आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

बीमारी

सुयश जॉगिंग करते हुए लगातार ऋचा के बारे में सोच रहा था. पिछले कुछ दिनों से वो बीमार सी दिख रही थी. हमेशा खिले-खिले चेहरे वाली तेज-तर्रार लड़की अचानक से निश्तेज लगने लगी थी. सुयश ने कई बार सोचा कि पूछे क्या बात है? उसे कोई परेशानी तो नहीं है, लेकिन हिम्मत नहीं जुटा पाया. जाने क्यों वो लड़की अपने आस-पास एक खोल बनाकर रखती है, जिसके अन्दर कोई प्रवेश नहीं पा सकता. वो कभी-कभी सोचता है कि इतना जिद्दी और खुद्दार भी नहीं होना चाहिए. अरे, अकेली रहती है, अपने पड़ोसी से कभी-कभार तो मदद माँग ही सकती है. लेकिन नहीं, बेकार का स्वाभिमान. अपना सारा काम अकेले करेगी. बीमार है, लेकिन मदद नहीं लेगी…सुयश को गुस्सा आने लगा था ‘जाने कुछ लड़कियाँ अपने-आप को क्या समझती हैं. उसके दोस्तों की गर्लफ्रेंड्स तो सारा काम करवा लेती हैं, पर ये लड़की किसी और ही मिट्टी की बनी हुयी है.’

2677419199_77bbabd9acवो दौड़ते-दौड़ते रुक गया. स्ट्रेचिंग करते हुए उसे ऋचा का फिर ध्यान आया. अगर वो उसकी जगह होता, तो क्या करता? एक अजनबी लड़के से मदद लेता? नहीं, वो भी नहीं लेता. लेकिन वो अजनबी कहाँ रहे अब? दो साल हो गए पड़ोसी बने हुए. कितनी बातें तो करती है, बेहिचक, बिंदास. हमेशा हँसकर मिलती है. पूरी बिल्डिंग में सभी तो उसे पसंद करते हैं. मिलनसार लड़की…बस कोई मदद नहीं लेती किसी से भी.
पर उसने भी तो कभी उससे पूछा नहीं. लेकिन पूछता भी कैसे? पुरुष अहंकार जो आ जाता है सामने. वो किसी से कम है क्या? फिर अगर ऋचा ने उसको ‘चीप टाइप’ का लड़का समझ लिया तो. एक बार सोसाइटी के गेट पर एक छोटे से एक्सीडेंट के बाद फोन नम्बर भी तो दिया था उसे. ज़ोर की मोच आयी थी लड़की को. लेकिन लड़की ने गलती से कभी एक मेसेज भी नहीं किया. हुँह, घमंडी कहीं की…

पर वो इतना सोच क्यों रहा है उसके बारे में? क्या वो भी सोचती होगी? बातें तो प्यार से करती है. हँसी-मज़ाक भी कर लेती है. इतनी बार चाय भी पी चुके हैं दोनों साथ, उसकी बालकनी में. उसकी मुस्कान कितनी प्यारी लगती है. पर उसने एक बार भी ऐसा कोई हिंट नहीं दिया, जिससे ये पता चले कि वो सुयश के बारे में सोचती क्या है?

दो दिनों से कितनी बेहाल लग रही है. ऑफिस जाते हुए और वापस आते हुए, रोज़ ही तो मिलती है. दोनों का ऑफिस टाइम एक ही है. नहीं सुयश का ऑफिस थोड़ी देर से होता है, लेकिन उसके साथ जाने के लिए वो थोड़ा पहले निकल जाता है. वो पसीना पोंछते हुए मुस्कुराया…आज तक किसी लड़की के लिए इतनी ज़हमत नहीं उठायी उसने. अब इस उम्र में टीनेज़र्स जैसा उत्साह रहता है रोज़ ऋचा का चेहरा देखने के लिए. लेकिन उसका चेहरा, इतना बेनूर क्यों दिख रहा है…आज तो ऑफिस भी नहीं गई. क्या हुआ है उसे?

सुयश बेचैन हो गया. उसे पूछना चाहिए कि ऋचा को किसी चीज़ की ज़रूरत तो नहीं है. ठीक है, इसलिए नहीं कि वो अच्छी लगती है, एक पड़ोसी के नाते सही…सुयश ने फोन की ओर हाथ बढ़ाया कि स्क्रीन पर एक अनजान नम्बर फ्लैश हो रहा था. “हैलो” “हाई, सुयश?” ये तो ऋचा की आवाज़ है. सुयश के पूरे शरीर में एक सिहरन सी दौड़ गयी.

“हाँ, मैं सुयश. आप कौन?” उसने जानबूझकर अनजान बनते हुए पूछा.
“…म् मैं ऋचा”
“अरे ऋचा, क्या बात है?”
“सुयश, वो चार-पाँच दिन से मेरी तबीयत ठीक नहीं है”
“अरे, तुमने बताया क्यों नहीं. बोलो डॉक्टर के यहाँ चलना है क्या?”

“नहीं…डॉक्टर को मैंने दिखा दिया. डेंगू है शायद. बहुत वीकनेस लग रही है. तुम एक काम करोगे प्लीज़.”

“अरे, बिल्कुल, तुम बोलो तो.”
“एक दूध का पैकेट लेते आना ग्राउंड से आते समय. और ब्रेड का पैकेट भी. मैं तुमसे नहीं कहती…लेकि…”
“अरे, कोई बात नहीं. आखिर पड़ोसी हूँ तुम्हारा.”

“और प्लीज़, अपने कुक से मेरे लिए खिचड़ी बनवा देना…वो…”

“बिल्कुल…बिल्कुल. तुम चिन्ता मत करो. आकर मिलता हूँ तुमसे.”

“ठीक है…आ जाओ” ऋचा ने फोन रख दिया.

सुयश के चेहरे पर एक मीठी सी मुस्कान थी. कोई बीमार है? भला कभी किसी की बीमारी से कोई इतना खुश हुआ करता है…भला हो डेंगू फैलाने वाले मच्छर का. सुयश मुस्कुराते हुए ग्राउंड से बाहर चल पड़ा- दूध का पैकेट लेने. उसके कान में ऋचा का बोला आख़िरी शब्द गूंज रहा था- “आ जाओ.”

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13 thoughts on “बीमारी

  1. बड़ी स्वीट सी कहानी है .
    आइस ब्रेक तो हुआ पर ऐसा न हो ऋचा ब्रेड, दूध और खिचड़ी लेकर मुस्करा कर एक थैंक्यू के साथ दरवाजा बंद कर दे ..:)
    युवाओं के मस्तिष्क में चल रही आँधियों का बढ़िया वर्णन किया है .

  2. हिचक, न जाने क्या करवा जाये, प्रतीक्षा के अतिरिक्त और क्या..पर आवश्यक भी है..

  3. मुखर्जी नगर में रह रहे लोगों की आप बीती सी यह कहानी, कम से कम यहाँ रहने वाले पाठक को तो अपनी ही लगेगी , इसके अलावा भी ऐसा बारहा होता है, साथ रहते हुये जाने कौन सी कशमकश रोकती है ये कहने से की “आ जाओ ” जबकि यह आना जीवन को एक नयी शुरुआत दे सकता है …. अंत में ” सुयश हुए ग्राउंड से बाहर चल पड़ा… ” यहाँ कुछ छूटा लग रहा है शायद “सुयश खुश होते हुये …. “

  4. मुस्कुराहट बरकरार रहे , सम्पादन भले ही छूटा करे 🙂

  5. मोहब्बत किसी भी उम्र में हो,टीन एज में पहुंचा देती है 🙂 प्यारी सी कहानी…..

    अनु

  6. बात करूं या ना करूं , बात करूं या ना करूं
    और अगर अचानक वो ही बात की शुरुआत कर दें तो फिर क्या बात !
    बहुत सुन्दर कहानी |

    सादर

  7. दरवाजे बंद कर रखना चाहिए ऋचा , मछ्छरों को अन्दर नहीं आने देना चाहिए !
    🙂
    शुभकामनायें …

  8. बढिया है। प्यारी कहानी! सतीश सक्सेना जी की बात सिर्फ़ पढ़ने लायक है-अमल में लाने लायक नहीं। 🙂

  9. प्रकाश गोविन्द on said:

    नाजुक …. प्यारी सी कहानी

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