आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

सागर, तुम इतने रीते क्यों हो?

जानती हूँ कि बहुत से ब्लॉगर मित्र उसे जानते नहीं होंगे। जो जानते भी होंगे, उनमें से भी बहुत से उसे अच्छा नहीं समझते। औरतें तो अमूमन उसके ब्लॉग पर जाते भी डरती हैं, कुछ को छोड़कर। उसके लिखे को भी बहुत से लोग इरोटिक या अश्लील भी मानते होंगे, लेकिन मेरे लिए वो मेरा मनपसंद लेखक होने के साथ ही एक अच्छा इंसान भी है। मेरे लिए वो मेरा ‘फूल राजकुमार’ है 🙂 देखो तो कितना प्यारा है-

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हालांकि मैं उसे नियमित रूप से नहीं पढ़ती, लेकिन अक्सर पढ़ती हूँ। कई बार उसकी व्याकरणिक त्रुटियों की ओर उसका ध्यान खींचने की कोशिश करती हूँ, लेकिन उसे कोई फर्क नहीं पडता। मेरी तरह वो भी सीधे ब्लॉग के डैशबोर्ड पर लिखकर पोस्ट कर देता है, एडिट नहीं करता।

मुझे याद है जब मैंने उसके ब्लॉग पर टिप्पणी करना शुरू किया था, तो उसने मुझसे चैट पर कहा था कि ‘तुम बड़ी हिम्मत वाली हो, जो मेरे ब्लॉग पर कमेन्ट करती हो। नहीं तो उसे पढ़ते बहुत लोग हैं, लेकिन टिप्पणी नहीं करते।’ मज़े की बात कि ब्लॉगर मित्रों में सबसे पहले मैंने उसी से चैट करनी शुरू की थी। एक दिन चैट के ही दौरान उसने मुझसे कहा कि मैं बदनाम और लड़कीबाज ही अच्छा, और मैंने जवाब दिया, “तुम खुद को जितना चाहे बदनाम और लड़कीबाज कहो। मैं नहीं मानती। मेरे लिए तुम भोले से बच्चे हो। जिसे बदमाश बने रहने में इसलिए मज़ा आता है कि उसकी हरकतों पे किसी को हैरानी ना हो। जो इस तरह अपने दिल के दर्द को छुपाता रहता है।”

हाँ, वो ऐसा ही है। तमाम दर्द को अपने सीने में छुपाये फिरता है। न किसी को दिखाता है और न झाँकने देता है। चैट करते-करते मेरे मुँह से मेरे सारे राज़ उगलवा लिए कमबख्त ने और अपने बारे में पूछने पर टाल गया। उसके बारे में सोचती हूँ, तो मजाज़ याद आते हैं, उसका लिखा पढ़ती हूँ, तो मंटो। कभी-कभी मैं सोचती हूँ कि ये शायर एक ही मिट्टी के बने होते हैं शायद। दर्द की मिट्टी, दर्द से सनी और दर्द के ही ढाँचे में ढली।

उसकी पोस्ट मैं अक्सर तब पढ़ती हूँ, जब बहुत उदास होती हूँ। उसका लिखा बहुत आराम पहुँचाता है। ऐसा लगता है कि मैंने जो सोचा और महसूस किया, उसे पता नहीं वो कैसे जान गया। मुझे तो शब्द नहीं मिलते और उसने उसे जादुई शब्दों और बिम्बों में व्यक्त कर दिया। दो-चार दिन से एक उदासी सी छाई हुयी है। उस कमबख्त की याद भी रह-रहकर आ जाती है और वो है कि फेसबुक एकाउंट डिएक्टिवेट करके गायब है। ब्लॉग भी नहीं लिख रहा है इन दिनों। कल से उसके ब्लॉग की कई पोस्ट पढ़ डाली हैं मैंने। एक बानगी देखिये-

स्याही में जो इत्र की खुशबू घुली है/ उनमें रक्त, पसीने और आंसू के मिश्रण हैं/ जिसने ख़त भेजे हैं/ अक्षरों में उनका चेहरा उगता है/उनकी आँखें कच्चे जवान आम की महकती फांके हैं/खटमिट्ठी सी महकती हैं वे आँखें/ और तब/ निरक्षर लिखता है पहला अक्षर।

ये एक चिट्ठी है, जो उसने अपनी महबूबा (पता नहीं, काल्पनिक या वास्तविक) के लिए लिखी है। अंत में जो दो लाइनें लिखी हैं, उन्हें मैंने करीब पाँच-छः बार पढ़ा-

तुमसे रिश्ता है या कि लपटों में आने वाला गठ्ठर है?

तुम हो या कि बदन के  चूल्हे में कोई सीला जलावन है!

(‘निरक्षर लिखता है पहला अक्षर’ से)

कई बार सोचा कि उसके दिल में झाँककर देखूँ कि इस चौबीस-पच्चीस साल के नौजवान को कहाँ से इतने दुःख मिले कि वो उन्हें सीने में परत दर परत दबाता चला गया। इतना कि मिट्टी चट्टान बन गयी और उसके नुकीले अंश अब उसी के सीने में करकते रहते हैं। लेकिन अपने दिल के दरवाजे को वो कसकर बंद रखता है और मुझे बार-बार खटखटाकर किसी को परेशान करने की आदत नहीं है। वो लिखता है-

“क्या दुख पर कोई कवर नहीं होता या हर कवर के नीचे दुख ही सोया रहता है? क्या दुख हमारे सिरहाने तकिया बनकर नहीं रखा जिसपर हम कभी बेचैन और कभी सुकून की नींद कवर और करवट बदल बदल कर सोते हैं।” 

(‘कोई जिस्म के ताखे पर रखी डिबिया आँखों की रास कम कर दे‘ से)

नहीं, मैं यहाँ उसके ब्लॉग की समीक्षा लिखने नहीं बैठी।  ऐसे ही कुछ पोस्ट पढीं, तो लगा कि शेयर करना चाहिए। मैं तो उसको याद कर रही हूँ। अक्सर मेल में वो मुझे ‘जानेमन’, ‘मेरी जान’ वगैरह जैसे संबोधन करता रहता है और मुझसे डाँट खाता है। इतना सब होने पर भी सुधरता नहीं। बिगड़े बच्चों की तरह डाँट सुनकर भी बदमाशियाँ बंद नहीं होतीं और मैं उसे बच्चा समझकर माफ कर देती हूँ।

मुझे मालूम है कि मैं ये पोस्ट लिखकर अपने लिए भी मुसीबत बुला रही हूँ क्योंकि ‘कोई’ है, जिसने अगर ये पोस्ट पढ़ी, तो जलभुनकर राख हो जाएगा और मुँह फुलाकर बैठ जाएगा 🙂 खैर, मुझे इसकी परवाह नहीं है। मुझे सागर की चिन्ता है। पता नहीं वो इस समय कहाँ है? पता नहीं उसको मेरे याद करने से हिचकियाँ आ रही होंगी या नहीं। लेकिन इस बार मिला तो उससे पूछ ही लूँगी कि ‘सागर, तुम इतने रीते क्यों हो?

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9 thoughts on “सागर, तुम इतने रीते क्यों हो?

  1. हमें लगा कि पोस्ट का शीर्षक है- सागर तुम इतने रोते क्यों हो! पोस्ट पढ़कर सागर को फोन किया घंटी बजी लेकिन फ़ोन नहीं उठा। लगता है सो रहा है बच्चा।
    सागर के लिखने के बारे में क्या कहें? तुमने बहुत अच्छा लिखा है। सागर की टिप्पणियां भी मजेदार होती हैं। एक नमूना देखा जाये:

    हे हे हे हे ! 🙂

    हमने अपने सारे विकल्प खुले रखे हैं सर जी, हम सब के हैं…

    जो भी प्यार से मिला हम उसी के हो लिए,
    जहाँ पर खटिया मिली हम वोहीं पर सो लिए

    इस मुआमले में हम बहुत क्लिअर हैं … एक वाक्य सुनाता हूँ एक बार हमारे दफ्तर के एक महिला ने पूछा था —

    “सागर इतना काम कैसे करते हो? तुम्हारी शक्ति क्या है ”
    “मेरी गर्लफ्रेंड मेरी शक्ति है” – मैंने जवाब दिया (तिकोना सा मुंह बना कर)
    फिर तुम्हारी कमजोरी क्या है ?
    “दूसरे की गर्लफ्रेंड मेरी कमजोरी है” – मैंने छुटते ही जवाब दिया (चौकोर सा मुंह बना कर)

    इस प्रकार,
    हमने एक और सम्भावना उनकी तरफ फैंक दिया था .)
    अतैव,
    हमने यहाँ कई नाम जोड़े (अतीत और वर्तमान के )
    अंतरिम मसौदा तैयार होने पर आपको सूचित किया जायेगा.

  2. ” कोई ” का आभार और शुभकामनायें !

  3. पढ़ना पड़ेगा इनको ,
    अगली फुरसत सागर जी के ही नाम होगी |

    सादर

  4. बहुत ही प्यारा और दुलार भरा पोस्ट….. चलिये इसी बहाने सागर साब का पता तो चले 🙂

  5. दोस्त के लिए प्यारी सी पोस्ट …. सागर का ब्लॉग मैंने भी पढ़ा है ….वाकई बहुत अच्छा लिखता है …

  6. oh…..LAGBHAG BHOOLNE KO HO AAYE IS SHAYAR GHARANE KE BLOG-BALAK ki yaad dilakar man ko thora bhavuk aur thora chanchal
    kar diya aapne…….aate hain phir…..tab-tak karte hain intzar sagar babu ka………..

    pranam.

  7. पसंद आया।

    कमेंट वाली बात पर मैं कहना चाहुंगा कि सागर का लेखन मुझे काफी पसंद है। जब भी याद आ जाए उसे पढ़ता हूं। लेकिन हर पोस्‍ट पर कमेंट न करने की दिक्‍कत यह है कि आदमी हर पोस्‍ट पर लिखे क्‍या ! मुझे पोस्‍ट पसंद आई, बहुत अच्‍छा लिखा है, बहुत अच्‍छा लिखते हो आदि-इत्‍यादि बार-बार लिखना बोर करता है।

    • सही, मैं भी हर पोस्ट पर कमेन्ट नहीं करती, और सागर को भी इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि कोई कमेन्ट करता है या नहीं. लेकिन उसने ये बात इसलिए कही थी कि उसके यहाँ पेज हिट्स की संख्या काफी होती है…उसने ये बात उनलोगों के लिए कही थी जो उसकी ‘इरोटिक’ पोस्ट्स पर शर्म के मारे कमेन्ट नहीं करते 🙂

  8. सागरजी को नियमित पढ़ता हूँ, यह भी सच है कि बहुधा टिप्पणी से बचा ले जाता हूँ स्वयं को
    पर एक बात कहूँगा..सागर खारा हो सकता है, रीता नहीं..

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