आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

अम्मा और मैं- एक अनोखा रिश्ता (3.)

कुछ महीने पहले एक कोशिश की थी, अठारह साल पहले इस दुनिया से रूठ गयी अपनी माँ से अपने रिश्ते को समझने की, उसे शब्दों में बाँधने की. सोचा था तीन कड़ियों में कुछ समेट पाऊँगी. वैसे तो माँ की यादों को कुछ शब्दों में नहीं समाया जा सकता, पर ये कोशिश, कुछ लिखने के बहाने इस अनोखे रिश्ते को समझने की थी- माँ-बेटी का रिश्ता, एक अनुशासनप्रिय माँ और एक उद्दंड बेटी का.

पर लिखने का ये सिलसिला साहस की कमी के कारण रुक गया, इस बात के डर से कि अम्मा के इस दुनिया से जाने के बारे में कैसे लिखूँगी? फिर सोचा कि जब खुद ही ये मानती हूँ कि वो हमेशा एक साये की तरह मेरे साथ हैं, तो फिर ये डर कैसा? इसलिए हिम्मत कर पायी कि ये पोस्ट लिखूँ. ये मेरा कन्फेशन होगा … जो शायद मेरे इस अपराधबोध को दूर कर सके कि मैंने उनके जीते जी कभी उन्हें समझने की कोशिश नहीं की, मेरी इस आत्मग्लानि को मिटा सके कि मैं कभी उनकी कोई सेवा नहीं कर सकी. हो सकता है कि इस बहाने मैं अपने आप को माफ़ कर पाऊँ या किसी तरह खुद को समझा पाऊँ.

किसी अपने के चले जाने पर हमें ना सिर्फ़ उसके ना होने का दुःख होता है, बल्कि उन तमाम बातों का भी दुःख होता है, जो उसके होने पर होतीं या जो हमने उससे कही होतीं. अम्मा का जाना अचानक नहीं हुआ. वो अक्सर बीमार रहती थीं. उन्हें आँतों की टी.बी. थी और मारे जिद के कभी ठीक से दवा नहीं कराती थीं. इस कारण बहुत अधिक दुबली हो गयीं और एक दिल के दौरे ने उनकी जान ले ली. पर उनके जाने के ठीक एक दिन पहले तक नहीं मालूम था कि कल वो नहीं होंगी. नहीं तो मैं वो सारी बात कह देती, जो उनके ना होने पर सोच-सोचकर रोती रहती.

मैं उनसे कहती कि मैं पूरी कोशिश करूँगी एक अच्छी लड़की बनने की, मन लगाकर पढूँगी, घर के काम में दीदी का हाथ बटाऊँगी, हमेशा दीदी का कहना मानूँगी, छोटे भाई से लड़ाई नहीं करूँगी, किसी को पलटकर जवाब नहीं दूँगी, लड़कों के साथ नहीं खेलूँगी, ज़ोर-ज़ोर से हँसूँगी नहीं और ऊँची आवाज़ में गाना भी नहीं गाऊँगी और… और भी बहुत कुछ. मैं उनसे बताती कि मैं उनकी बात का जवाब इसलिए देती हूँ कि वो डाँटकर बात करती हैं, अगर वो प्यार से कहें तो मैं हर काम कर दूँगी… अगर मुझे ज़रा सा भी पता होता कि कल वो हमारे बीच नहीं होंगी तो मैं अपने स्वभाव के विपरीत उनके गले लग जाती और कहती कि “अम्मा, तुम हमें सबसे प्यारी हो. हमें छोड़कर मत जाओ. तुम भले ही बिस्तर पर पड़ी रहो. हम तुम्हारी पूरी सेवा करेंगे, पर तुम रहो. तुम्हारा होना ही सब कुछ है.” पर, मैं नहीं कह पायी, कुछ नहीं कह पायी और एक पल में ही मेरे देखते-देखते वो विदा हो गयीं. मुझे लगा मानो वो मेरे ही व्यवहार से रूठकर इस दुनिया से चली गयीं.

किसी के जाने के ठीक पहले तक हमें नहीं पता होता कि कल वो हमारे बीच नहीं रहेगा. किसी के रहने ना रहने की बात छोड़ भी दें, तो भी हमें अपने अगले पलों के बारे में कुछ नहीं पता होता. आज जो हमारे साथ चल रहे हैं, कल रहें ना रहें. हम ही आज जैसे हैं, वैसे कल हों कि नहीं. पता नहीं आज जो हैं, कल वो परिस्थितियाँ रहें ना रहें. पता नहीं कल आज के जैसा हो कि नहीं… तो जब हमें कल का पता नहीं तो आज को क्यों गवाएँ? हमें आज को जीना चाहिए, उसे समझने की कोशिश करनी चाहिए. हमें जिसके लिए जो महसूस होता है कह देना चाहिए, किसी के दिल को दुखाये बिना…कोई काम ऐसा नहीं छोड़ना चाहिए, जिसके ना करने के कारण कल पछताना पड़े…

आज रुककर सोचती हूँ कि ये बातें तब समझ में आ गयी होतीं, तो शायद मुझे इस तरह पछताना नहीं पड़ता. हाँ, मैं छोटी थी, पर इतनी ज्यादा छोटी भी नहीं थी कि ये बातें ना समझ सकती. ये अपराधबोध मुझे अब भी सताता है कि मैंने अम्मा को कभी वो सम्मान नहीं दिया, जिसकी वो हकदार थीं. मैं हमेशा अपने में ही रहती थी. अम्मा के पास जाने से कतराती थी. उनके आख़िरी दिनों में मैंने कभी उनके पास बैठने की ज़रूरत नहीं समझी, कभी नहीं पूछा कि उन्हें किसी चीज़ की ज़रूरत तो नहीं, कि वो कुछ कहना तो नहीं चाहती हैं, और अब ये अपराधबोध मुझे सताता रहता है, ये ग्लानि मुझे परेशान करती रहती है. शायद मेरी ये सज़ा है कि मैं ज़िंदगी भर इस पछतावे में जीती रहूँ.

पिछली कड़ियाँ

अम्मा और मैं- एक अनोखा रिश्ता (1.)

अम्मा और मैं- एक अनोखा रिश्ता (2.)

भागना परछाइयों के पीछे-पीछे

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24 thoughts on “अम्मा और मैं- एक अनोखा रिश्ता (3.)

  1. तीनो लेख पढ़े बहुत सरल भाषा मे आपने मन की भावनायो को व्यक्त किया है …मन भर आया …..लिखते रहिये खुश रहिये ……

  2. “ये मेरा कन्फेशन होगा … जो शायद मेरे इस अपराधबोध को दूर कर सके कि मैंने उनके जीते जी कभी उन्हें समझने की कोशिश नहीं की”–Touching!
    -Ashok Lav


  3. यह कष्ट हममे से अधिकतर को है मुक्ति..अफ़सोस यही है कि उनके जाने के बाद उनकी याद आती है ….कुछ माँ के बारे में लिंक दे रहा हूँ ..शायद अच्छे लगेंगे

    http://satish-saxena.blogspot.com/2010/07/blog-post_22.html
    http://satish-saxena.blogspot.com/2008/07/blog-post_20.html
    http://satish-saxena.blogspot.com/2010/06/blog-post.html
    http://amar-randomrumblings.blogspot.com/2008/11/blog-post_10.html

  4. प्रवीण पाण्डेय on said:

    इस स्वजनित अपराध भाव को मन से निकाल दें। माँ और बिटिया के मनों में जो संवाद चलता है, उसे निकटता व भौतिक संवाद से न तो नापा जा सकता है और न ही व्यक्त किया जा सकता है। माँ की आत्मा अपने बच्चों में सदा बसी है, आपमें भी अपने माँ के आत्मिक अंश हैं, उन्हें आप बस पोषित करके रखें।

  5. आज तीनों कड़ियाँ एक साथ पढ़ीं …माँ बेटी के मन को भावनात्मक शब्दों में बाँध दिया है …मांएं ऐसी ही होती हैं ..बाहर से कठोर और अंदर नर्म दिल …ज़रा सी बात पर आंसू आ जाते हैं …जो तुम माँ से कहना चाहतीं थीं वो सब माँ पहले से जानती थीं …

    तुम्हारी इस पोस्ट को पढ़ कर अपने बच्चों की भावनाओं को समझने का मौका मिला ..आज अपने बच्चों को तुम्हारी जगह रख कर सोच रही हूँ ….आँखें नम हो गयी हैं …बच्चे भी न कहते कुछ हैं पर सोचते कुछ हैं … पर फिर भी माँ के अन्दर की शक्ति उनकी भावनाओं को पढ़ लेती है ….

  6. आँखे नम हो आयी …लगा सब भाव और शब्द मेरे ही हैं -यहाँ माता जी हैं मेरे संदर्भ में पिता जी !
    मगर प्रवीण जी का कहना ठीक है ..अपने आत्म को यूं पीड़ित न कीजिये ….गीता भी यूं आत्म हनन का निषेध करती है ..आप तो गीता पढ़ती नहीं ..कि पढ़ती हैं ?

  7. आराधना,
    माँ को वो सब पता था ,जो तुम उनसे कह नहीं पायी. और तुम्हारी वो उम्र ही ऐसी थी जब माँ की रोक-टोक उनकी बातें अच्छी नहीं लगतीं.
    और तुम्हे ऐसा लगता है कि माँ को तुम्हारा लडको के साथ खेलना, ऊँचे स्वर में गाना गाना ये सब पसंद नहीं था…सच कहूँ….अम्मा मन ही मन मुदित होती होंगी….कि वे जो सब नहीं कर सकीं वो तुम कर रही हो…पर लोगो को दिखाने को डांटना तो पड़ता है,ना .बस एक यही वजह होगी तुम्हे बरजने की.

    इसलिए यह अपराध बोध बिलकुल मन से निकाल दो….तुमने अम्मा को एक अलग सी निर्भीक बेटी बन कर दिखाया…एक अलग अनुभव से परिचित करवाया उन्हें.

  8. Hi Aradhana,

    That’s a real tragic confession.Hope it makes you feel better !! Life is both black and white.The shades of darkness help us to intercept the value of light in new way. Anyway,the theme of your writing has shades of one of the quotes that I posted on Facebook sometimes back.

    ******************
    “It’s only when we truly know and understand that we have a limited time on earth — and that we have no way of knowing when our time is up — that we will begin to live each day to the fullest, as if it was the only one we had.-”

    – Elisabeth Kubler-Ross
    ************************

    I had posted the quote with exactly the same thoughts in my mind that you have jotted down right now in your own way. Interestingly,one of your Orkut quotes echoed the same theme.I find this post the extension of the same theme.

    Anyway,let’s express our guilt complexes in black and white instead of allowing them to rule the chambers of heart and mind;allowing them to kill us slowly. I am posting the excerpts of your post on my page so that some more souls come to read it.

  9. अब अपने आसपास की मांओं में इस रिश्‍ते और भूमिका के संधान का प्रयास कीजिए, मां की मुस्‍कुराहट और सुकून महसूस कर पाएंगी .

  10. गीता का प्रश्नगत श्लोक जिस और मैंने संकेत किया था ,यह है –
    उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत
    आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः
    अध्याय ६,श्लोक ५
    अपने द्वारा अपना उद्धार करें ,अपने को अवसाद में न डालें
    क्योंकि मनुष्य स्वतः ही अपना मित्र है और अपना शत्रु भी

  11. I read all three parts and just broke into tears…
    mera aur meri mummy ka rishta bhi ajeeb sa ho jata hai kabhi kabhi… parayo jaisa feel hota hai tab.. lekin mummy ki nazariye se bhi dekhne ki koshish karti hu.. fir mummy ke saare kaam khatm karwake unhe bitha ke ek bahut lamba discussion karti hu.. fir sorry kehti hu.. ro bhi padti hu.. jaise jaise badi ho rahi hu na handle kar paa rahi hu.. aajkal to gaana gaa ke manati hoon… ye wala..”acha ji mai haari chalo maan jaao na !” (man me sochti hu.. its okay mai zara “hahakari” type ki ladki hu..😛 par sabkuch mumma par hi aazmaana zaruri hai kya.. maa hain akhir meri!)
    acha mai aapko ek tight hug kar sakti hoon ?🙂

  12. मेरी मांं को भगवान के पास गये २५ वर्ष से अधिक समय हो गया पर उनकी यादें, उनकी सीख मेरे जहन में अभी भी बसी है। कभी मुश्किल होती है तो सोचता हूं कि अम्मा क्या करतीं वही करने का प्रयत्न करता हूं।

  13. मन कैसा- कैसा तो हो गया है …
    रश्मि से सहमत हूँ की माँ बेटी को डांटती रहे , मगर भीतर ही भीतर खुश भी होती है की उसके बेटी वह सब कर पा रही है जो वह कर नहीं पाई …तुम्हारी निर्भीकता और ईमानदारी से आत्मावलोकन प्रभावित कर रही है …
    जो हम अपने माता पिता के लिए नहीं कर पाए , उनके लिए करें जिनको इसकी जरुरत है तो यह आत्मसंतोष हर अपराधबोध को दूर करता है …
    बहुत स्नेह !

  14. आराधना जी,
    आज पूरा संस्मरण एक साथ पढ़ा ,समझ नहीं पा रही हूं कि अपने भाव कैसे व्यक्त करूं
    ये रिश्ता दुनिया का सब से निश्छल और निस्वार्थ भावना से पूर्ण रिश्ता है ,मां के लिये उस के बच्चे उस की अमूल्य धरोहर होते हैं उस का स्पर्श ही बच्चे की तकलीफ़ें हर लेता है ,आप का ये दुख अगर उन की आत्मा तक पहुंचा तो वो दुखी ही होंगी ,इस लिये अपने दुख का अंत करने का प्रयास करें ,ख़ुश रहा करें तभी वो भी जहां रहेंगी सुखी रहेंगी
    इतनी सहजता से लिखा गया ये लेख आंखें ज़रूर नम कर देता है

  15. ग्लानि से उबरने के बाद ही भावनाओं का सही सम्मान हो सकता है ।

  16. सेंटी-सेंटी हो गया। यादों में खो गया।

  17. शायद मेरी ये सज़ा है कि मैं ज़िंदगी भर इस पछतावे में जीती रहूँ….
    बहुत हल्की सज़ा चुन रही हैं आप…🙂

    बेहतर….

  18. ओह! महसूस कर सकता हूं।

  19. ‘किसी अपने के चले जाने पर हमें ना सिर्फ़ उसके ना होने का दुःख होता है, बल्कि उन तमाम बातों का भी दुःख होता है, जो उसके होने पर होतीं या जो हमने उससे कही होतीं’
    सच कहा है आप ने आराधना जी,
    जब कोई दूर चल जाता है ,न जाने कितने ऐसे ख्याल दिल और दिमाग में आते रहते हैं..जब तक सब कुछ सहज है सामान्य है हम किसी भी अनहोनी के बारे में नहीं सोचते न सोचना चाहते .
    अंतिम पंक्तियाँ ही जीवन का सत्य ही है कि ‘ हमें इस बात का ज्ञान ही नहीं कि अगले पल हम जैसे हैं वैसे रहेंगे भी?’
    …’गुज़ारिश’ अभी तक दिमाग में कहीं कुछ कुरेदती रहती है.एक ज़िंदगी है अपने पास. अपने अपनों के पास ..क्यों न जी लें हर पल को भरपूर ,कह लें जो दिल में है..सुन लें सब कुछ जो सुनाना चाहता है कोई..

  20. सुदूर खूबसूरत लालिमा ने आकाशगंगा को ढक लिया है,
    यह हमारी आकाशगंगा है,
    सारे सितारे हैरत से पूछ रहे हैं,
    कहां से आ रही है आखिर यह खूबसूरत रोशनी,
    आकाशगंगा में हर कोई पूछ रहा है,
    किसने बिखरी ये रोशनी, कौन है वह,
    मेरे मित्रो, मैं जानता हूं उसे,
    आकाशगंगा के मेरे मित्रो, मैं सूर्य हूं,
    मेरी परिधि में आठ ग्रह लगा रहे हैं चक्कर,
    उनमें से एक है पृथ्वी,
    जिसमें रहते हैं छह अरब मनुष्य सैकड़ों देशों में,
    इन्हीं में एक है महान सभ्यता,
    भारत 2020 की ओर बढ़ते हुए,
    मना रहा है एक महान राष्ट्र के उदय का उत्सव,
    भारत से आकाशगंगा तक पहुंच रहा है रोशनी का उत्सव,
    एक ऐसा राष्ट्र, जिसमें नहीं होगा प्रदूषण,
    नहीं होगी गरीबी, होगा समृद्धि का विस्तार,
    शांति होगी, नहीं होगा युद्ध का कोई भय,
    यही वह जगह है, जहां बरसेंगी खुशियां…
    -डॉ एपीजे अब्दुल कलाम

    नववर्ष आपको बहुत बहुत शुभ हो…

    जय हिंद…

  21. क्या कहूं आराधना ? कहने से ज़्यादा कुछ सीखने का मन कर रहा है.

  22. पिंगबैक: लड़कियाँ, अपने आप में एक मुक्कमिल जहाँ होती हैं | चिठ्ठा चर्चा

  23. aapbeeti kuch kuch apni see lagi mari maa bhi 27 march 2010 ko sidhar gayi.nujhay aaj bhi lagta hi voh kahi aas pass hi hai.liver cansar unkay liya jaanlava hua.main unki sabsay payari dost aur voh mari sabsay pakki sahali.

  24. aap ki amma beti se kafi milti julti meri life h. aur ye sayad mujhe sudhar de……..
    mujhe v yahi lagta h ki meri maa v ishi tarah h. mai v unki koi baat nhi manti hu. unko jabaab de deti hu. wo v meri baat nhi samjhti , na mai unki. hm 4 sister h aur 1 brother . lekin mujhe lagta h ki puri ghar me hm v sabse jada kamine h .sab mere se paresaan rahte h. lekin indino mujhe frd mila h aur wo mujhe bahut samjhta h,sayad meri ye naoubat na aaye aur mai apna behaviour change kar pau.mai kosis karungi. or meri v didi achhi h lekin mujhe aaj tak ushne samjhaya hi nhi .

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