आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

रिश्तों की उलझनें

कभी-कभी मन इतना उलझ जाता है कि कोई एक सिरा ढूँढे नहीं मिलता। मानवीय सम्बन्ध बहुत जटिल होते हैं। बस दोस्ती का रिश्ता ऐसा होता है, जहाँ सब कुछ सहज ही होता जाता है। इस रिश्ते को बनाये रखने के लिए कोई कोशिश या औपचारिकताएँ नहीं की जातीं, लेकिन कभी-कभी यहाँ भी कुछ सवाल सामने आकर खड़े हो जाते हैं।

कई बार ऐसा हुआ है कि मेरे बहुत करीबी दोस्तों ने या तो मेरा फोन उठाया नहीं या काट दिया, पलटकर फोन नहीं किया। मैंने दो-तीन दिन तक इंतज़ार किया और फिर मैंने ही फोन किया… ये मेरे वो दोस्त हैं, जिनकी पढ़ाई में मैंने अपनी पढ़ाई छोड़कर साथ दिया, जिनके इंटरव्यू की तैयारी के लिए घर नहीं गयी, जिनके समय के लिए अपने समय की परवाह नहीं की। जबकि इन्हें पता है कि मैं अकेली और बेरोजगार हूँ, तब भी इतनी ज़हमत नहीं उठायी कि एक बार पूछ लेते कि मैं किसी मुसीबत में तो फोन नहीं कर रही हूँ।  फिर भी मैंने दोस्ती खत्म नहीं की ये सोचकर कि वो लोग किसी ज़रूरी काम में व्यस्त रहे होंगे और ये कि इतनी छोटी-छोटी बातों में दोस्ती नहीं तोड़ी जाती।

अभी कुछ दिन पहले एक दोस्त ने फोन किया पहली बार। मैं अपनी सहेली के साथ बात कर रही थी। वो बहुत दिनों बाद मेरे पास आयी थी और हम किसी समस्या पर बात कर रहे थे। मैंने दोस्त का फोन नहीं उठाया। कुछ और समस्याओं के कारण मैं शाम को फोन ऑफ कर लेती हूँ, तो उसे मेसेज भी नहीं कर पायी। सोचा था फेसबुक ऑन करूँगी तो उसे मेसेज दे दूँगी। लेकिन उसने नाराज़ होकर मुझसे सम्बन्ध तोड़ लिये और मुझे ब्लाक कर दिया।

एक दूसरा दोस्त है। वो विदेश में है और बीमार है। हम लगभग तेरह साल से दोस्त हैं। इलाहाबाद में एम.ए. करने के समय से। उसे मैंने हमेशा अपने छोटे भाई की तरह माना है। इस समय वो बहुत परेशान है और फेसबुक पर मेसेज और फोन कर-करके मुझसे एक बात पूछ रहा है। वो बात मुझसे सम्बन्धित नहीं है और मेरी आदत नहीं है कि किसी और की बात किसी दूसरे को बताऊँ। जब मैंने उसे वो बात नहीं बताई तो उसने मेरे फेसबुक स्टेटस पर उलटा-सीधा लिखना शुरू किया। मैंने उसे ब्लाक कर दिया। दो-तीन दिन बाद उसने फोन करके माफी माँगी तो मैंने माफ कर दिया और फिर से फेसबुक फ्रैंड बना लिया। कुछ दिन बाद उसने फिर वही हरकत की। फोन कर-करके भी परेशान कर दिया। तो मैंने शाम को फोन ऑफ करना शुरू कर दिया। फेसबुक पर भी उसने वैसा ही किया। मेरी व्यक्तिगत ज़िंदगी के बारे में उल्टा-सीधा लिखना।

बहुत दुःख हुआ मुझे। आप एक ओर तो मुझे अपनी बड़ी बहन मानते हो और दूसरी ओर ऐसी हरकत। उसको छोटा भाई मानती हूँ, उसकी बीमारी और अकेलेपन का ख़याल करती हूँ, इसलिए उसकी गलतियाँ माफ करती जाती हूँ। अगर ऐसा कोई और करता तो मेरी ज़िंदगी से ही बाहर हो जाता।

अब सोचने की बात ये है कि या तो मैं ज़रूरत से ज़्यादा सहनशील हूँ। जो अपने दोस्तों की इग्नोरेंस को इग्नोर कर देती हूँ या फिर वो दोस्त ज़रूरत से ज़्यादा गुस्सैल। ये सोचना बड़ा अजीब लगता है कि वह सीमा कहाँ है, जहाँ आकर हम ये तय कर सकें कि कौन ज़्यादा बड़ी समस्या में होता है।  फोन करने वाला, या किसी कारणवश फोन न उठाने वाला। कोई बार-बार इग्नोर करे तो उससे दोस्ती तोड़ना समझ में आता है, लेकिन एक बार फोन न उठाने पर ऐसा करना क्या सही है?

है ना सोचने की बात? कुछ दोस्त ऐसे हैं जो एकदम इग्नोर कर देते हैं और जब मिलते हैं तो ऐसे तपाक से कि उनसे सगा कोई है ही नहीं। फिर इतना सटीक रीज़न देंगे फोन न उठाने का कि आप कुछ कह ही नहीं सकते। आपके पास कोई चारा ही नहीं होता उनकी बात मानने के अलावा। और कुछ दोस्त आपकी प्रॉब्लम नहीं समझते। उनको इससे कोई मतलब ही नहीं कि आप पर क्या गुज़र रही है या आप किस मानसिक स्थिति में हैं, वो बस अपनी बात कहे जायेंगे। उन्हें लगेगा कि उनकी बात ज़्यादा महत्वपूर्ण है और उनकी समस्या ज़्यादा गंभीर। बीच में मेरे जैसे लोग फँस जाते हैं। क्या करें, कहाँ जायं? मेरी बात कोई समझता क्यों नहीं रे 😦

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33 thoughts on “रिश्तों की उलझनें

  1. हम सभी सुविधा पसंद जीव हैं। चाहते हैं कि अपनी व्यस्तताओं के समय फोन न उठाना पड़े और हम जब फोन करें तो अगला उठा ले। फोन स्विच ऑफ नहीं करना चाहिए लेकिन हम लोगों के इतने प्रकार के मित्र होते हैं कि हमेशा सभी को जवाब नहीं दिया जा सकता। एक से जुड़ो तो दूसरे की उपेक्षा हो ही जाती है। कई बार अनाप-शनाप कालें भी आती हैं। ऐसे में स्विच ऑफ भी करना पड़ता है। कभी लगता है यह जी का जंजाल है। कभी जब इसी फोन की वजह से भारी मदद मिल जाती है तो लगता है यह बड़े काम की चीज है। दरअसल फोन से दोस्ती का मुल्यांकन संभव ही नहीं है।

  2. थोड़ी देर के लिए दुःख तो होता है, जब जिन्हें कभी अच्छा मित्र समझा था वे ऐसा व्यवहार करें….लेकिन फिर यही सोच कर चलना चाहिए
    people come into ur life for a reason , for a season or for a lifetime
    अब life time वाले मित्रों का तो बाद में ही पता चलेगा ..
    इसलिए जाने वाले अगर जाते हैं तो फिर नए नए मित्र जीवन में आते भी हैं….इसलिए खुश रहो..

  3. “फिर इतना सटीक रीज़न देंगे फोन न उठाने का कि आप कुछ कह ही नहीं सकते। “
    अइसे दोस्तों के लिये शेर है-
    मैं सच बोलूंगी हार जाऊंगी,
    वो झूठ बोलेगा, लाजबाब कर देगा।

    बाकी दोस्ती के बारे में हम वसीम बरेलवी साहब का ये शेर अर्ज करते हैं:
    शर्तें लगाई नहीं जाती दोस्तों के साथ,
    कीजै मुझे कुबुल मेरी हर कमी के साथ।

    अउर जो दोस्त जानबूझकर परेशान कर रहा है वो दोस्त कैसा। हम उसकी निन्दा करते हैं। सजा तुम खुद दे देना। 🙂

  4. जो सचमुच दोस्त होते हैं, न सिर्फ वो तुम्हें जानते हैं, वो तुम्हें अच्छी तरह समझते भी हैं। ज़रा- ज़रा सी बात से जो दोस्ती तोड़ते हैं, उनसे दूर रहो। जीवन में अगर एक-दो भी अच्छे दोस्त हैं, तो काफी है। दोस्ती, फ़ोन , एस एम् एस, गूगल, फेसबुक, ट्विटर की मोहताज़ नहीं होती। दोस्ती वो होती है, जो किसी भी क़ीमत पर नहीं टूटती। दोस्ती में खुद से पहले, दोस्त के बारे में सोचा जाता है। और एक बात याद रखना जैसे-जैसे उम्र बढती है, इंसान अपने दोस्तों को ज्यादा ढूंढता है। अच्छे दोस्त बनाओ और पूरी ज़िन्दगी निभाओ। पढ़ा तो होगा ही A friend in need is a friend indeed. दफा करो ऐसे दोस्तों को और मस्त रहो, अच्छे दोस्त मिलेंगे, क्योंकि अच्छे दोस्त हैं, इसी दुनिया में।

    • कितनी अच्छी और सच्ची बात कही है आपने कि…….दोस्ती, फ़ोन , एस एम् एस, गूगल, फेसबुक, ट्विटर की मोहताज़ नहीं होती। ………………और एक बात याद रखना जैसे-जैसे उम्र बढती है, इंसान अपने दोस्तों को ज्यादा ढूंढता है। …….
      मैं भी स्वप्न मञ्जूषा जी के ये विचार ही यहाँ दोहराना चाहूंगी.

      • हाँ, ये बात सच है कि दोस्ती इन माध्यमों की मुहताज नहीं. लेकिन सभी दोस्त दूर-दूर हैं, तो फोन-फेसबुक ही जोड़े रखने का माध्यम है. मुझे लगता है कि इन माध्यमों ने दोस्तों की बीच की दूरी को कम किया है और नए दोस्त बनाने में मदद की है.

    • मैं खुद कभी भी इतनी छोटी-छोटी बातों पर दोस्ती तोड़ने के बारे में सोच भी नहीं सकती. ये सोच ही क्षुद्र सोच है. पर जब कोई ऐसा करता है, तो बहुत दुःख होता है.

      • दुःख होता है ??
        दुःख होना नहीं चाहिए, खुश होना चाहिए। क्योंकि ‘धीरज, धर्म, मित्र, अरु नारी, आपत काले परखिये चारि’। जो तुम्हारी समस्या नहीं समझते, तुम्हारा साथ नहीं देते उनका चले जाना ही बेहतर है।
        एक और उक्ति याद आ रही है ‘साधु ऐसा चाहिए जैसा सूप सुभाय, सार-सार को गहि रहै थोथा देई उडाय …ईश्वर का धन्यवाद करो कि उसने यह मौका दिया तुम्हें कि तुम उनसे दूरी बना सको

        एक बात और जो मुझे बुरी लग रही है, कहना चाहूँगी। शायद मेरा ये कहना तुम्हें पसंद ना आये, लेकिन तुमसे बड़ी हूँ और तुमसे ज्यादा जीवन देखा है मैंने, इसलिए कहूँगी ही। खुद पर तरस खाना बंद करो। बार-बार ये मत कहो कि मैं बेरोजगार हूँ, पैसे नहीं हैं। खुद को सबल बनाओ, जीवन समर आसान नहीं है, लेकिन ऐसा कहने से न तुम्हें कुछ हासिल होगा न ही लोग कुछ करने वाले हैं। कोई भी प्रतिष्ठित नौकरी ढूँढो, बेशक वो छोटी ही क्यूँ न हो, आगे बढ़ने के रास्ते स्वयं खुलेंगे। उम्मीद तो है कि तुम बुरा नहीं मानोगी।

      • हाँ, आप ठीक कह रही हैं…

      • मैंने तुम्हें हमेशा एक बहादुर लड़की ही देखा है, और तुम वही बनी रहो ..
        शुभकामनायें हैं हम सबकी तुम्हारे साथ ..

      • मैं हूँ बहादुर लड़की, लेकिन थोड़ी संवेदनशील ज़्यादा हूँ 🙂

  5. अनूप जी ने वसीम बरेलवी साहब के शेर के माध्यम से बहुत सटीक बात कही है.
    बाकी जिसे तुम्हें रुलाने में मजा आये वो दोस्त हो ही नही सकता.

  6. आजकल सबको कहना ही है सुनने का समय किसी के पास नहीं , वैसे रिश्ते जटिलताएं भी लाते हैं अपने साथ …..

  7. जब किसी को इतना धैर्य नहीं है कि एक फोन के उत्तर के लिये सायं तक प्रतीक्षा नहीं कर सकता तो क्या कहा जा सकता है, सब आपके अच्छे के लिये ही हुआ। शान्तमना जियें, विस्तार बहुत है जीवन में, किसी एक पर आधारित नहीं होती है जिन्दगी।

  8. ऐसे ही अनुभव जीवन को मुकम्मल बनाते हैं -मंगलेश डबराल की एक कविता भी इन्ही भावों की है जिसे मैंने सीधे अश्वघोष मानिंद/श्रीमुख से ही सुनी थी -मंच से उतरते ही महानुभाव से मैंने पूछ ही लिया था बतौर उलाहना कि आप कभी उन लोगों को भी फोन मिला लिया करिए जो जवाब देते हों 🙂 नहीं तो वो भी किनारा कर लेगें एक दिन -सहने की कोई सीमा भी होती है आखिर !

    • उन्होंने खुद फोन करना छोड़ा हुआ है 🙂 हमने तो मना किया नहीं.हमारे फोन में कभी इतने पैसे नहीं होते कि हम फोन करें और मिस्ड कॉल देने की आदत नहीं.

  9. ज़रा सी बात पे बरसों के याराने गये
    चलो इसी बहाने कुछ लोग पहचाने गये…

    भाढ में जाने दो उन्हें जिन्हें तुम्हातरी परवाह नहीं , काहे को खून जलाना जी …. ishmyle pilijjj 🙂

  10. खुश रहो मस्त रहो. जहाँ ऐसे दोस्त हैं, जिनका तुम जिक्र कि हो, वहीं वैसे दोस्त भी हैं जो तुम्हारी एक आवाज पर सब छोड़कर दौड़े चले आते हैं.
    सीमा रेखा तुम्हें खुद तय करना होगा, जैसे वे अपनी तय कर रखे हैं. एक सीमा रेखा के बाद खुद को इन सब बातों से अलग करने में समय नहीं लेना चाहिए.
    आगे तो, मनुष्य का मनोविज्ञान समझना किसी के बस कि बात नहीं. चाहे कोई कितना ही दावा कर ले.

  11. मुक्ति जी

    असल में होता ये है की जब हम दोस्ती को बड़े गंभीरता से लेते है और हर अगले को अपना दोस्त कहने लगते है , जरुरी नहीं है की हमारी तरह ही सभी दोस्ती को गंभीरता से लेते हो उसके असली मायनों के साथ , कुछ लोगो के लिए बस स्कुल कालेज का साथ ही दोस्ती है तो किसी के लिए मौज मस्ती का नाम दोस्ती है , किसी के लिए बस जब तक हो सके तब तक का साथ ही दोस्ती है तो किसी के लिए बस अपना काम हो जाने भर के लिए ही दोस्ती है , सभी दोस्ती को उसके असली मायनों के साथ लेते हो और उसे जीवन भर का सुख दुख का परेशानी ख़ुशी का साथ मानते हो ये जरुरी नहीं है । मुसीबत तभी आती है जब हम बड़े गंभीर है दोस्ती को लेकर अगले को अपना अच्छा दोस्त कहते फिरते है और अगला आप को उतना अच्छा दोस्त मानता ही नहीं है या वो दोस्ती शब्द को ही गंभीरता से नहीं लेता है , फिर तो ये होना ही है । उनके लिए मेरी सलाह है जो दोस्ती को बड़े गंभीरता से लेते है , की हर किसी को न तो अपना दोस्त बनाये और न ही हर किसी को अपना दोस्त माने , पहचान को दोस्ती नाम देने में थोडा समय ले सामने वाले को अच्छे से समझे और ये भी समझे की वो आप की दोस्ती को कितना गंभीरता से ले रहा है , कही वो बस स्कुल कालेज में साथ रहने और मौज मस्ती करने भर को ही तो दस्ती नहीं मन रहा है तो उससे दूर हो जाये , और किसी अपने जैसे से दोस्ती करे , कम लोगो से दोस्ती करे । जिनके साथ मैंने स्कुल के 1२ साल बिताये वो आज मेरे संपर्क में नहीं है मेरे मित्र नहीं रहे जिसके साथ बस कालेज का एक साल साथ बिताया आज १३ सालो से वो मेरी मित्र है ज्यादातर फोन पर क्योकि हमने साथ केवल १ साल ही बिताया है १२ सालो से अलग अलग शहरों में रह रहे है , और दो चार साल में एक बार मिलते है 🙂

  12. “दोस्त” काफी गहरा शब्द है – जो मिलते है उन सबको “दोस्त” न कहा कीजियेगा 🙂

    • दोस्ती- बड़ा व्यापक शब्द है. इसमें अचानक से मिले नए लोग भी शामिल हो जाते हैं और बचपन की दोस्ती वाले पक्के दोस्त भी. इसीलिये हम इसमें कैटेगरी बना लेते हैं. अच्छा दोस्त, बहुत अच्छा दोस्त वगैरह 🙂
      वैसे मैं जल्दी दोस्त नहीं बनाती हूँ. बहुत सोच-समझकर ही आगे बढ़ती हूँ. इस मामले में दिल से ज़्यादा काम लेती हूँ और मात खा जाती हूँ.

  13. rishto me apekshayen nahi honi chahiye… aisa suna tha,
    lekin suna hua, kahan hota hai…
    dosti me jayda hi ummiden honee lagi hai…

  14. अब मेरा भी दुःख सुन ले मुक्ति …जानती है ! कॉलेज के ज़माने की एक पक्की वाली सहेली है …कभी फोन नहीं करती , उम्मीद करती है कि हमेशा मैं ही फोन करूँ …वो भी फ्रीक्वेंटली….उसका तर्क ये होता है कि मैं नौकरी करती हूँ तो फोन करना अफोर्ड कर सकती हूँ (नौकरी करना मानो दोस्ती को जिंदा रखने का भी जरिया हो)….गाहे बगाहे मैं ही उसे फोन किया करती हूँ …. जब उसे खुद अपनी ज़रूरत के लिए फोन करना होता है तो वो जल्दी जल्दी बात कह कर फोन काट देती है ..शायद सुकून की सांस भी लेती हो …मेरे फोन करने पर तसल्ली से गपियाती है ….हालांकि मुझे ये भी बुरा नहीं लगता ….पर तकलीफ तब हुई जब मेरे जन्मदिन जैसे दिन पर मिस कॉल दे कर चुप लगा गयी …पलट के तुरंत मेरे फोन करने पर बातें हुईं …बातों के दौरान उसका ये पूछना कि फोन किसका लगा है ..मेरा कि तुम्हारा ….?…….बस उसका ये पूछना चुभ गया कहीं ……….अब शायद उससे कभी उतने स्नेह भाव से बात नहीं कर सकूंगी …
    संवेदनशील होने के ये नुकसान हैं यार …उठाने तो पड़ेंगे न !!

  15. बहुत सारे अनुभवीजन अच्छी-अच्छी बातें कह गये. मेरा खुद का मानना है, कि दोस्ती में इतना भरोसा हमेशा होना चाहिये, कि अगर फोन नहीं उठा, तो उसे हम दोस्त की इग्नोरेंस न मान पायें. जो आपके बारे में ज़ाहिर तौर पर उल्टा-सीधा लिख रहा, वो दोस्त है ही नहीं. दोस्त कम हों, बस सच्चे हों.

  16. vyakti ko pehchanae mae agar aap nirantar bhul kartae haen to galti kahin naa kahin aap ki apni haen . usko shudharae

  17. जो सब के समक्ष आपके बारे मे उल्टा सीधा कहे या लिखे वह आपका दोस्त नही हो सकता । ऐसे मे उससे दूर रहना ही सही है ।

  18. दोस्ती में प्यार भी होता है और बचपना भी. साथ साथ चलते कुछ समय लेते हैं, कुछ समय के साथ बड़े होते हैं तो कुछ बिना समय गंवाए ही एक दुसरे को अच्छा पहचानने लगते हैं. शायद सब का अपना अपना चार्म है. हर हाल में लेकिन दोस्ती बहुत हसीन है.

  19. जैसे-जैसे उम्र बढती है, इंसान अपने दोस्तों को ज्यादा ढूंढता है। hummmmmmmmmm!!!

  20. 🙂 जो भी चर्चा हो रही है वो मित्रों की है ना मित्रता की..बस जान पहचान वाले लोग और उनके बात व्यवहार की चर्चा मात्र.
    “रहिमन विपदा हूं भली जो थोड़े दिन होय, हित अनहित या जगत् में जानी परत सब कोय”.आजकल हम हर क्षण जाँच परख कर रहे है कि ये मित्र है या नही…यहाँ तक कि फ़ोन कॉल उठाने, कॉल करने या बात के लहजे से निर्धारित करने लगे है मित्र और शत्रु..कारण ये है कि हम बिना स्वयम्‌ को जाने दूसरों की विवेचना करने लगे है.वैसे बड़ा रोचक विषय है आज कल फ़ोन पर जो घंटों बात होती है उसको रिकॉर्ड कर देखिये तो पता लगेगा कि अर्थ हीन महत्व्हीन बातों में कैसे हम समय बरबाद कर देते है.वो कैसी मित्रता जो इन छोटे छोटे क्षणों की मोहताज रह जाए.इसलिए में जानता कई लोगों को हूं पर मेरा कोई मित्र नही.और लोगों के व्यवहार से मुझे दुःख हो सकता है पर वो दुःख मुझे व्यथित करने का माद्दा नही रखता….मित्र मिलें ये भी बड़े सौभाग्य कि बात है….और वो मित्रता जीवन भर बनी रहे ये परम् सौभाग्य की…..:)

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