आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

कुछ प्रश्न

कुछ प्रश्न हैं, जो अक्सर मस्तिष्क में उमड़-घुमड़ मचाते हैं, लेकिन अफ़सोस उनका जवाब नहीं मिलता। गर किसी के पास किसी एक प्रश्न का उत्तर हो तो बताए प्लीज़-
1. -मुस्लिम आतंकवाद का राग अलापने वालों को हिंदू आतंकवाद क्यों नहीं दीखता और हिंदू आतंकवाद की बात करने वाले मुस्लिम आतंकवादियों की बात पर चुप क्यों हो जाते हैं?
2. -अफज़ल गुरु के लिए मानवाधिकार की दुहाई देने वाले, संसद हमले में शहीद पुलिसवालों की बात क्यों नहीं करते और उन पुलिस अधिकारियों के घरवालों के प्रति सहानुभूति रखने वालों को अफज़ल गुरु के घरवाले क्यों नहीं दिखाई देते?
3. -गुजरात दंगों की बात करने वालों को चौरासी के दंगे या कश्मीरी पंडितों का अपनी ज़मीन-जायदाद छोड़कर रिफ्यूज़ी कैम्पों में रहना क्यों नहीं दीखता और कश्मीरी पंडितों के दर्द को महसूस करने वालों को गुजरात में सरेआम हुआ कत्लेआम क्यों नहीं दीखता?
4. -नक्सली हिंसा में मरने वाले पुलिसवालों से सहानुभूति रखने वालों को पुलिसवालों द्वारा सोनी सोढी और ऐसे ही अन्य आदिवासियों पर किये गए अत्याचार नहीं दिखाई क्यों नहीं देते और सोनी सोढी के हक के लिए लड़ने वाले लोगों को नक्सलियों द्वारा बेरहमी से मार दिए गए पुलिसवालों से सहानुभूति क्यों नहीं होती?
5.- कश्मीरियों के लिए आत्मनिर्णय का समर्थन करने वाले ये क्यों भूल जाते हैं कि पूर्वोत्तर के भी बहुत से राज्य भारतीय संघ में कई शर्तों के साथ सम्मिलित किये गए थे, उनके आत्मनिर्णय का क्या? अगर कश्मीर अलग होगा तो क्या पूर्वोत्तर में अलगाव की माँग नहीं उठेगी? तमिलनाडू जो शुरू से भारत के विरुद्ध जाकर श्रीलंका में सिंघलियों के विरुद्ध तमिल लोगों की हिंसा का समर्थन करता रहता है उसका क्या?

मेरे सवालों की लिस्ट बहुत लंबी है…पर अभी बस यही सवाल! मैं न भाजपाई हूँ, न कांग्रेसी और न कम्युनिस्ट. मैं एक आम भारतीय नागरिक हूँ, जिसे हर पीड़ित का दुःख अपना दुःख लगता है, जो आतंकवाद की घटना या सामूहिक बलात्कार की घटना के बारे में सुनकर, गाना सुनना और खाना खाना भूल जाती है. बस सोचती रहती है कि जिनके घर के लोग मारे गए या शोषण का शिकार हुए, वो कैसे होंगे? जानती हूँ कि ये अति संवेदनशीलता है लेकिन होते हैं कुछ लोग ऐसे भी.
मुझे ये बात समझ में नहीं आती कि लोग आतंकवाद और मानवाधिकार के मामले में सेलेक्टिव कैसे हो सकते हैं?

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9 thoughts on “कुछ प्रश्न

  1. coincidentally, aapke sawal mere bhi hain.. jab nya nya facebook join kiya tha to inhi sawalon ke saath main waampanthi and human-rights ke samarthkon se uljhta rhta tha.., lekin jab dekha ki they are like color-blinded pople who see only a few colors, i withdrew myself from active participation in fb discussions and became a sort of observer..
    any way, if u by chance get any answer(s), kindly share with me.
    Thanks!

  2. ये सारे सवाल सभी आम भारतीय नागरिक के हैं …. सत्तासीन और सत्ता के लिए लालायित लोग क्या जवाब देंगे जो वोटों की राजनीति करते हैं , धर्म के नाम पर बरगलाते रहते हैं ….. हिन्दुस्तानी नहीं वरन हिन्दू और मुसलमान मानते हैं ….. आम जनता के पास इन प्रश्नो का कोई जवाब नहीं हो सकता ।

  3. इन सवालों के जबाब किसी के पास नहीं हैं .
    आम आदमी , जो किसी वाद से नहीं जुड़ा , जिसका कोई निहित स्वार्थ नहीं, उसे ये प्रश्न ऐसे ही परेशान करते हैं

  4. काश राजनीति की पगडंडियाँ ढेढ़ी मेढ़ी न होतीं, तो संभवतः सीधे हम तक पहुँच जातीं…बातें तब तनिक और स्पष्ट होतीं।

  5. शायद लोगों को लगता होगा कि उन्हें किसी एक पक्ष को चुनना ही है , यही उनके लिए हितकारी होगा | शायद इनको चश्मा पहनकर दुनिया देखने की आदत होगी , इन्हें डर होगा कि किसी रंग का चश्मा नहीं पहना तो आँखें चौंधिया जायेंगीं | एक बार खुली आँखों से दुनिया देखेंगे तो और रंग दिखेंगे |
    हो सकता है कि कुछ और कारण हो , लेकिन इसका उपाय एक ही है –
    क्या फरक कि मैं चला या तू चला है ,
    बात है कि फासला कुछ कम हुआ है |

    सादर

  6. “कुछ लोग” इसके उत्तर में लम्बे विमर्श की और बढ़ सकते है, प्रतिक्रियां में कुछ कमेंट्स की बखिया उधेर सकते हैं। एक लाइन में मेरा उत्तर ये है –

    “कुछ लोग अपने खूंटे से बंधे हुए होते हैं, उससे स्वतंत्र हो कर नहीं सोच सकते और ये खूंटे हैं – अपने मजहब के प्रति कट्टरता/धर्मांधता के, विलासी सोच से ग्रस्त अमानवीयता के, अपने अपरिभाषित जात/नस्ल के हित रक्षण के। ”

    ये तो हुयी जनता/नागरिक की सोच अब यदि कोई लेखक/पत्रकार/जन-प्रतिनिधि भी अपने खूंटे का ओछा प्रदर्शन करता है तो समझा जाय कि को अत्यंत स्वार्थ लोलुप है और ऐसे बुद्धिजीवी लोग ही समाज में कैंसर के जन्मदाता हैं, राष्ट्र की प्रगति के बाधक हैं। मैंने पत्रकारिता का मोह छोड़ कंप्यूटर इंजीनियरिंग में अपना करियर इसलिए बनाया कि मैं उन्मुक्त लेखन कर सकूँ बगैर किसी दबाव के, बगैर किसी खूंटे में बंधे। हाँ एक खूंटे में जरूर बंधा हूँ वो है “अपनी संस्कृति और गौरवशाली इतिहास से जुड़े रहने की चाहत”

    आराधना, आपके प्रश्न ज्वलंत हैं, इसलिए प्रतिक्रया देना मुझे जरुरी लगा।
    – सुलभ

  7. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (24-02-2013) के चर्चा मंच-1165 पर भी होगी. सूचनार्थ

  8. हर पढ़े लिखे व्यक्ति से यह अपेक्षा है कि वह इन मुद्दों पर विवेकपूर्ण दृष्टि अपनाए

  9. क्योंकि सबके अपने अपने अजेंडे हैं, इसलिये।

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