाहती हैं, और अब ये अपराधबोध मुझे सताता रहता है, ये ग्लानि मुझे परेशान करती रहती है. शायद मेरी ये सज़ा है कि मैं ज़िंदगी भर इस पछतावे में जीती रहूँ.

पिछली कड़ियाँ

अम्मा और मैं- एक अनोखा रिश्ता (1.)

अम्मा और मैं- एक अनोखा रिश्ता (2.)

भागना परछाइयों के पीछे-पीछे

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