आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

सरकारी अस्पताल में एक दिन

अक्सर एक कहावत टाइप की कही जाती है कि दुश्मनों को भी वकील या डॉक्टर के चक्कर ना लगाने पड़ें। और वो भी सरकारी अस्पताल से तो भगवान ही बचाए। फिर भी हम मिडिल क्लास लोगों को कभी न कभी सरकारी अस्पताल जाना ही पड़ता है। आज मुझे भी जाना पड़ा, अपनी छोटी बहन वंदना के साथ।

वैसे तो वंदना उत्तर प्रदेश राज्य प्रशासनिक सेवा की अफसर है और प्राइवेट क्लीनिक में दिखाने का खर्च उठा सकती है, लेकिन हमारे दोस्तों और परिचित डॉक्टरों का ये मानना है कि प्राइवेट प्रैक्टिस करने वाले ज़्यादातर डॉक्टर मरीज को ‘पेशेंट’ न समझकर ‘कस्टमर’ समझते हैं। ‘कट्स’ और ‘कमीशन’ के रूप में अपना हिस्सा पाने के लिए आलतू-फालतू के टेस्ट लिख देते हैं। मजबूरन जहाँ से वो कहें, उसी जगह से टेस्ट करवाने पड़ते हैं, चाहे वो जगह आपके घर से कितनी ही दूर हो। दिल्ली जैसे महानगर में ये बहुत कष्टप्रद होता है। इसीलिये उसने खुद को सरकारी अस्पताल में दिखाने का निर्णय लिया। आज हम एल.एन.जे.पी. (लोकनायक जयप्रकाश चिकित्सालय) उसके कुछ टेस्ट करवाने गए थे। वो टेस्ट बाहर से करवाना चाहती थी, लेकिन डॉक्टर की सख्त हिदायत थी कि टेस्ट भी इसी जगह से करवाने होंगे।

ढेर सारी पर्चियाँ समेटते जब हम अस्पताल पहुँचे तो वहाँ समझ में ही नहीं आ रहा था कि जाना किधर है? बहुत सारी छोटी-छोटी बिल्डिंग अलग-अलग बनी हुयी हैं वहाँ। कुछ पर्चियों पर तो रूम नंबर लिखा था, तो हम पूछते-पूछते वहाँ पहुँच गए। पता चला रूम नम्बर 37 में ब्लड का सैम्पल देने के लिए नंबर लेना होगा, फिर रूम नंबर 34 में जाकर ब्लड सैम्पल देना होगा। दोनों जगह बारी-बारी लंबी लाइन लगानी पड़ी। जहाँ से ‘नम्बर’ लेना था, वो जगह गंदी और धूल भरी थी। ऐसा लग रहा था कि बरसों से वीरान पड़े किसी खण्डहर को अस्पताल के काम के लिए खोल दिया गया हो। गनीमत ये कि हवा नहीं चल रही थी। अगर जरा सी भी हवा चलती तो धूल उड़कर मेरे नाक-मुँह में जाती और फिर ‘डस्ट एलर्जी’ से खाँस-खाँसकर मेरा बुरा हाल होता। शायद धूल ‘उड़ने’ के ही डर से वहाँ झाड़ू न लगाई जाती हो।

फिर हम कमरा नम्बर 34 में पहुँचे। वंदना ब्लड सैम्पल देने के लिए लाइन में लगी और मुझसे कहा कि मैं पता करके आऊँ कि एक्स रे कहाँ होता है, जिससे कमरा ढूँढने में ज़्यादा समय ना व्यर्थ हो। मैंने उस बिल्डिंग से निकलकर गार्ड भैया से पूछा कि एक्स रे कहाँ होता है, उन्होंने कहा कि ‘जी होता तो दो जगह है। एक ऊपर, एक नीचे। आपको कहाँ जाना है?’ मैंने पर्ची को ध्यान से देखा, उस पर कहीं भी नहीं लिखा था कि एक्स रे किस नम्बर के कक्ष में करवाना है। मेरे साथ एक और महिला थी, जिसे अपनी सास का एक्स रे करवाना था। लोअर मिडिल क्लास में बच्चों और वृद्ध घरवालों को दिखाने औरतें ही अस्पताल का चक्कर लगाती हैं। मेरी कामवाली भी अक्सर अपने बच्चे को डॉक्टर के पास ले जाने के लिए छुट्टी लेती रहती है।

खैर हम दोनों दूसरे तल पर रूम नंबर 137 में पहुँचे। थोड़ी देर लाइन में लगे रहे। जब कक्ष से एक ‘परोपकारी क़िस्म का’ लड़का निकलकर कुछ लोगों के पर्चे देख रहा था, तो मेरे साथ की महिला ने अपना पर्चा भी दिखाया। पता चला ‘ये वाला’ एक्सरे नीचे रूम नम्बर 32 में होगा। मुझे ये नहीं समझ में आ रहा था कि अस्पताल वाले एक ही जगह ‘सब तरह’ के एक्स रे करवाने का प्रबंध करवा देते, तो इनका क्या बिगडता? लगे हाथ मैंने भी अपना पर्चा दिखाया और उसने मुझे भी नीचे जाने को कहा। नीचे जाते हुए ही वंदना का फोन आया कि यहाँ का काम खत्म हो गया। आप कहाँ हो? मैंने कहा अभी आती हूँ। मैं अक्सर रास्ते भूल जाती हूँ। इस बार भी भूल गयी। दूसरे दरवाजे से बाहर के गेट की ओर निकल गयी, फिर घूमकर वंदना की बिल्डिंग पहुँची और फिर उसे लेकर रूम नम्बर 32 में।

वहाँ फिर वही चक्कर। पहले नम्बर के लिए लाइन में लगना और फिर एक्स रे करवाने के लिए। इस बार फिर वंदना को लाइन में लगने को कहकर मैं अल्ट्रासाउंड वाले कमरे को ढूँढने निकल पड़ी। भला हो 137 वाले ‘परोपकारी’ लड़के का कि उसने इस पर्ची में नम्बर डाल दिया था- 128। मैं घुमावदार गलियों से होते हुए किसी तरह 128 के पास पहुँची, लेकिन थोड़ी दूर से ही वापस आ गयी कि कहीं भटककर दूसरे गेट से बाहर न निकल जाऊं। मुझे ये अस्पताल भूल-भुलैय्याँ की तरह लग रहा था।

मैं वापस वंदना के पास आकर खड़ी हो गयी और माहौल का जायजा लेने लगी। सरकारी अस्पतालों में ज़्यादातर ऐसे लोग जाते हैं, जिन्हें छूना और उनके आस-पास होना तक हम बर्दाश्त नहीं करते। उनके शरीर से पसीने की गंध आती है क्योंकि वो लोग ‘डीयो’ ‘अफोर्ड’ नहीं कर सकते। उन गंदे-मंदे, गन्हाते-बसाते लोगों के बीच से अगर कोई स्मार्ट, कान्फिडेंट और साफ-सुथरा आदमी या औरत निकलती दिखती थी, तो वो डॉक्टर होता/होती थी। उसके गले में लटक रहा स्टेथोस्कोप बोले तो ‘आला’ इस बात की ताकीद कर रहा होता। मुझे अलग ‘खाली’ खड़े देखकर एक औरत मेरे पास आयी और कमरा नम्बर 4 किधर है, पूछने लगी। उसके साथ एक बेहद बूढ़ी औरत थी, जिसे वह अम्मा कह रही थी। उसका कहना था कि “अम्मा को भर्ती कराना है।” मेरा दिमाग घूम गया। मैंने न में सिर हिलाया और सोचा कि ‘काश, मालूम होता कि कमरा नम्बर 4 किधर है, तो इस थकी-मांदी हताश सी दिखने वाली महिला की कुछ मदद कर सकती। मुश्किल से चल पा रही बूढ़ी औरत को लेकर बेचारी कहाँ-कहाँ भटकेगी?’

मेरे चिंतन में डूब जाने पर वो औरत वहाँ से चली गयी। थोड़ी देर बाद मैंने वंदना से कहा कि मैं बाहर जा रही हूँ। मुझे वहाँ घुटन हो रही थी और चाय पीने के तलब भी लग रही थी। बाहर आकर चाय पीते हुए मैंने सोचा कि आज इस पर पोस्ट लिखूँगी और धडाधड दो-तीन फोटो खींच लिए। बहुत से लोग दिल्ली/एन.सी.आर. के ग्रामीण इलाकों से इन सरकारी अस्पतालों में आते हैं। कई लोग पेड़ों के नीचे बैठे थे तो कई लोग गत्ता और चादर बिछाकर लेटे हुए थे। मुझे रेलवे प्लेटफार्म याद आने लगा। मैं वापस चिंतन मुद्रा में चली गयी- ‘ज़िंदगी एक प्लेटफार्म ही तो है, मुसाफिर आते हैं, जाते हैं, गाडियाँ आती-जाती हैं। या अस्पताल है…?’

मैंने जूस खरीदा और वंदना को ले जाकर दिया। वो खाली पेट घर से गयी थी। मैंने अगर हचक के “हैवी ब्रेकफास्ट” ना लिया होता, तो शायद मैं भी अगले दिन ओ.पी.डी. में किसी डॉक्टर को दिखाने की लाइन में लगी होती। मैंने वंदना से कहा “कैसा अस्पताल है ये? यहाँ तो मरीज टेस्ट करवाते-करवाते ही मर जाय।” हद है।

इस सारे घटनाक्रम में सबसे अच्छी लगी एक्स रे कर रही लड़की। वो इतनी तेजी और तन्मयता से अपना काम कर रही थी कि जी खुश हो गया। जब उसने नाम पुकारा तो हमें लगा कि ये दुबली-पतली सी लड़की ‘नाम पुकारने के लिए’ ही रखी गयी है। लेकिन अन्दर गए, तो देखा कि वो अकेली ही बुलाने का काम भी कर रही थी और एक्स रे लेने का भी। वो एक मरीज का नाम बुलाती…फलां कौन है? मरीज आगे बढ़ता। लड़का/आदमी होता तो कहती “शर्ट उतार दो” उसको एक्स रे लेने वाली जगह पर खड़ा करके कहती “ठुड्डी इसके ऊपर रखो…पैड को दोनों हाथों से पकड़ो…साँस ज़ोर से खींचकर रखना और रोके रखना”…फिर मशीन पर जाती, बटन दबाती और कहती “हो गया”। इसके बाद तेजी से एक्स रे फिल्म निकालकर उस पर पर्ची लगाकर अलग रखती और दूसरा नाम पुकारती…एक-एक मरीज को लड़की दो-तीन मिनट में निपटा रही थी। वंदना मुझे भी अन्दर ले गयी थी, तो मैंने उसकी कार्यकुशलता को ध्यान से देखा। मैं अनुमान नहीं लगा पा रही थी कि इस छोटी सी, महीन आवाज़ वाली लड़की ने सुबह से कितने मरीज़ ‘निपटाए’ होंगे? ईमानदारी से काम करने वाले हर जगह मिल जाते हैं🙂

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एल.एन.जे.पी. अस्पताल का इमरजेंसी विभाग

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ज़मीन पर बैठे लोग

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बैठने के लिए चादर बिछाती औरत

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12 thoughts on “सरकारी अस्पताल में एक दिन

  1. एक जैसे ही हैं होते हैं ये सारे सरकारी हस्पताल -आपने जिस तरह घटनाओं का वर्णन किया है एक कई बार देखे हुये चलचित्र के दृश्य सामने से घूम गए हों -मुफ्त चिकित्सा के लोभ में कभी लेने के देने पड़ जाते है-अस्पताल बीमारियाँ तक हो जाती हैं जैसे टी बी आदि -संभल के!

    • ‘मुफ्त चिकित्सा’ के लाभ में नहीं, ‘अच्छे चिकित्सक’ की तलाश में. सरकारी डॉक्टर, प्राइवेट प्रैक्टिस करने वाले डॉक्टर से कहीं ज़्यादा काबिल होते हैं क्योंकि बहुत लंबी इंटर्नशिप और प्रतियोगिता परीक्षा के बाद नियुक्त होते हैं.

  2. मुझे एक बार सीजीएचएस डिस्पेंसरी ने प्रेग्नेंट दिखा दिया :O

    मामला ये है कि मैं यूरिन टेस्ट के लिए सीजीएचएस डिस्पेंसरी गया. उन्होंने मुझे घर से ही किसी भी शीशी में टेस्ट सैम्पल लाने के लिए कहा. मैं ले गया. उन्होंने मुझसे कहा कि मैं छत पर जाकर एक टेबल पर अपना कागज़ रखकर उसपर अपनी शीशी रख दूं. मैं जब छत पर गया तो देखा वहां एक छोटी से टेबल पर यूरिन सैम्पल की बहुत सी बोतलें रखी थीं. हर शीशी के नीचे एक कागज़ था. मैंने भी अपना कागज़ जमाकर अपना सैम्पल उसपर रख दिया.

    जब रिपोर्ट अप्रत्याशित आई तो मेरा भड़कना वाजिब था. उन्होंने कहा कि किसी शरारती ने बोतलें बदल दीं होंगीं.

    अगर ऐसा भी हुआ हो तो भी उन्हें टेस्ट तो वही करने थे जो मेरे कागज़ पर लिखे थे. मैं, और प्रेग्नेंट! तब तो मेरी शादी भी नहीं हुई थी!

  3. अच्छा लगा, उस एक्सरे करने वाली लड़की के बारे में जान , सही है अपने काम को इतनी कुशलता और ईमानदारी से पूरा करने वाले लोग कम ही सही पर हैं .

  4. डा. ज्ञान चतुर्वेदी का लिखा उपन्यास ’नरक यात्रा’ याद दिला दिया आपने।

  5. अनुभव अच्छे से लिखे।यह सही है ईमानदारी से काम करने वाले हर जगह मिल जाते हैं। हचक के शब्द प्रयोग पहली बार देखा तुम्हारी पोस्ट में। मजा आया पढ़कर।🙂

  6. काश स्वास्थ्य, शिक्षा पर ही ध्यान दे दे कोई..

  7. सरकारी अस्पतालों का हर जगह यही हाल है ….

  8. sarkari mahkama ko jo bhi samjhe par, sachchai hai, wahan se jure log bhi bahut mehnat karte hain

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