आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

एफ बी जेन बोले तो फेसबुकिया पीढ़ी

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हमने होश संभालते ही ब्लैक एंड व्हाईट टी.वी. पाया, जो कुछ दिनों में रंगीन हो गया। टीनेज में सेटेलाईट चैनल मिले और युवा होने पर मोबाइल और इंटरनेट। सोशल वेबसाईट तो हमारी युवावस्था के ढलने की ओर अग्रसर होने पर मिली है 🙂 पर ‘एफ.बी. जेनरेशन’ ने आँखें खोलते ही ये सारी चीज़ें एक साथ अपने सामने पाईं। ये इनके साथ ही बड़ी हो रही है और इसलिए इन दोनों को अलग रख पाना आजकल के अभिभावकों के लिए नामुमकिन हो रहा है। मेरा साबका कुछ दिनों से इस पीढ़ी से सीधे-सीधे पड़ने लगा है, जबसे मेरी भतीजी जी दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ने आयीं हैं।

पहले तो भतीजी जी मेरे ही साथ रह रही थीं, लेकिन मुझसे इनका साथ बर्दाश्त नहीं हुआ और मैंने इन्हें पी.जी. में शिफ्ट करवा दिया। नहीं, बच्ची बहुत सीधी है। उससे मुझे कोई समस्या नहीं थी, मुझे बस ये लग रहा था कि वो अपने कॉलेज के पास रहे, जिससे उसका समय बचे और बचा हुआ समय वो पढ़ाई में लगा सके। दूसरी बात आत्मनिर्भर और आत्मविश्वासी बनने के लिए अकेले रहना ज़रूरी है…। ये बात और लोगों को देर से समझ में आयी खुद उसको भी। (यहाँ अपनी प्राइवेसी के खतरे में पड़ने की बात को हमने चतुराई से छिपा लिया है।) अक्सर वीकेंड में वो मेरे पास आती-जाती है, लेकिन हमदोनों एक-दूसरे को दो दिन से ज़्यादा झेल नहीं सकते। 🙂

अब इनके एफ.बी. के किस्से। वैसे बच्ची पढ़ाकू है, लेकिन साथ ही उसमें आज की जेनरेशन के सारे गुण हैं। देवी जी फोटो इतनी स्टाइल में खिंचवाती हैं, कि हीरोइनें भी शर्मा जायं। हमको तो आज तक फोटो खिंचाना नहीं आया…पर अब इनको देखकर थोड़ा-थोड़ा हम भी सीख गए हैं। खूबसूरत स्माइल तो हम दोनों के जींस में ही है :)। हाँ, तो भतीजी जी जब भी फेसबुक पर अपनी प्रोफ़ाइल पिक अपलोड करती हैं, तो तुरंत हमें एक मेसेज करती हैं ‘नयी प्रोफ़ाइल पिक अपलोड की है। नेट ऑन कीजियेगा, तो एफ.बी पर जाकर मेरी फोटो लाइक कर दीजियेगा।’ 🙂

आजकल इनको ‘चैटिंग’ का शौक चर्राया हुआ है। मेरे यहाँ आते ही मेरे लैप्पी पर कब्ज़ा जमाकर बैठ जाती हैं और जब तक उसमें जान बाकी रहती है, चैटियाती रहती हैं। तभी छोडती हैं, जब बेचारे लैप्पी की बैटरी खत्म हो जाती है और वो बेहोश हो जाता है 😛  बहुत दिनों से इनका लैपटॉप खरीदना ड्यू है। हमने कहा ‘बच्चा, हम तुम्हारे लिए लैपटॉप तो खरीदवा दे रहे हैं, लेकिन नेट कनेक्शन नहीं लेने देंगे।’ पर फ़ायदा ? आजकल तो साधारण से फोन पर नेट कनेक्शन उपलब्ध है। बस एक कार्ड डलवाओ और सोशल साईट पर पहुँच जाओ। फिर चाहे जितना चैटियाओ।

एक भतीजी के भतीजा जी भी हैं। (बड़े संयुक्त परिवारों में ऐसे अटपटे रिश्ते होते हैं) अभी पन्द्रह साल के हैं और अपनी प्रोफ़ाइल बनवा डाली एफ.बी. पर। हमें पता चला तो हमने उनके पिताजी से कहकर प्रोफ़ाइल डिलीट करवा दी। लेकिन बच्चे ने फिर से चुपचाप प्रोफ़ाइल बना ली। इस बार हमसे बचने के लिए अपनी फोटो नहीं लगाई। कॉमन फ्रेंड्स की पोस्ट पर कमेन्ट करने से भी बचते रहते थे। जहाँ हम पहुँचे नहीं, कि जनाब फूट लेते थे। एक दिन एफ.बी. के ही किसी मैटर को लेकर उनके पिताजी से बात हुयी, तो उन्होंने कहा ‘लो, तुम खुद ही बतिया लो इनसे।’ अब बच्चा बेचारा डर गया कि कहीं हम हड़का न दें। जब हमने कुछ नहीं कहा तो खुश हो गया। हमने भी सोचा कि इनलोगों को रोका तो जा नहीं सकता, तो बेहतर है कि इनसे एक कदम आगे रहो। खुद अपडेट रहो और बच्चों की अपडेट पर नज़र रखो 🙂

भतीजी जी इस बार फिर वीकेंड पर आयीं। खुद तो एफ.बी. पर चैट करने में बड़ा मज़ा आता है इन्हें, लेकिन जब हम नेट पर बैठते हैं, तो बोर होती हैं। परसों हमने इनकी बोरियत दूर करने के लिए दो-तीन कविताएँ नेट से पढ़कर सुना दीं, तो ये और भी ज़्यादा बोर हो गयीं और बदला निकालने के लिए अपने मोबाइल पर कानफाडू भड़कीला सा भोजपुरी गाना लगा दिया। हमने इतना कहा कि अब तुमको कविताएँ नहीं सुनायेंगे, इसे बंद कर दो प्लीज़, लेकिन बंदी पूरा गाना सुनाकर ही मानी 🙂

ये एफ.बी. जेनरेशन है। न आप इन्हें झेल सकते हैं और न ये आपको। हमने कल भतीजी से कहा ‘कभी-कभी आ जाया करो। मनोरंजन होता है।’ तो हमें चिढ़ाने के लिए बोली ‘हाँ, आयी हूँ, तो रहूँगी ना पूरी छुट्टी।’ सुनते ही हमारी तो जान निकल गयी। हमने कहा, ‘अब इतने दिन भी नहीं।’ सत्रह मार्च तक इनके सेमेस्टर ब्रेक की छुट्टी है। ‘तो मैं जाऊं मंडे को?’ हमने झट से कहा ‘हाँ!’ वो मुस्कुराई। उधर उसकी सहेलियाँ भी इंतज़ार कर रही थीं और बार-बार पूछ रही थीं वापस पी.जी. आने के बारे में। जाते-जाते बोली, ‘झूठ-मूठ में भी रोक नहीं सकतीं। बाय तो कर दीजिए।’ 🙂
हमने लैपटॉप से नज़र उठाये बिना कहा ‘बाय!’

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20 thoughts on “एफ बी जेन बोले तो फेसबुकिया पीढ़ी

  1. oh God!! generation gap abhi se ??/:).

    • मुझे लगता है कि अब जेनेरेशन गैप कम सालों के अंतर पर होने लगा है. पहले बीस साल के अंतर पर होता था. अब दस साल के अंतर पर. मेरी भतीजी मुझसे तेरह-चौदह साल छोटी है.

  2. एफ बी जनरेशन …. 😦
    आप बच्चों को हड़काती भी हैं …? 🙂

  3. हमने लैपटॉप से नज़र उठाये बिना कहा ‘बाय!’
    :p :p

  4. आजकल सभी बच्चों का यही हाल है। मेरी भांजी आर्किटैक्चर का कोर्स कर रही है। उसकी मित्र मंडली की लड़कियों के फेसबुक पर फोटो देखकर मैंने एक दिन पूछ ही लिया कि तुम लोग आर्किटैक्चर का कोर्स कर रही हो या मॉडलिंग का।

  5. कहानी बच्चे बच्चे की

  6. बता तो ऐसे रही हो जैसे दादी-नानी की उमर में पहुंच गयी हो और ज्ञान झाड़ना ही एकमात्र काम रह गया है। 🙂
    वैसे लेख अच्छा लिखा है। देखना कोई न कोई अखबार वाला यहां से टोप के अपने यहां सटायेगा एकाध दिन में।

  7. पहले तो मैंने सोचा कि कोई वैष्णव जन जैसी पोस्ट है मगर आपने एस नयी जेनेरेशन का अच्छा खाका खींचा है !

  8. बहुत उम्दा प्रस्तुति आभार

    आज की मेरी नई रचना आपके विचारो के इंतजार में
    अर्ज सुनिये

    आप मेरे भी ब्लॉग का अनुसरण करे

  9. सतीश सिंह ठाकुर on said:

    ज़िंदगी से जुड़कर जीवन के बदलावों को देखें, तो ये बेहद दिलचस्प हो जाता है। जिस सहजता से आपने नई पीढ़ी के मनोविज्ञान को बयान किया है, वो मजेदार है। कमाल ये कि..आपने कोई कहानी नहीं सुनाई, न निबंध लिखा, न डायरी…कुछ अनुभवों को बस पिरो दिया…लेकिन फिर भी ये लुत्फ़ देता है, किसी कहानी से भी ज़्यादा…। रिश्तों से और जीवन से यूं ज़मीन पर मुलाकात जब भी होती है…बहुत अच्छा लगता है।

  10. एकदम सटीक तस्वीर उतारी है आपने।
    पिछले 6-7 महीने से मेरे घर भी एक सिस्टर आई है रहने, ठीक वैसा ही है ऍफ़ बी जेन टाइप। लेकिन मैं उसे नियमित हिंदी लेक्चर देता रहता हूँ, अक्सर शनिवार/रविवार को लम्बी क्लास लेता हूँ उसकी। लेकिन एक बात तो मानता हूँ, मैं भी बहुत कुछ नया अपडेट उन्ही बच्चो से सीखता हूँ। हमें सामंजस्य बना लेना चाहिए। बढ़िया ब्लोगिंग !!

  11. हा हा, आप उनके मन की बात करें, तभी टिकेंगी। वोट पाना है तो तुष्टीकरण कीजिये।

  12. टेक्नोलोजी में इतनी तेजी से प्रगति हो रही है कि उस से पाँव मिलाकर चलना मुश्किल हो रहा है.
    अभी औरकुट अपनी पहचान बना ही रहा था कि फेसबुक आ गया, फिर ट्विटर है wats app है.
    और बच्चे बड़ी तेजी से आकर्षित हो रहे हैं .
    पर ये फेज़ कुछ दिनों का ही है..जैसे जैसे बच्चे बड़े होते जाते हैं, इसका आकर्षण घटता जाता है.
    कल ही अखबार में एक खबर थी कि फेसबुक के २९ वर्षीय मालिक इस चिंता में हैं कि फेसबुक को युवा पीढ़ी के लिए कैसे आकर्षक बनाय जाए ,युवा पीढ़ी इस से विमुख हो रही है.

    वैसे ये सब पढ़कर यह बात जरूर याद आती है कि हमारे दादा जी/नाना जी के जमाने में युवा पीढ़ी का रडियो सुनना भी गलत समझा जाता था. बड़े बुजुर्ग के घर में आते ही ट्रांजिस्टर बंद कर दिए जाते थे 🙂

  13. हमारी १५ साल की भांजी ऍफ़ बी पर आई और ख़ुशी ख़ुशी सभी मौसियों मामाओ को ( वही संयुक्त परिवार वाला ढेरो रिश्तेदार ) फ्रेंड रिक्वेस्ट भेज दिया हम सभी ने ख़ुशी ख़ुशी उसे अपने लिस्ट में शामिल कर लिया और सभी ने उनके वाल को रंगा की बेटा जी जो जन्म की तारीख आप ने यहाँ दी है तब तक तो तुम्हारे मम्मी की शादी भी नहीं हुई थी 🙂 फिर सब ने पीछे से गर्जियनगिरी करते हुए उनकी माता जी को फोन किया की बिटिया का प्रोफाईल बना तो दिया है लेकिन अनजान लोगो को उसके फ्रेंड लिस्ट में शामिल मत करना सब ने माता जी को हिदायत दे दी , लेकिन हमारे इंजनियरिंग की पढाई कर रहे कजन ने जो दिल्ली जैसी जगह पर बचपन से रहा है उसने दीदी को फोन कर कहा की दीदी मुझे हार्ट अटैक आने वाला था बच्ची को ऍफ़ बी पर क्यों आने दिया बच्चे ख़राब हो जायेंगे और न जाने क्या क्या और कहा, उसे वहां से हटा दो , बेचारी दीदी ने उसकी प्रोफाईल को अपन नाम दे उसे अपना बना लिया , जब हम सभी को पता चला तो हम सभी ने अपने कजन को खूब डांट पिलाई और पूछ क्या वो ख़राब हो गया है 😦

    नतीजा कुछ दिन बाद पता चला की भांजी ने अपनी प्रोफाईल नई बना ली है और इस बार किसी को फ्रेंड रिक्वेस्ट नहीं भेजी 😦

    बाद में मैंने कजन को समझाया की यदि हम उसके फ्रेंड लिस्ट में होते तो वो क्या कर रही है किससे दोस्ती कर रही है उसके मन में क्या चल रहा है जैसे अनेक बाते जान सकते थे , वो हमे खुल कर कह सकती थी लेकिन तुम्हारे कारण ये मौका हाथ से चला गया । मेरे ढेर सारे यंग कजन है सभी की खबर मुझे रहती है इसी ऍफ़ बी के कारण । मै अपने ससुराल की तरफ से एक मात्र महिला हूँ जो ऍफ़ बी पर हूँ नतीजा की यहाँ मुंबई में बैठ कर भी मुझे पता होता है की दूर गांव दुसरे शहरों में ननद जेठ के बच्चो के जीवन में क्या चल रहा है सब ऍफ़ भी के मार्फ़त ज्यादातर उनकी बातो को पढ़ती हूँ और निजी बातो पर कभी बड़े होने वाले कमेन्ट नहीं देती हूँ किस किस का स्टेटस सिंगल से कमिटेड हो गया और कौन खुश और परेशां है पता चल जाता है 🙂

  14. एफ बी के अपने फायदे भी हैं और नुक्सान भी… लेकिन कम उम्र के बच्चो के लिए नुक्सान ज्यादा सिद्ध हो रहे हैं… वैसे दयानंद पांडे की कहानी याद आ गयी फेसबुक में फंसे चेहरे…. उनके ब्लॉग का नाम सरोकार है.

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