आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

अकेली औरत

शीर्षक पढ़कर ही अजीब सा एहसास होता है ना? कैसे गंदे-गंदे ख़याल आ जाते हैं मन में.  “एक तो औरत, ऊपर से अकेली. कहाँ है, कैसी है, मिल जाती तो हम भी एक चांस आजमा लेते.” … ऐसा ही होता है. अकेली औरत के साथ सबसे बड़ी समस्या ये होती है कि उसे सब सार्वजनिक संपत्ति समझ लेते हैं. बिना जाने कि वह किन परिस्थितियों में अकेले रहने को मजबूर है, लोग ये समझ लेते हैं कि वो अत्यधिक स्वच्छंद प्रवृत्ति की है और इसीलिये किसी एक के साथ बंधकर नहीं रह सकती. जो लोग थोड़े भले होते हैं वो शादी ना करने के नुकसान बताकर शादी करने की सलाह देने लगते हैं. जैसे वो औरत इतनी बेवकूफ है कि उसे शादी के फायदे-नुकसान के बारे में पता ही नहीं है.

दो-तीन दिन पहले मैंने एक ब्लॉग पर टिप्पणी में ये बात कही थी और फिर यहाँ दोहरा रही हूँ कि अकेले रहना ना पूरी तरह मेरी मजबूरी है और ना ही मेरी इच्छा. बेशक मैंने बचपन से ही और लड़कियों की तरह कभी दुल्हन बनने के सपने नहीं संजोये. मैंने हमेशा ये सोचा कि मुझे कुछ अलग करना है. और ससुराल का इतना डर बिठा दिया जाता है हमारे यहाँ कि मुझे लगता था मैं जो कुछ भी करना चाहती हूँ, वो ससुराल वाले नहीं करने देंगे. इसलिए मैंने सोच लिया था कि कभी शादी नहीं करूँगी. बचपन में माँ के देहांत के बाद तो मेरा ये इरादा और पक्का हो गया था. लेकिन मैंने अकेले रहने के बारे में कभी नहीं सोचा था. मैं चाहती थी कि मैं अपने पैरों पर खड़ी हो जाऊँ और पिताजी के साथ रहूँ. हालांकि पिताजी मुझे आत्मनिर्भर देखना चाहते थे और हमेशा कहते थे कि मेरी चिंता मत करो, बस आगे बढ़ती रहो.

ऐसा नहीं है कि मैंने कभी प्यार के बारे में नहीं सोचा. और लड़कियों की तरह मैंने भी प्यार किया और हर एक उस पल को पूरी शिद्दत के साथ जिया, ये सोचकर कि पता नहीं आने वाला कल कैसा हो? लेकिन फिर भी शादी मेरे एजेंडे में नहीं थी. मुझे हर समय पिताजी की चिंता लगी रहती थी. वे घर पर अकेले रहते थे और मैं इलाहाबाद हॉस्टल में. मैं जल्द से जल्द कोई नौकरी पाकर उन्हें अपने पास बुला लेना चाहती थी. लेकिन, 2006 में पिताजी के देहांत के बाद मेरा ये सपना टूट गया. अकेले रहना मेरी मजबूरी हो गई. मैं दिल्ली आ चुकी थी और महानगरीय जीवन को काफी कुछ समझ चुकी थी. ये जानते हुए कि इलाहाबाद जैसे शहर में किसी लड़की का अकेले रहना आज भी दूभर है, मैंने दिल्ली में रहने का फैसला कर लिया.

यहाँ कम से कम आपको हर वक्त लोगों की प्रश्नवाचक दृष्टि का सामना नहीं करना पड़ता. हर तीसरा आदमी आपसे ये जानने की कोशिश नहीं करता कि आपने शादी की या नहीं, नहीं तो क्यों नहीं. कुल मिलाकर ना किसी के पास इतनी फुर्सत है और ना गरज कि वो आपके व्यक्तिगत जीवन में ताँक-झाँक करे. हाँ, कुछ महिलाओं ने ये जानने की कोशिश ज़रूर की कि मेरी ‘मैरिटल स्टेटस’ क्या है? पर मैंने किसी को कोई सफाई नहीं दी. बस  मुस्कुराकर इतना कहा कि इससे क्या फर्क पड़ता है? और आगे किसी ने कुछ नहीं पूछा.

जब आप अकेले होते हैं और आपके ऊपर कोई बंधन नहीं होता, तो खुद ही कुछ बंधन लगाने पड़ते हैं. कुछ सीमाएं खींचनी पड़ती हैं, कुछ नियम बनाने पड़ते हैं. सभी को चाहे आदमी हो या औरत. बस ये खुद पर निर्भर करता है कि कहाँ और कितनी लंबी रेखा खींचनी है. और ये बात सबको मालूम होती है अपने बारे में, कोई दूसरा ये तय नहीं कर सकता. ऐसा इसलिए ज़रूरी हो जाता है कि हर एक बात की एक सीमा होती है. अगर आप खुद से ये तय नहीं करते तो दूसरे तय करने लग जाते हैं और फिर आपके हाथ में कुछ नहीं रहता.

मैंने भी अपनी कुछ सीमाएं तय कर रखी हैं. अब चूँकि मैं अकेली हूँ और बीमार पड़ने पर कोई देखभाल करने वाला नहीं है, तो भरसक खाने-पीने का ध्यान रखती हूँ. व्यायाम करने की भी कोशिश करती हूँ. बाहर का खाना नहीं खाती, जिससे संक्रामक रोगों से बची रहूँ. मैं बहुत कम लोगों को अपना फोन नंबर देती हूँ, यहाँ तक कि अपने बेहद करीबी रिश्तेदारों को भी नहीं.  मेरा पता भी बहुत कम लोगों को मालूम है और बेहद करीबी दोस्तों के अलावा किसी को भी मैं अपने कमरे पर मिलने को नहीं बुलाती. चूँकि मुझे अपनी सुरक्षा के साथ, स्वतंत्रता का भी ध्यान रखना पड़ता है, इसलिए ये और भी ज़रूरी हो जाता है कि मैं फोन नंबर, पता ई-मेल आदि गिने-चुने लोगों को दूँ.

मेरा बहुत मन करता है रात में सड़कों पर टहलने का, पर मैंने कभी अपनी ये इच्छा पूरी करने की हिम्मत नहीं की. मैं जब भी अकेली बाहर जाती हूँ तो कोशिश करती हूँ कि  आठ-साढ़े आठ बजे तक  घर पहुँच जाऊँ. नौ बजे के बाद मोहल्ले से बाहर नहीं जाती. हमेशा ये याद रखती हूँ कि ये दिल्ली है, औरतों के लिए सबसे अधिक असुरक्षित महानगर. हाँ, अपने मोहल्ले में ग्यारह बजे तक टहल सकती हूँ क्योंकि यहाँ ज्यादातर स्टूडेंट्स रहते हैं जिनके कारण बारह-एक बजे तक चहल-पहल रहती है.

अब मैं अपनी सबसे पहली बात पर आती हूँ. अकेली औरत को प्रायः लोग सहज प्राप्य वस्तु समझ लेते हैं. अगर वो थोड़ी निडर और बोल्ड हो तो और मुसीबत. मेरे साथ दिक्कत ये है कि मैं अमूमन तो किसी से बात करती नहीं, लेकिन जब दोस्ती हो जाती है, तो एकदम से खुल जाती हूँ. मुझे जो अच्छा लगता है बेहिचक कह देती हूँ. अगर किसी पर प्यार आ गया है, तो ‘लव यू डियर’ कहने में कोई संकोच नहीं होता. मैं बहुत भावुक हूँ और उदार भी. मेरे दोस्त कई बार मुझे इस बात के लिए टोक चुके हैं कि किसी पर सिर्फ़ इसलिए प्यार मत लुटाने लग जाओ कि उसे इस प्यार की ज़रूरत है. ऐसे तो तुम प्यार बाँटते-बाँटते थक जाओगी. लेकिन चूँकि मैं बहुत कम लोगों से घुलती-मिलती हूँ, इसलिए आज तक मुझे लेकर किसी को कोई गलतफहमी नहीं हुयी.

लेकिन पिछले कुछ दिनों से ये सोच रही हूँ कि अपनी बोल्डनेस थोड़ा कम करूँ? क्या फायदा किसी को निःस्वार्थ भाव से ‘लव यू’ कह देने का या ‘लोड्स ऑफ हग्स एंड किसेज़’ दे देने का जब सामने वाला उसे लेकर भ्रमित हो जाय. मेरे ख्याल से हमारे समाज में लोग (विशेषकर पुरुष) अभी इतने परिपक्व नहीं हुए हैं कि इस तरह के प्यार को समझ पायें. उन्हें लगता है कि स्त्री-पुरुष के बीच सहज स्नेह सम्बन्ध जैसा कुछ नहीं होता. अगर होता है तो बस आदिम अवस्था वाला विपरीतलिंगी प्रेम होता है. जबकि मैं ऐसा मानती हूँ कि ऐसा प्रेम एक समय में एक ही के साथ संभव है, चाहे वो पति हो, पत्नी हो या प्रेमी. पर जब तक कि हमारा समाज इतना परिपक्व नहीं हो जाता कि सहज स्नेह को समझ सके, मेरा और सम्बन्ध बनाना स्थगित रहेगा.

अकेले रहने का इतना तो खामियाजा भुगतना ही पड़ेगा.

Single Post Navigation

46 thoughts on “अकेली औरत

  1. tumne mano meri jivan ki kahani likh di ho …..sach akile ladki ka jina yah smaj ke napunsha durbhar kar dete hae

  2. एकला चलो रे। ऐसा कुछ नहीं है कि विवाह में ही आनन्द के सभी सूत्र छिपे हों। जीवन प्रवाहमय हो, अकेला या किसी के साथ।

  3. आराधना ! कुछ तो लोग कहेंगे. लोगों का काम है कहना.ये हमें निर्धारित करना है कि हमें कैसी जिंदगी चाहिए अपने लिए. शादी खुशियों का मापदंड नहीं है.जरुरी है खुश रहना फिर वो चाहे कैसे भी मिले.
    रही बात बोल्ड नेस की तो वह भी व्यक्ति विशेष की मानसिकता पर ही निर्भर करती है. हम जैसे खुद होते हैं ज्यादातर हमें दोस्त भी वैसे ही मिलते हैं जो हमें समझते हैं और जो नहीं समझते हैं उनकी परवाह क्यों करनी .
    जियो बिंदास ..कीप स्माइलिंग

  4. हम भी कुछ कहें क्या? जाओ नहीं कहते.🙂

  5. good post aradhna
    do you know even if there are 2 woman they are called do akaeli aurate jaa rahee thee
    akaeli tabhie hi khatam hotaa haen jab koi purush saath ho

    maa beti akaeli rehtee haen how does it sound

  6. अली सैयद on said:

    पर्यवेक्षण और निष्कर्ष आपके हैं / अनुभवजनित हैं , तो सही भी होंगे ! मित्रों / पुरुषों / शादी के मुद्दों पर उचित अनुचित के निर्णय आपको ही लेने हैं और अगर खुद में किसी बदलाव को देखना है तो वो भी !

  7. मेरे ख्याल से हमारे समाज में लोग (विशेषकर पुरुष) अभी इतने परिपक्व नहीं हुए हैं कि इस तरह के प्यार को समझ पायें. उन्हें लगता है कि स्त्री-पुरुष के बीच सहज स्नेह सम्बन्ध जैसा कुछ नहीं होता. अगर होता है तो बस आदिम अवस्था वाला विपरीतलिंगी प्रेम होता है.
    बहुत सही खयाल है आराधना. एकदम ऐसा ही कुछ मैं भी सोचती हूं. अभी हमारा समाज सहज स्नेह की भाषा नहीं समझता. बहुत तक़लीफ़देह है ये😦

  8. सतीश सक्सेना on said:

    शुभकामनायें डॉ आराधना !

  9. दिल के इस पन्ने को पढ़कर बस समझने का प्रयास किया जा सकता है; कमेंट करना मेरे बस में नहीं। हाँ, शीर्षक केवल ‘अकेली’ होता तो मुझे और भी अच्छा लगता ।

  10. अकेली महिला के जीवन व सहज स्नेह की परिभाषा दर्शाता बेहतरीन लेख..

  11. समाज में रहने वाली अकेली लड़कियों / औरतों की सच्चाई बताती अच्छी पोस्ट … यानि एक रेखा और खींच ली है …. सीमाएं तो तय करनी ही पड़ती हैं कभी खुद से तो कभी दूसरों की वजह से …

  12. रश्मि रविजा दी की ई-मेल से प्राप्त टिप्पणी-

    मेरे ख्याल से हमारे समाज में लोग (विशेषकर पुरुष) अभी इतने परिपक्व नहीं हुए हैं कि इस तरह के प्यार को समझ पायें. उन्हें लगता है कि स्त्री-पुरुष के बीच सहज स्नेह सम्बन्ध जैसा कुछ नहीं होता. अगर होता है तो बस आदिम अवस्था वाला विपरीतलिंगी प्रेम होता है.

    बस अकेली औरत के स्वतंत्रतापूर्वक जीने में लोगों की यही मानसिकता आड़े आती है….और उसे खुद ही कुछ बंधन अपने आप लगाने पड़ते हैं…फिर भी कम से कम महानगरों की नई पीढ़ी इस पूर्वाग्रह से ग्रस्त नहीं है..और आनेवाले दिनों में किसी अकेली औरत को अपनी तरह से जीने में कोई कठिनाई महसूस नहीं होगी.

    अकेलापन तो मन की स्थिति है…भीड़ में रहकर भी कोई अकेला रह सकता है…और अकेले रहकर भी बहुत भरा-पूरा.

  13. vaise mai internet ki duniya ka mahir yayaawar nahi hun !! magar aj is pate pe aayaa jo kafi kuchh aaina dikhaa gayaa !! hum jo apne samay ke kaidi hein !! kahi jism se kaidi hein to kahi khayaalon se!! kabhi salaakhon se uljhate hein to kahi savaalon se !!
    bediyan baahar bhi hein bhitar bhi !! sahajtaa ko itni dushvariyan pesh aati hein !! kabhi kabhi to suratein tak badal jati hein !!

  14. इस पोस्ट को पढने के बाद मन में इतना कुछ है कि ब्लॉग-पोस्ट्स की एक शृंखला ही बन जाये परन्तु यहाँ कहने के लिये शायद इतना ही:
    संजो के रखो इसे, हाथ से न जाने दो
    बात निकलेगी तो बेकार चली जायेगी।

  15. मैं कमेन्ट नहीं करना चाहता था -आपका जीवन है जैसा चाहें वैसा जियें ….हाँ लोगों को अपरिपक्व समझने का मुगालता न पाले रहें …कम से कम अभी तो नहीं जबकि आपको अभी भी बहुत कुछ जानना समझाना शेष हो …..हाँ लोगों को भी आपके एक्शन से मुगालते न हों इसका ख़याल अवश्य रखें …
    आपकी इस पोस्ट ने मेरी इस धारणा को फिर पुष्ट किया है कि कितना भी हो एक भारतीय अपनी सोचों -संस्कार और संस्कृति के थोथे और झूठे झमेलों से कभी नहीं निकल सकता -उसने अपने सोच के दायरे बना रखे हैं जिसे वह सबसे पाक साफ़ समझता है …जीवन भर स्व-औचित्य सिद्ध करता जाता है ..
    कृपया इसका जवाब न दें क्योकि फिर आप और भी अतार्किक और पिछड़ी हुयी लगेगीं ….
    आपकी मुझसे बड़ी असहमतियां रहती थीं -क्षमा कीजियेगा यह पहली पब्लिक -असहमति मेरी ओर से भी है ….
    मेरे भी कई मिथ ब्लॉग जगत ने तोड़े हैं ..और इसलिए इसका बहुत शुक्रगुजार हूँ !

    • शायद मैं आपको अतार्किक और पिछड़ी हुयी लगूं. लेकिन मैं बहुत दुखी हूँ. मुझे ये नहीं मालूम था कि सहज स्नेह-संबंधों में डिमांड-सप्लाई का नियम चलता है. बस इसके आगे मैं और कुछ नहीं कहना चाहती.

  16. मैं भी ऐसी पोस्ट पर बिना कमेन्ट किये ही जाना चाहता था, लेकिन फिर अरविन्द सर की टिप्पणी पर ध्यान चला गया… सोचा उनसे पूछ ही लूं कि क्या उम्र में बड़े होने पर समझदारी आ जाती है, अगर हाँ तो उम्र के किस पड़ाव पर इंसान को इतना समझदार मान लिया जाए, कि उसकी कही बातों पर सीरियसली विचार किया जा सके.. और हाँ वो उम्र कौन तय करेगा और किस आधार पर…

  17. आपकी पोस्ट को पुनः हर्फ़ दर हर्फ़ पढने के बाद कुछ और फ्लैशेज..
    “किसी पर सिर्फ़ इसलिए प्यार मत लुटाने लग जाओ कि उसे इस प्यार की ज़रूरत है.”
    -अब यही मुगालता अगले को भी हो तब ?
    “निःस्वार्थ भाव से ‘लव यू’ कह देने का या ‘लोड्स ऑफ हग्स एंड किसेज़’ दे देने का जब सामने वाला उसे लेकर भ्रमित हो जाय”
    -यह सब कहा ही क्यों जाय जब सम्बन्धों को घनिष्टता की और न ले जाना हो तो ?हो सकता अगला आप जैसा परिपक्व और विद्वान न हो🙂 जब ऐसे मौके दिए जायेगें तो गलतफहमियाँ भी होने की संभावनाएं रहेंगी ही …
    ‘मेरे ख्याल से हमारे समाज में लोग (विशेषकर पुरुष) अभी इतने परिपक्व नहीं हुए हैं कि इस तरह के प्यार को समझ पायें.’
    -अब पुरुषों का अपना एक सहज बोध भी होता है,मगर वे भी कोई अवतरित देवदूत नहीं है ,परिष्कृत पशु ही तो हैं ,धोखे वे भी खा सकते हैं …
    यह जेंडर बायस है कि ‘विशेषकर पुरुष’ परिपक्व नहीं होते ….ओहो हो सकता है आप नयी उम्र वालों को लक्षित कर रही हों …
    -विपरीत लिंगी वाला आदिम प्रेम …
    -मैडम जिसे आप आदिम (मतलब प्रकारांतर से असभ्य भी ) प्रेम कह रही हैं वह सबसे उदात्त और विकसित प्रेम है जीवा जगत का –
    यह वह सत्व सर्वस्व है किसी पुरुष का जो वह हजारों में किसी एक को चयनित कर प्रदान करना चाहता है …
    हाँ बिना आपसी -उभय सहमति के यह संभव भी नहीं है और जैवीय -सांस्कृतिक सभी दृष्टि से अनुचित भी …..
    यह सही है एक भारतीय सोच और पश्चिमी सोच का बहुत बड़ा फर्क है जो हामरे संस्कारों और परिवेश पर निर्भर करता है मगर नारी की निजता और गरिमा का सम्मान चाहे पश्चिम और या पूर्व हर जगहं होना ही चाहिए -और पुरुष का भी !
    अगर पारदर्शिता कायम हो जाय ,संवादहीनता न रहे तो भद्र जन ऐसी उभयपक्षी सौहार्दता बनाए रखें यही उचित और ग्रहणीय है !
    काहें का टेंशन लेती हैं -बड़े बड़े निर्णय आपने कर ही डालें हैं -बिंदास जिए ,हंसी खुशी रहें ….अमानत में खयानत न हो …आमीन!

    • ” मगर नारी की निजता और गरिमा का सम्मान चाहे पश्चिम और या पूर्व हर जगहं होना ही चाहिए -और पुरुष का भी !
      अगर पारदर्शिता कायम हो जाय ,संवादहीनता न रहे तो भद्र जन ऐसी उभयपक्षी सौहार्दता बनाए रखें यही उचित और ग्रहणीय है !”
      मैं तो चुप ही थी. मेरा किसके साथ कैसा सम्बन्ध था, है और नहीं है- इन सभी बातों को लेकर. मैंने आज भी नाम नहीं लिया और ना कभी लूँगी. ना मैं किसी से अपने पक्ष में कोई राय रखने को कहूँगी.
      पर किसी के फेसबुक स्टेटस पर द्विअर्थी टिप्पणियों में कभी मेरा भी नाम होगा, ये नहीं सोचा था.

  18. @शेखर ,
    भैया मेरे ,हम आपसे अलग से न बतिया लें ….?
    यहाँ अखाड़ा बनता जायेगा !
    बस सूत्र वाक्य समझ लीजे –
    समझदारी भी व्यक्ति सापेक्ष होती है -हाँ कई अनुभव भी उम्र सापेक्ष होते हैं
    अब जैसे बिना बूढा हुए बूढ़े का अनुभव आप इमानदारी से नहीं कर सकते !

    • आपकी ही बात कह रहा हूँ, सिर्फ शब्द बदल दिए रहा हूँ. “बिना महिला हुए महिला होने का अनुभव आप इमानदारी से नहीं कर सकते!”

      और ऊपर कही हुई आपकी बातों से मुझे ऐसा लगा जैसे कोई कह रहा “मैं जो कह रहा हूँ उसे मानो. अगर नहीं मानोगे तो मूढ़ करार दिए जाओगे”. दंभ में आकर कही बातों के बाद कुछ भी सुनने को बाकी कहाँ रहता है?

      रही बात अखाड़ा बनने ना बनने कि तो – इस पोस्ट को पढकर कोई भी समझ सकता है कि यह नारी मुक्ति को लेकर लिखी हुई पोस्ट नहीं है. यह पोस्ट हताशा, निराशा और दुखी मन से लिखी गई है. वहाँ आपने शास्त्रार्थ छेड़ कर अखाड़ा तो बना ही दिया है.
      बचपन में सुनी एक कहानी याद आ रही है. किसी जमाने में एक गाँव में एक प्रकाण्ड पंडित रहते थे. चूँकि वे विद्वान थे तो लोग उनसे न्याय कि भी उम्मीद रखते थे. एक दिन उनसे एक गंवई आदमी आकर अपना कष्ट बताया. पंडित जी ने उसकी कही बातों में से व्याकरणीय दोष निकाल कर बताया. घंटों बैठाकर व्याकरण समझाया, और व्याकरण पढ़ने कि सलाह देकर विदा कर दिया.

    • मुझे न तो यहाँ अखाडा बनाने में दिलचस्पी है और न ही बहस करने में… और न ही अपने आपको विद्वान समझता हूँ… क्यूंकि जिस दिन कोई भी इंसान अपने आपको विद्वान समझने लगे, उसी दिन उसकी विद्वता(?) ख़त्म हो जाती है…. और रही बात, इमानदारी से अनुभव करने की तो आप भी आज की पीढ़ी में युवा होने का और उनकी परेशानियों का अनुभव इमानदारी से नहीं कर सकते…. बाकी आपने तो कह ही दिया है कि आपका आखिरी कमेन्ट किया जा चुका है तो आपसे जवाब की उम्मीद भी नहीं रखता हूँ…

  19. सच में मुक्ति जी ,आपके इस शीर्षक से ही ऐसा ध्वन्यात्मक-संकेत निकलता है जो आपकी पर्सनैलिटी से मैच नहीं करता.मैं इस बात पर कुछ नहीं कहूँगा कि आपने अकेले रहने का या और कुछ करने का निर्णय सही लिया या गलत,हाँ यह ज़रूर कहूँगा कि अपने को ‘अकेली औरत ‘कहकर आप कैसा फेवर चाहती हैं? ऐसे दो-दो सब्द यहाँ नकारात्मक अर्थ उत्पन्न कर रहे हैं.अकेला या विवाहित होना किसी की सामाजिक पहचान भर है.यदि आप पढ़-लिख गई हैं,ज्ञान-बोध प्राप्त हैं तो फिर इस ‘अकेली’ और ‘स्त्री’ का आलंबन लेना तो ज़रूरी नहीं !
    हम यहाँ आभासी जगत में एक-दूसरे को उसके लिखे से ही ज़्यादा जानते हैं,इस नाते आपकी इमेज मेरे मन में एक साहसी और समझदार व्यक्तित्व की रही है,पर आपने बेहद निजी अनुभवों को पूरी निष्पत्तियां बनाकर पेश किया है,जिससे आप कहीं कमज़ोर दिख रही हैं.

    इस समाज में हर तरह के लोग हैं ,स्त्री हों या पुरुष .यह हमारी योग्यता पर निर्भर है कि हम समय रहते दुष्प्रवृत्तियों से छुटकारा पा लें. हम इस बात से भी ना-इत्तेफाकी रखते हैं कि स्त्री-पुरुष सम्बन्ध किसी एक हद तक आकार रुक जाने चाहिए.इसमें हद और हद से आगे जाने की आशंका दोनों बराबर रहेंगी.आप यदि यह समझती हैं कि हम किसी सम्बन्ध को एक निश्चित दूरी तक ले जायेंगे तो यह ग़लतफ़हमी भी होगी.सामने वाले को जाने बिना यदि आप इस तरह का ‘हल्का-फुल्का’ करने का जोखिम लेती हैं तो फिर बेकार की रुदालियाँ भी आप ही के हिस्से आएँगी !

    अकेला रहना बिलकुल निजी और वैयक्तिक मामला है.हो सकता है,जो फैसला आज आपको ठीक लग रहा हो,वह कल पलट जाए ,पर इसके लिए दूसरों के माथे सब कुछ मढ़कर स्वयं ‘निरीह’ दिखना कहाँ का पांडित्य है ? आप पढ़ी-लिखी हैं,तर्क से विचार करके देखें तो लगेगा कि आप अकेली नहीं हैं.मज़बूत इच्छाशक्ति जब आपके साथ है तो यह सब ‘रुदन’ अच्छा नहीं लगता.आपसे ऐसी कमजोरी की अपेक्षा नहीं थी.

    • मैंने किसी की शिकायत नहीं की, ना सहानुभूति लेने की कोशिश की. और ना ही अपना कोई बेहद निजी अनुभव लिखा है. आपको ऐसा क्यों लग रहा है कि मैं किसी व्यक्ति विशेष को केंद्रित करके ये सब लिख रही हूँ. पिछले कुछ महीनों में मुझे कुछ ऐसे अनुभव हुए हैं, जो मैंने यहाँ लिखे और वो अनुभव निजी नहीं हैं. उनसे हर एक अकेली लड़की दो-चार होती है. मैं भी और मेरी कुछ सहेलियाँ भी. आपलोगों को आदत हो गई है, हर बात को एक सन्दर्भ से जोड़ने की. जबकि मेरा ऐसा कोई मंतव्य नहीं है.

  20. @पी डी,
    बात हमारे और हिमांशु के बीच थी ..आप ?
    अनवेलकम गेस्ट …वह भी पंचायत करने,नाट डन…
    अखाडा मत बनाईये क्योकि बातें फिर पर्सनल हो जायेगीं
    मुझे छद्मावरण और छद्माचरण से सख्त नफरत है ….
    आशा है संकेत समझेगें आप ?

    सारी आराधना,आप एक ब्रेव और विदुषी महिला हो ..
    काहें जमात में शामिल हो रही हो ….जिसके लिए कम से कम मैं आपको
    जानता रहां हूँ …
    उसी विशिष्टता पर कायम रहो …
    भूल गयी -रहिमन अपने मन की व्यथा …..
    यह दैन्य प्रदर्शन क्यों ?
    मेरा यहाँ अब अंतिम कमेन्ट है !

    • पब्लिकली बातें भी करेंगे और कहेंगे कि प्रायवेट बात हो रही है. रही बात बहस की तो वो हम भी आपसे नहीं करना चाहते हैं क्योंकि आपने साफ़-साफ़ लिख दिया है कि आप बहस में पर्सनल बात घुसाना जानते हैं. रही बात छद्मावरण और छद्माचरण की तो आपसे ब्लॉगिंग के मामले में पुराने हैं और आप कोई एक लिंक यहाँ दिखाइए जहाँ मैंने वह मिजाज दिखाया हो?

  21. ओह सारी ,शेखर को हिमांशु लिख बैठा ..जरावस्था का आरम्भ हो गया लगता है🙂

  22. अनुराधा जी,
    यह दुविधाभरी स्थिति तो आनी ही थी, बुरा न मानें तो कह ही दूँ कि आपका निर्णय पूर्णतया सुदृढ और सुविचारित नहीं था। अन्यथा इस विषय में समाज की अपरिपक्वता स्पष्ट ही है। और इन स्थितियों का सामना करना ही पडेगा यह साफ था। आपने जब निर्णय ले ही लिया तो आपका मनोबल बला का मजबूत होना चाहिए। यहाँ तक पहुच कर ग्लानी महसुस करना आपके व्यक्तित्व के लिए भी हितकारी नहीं है। समाज तो वही रहेगा। स्थितियाँ अपने कारण और रूप बदलकर पुनः पुनः समक्ष उपस्थित होगी। दुविधा में रहना तो और भी दुखदायी होगा। इस यथार्थ पर स्थिर हों कि “सिर दिया ओखली में तो मूसल से क्या डरना” तत्काल पूरी दुनिया बदल जाने वाली नहीं, और इतने बडे बदलाव तक प्रतीक्षा सम्भव नहीं।

  23. wonderful post araadhana ji – i think this is the first post i have read (yours) – and i say this —- hats off – salute

    @ मेरे ख्याल से हमारे समाज में लोग (विशेषकर पुरुष) अभी इतने परिपक्व नहीं हुए हैं कि इस तरह के प्यार को समझ पायें. उन्हें लगता है कि स्त्री-पुरुष के बीच सहज स्नेह सम्बन्ध जैसा कुछ नहीं होता.
    true… every society needs its own time to grow up – may be ppl will find that maturity in the time to come. today – it is definitely lacking.

    i haven’t even started reading the comments on this post yet – but could not resist commenting. will read all the comments and rewrite another comment .
    cheers – glad i came to your blog🙂

  24. आराधना जी – दुबारा सारे comments देख कर फिर से कमेन्ट कर रही हूँ | जब आप दिल में अपने आप को जानती हैं की आप अपने जीवन में, अपने विश्वासों और मान्यताओं के साथ, सच्ची हैं और सही हैं, तो परेशानी किस बात की है ? यदि हमारी प्रसन्नता और दुःख दूसरों के approval या disapproval से जुड़े रहेंगे – तो हम हमेशा दुखी ही रहेंगे – क्योंकि universal approval तो श्रीराम, श्रीकृष्ण, जीज़स आदि भी नहीं जीत सके – तो हम तो फिर किस खेत की मूली हैं ?

  25. वैसा आलेख…जिसे आराधना ही लिख सके…सहज, सरल, कुछ खुला-खुला सा पर
    balanced भी…बांबू लेकर रस्सी पर संभल-संभल कर ही नही चली हो तुम, गती से भी चली हो…

    अकेले रहने के और साथ-साथ रहने के खामियाज़े उभय पक्ष equally भुगतते हैं…

    स्त्री-पुरुष या समाज की सहज परिपक्वता तक कुछ चीजें मुलत्वी रखना यह कुछ असहज
    सी बात लगे…पर यहाँ पर सारी बातों को एक सूत्रबद्धता में बांधना शक्य भी नहीं…
    पर कोशिश करने में क्या हर्ज़ है…

    खान-पान और संक्रमण से कैसे बचा जाए…जैसी नियमित्ताओं को तुम्हारा बनाए रखना,
    जान कार अच्छा लगा… पर हवाओं और पानी के संक्रमण से बचना मुश्किल है…जिसके लिए कौन सी दवाईयाँ हमें सूट करती है…उस ज्ञान को भी संचित कर रखना चाहिए …

    विश्वसनीय मित्र हैं कुछ तुम्हारे इसका भी संबल कम तो नहीं…

    • मुझे लगता है इस पोस्ट पर सबसे पोज्तिव और सकारातमक कमेंट्स यही है ..इस कमेंट्स को मेरा भी कमेंट्स समझ जाए…
      हर एक की लाइफ के अपने दुखड़े हैं.. अकेलों के भी दुखड़े हैं और दुकेलों के भी.. और फैमली वालों के भी… कभी कभी ये दुखड़े फुट के बाहर भी आते हैं … और यहाँ भी वही बात है…

  26. मनुष्य दुनिया में
    एकाकी आता हैं
    एकाकी ही जाता हैं
    शांति तब पाता हैं
    जब दूसरो के जीवन में
    नहीं झांकता हैं
    बहुत से मनुष्य
    एकाकी नहीं होते
    अकेले होते हैं
    वही संबंधो का
    प्रदर्शन कर के
    अपने अकलेपन को छिपाते हैं .
    हे ईश्वर
    जिनके पास सम्बन्ध हैं पर
    फिर भी वो अकेले हैं
    उनको
    मानसिक विक्षिप्ता से बचाना
    http://mypoemsmyemotions.blogspot.in/2011/08/blog-post_08.html

    wrote this poem long back sharing it with you .
    we those who are akeli are much sane people then those who have wife , adult son and daughter and still try to romance . i pity such people and keep away from them so should u .

  27. हम कई बार शादी करके भी अकेले होते हैं। साथ रहके भी अकेले-अकेले होते हैं।

    अकेलापन चुनाव होता है किसी ऐसे का, जिसके सामने संभावनाओं की बहुतायत हो – उसका चुनाव जो स्वतंत्र है। यहां संभावना सिर्फ़ एक से अधिक पुरुष के लिए नहीं है, बल्कि अन्य क्षेत्रों के लिए है।

    आधुनिक विकास के द्वन्द्व एवं पाखण्ड को उजागर करता यह आलेख हमें चिंतन के कई आयाम सौंपता है।

    संस्मरण या आत्मानुभूति से कई बार कई ऐसे मसले सामने आते हैं जो, … स्वस्थ बहस की मांग करती है। दुख होता है यह देख कर कि ब्लॉग जगत में यह व्यक्ति्गत होते-होते निम्नता की हद को पार कर जाता है। इसलिए मैं ख़ुद को इन सबसे अलग रखने लगा हूं।

    इक्कीसवीं सदी में भी सामंती रूढ़ियों वाले पुरु-प्रधान समाज में नारी के लिए आत्माभिव्यक्ति में कितनी कठिनाई हो सकती है, यह सहज अनुमेय है। फिर भी आपने लेख के माध्यम से जो आवाज उठाई है और नारी ज़िंदगी के सरोकारो के संघर्ष को नए अर्थों में बयान करने की कोशिश की है और वह प्रशंसनीय है।

  28. इसे अब तक दो चार बार पढ़ चुकी हूँ … क्या कहूँ , इस समझ से परे मन सिर्फ प्रलाप कर रहा है और प्रलाप लिखा नहीं जा सकता , पर जिनके भीतर प्रलाप चलता है उनके लिए समझना आसान है

  29. बड़ी हार्दिकता से लिखी गई पोस्ट है किन्तु मुझे आश्चर्य है कि जिस समाज के विषय में पता है कि वह ऐसा है, या वैसा है (निर्मम, नासमझ, काफी मायनों में खतरनाक भी इत्यादि ) उसी समाज के सम्मुख सार्वजनिक रूप से अपनी हार्दिकता व व्यक्तिगत जीवन के बारे में खुलासे करने और कुछ कुछ स्पष्टीकरण- सा देने की भावना की झलक की क्या आवश्यकता थी !
    आराधना जी, आपको यह भी पता होना चाहिए कि यह समाज इतना समझदार नहीं है कि महिलाएँ अपने व्यक्तिगत जीवन की कथा अभिधात्मक रूप में उन्हें बताएँ और मैं ऐसा करूँगी या नहीं करूँगी कहा नहीं जाता अपितु किया जाता है; बिना बताए, बिना कहे और बिना कारण बताए या स्पष्टीकरण दिए।
    भले, हृदय में नहीं किन्तु व्यवहार में अभी और बहुत मजबूती लानी शेष है। उस मजबूती का कारण या आवश्यकता मत बताइये किसी को। कोई होता कौन है जो किसी के निर्णय या व्यवहार का कारण जाने का अधिकार रखता है?

  30. अराधना जी ये तो सच है ये समाज अभी परिपक्व नही हुआ है और ना इससे उम्मीद की जा सकती है और अपने दायरे हमारे अपने लिये हैं जिसे जरूरी नही हम सबको सार्वजनिक करें क्योंकि यहाँ टाँग पकडकर घसीटने वाले बहुत हैं बाकि आपका कहना काफ़ी हद तक सही है।

  31. आराधना जी …मैं भी कविताजी की बात (Dr.) Kavita Vachaknavee)…से सहमत हूँ ..जब हम ये जान रही है कि यहाँ ब्लॉग पढ़ने वालो की तादाद बहुत हाउ तो जिन्हें नहीं भी पता कि आप दिल्ली में अकेली है ..उन्हें तो आपने खुद ही इस पोस्ट कि माध्यम से बता दिया …बाकि आप खुद से समझदार है …इस मामले को भी अपने तरीके से संभाल लेंगी …सादर

  32. आपको पढ़ना संभव हुआ … ब्‍लॉग बु‍लेटिन पर अवलोकन 2012 में चयनित आपकी पोस्‍ट से, जिसकी माध्‍यम रश्मि प्रभा जी … आपका सहज़ सरल सा यह लेखन एक सच के साथ चलता हुआ हम तक पहुँचा … जो कि बहुत ही अच्‍छा लगा

    अनंत शुभकामनाओं के साथ बधाई उत्‍कृष्‍ट लेखन के लिए

  33. आपकी इस पोस्ट को परिकल्पना ब्लोगोत्सव पर पढ़ा था , शायद |
    कुछ नहीं है कहने को , शर्मिंदा हूँ और निशब्द हूँ |

    सादर

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: