आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

वो ऐसे ही थे (2.)

मेरे बाऊजी मार्क्स के विचारों से बहुत प्रभावित थे. लेकिन वे जितने बड़े प्रशंसक मार्क्सवाद के थे, उतना ही उन्हें व्यक्तिगत स्वतंत्रता से लगाव था. ये दोनों ही परस्पर विरोधी विचार मझे विरासत में मिले हैं. जब हम बहुत छोटे थे और शीतयुद्ध का मतलब भी नहीं जानते थे, तब बाऊ हमें अमेरिका और रूस की परस्पर शत्रुता के किस्से सुनाया करते थे. और बेहद रोचक कहानियों से दोनों की राजनीतिक व्यवस्था के अंतर को समझाते थे. वो अस्सी का दशक था. शीतयुद्ध का आख़िरी दशक.

ऐसा ही एक किस्सा मुझे याद आ रहा है, जो शीतयुद्ध के शुरुआती दिनों के माहौल के बारे में संकेत देता है, जब रूस कई मामलों में अमेरिका से बहुत आगे था. उसके नागरिकों का जीवनस्तर अन्य विकसित देशों की अपेक्षा कहीं अधिक ऊँचा था. ये किस्सा है- दो कुत्तों का किस्सा. एक अमेरिका का कुत्ता था और एक रूस का, जो तब सोवियत संघ हुआ करता था. रूस के कुत्ते को सारी सहूलियतें मिली हुयी थीं. उसे समय-समय पर अच्छा खाना दिया जाता था. उसके रहने के लिए शानदार केज था. उसे सुन्दर सा चमड़े का पट्टा पहनाया गया था. वहीं अमेरिका का कुत्ता टपोरियों की तरह घूमा करता था. भूख लगती थी तो किसी के भी घर से रोटी माँगकर खा लेता था. और नींद लगने पर कहीं भी सो जाता था. अपने मालिक के पास भी ज्यादा देर नहीं ठहरता था.

पर एक बात अटपटी सी थी. सारी सुविधाओं के बीच रहते हुए भी सोवियत संघ का कुत्ता दुबला-पतला था और सूखी रोटी खाकर भी अमेरिका का कुत्ता तंदरुस्त था. सोवियत संघ के कुत्ते को जब सुबह घुमाने ले जाया जाता तो उसे इधर-उधर घूमते अमेरिकी कुत्ते को देखकर बहुत आश्चर्य होता. एक दिन उसने अमेरिकी कुत्ते से पूछा, “यार, एक बात बता, तुझे सूखी रोटी भी माँगकर खानी पड़ती है. सोने के लिए ठीक-ठाक बिस्तर भी नहीं है. फिर भी तू इतना मोटा-ताजा क्यों है और मैं इतना दुबला कैसे हूँ?” अमेरिका का कुत्ता मुस्कुराया और उससे बोला, “इसका कारण वो एक चीज़ है, जो मुझे मिलती है, तुझे नहीं मिलती.” “क्या?” सोवियत संघ के कुत्ते ने पूछा. ” मुझे भौंकने को मिलता है.” कहकर अमेरिका का कुत्ता पूँछ उठाकर पार्क के दूसरी ओर चल दिया.

मैं अक्सर आज भी ये किस्सा याद करती हूँ और सोचती हूँ कि बाऊ जी ने हमें बचपन से ही कई आयामों से चीज़ों को देखना सिखाया. वो अक्सर कहा करते थे कि ये तुम्हारे ऊपर है कि तुम रोटी के लिए अपनी स्वतंत्रता की कीमत अदा करते हो या स्वतंत्रता के लिए रोटी की. उन्होंने कभी नहीं कहा कि तुम ये राह चुनो या वो. ये हम पर ही छोड़ दिया. मुझे मालूम है कि आज के युग में रोटी की जद्दोजहद बहुत मुश्किल है और अच्छे-अच्छों के हौसले पस्त कर देती है, लेकिन मैंने हमेशा आज़ादी चुनी है.

लेकिन, मुझे ये भी मालूम है कि ये आज़ादी भी अधूरी है क्योंकि ये किसी की दी हुयी आज़ादी है. मैं तब भी ये सोचती थी कि अगर रूस के कुत्ते को भौंकने का भी अधिकार मिलता तो वो सबसे ज्यादा अच्छी स्थिति होती. पर ऐसी स्थिति सिर्फ़ एक सपना है आज भी. किसी को भी पूरे अधिकार नहीं मिले हैं. भौंकने का अधिकार देकर हमें अपनी आज़ादी के भ्रम में छोड़ दिया जाता है. हम छोटे से छोटे कारण के लिए अपनी झूठी आज़ादी छोड़ने को तैयार नहीं होते. हमारे मन में व्यवस्था की खामियों को लेकर भरा हुआ गुबार निकालने के लिए ये झूठी आज़ादी ‘सेफ्टी वाल्व’ का काम करती है और हम सच्ची आज़ादी से वंचित रह जाते हैं.

आज जब विश्व के कुछ देशों में जनता सड़कों पर निकल आयी है, तो सोचना यह है कि वो किस आज़ादी की तलाश में है – भौंकने की आज़ादी या रोटी की. निस्संदेह वो देश ऐसे हैं, जहाँ रोटी की इतनी कमी नहीं. उन्हें भौंकने का अधिकार चाहिए, लेकिन वो भी शर्तहीन. ऐसी नहीं जैसी हमारे देश में मिली हुयी है, जहाँ भौंकने का अधिकार तो मिला हुआ है, लेकिन उसे अलग-अलग राजनीतिक दल खरीद लेते हैं. मेरे ख्याल से सच्ची आज़ादी वही होगी, जिसमें हमें भौंकने के अधिकार के साथ रोटी का भी अधिकार मिले, खाली पेट कोई कितना भौंक सकता है?

हम बाऊ जी से लगभग सभी अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर बात करते थे. जब भी किसी देश में कोई हलचल होती थी, तो वहाँ का इतिहास खंगालने के लिए हमें किताबों का सहारा नहीं लेना पड़ता, बाऊ उसे जबानी बता देते. और ये तो सभी को मालूम है कि किसी भी क्रान्ति की जड़ें इतिहास में होती हैं. मैं आज भी जब ऐसी खबरें सुनती हूँ या किसी अटपटे से प्रश्न पर अटकती हूँ, तो बाऊ की याद बेतरह आती है.

इससे मिलती कड़ी-

वे ऐसे ही थे (1.)

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28 thoughts on “वो ऐसे ही थे (2.)

  1. मेरे ख्याल से सच्ची आज़ादी वही होगी, जिसमें हमें भौंकने के अधिकार के साथ रोटी का भी अधिकार मिले, खाली पेट कोई कितना भौंक सकता है…
    इन पूरे लोगों को समसे ज्यादे समझ थी….राजनीति और अर्थशास्त्र की…..कितबें नहीं वे प्रेक्तिक्ली जानते थे…पता नहीं पूरी आज़ादी है…क्या..?
    एक चलवा ही है शायद..एक इडियल चीज ..जो कभी हकीकतन पोसिबल नहीं है…

  2. ज्ञान और दर्शन का अद्भुत पिटारा है तुम्हारा यह संस्मरण .अपने बड़ों की इन्हीं चर्चाओं और किस्सों से हमें अपने जीवन का मार्ग मिलता है.
    बेहतरीन लिखा है जारी रखो .

  3. यह संस्मरण रोचक के साथ ज्ञानवर्द्धक भी है ….

  4. अभी अभी लौटा हूँ भोपाल से मगर काम के बोझ के बावजूद यहाँ आकर यह संस्मरण पढने से खुद को रोक नही पाया –
    कुत्ते की कथा बहुत मर्मभरी है ….आगे के अंक का इंतज़ार है !

  5. अच्छा लगा बाबू जी के बारे में यह संस्मरण पढ़कर. कुत्तों के माध्यम से बहुत गूढ बात समझाई है.

  6. बहुत दिलचस्प और कारगर तरीके से समझाया बाउजी ने।

    यूं अंजुले की बात भी विचारणीय है कि:

    “…एक छलावा ही है शायद..एक आयडियल चीज ..जो कभी हकीकतन पोसिबल नहीं है…


  7. भौंकने ( अभिव्यक्ति ) के अधिकार को रोटी से जोड़ देने पर भौंकने के स्वर में बदलाव की सँभावनायें बलवती हो उठती हैं ।
    पारिश्रमिक के बदले में नारे लगाने वाले रैलियों को गुलज़ार करते हुये जनमत मोड़ने के हथियार बन कर रह जाते हैं ।
    सर्वजन सर्वहारा समुदाय से सहानुभूति के चलते उनके मध्य कार्य करने के दौरान मैंने पाया कि अपने देशकाल में आज़ादी का सच मार्क्स के दर्शन से बिल्कुल अलग है ।
    इसे अपने बाऊ जी की विद्वता पर किसी आक्षेप के रूप में मत लेना !

    • रोटी के लिए स्वतंत्रता गिरवी रखनी पड़ती है. ये बात बाऊ जानते थे और इसीलिये उन्होंने ये हम पर छोड़ दिया था कि हम दोनों में से किसे चुनें.

  8. पिंगबैक: Tweets that mention वो ऐसे ही थे (2.) | Aradhana-आराधना का ब्लॉग -- Topsy.com

  9. प्रवीण पाण्डेय on said:

    इन दो धुर विचारधाराओं में साम्य ढूढ़ लाना भारतीय हृदय का ही कार्य हो सकता है।

  10. अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता में हमारा देश किस से पीछे नहीं.

    • हमारे देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है, लेकिन वो अलग-अलग कारणों से बंधी हुयी है, कभी व्यक्तिगत स्वार्थ से तो कभी किसी और कारण.

  11. हमारे देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है, लेकिन वो अलग-अलग कारणों से बंधी हुयी है, कभी व्यक्तिगत स्वार्थ से तो कभी किसी और कारण.
    सही कहा आराधना जी ने….मैं आपके विचारों से सहमत हूँ …अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कई कारणों से बिक जाती है और मैं तो यह भी कहूँगी कि छोटे-छोटे स्वार्थों के लिए बिक जाते हैं ….विचारोत्तेजक अच्छा लेख है …शुभकामनाओं सहित…

  12. क्रान्तिया जब तक सफल नहीं हो पाती जब तक जनसमूह उनसे न जुड़े ओर अपनी उस उर्जा को बरकरार रखे ….बिना किसी उद्देश्य से सहज भावना से होने वाला आक्रोश अमूमन अपने रास्ते से भटक जाता है ……अभिव्यकति की आज़ादी किसी भी लोकतान्त्रिक समाज का आवश्यक हिस्सा है…..ओर किसी देश के विकास के लिए विचारो की उड़ान बेहद जरूरी है

  13. जहां जनता सड़कों पर निकली है वहाँ रोटी की कमी ना सही पर रोटी बेहद मंहगी हो गई है इसलिए जनता को दोनों कारणों से बाहर आया मानिए !

    रोटी के अधिकार पे कोई दो मत नहीं पर किसी भी लोक कल्याणकारी राज्य में ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी’ और ‘व्यक्तिगत स्वतंत्रता’ के ‘मायने’ पहले ही तय किये जाने चाहिए ! ये दोनों अंतहीन और अपरिभाषित प्रकृति में स्वीकार्य नहीं होनी चाहिए !

    आपके पिता जी को नमन !

  14. असली व्यापक व्यक्तिगत स्वतंत्रता की परिस्थितियों का निर्माण, एक नियोजित समाज में ही हो सकता है…
    मार्क्सवादी दर्शन व्यक्तिगत स्वतंत्रता के ख़िलाफ़ नहीं, वरन इसी व्यापक असली स्वतंत्रता के निर्माण की आकांक्षा में जन्मा है…

    खैर…एक बेहतर संसमरण आलेख…

  15. बड़ों की बातों में ज्ञान का भण्डार छुपा होता है…और जब-जब हम असमंजस में होते हैं…कुछ समझ नहीं आता…उनलोगों की कोई भूली बात याद आ जाती है…और सब सूर्य-प्रकाश सा स्पष्ट हो उठाता है…

  16. सम्भवतः ये आगाज ईक नयी दिशा देगा..,
    दूरी…. रोटी और अभिव्यक्ति में मिटा देगा….,
    हमें भी अपनी जमिं अपना आसमां देगा..,
    कुछ और बाऊ जी…कुछ आराधना देगा…

  17. अच्छी बातें बाऊ जी की यादों से जुड़ कर और भी मर्मस्पर्शी हो गयी हैं.

  18. बहुत सही! अमरीकी कुकुर बेहतर!

  19. यह संस्मरण रोचक के साथ ज्ञानवर्द्धक भी है|

  20. हमेशा की तरह इस संस्मरण को पढ़ना बहुत अच्छा लगा। सही मायने में बहुत बड़े और समझदार मन वाले थे तुम्हारे बाबूजी।

  21. बहुत ही अच्छा प्रयास किया आपने………मुबारक इस रचना और इसके खूबसूरत अंदाज़ के लिए… रेक्टर कथूरिया

  22. आराधना जी…बहुत ही अच्छा प्रयास किया आपने………मुबारक इस रचना और इसके खूबसूरत अंदाज़ के लिए….रेक्टर कथूरिया

  23. प्रिय आराधना जी,
    जी, बाऊजी का विचार एक सम्पूर्ण स्वतन्त्रता – मनसा, वाचा और कर्मणा की ओर इंगित करता है । आप ठीक कहती हैं कि हमारे देश में आजादी , अपने लोगों के आर्थिक, शैक्षिक व सामाजिक पिछडेपन का कमजोरी के कारण, आज भी निहित स्वार्थों के चंगुल से मुक्त नही हुई है। बाऊजी के विचारों व सपनों वाली आजादी तो देश के आमूल आर्थिक, शैक्षिक विकाश में ही निहित है । इतने भावपूर्ण व सुन्दर अभिब्यक्ति हेतु आपका हार्दिक अभिनन्दन ।

  24. काफी हद तक हमारा इतिहास हमारे भविष्य का आईना है , मुझे हालाँकि घर में तो ऐसा को माहौल नहीं मिला लेकिन स्कूल में मेरे एक सर जो मुझे इतिहास पढ़ाते थे उनका पढाने का तरीका कुछ ऐसा था कि इतिहास एक कहानी सा लगता था | उन्हीं की बदौलत मुझे आज ही इतिहास में रूचि है(हालाँकि इंजीनियरिंग ने सारी रूचियाँ ही तबाह कर दीं 😦 ) |

    सादर

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