आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

Archive for the day “अप्रैल 28, 2013”

खेलों से नाता

बचपन से ही मेरी खेल-कूद में रूचि थी और अम्मा की लाख रोक-टोक के बावजूद मैं रेलवे कालोनी के लड़कों के साथ ऊधम मचाती रहती थी. स्कूल में भी खेलों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती थी और इनाम भी जीतती थी. प्राइमरी तक तो ‘आलू दौड़,’ ‘मेंढक दौड़’, ‘म्यूज़िकल चेयर’ वगैरह जाने कितने अजीब-अजीब से खेल होते थे और प्रतियोगिताएँ भी स्कूल के अन्दर ही होती थीं. लेकिन छठी कक्षा से मैंने एथलेटिक्स में भाग लेना शुरू कर दिया और जिले स्तर की विद्यालयीय प्रतियोगिताओं में जाने लगी.

जिला स्तर की खेल-प्रतियोगिताओं में एथलेटिक्स में सिर्फ तीन खेलों में भाग लेने का नियम था, तो मैं सौ मीटर दौड़, डिस्कस थ्रो (चक्का फ़ेंक) और लंबी कूद में भाग लेने लगी. जब मैंने पहली बार सौ मीटर दौड़ लगाई तो मेरी गेम टीचर सिद्दीकी मैम आश्चर्यचकित रह गयीं क्योंकि मैं फ़्लैट फूटेड थी. मुझे तब समझ में ही नहीं आता था कि इसका मतलब क्या होता है. बहुत बाद में पता चला. मैम को अचरज इस बात पर था कि मैं हर बार फर्स्ट आ जाती थी. ये शारीरिक कमी कभी भी मेरी तेज दौड़ में बाधा नहीं बनी. मज़े की बात की मैं दौड़ने का नियमित अभ्यास कभी नहीं करती थी. शायद अपनी कालोनी में खेलना मेरे काम आता था.

आठवाँ पास करने के बाद मेरे हॉकी के कोच नज़्मी भाई ने मुझे एथलेटिक्स में भाग न लेने का और इनडोर खेलों की ओर ध्यान देने की सलाह दी. क्योंकि उन्हें मालूम था कि मैं खेल के साथ-साथ पढ़ाई भी अच्छे से करना चाहती हूँ और एथलेटिक्स के लिए जितनी मेहनत चाहिए उतनी मैं नहीं कर पाऊँगी. फिर पिताजी के मगरवारा से उन्नाव ट्रांसफर के बाद से मेरा खेल का मैदान भी छिन गया था. उन्नाव की रेलवे कालोनी रेलवे स्टेशन के पास थी और कोई खेल का मैदान नहीं था. लड़के तो स्टेशन के उस पार स्थित जी.आई.सी. ग्रांउड में खेलने चले जाते थे. पर मेरा खेल छूट गया. जब तक स्कूल रहता था, तब तक वहीं खेल लेती थी. लेकिन गर्मियों की छुट्टियों में खेलों से नाता बनाए रखने और खुद को फिट रखने के लिए मैंने भी जी.आई.सी. ग्राउंड हॉकी खेलने जाना शुरू कर दिया. हालांकि हॉकी की प्रतियोगिता में कभी भाग  नहीं लिया.

मेरे लड़कों के साथ हॉकी प्रैक्टिस पर जाने का अम्मा ने बहुत विरोध किया, लेकिन बाऊ की अनुमति तुरंत मिल गयी थी. रेलवे कालोनी के लोग भी बहुत खुसुर-फुसुर करते थे कि ‘चौबे जी ने अपनी लड़की को ज़्यादा ही छूट दे रखी है. अरे बैडमिंटन, टेबल-टेनिस तक तो ठीक है, लेकिन हॉकी? उसमें तो आपस में भिड़ना पड़ता है, और वो भी मुसलमान लड़कों से’ ऐसा लगता था कि मुसलमान लड़कों से भिड़कर मुझे छूत का रोग लग जाएगा 🙂

हॉकी प्रैक्टिस पर मैं सुबह पाँच बजे चल देती थी. मेरे साथ कालोनी की एक और लड़की सुनीता भी जाती थी. उन्नाव जिले की खेल की टीमों के विषय में एक दिलचस्प आँकड़ा ये था कि वहाँ की हॉकी की टीम में मुसलमान लड़कों का प्रतिशत ज़्यादा था और क्रिकेट टीम में हिन्दुओं का. प्रैक्टिस पर आने वाले सारे बड़े-बड़े लड़के थे, जिनको हमलोग भाई कहकर बुलाते थे और वो लोग हमें ‘छोटी’ कहते थे. सिर्फ हमदोनों लड़कियाँ थीं और बाकी लड़के. इसलिए हमें ज़्यादा महत्त्व मिलता था 🙂 कुछ भाई लोगों के नाम तो मुझे अभी भी याद हैं. उरूज़ सर और नज़मी भाई तो हमारे स्कूल के कोच ही थे, इसके अलावा शिबली, सारिक और शाहिद भाई थे. केवल दो लड़के हमारे हमउम्र थे और उनका नाम कैसे भूल सकती हूँ 🙂 एक था शिब्बू और दूसरा राजू.

शिब्बू और राजू से मेरी कभी आमने-सामने बात नहीं हुयी, जबकि सुनीता बराबर बात करती थी. एक तो मैं वैसे ही थोड़ी संकोची और अंतर्मुखी स्वभाव की थी, दूसरे अपने हमउम्र लड़कों (खासकर शिब्बू, मुझे वो अच्छा लगता था 🙂 )से बात करने में और हिचकती थी. बचपन के साथियों की बात दूसरी थी. एक बार शिब्बू और राजू में शर्त लगी मुझसे बात करने की. हमलोग हॉकी प्रैक्टिस के बाद मैदान के बाहर एक बूढ़ी अम्मा की चाय की दुकान पर चाय पीते थे. हम चाय ही पी रहे थे शायद, शिब्बू कुछ देर मेरे पास आकर खड़ा रहा. और मैंने ज्यों पलटकर उसकी ओर देखा, वो भागकर राजू के पास बैठ गया. सबलोग हँसने लगे. जब मैंने प्रश्नवाचक दृष्टि से नज़मी भाई की ओर देखा, तो उन्होंने असल बात बतायी. मैंने मुस्कुरा भर दिया. पर बात नहीं की. कभी भी नहीं.

ओह! क्या मस्ती भरे दिन थे वे. जब खेल छूटा, तो सारे दोस्त भी छूट गए. नज़मी भाई अक्सर मुझसे कहते थे कि हाथ में स्टिक लेकर बिंदास चलने वाली लड़की को कोई छेड़ नहीं सकता. हाँ, हमारे हाथ में स्टिक होती थी, तो हममें एक अलग सा आत्मविश्वास भर जाता था. हम पूरा रेलवे स्टेशन क्रास करके अपनी कालोनी में आते थे. मुसाफिर अचरज भरी निगाहों से हमें देखते थे.

नज़्मी भाई मेरे हॉकी छोड़ने के बाद भी मुझसे मिलते रहते थे. मेरे घर भी आते-जाते थे. मुझे याद है कि चौरानबे में जब हम वैष्णो देवी घूमने गए थे, तो नज़मी भाई ने दीदी को सौ रूपये दिए थे प्रसाद चढ़ाने को. आपको शायद आश्चर्य होगा ये सुनकर कि उन्नाव के कुछ मुस्लिम लोगों की वैष्णो देवी में खासी श्रद्धा थी और वे लोग अक्सर वैष्णो देवी दर्शन के लिए भी जाते थे. खुद नज़मी भाई भी वैष्णो देवी होकर आये थे.

इस बरस उन्नाव गए हुए दस साल हो गए. आजकल नज़्मी भाई की बहुत याद आती है. जाने कैसे होंगे वो ?

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