आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

ब्लू

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ज़िंदगी, एक कैनवस पर बनी इन्द्रधनुषी तस्वीर है, जिसमें बैंगनी और हरे के बीच नीला रंग आता है। वही नीला रंग जो आकाश, समुद्र और पहाड़ों को अपने रंग में रंग लेता है। मेरा मनपसंद उदासी का गहरा नीला रंग, जितना उदास, उतना ही सुकून देने वाला भी।

वैसे  तो और भी बहुत से रंग हैं ज़िंदगी में, लेकिन ब्लू इतना ज्यादा है कि सबको अपने प्रभाव में ले लेता है। हर ओर नीला, नीला और नीला। कल कई बार इस रंग ने पूरी तरह भिगोकर रख दिया। ऐसा लग रहा था कि होली आ गयी। पर होली में नीला रंग कौन खेलता है भला…?

एक दोस्त है। बहुत परेशान है। दूर विदेश में अकेला और बीमार। रात में फोन किया उसने। अक्सर करता है। मैं उसकी बात सुनती हूँ क्योंकि उसको बहुत मानती हूँ। वो कहता जाता है अपनी बातें। कई बार रोता है। मैं बस सुनती हूँ।  इसलिए कि वो अकेला है। मैं खुद परेशान हूँ, लेकिन वो मुझे खुद से ज़्यादा परेशान लगता है। उसके दिमाग में खून के थक्के हैं। कई आपरेशन हो चुके हैं और भी कई होने हैं। हमारे देश में इस बीमारी का कोई स्थायी इलाज नहीं है शायद और अगर होगा भी तो बहुत मँहगा।

वो फोन करता है और मुझसे कुछ पूछता है। एक ऐसी बात, जो मैं उसे बता नहीं सकती। वो मुझे वास्ता देता है अपनी अपनी ज़िंदगी का, जो कि बिल्कुल अनिश्चित है…मैं तब भी नहीं बता सकती। मैं कुछ नहीं कर सकती। उदासी का गहरा रंग घेर लेता है मुझको। वो उधर रोता है, मैं इधर रोती हूँ। वो बार-बार पूछता है, पर मैं नहीं बताती। छः बार फोन करने पर भी नहीं। आखिर मैं फोन काटकर ऑफ कर देती हूँ…और सारी रात गहरे नीले रंग में डूबी रहती हूँ…

एक बहन है। गाँव में रहती है। उसकी कहानी लिखी थी मैंने अपनी पोस्ट पर। वो वहाँ घुट-घुटकर जीती है और उसकी घुटन मैं यहाँ महसूस करती हूँ। वो निकलने की कोशिश कर रही है एक अंधे कुँए से। छटपटाती है, कुछ ऊपर चढ़ती है और फिर फिसलकर वापस कुँए में गिर जाती है। कल एक फोन आया। शायद फिर वो बाहर निकलने की सोच रही है। एक सीढ़ी लगाने की कोशिश की है, देखो क्या होता है? मैं बस इतना कर सकती हूँ। मैंने परसों अपने एक दोस्त से कहा था कि मैं दूसरों की चिन्ता ज़्यादा करती हूँ। इसलिए दुखी रहती हूँ। सिर्फ अपने बारे में सोचने वाले लोग खुश रहते हैं या नहीं… पता नहीं…

एक सहली है। ज़िंदगी के दोराहे पर भ्रमित। दो रास्तों से एक रास्ता चुनना था उसे। अक्सर लड़कियों के पास विकल्प बहुत कम होते हैं और जो विकल्प होते भी हैं, उनमें से किसी एक को चुनना बहुत कठिन होता है। लड़कियाँ निश्चित दायरों में पाली-पोसी जाती हैं। उन्हें बहुत सीमित आज़ादी मिली होती है। बस ये समझ लो कि एक छोटे पिंजरे से निकालकर बड़े पिंजरे में डाल दिया जाता है। इस पिंजरे में वो थोड़े बड़े दायरे में उड़ान भरती हैं। ज़्यादा उड़ने की कोशिश करती हैं, तो पिंजरे की दीवारों से टकराकर खुद ही गिर जाती हैं। पर दरवाजे नहीं खुलते। उन्हें उसी दायरे में अपनी दुनिया बनानी होती है। जो लड़कियाँ खुला आकाश देखकर आहें भरती है, वो खुद को परेशान करती हैं। कुछ मिलने वाला नहीं होता इस चाहत से। एक और चिड़िया पिंजरे की दीवार से टकराकर गिर पड़ी और हार मान ली। शायद उसे लगा हो कि पिंजरे की गुलामी से कहीं ज़्यादा खतरनाक नीले आकाश की आज़ादी है…या शायद कुछ और…

एक दोस्त ने लंबे समय बाद फोन किया। वो बड़ा अफसर बन गया है और तबसे उसकी दुनिया दिन पर दिन चमकीली होती जा रही है। उसकी ज़िंदगी में उदासी के गाढ़े नीले रंग की कोई जगह नहीं। उसे मेरा एक काम करना था। चार महीने हो गए, काम नहीं हुआ। वो मुझे बता रहा था कि वो कितना व्यस्त है। मैं बेमन से सुन रही थी अपने नीले वालपेपर को देखते हुए….मेरे साथ बहुत बड़ी दिक्कत ये है कि जब कोई दोस्त सिर्फ अपनी खुशी के लिए मुझसे बात करता है, तो मुझे लगता है कि वो मतलबी है और जब सिर्फ मेरी हालचाल लेने के लिए फोन करता है, तो लगता है कि मेरे ऊपर एहसान कर रहा है। खासकर ऐसे बड़े अफसर बन गए दोस्तों के बारे में न चाहते हुए भी ऐसा सोचने लगती हूँ। दोस्त ऐसे हैं नहीं, मुझे ऐसा लगता है, ये मेरी प्रॉब्लम है। मुझे ये लगता है कि इस ‘सिर्फ’ को दोस्ती के बीच में नहीं होना चाहिए। खैर…

कल फिर देर रात तक नींद नहीं आयी। एक कोरे हैंडमेड कागज़ पर एक लैंडस्केप बनाया, और अधूरा छोड़ दिया। फिर कभी शायद उसे पूरा कर सकूँ…और फिर रंग भर सकूँ…अपना मनपसंद नीला रंग…

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6 thoughts on “ब्लू

  1. पता नहीं, मुझे तो नीला रंग गहराई का प्रतीक लगता है, आसमान और सागर सा। गहराई में आत्मिक आनन्द भी बसता है।

  2. हम्म…जो सिर्फ अपने बारे में सोचते है वो हमेशा दुखी ही रहते है,
    जो दूसरों के विषय में सोचते हैं वे उसे हंसाने की भी कोशिश करते हैं और इस कोशिश में पहले खुद हँसते हैं…खुश रहते हैं.
    ब्लू तो मेरा भी फेवरेट है, मेरे बेटे का भी पर इस तरह इस रंग पर कभी सोचा नहीं….हम्म

  3. नीले रंग पर चर्चा मुलतवी करता हूँ क्योंकि आपकी मनस्थिति अभी वैसी नहीं है कि हल्की फुल्की बातें की जाय -यह पूरा जीवन ही ऐसा है कि अनुभव पूरे नहीं होते -मैं जिन बातों का सिंहावलोकन कर सकता हूँ वे अभी आपके जीवन में आने बाकी हैं -टेक केयर ! बस दाल रोटी का जुगाड़ करिए और पढ़िए लिखिए बाकी सब छोडिये !

  4. मैंने इसे अपने साधारण से सैमसंग के मोबाईल के छोटे से स्क्रीन पर पढ़ा था. पढ़ते वक्त लग रहा था जैसे कविता लिखी हुई है. छोटे स्क्रीन पर वैसे ही आ रहा था..

  5. आपका लेखन बेहद सहज और संतुलित है..खुश रहना या ना रहना हम पर निर्भर करता है.हम जब जब ये सोचने लगते है कि कर्म और उसके फल दोनों हम से प्रभावित है दुखी होने के कई कारण दिखायी देने लगते है.पर जब हम जीवन मॆं घटने वाली घटनाओं को नियति मान लेते है तो दुःख होने के कारण कम हो जाते है और सापेक्षता के आधार पर देखा जाए तो कम दुःख होना भी सुख ही है.तर्क ये भी है कि सब कुछ नियति समझ लेना जीवन से विमुख कर सकता है पर ऐसा होता नही हम सत्य से विमुख कभी नही होते जाने या अनजाने भी.मित्रता के अलग अलग अर्थ हो चले है आजकल.हर व्यक्ति अपने आचरण सोच के आधार पर व्यवहार करता है.मित्रता कोई अनुबंध नही. कोई मित्र अपना वादा निभा सके या नही पर मॆं सही मित्र बने रहने का प्रयत्न अवश्य करता रहता हूँ.मुझसे कुछ भी जुड़ना और विलग होना मेरे वश मॆं तो नही पर मॆं जो कर सकता हूँ वो करता हूँ.फिर ये सोच कर मुस्कुरा लेता हूँ “मन इच्छा होती नही हरि इच्छा तत्काल, मन चाहे बैकुंठ को हरि भेजें पाताल”

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