आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

Archive for the month “जनवरी, 2011”

दर्दे-ए-हिज्र बेहतर है फिर तो तेरे पास होने से

मुझे तारीखें याद नहीं रहतीं. पिछली दफा तुम किस तारीख को आये, कब गए, अगली बार कब आओगे, कुछ भी नहीं. मैं कैलेण्डर के पन्ने नहीं पलटती, जिससे तुम्हारे जाने का दिन याद रहे… और जब तुम आते हो, तो अपने हाथों से नयी तारीख लगाते हो.

तुम्हारे जाने से ज़िंदगी ठहर सी जाती है. यूँ लगता है कोई हलचल ही नहीं. ना सुबह उठने की जल्दी, ना कोई काम करने का मन. बस पड़े रहने का जी करता है, जिससे ठहरी हुयी ज़िंदगी से तालमेल बिठाया जा सके.

तुम्हारे आने के ठीक पहले परदे धो दिए जाते हैं, चादरें बदल दी जाती हैं, घर के सामानों पर पड़ी धूल पोछकर साफ़ कर दी जाती है, गुलदान में नए फूल लगा दिए जाते हैं.  बस, तारीख नहीं बदली जाती, क्योंकि उसका रुके रहना या बदलना तुम तय करते हो.

और फिर…

तुम्हारे आने पर महक उठते हैं मुरझाए हुए फूल, उनके रंग चटख हो उठते हैं, पत्ते अधिक हरे हो जाते हैं, खिड़की के बाहर का आसमान गहरा नीला हो जाता है. पर… मैं ये सब नहीं देखना चाहती. मैं तुम्हारे होने को किसी और से बाँटना नहीं चाहती. फिर गहरा सन्नाटा. सुकून देता हुआ. बहुत देर तक…

‘कब जाना है?’

‘परसों’

…सुनकर लगा ज्यों दिल ने अपनी जगह छोड़ दी हो, पर काम दोगुना कर दिया. अब धडकन गले में सुनायी दे रही है और भी तेज…आँखें दो दिन बाद की घटनाएँ देखने लग जाती हैं. कान बीस डेसीबल से भी कम की आवाज सुन सकते हैं.  सन्नाटा और भी गहरा हो जाता है, पर सुकून नहीं देता. बेचैन कर देता है.

अड़तालीस घंटे अभी बाकी हैं. पर खर्चूं कैसे ? हिसाब जो नहीं आता. मुझे मालूम है मैं खर्चीली इन्हें यूँ ही गँवा दूँगी. हमारे दिल की धडकनें कुछ सोचने भी तो नहीं देतीं…

अजीब सी स्थिति है. इसे समझना मुश्किल है. गणित के सवाल हल करने से भी ज्यादा.  मुझे खुद नहीं मालूम कि मेरी हालत कैसी हो गयी?

…पता है …?

इस समय मैं दुखी नहीं हूँ. बिल्कुल नहीं. क्योंकि तुम पास हो,  लेकिन …

तुम्हें जाना है… इसलिए मैं खुश भी नहीं…

2010 in review

The stats helper monkeys at WordPress.com mulled over how this blog did in 2010, and here’s a high level summary of its overall blog health:

Healthy blog!

The Blog-Health-o-Meter™ reads Wow.

Crunchy numbers

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The average container ship can carry about 4,500 containers. This blog was viewed about 14,000 times in 2010. If each view were a shipping container, your blog would have filled about 3 fully loaded ships.

 

In 2010, there were 51 new posts, growing the total archive of this blog to 60 posts. There were 187 pictures uploaded, taking up a total of 135mb. That’s about 4 pictures per week.

The busiest day of the year was April 20th with 243 views. The most popular post that day was ज़िन्दगी का एक खराब दिन .

Where did they come from?

The top referring sites in 2010 were blogvani.com, networkedblogs.com, hi.wordpress.com, chitthajagat.in, and WordPress Dashboard.

Some visitors came searching, mostly for बादल पर कविता, चाचियाँ, कजरी, बया, and प्यासी थी.

Attractions in 2010

These are the posts and pages that got the most views in 2010.

1

ज़िन्दगी का एक खराब दिन April 2010
50 comments

2

About May 2009
26 comments

3

ओढ़े रात ओढ़नी बादल की July 2010
40 comments

4

मैं प्यासी August 2010
34 comments

5

सुनो… मुझे तुम्हारी ये बातें अच्छी लगती हैं. June 2010
55 comments and 1 Like on WordPress.com,

नए साल का उपहार ‘सोना’

कभी-कभी लगता है कि ज़िंदगी कितनी बकैत चीज़ है. कितनी बेरहम. किसी की नहीं सुनती. कभी नहीं रुकती. लोग आयें, बिछड़ जाएँ. साल आयें, बीत जाएँ.  ये चलती ही जाती है. सब कुछ रौंदती. किसी बुलडोज़र की तरह अपना रास्ता बनाती.

तो ये चल रही है. तारीखों के आने-जाने का इस पर कोई असर नहीं. कुछ खास तारीखें बस एक मौका देती हैं, मुड़कर एक बार देख लेने का कि ज़िंदगी कितनी बीती, कैसे बीती? कुछ हिसाब-किताब खोने-पाने का. कुछ अफ़सोस, कुछ खुशियाँ. नए साल की पूर्व संध्या भी ऐसी ही एक तारीख है जो अचानक मानो अपनी धुन में चल रही ज़िंदगी को एक झटका देती है कि ‘देख, तू बीत रही है. धीरे-धीरे रीत रही है और एक दिन खाली हो जायेगी, चुक जायेगी.’ तब होश आता है कि दोस्तों, ये ज़िंदगी तो ऐसी ही है. इसे लाइन पर लाना पड़ेगा. क्यों भाग रही है दुनिया से रेस मिलाने को? रोको इसे. कुछ लम्हें चुरा लो, कुछ खुशियाँ झटक लो. नहीं तो ये बीत जायेगी और हम हाथ मलते रह जायेंगे.

तो मैंने भी इस साल कुछ खुशियाँ झटकने की कोशिश की है. एक नया ब्लॉग बनाया है कि मैं नए-नए लोगों के विचार और भावनाएँ जान सकूँ और उसे अपने दोस्तों को बता सकूँ. … और एक पपी पाली है ‘सोना.’ ये मेरा खुद से खुद को क्रिसमस और नए साल का उपहार है. खुशियाँ कहीं बाहर नहीं होतीं, अपने ही अंदर होती हैं, बस उनको खींचकर बाहर निकालना होता है, नहीं तो ये बेरहम ज़िंदगी उन्हें अपने साथ ही लिए जायेगी.  खुशियाँ मनाने का ये मेरा अपना तरीका है. अपने जन्मदिन पर अकेली थी, तो खुद ही जाकर पेस्ट्री ले आयी और रात में एक मूवी देखते हुए पेस्ट्री खाई और आज मैं अपनी पपी के साथ नए साल की खुशियाँ मना रही हूँ. उसे पेस्ट्री नहीं खिला सकती तो उसका हिस्सा भी खुद खा रही हूँ   🙂

सोना येलो लेब्रेडोर है. अभी सिर्फ़ सैंतीस दिन की है, इसलिए मुझे उसको ठण्ड से बचाने के लिए अपने पास सुलाना पड़ता है और वो किसी छोटे बच्चे की तरह मेरी बाँह पर सर रखकर सो जाती है. मेरे हिलने-डुलने पर अजीब सी आवाज़ निकालती है गूं-गूं करके   🙂

ये रही उसकी कुछ फोटोग्राफ्स

इससे मिलती-जुलती कड़ियाँ:

मेरे घर आयी एक नन्हीं कली

अब सब कुछ पहले जैसा है

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