आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

Archive for the month “मई, 2013”

मीत के गुण्डा की गुण्डई के किस्से

फेसबुक पर मीत  ने हमको ‘गुण्डा’ नाम दिया है, जो कि हमारे स्वभाव को पूरी तरह चरितार्थ करता है 🙂 मीत कौन हैं? इनसे हमारा परिचय करीब साढ़े तीन साल पहले ब्लॉग लिखते-लिखते हुआ था. इनका एक ब्लॉग हुआ करता था (अब पता नहीं कहाँ गया?)- ‘किससे कहें.’ उस पर ये पुराने फ़िल्मी गीत, ग़ज़लें, गीतकारों और गजलकारों के किस्से और न जाने क्या-क्या छापा करते थे. कुछ पहेलियाँ भी पूछते थे. ऐसी ही किसी पहेली का जवाब सही-सही देने के बाद हमारा इनसे परिचय हो गया. (ये हमने आज तक किसी से नहीं बताया था कि हमको ये बहुत अच्छे लगते थे :)) खैर, मीत हमको ‘गुण्डा’ कहते हैं , तो हम अपनी गुण्डई के कुछ किस्से सुनायेंगे और आपको सुनना पड़ेगा नहीं तो हम कैसे गुण्डा?

(किस्सा नंबर एक)

ये इलाहाबाद की घटना है. मैं अपने एक दोस्त के साथ ‘धूम’ फिल्म देखने गौतम सिनेमाघर गयी. और हमेशा की तरह किनारे (कार्नर नहीं :)) वाली सीट पर बैठी. फिल्म अभी शुरू ही हुयी थी कि पीछे की सीट से एक लड़का उठकर बाहर गया और जाते-जाते मेरे कंधे को छूता गया. पहली बार मैंने सोचा कि हो सकता है कि हाथ गलती से लग गया हो. लेकिन वापस लौटने पर उसने फिर वही हरकत की. मैंने अपनी सीट से खड़े होकर तुरंत उसे टोका, “तुमने हाथ क्यों लगाया?” वो डर तो गया लेकिन अपनी गलती न मानते हुए लड़ने लगा, “गलती से लग गया होगा.” मैंने कहा, “गलती से एक बार हाथ लगता है दुबारा नहीं.” मेरा दोस्त भी उससे झगड़ पड़ा और कहा, ‘माफी माँगो’ इस पर वो लड़का भड़क गया. उसके दोस्त जब खड़े हुए तो पता चला कि वो करीब सात-आठ थे. शायद इसीलिये इतना अकड़ रहे थे. सिनेमाहाल के और लोगों को फिल्म छूटने की चिन्ता हो रही थी. उन्होंने उल्टा मुझे समझाया, “बहनजी, जाने दीजिए” मैंने ज़ोर से चिल्ला के कहा, “शर्म तो आती नहीं आपलोगों को. एक लड़का अँधेरे का फ़ायदा उठाकर बदतमीजी कर रहा है और आपलोग हमसे कह रहे हैं कि हम जाने दें.”

इसी बीच शोर-शराबा सुनकर चौकीदार आ गया. उसने उनलोगों को शांत करके बैठा दिया और मुझसे भी बैठने के लिए कहा. मैं बैठ तो गयी, लेकिन मेरा खून खौल रहा था कि जिस लड़के ने मेरे साथ बदतमीजी की, उसका मैं कुछ नहीं बिगाड़ पायी. मैंने सुना कि वो लड़का किसी से फोन पर बात कर रहा था, जिससे ये लगा कि वो कुछ और गुंडों को अपनी मदद के लिए बुला रहा है. मुझे और गुस्सा आया. मेरे दोस्त ने मेरा मूड और हालात देखते हुए वापस चलने के लिए कहा, तो मैंने मना कर दिया कि “फिल्म देखने आयी हूँ, तो देखकर जाऊँगी. इन कमीनों के कारण मैं भाग नहीं सकती.” और सच में मैं भागती कभी नहीं. हमेशा लड़ती हूँ.

तभी चौकीदार ने मेरे पास आकर कहा, “मैडम, आप आराम से बैठिये. मैनेजर ने गेट बंद करवा दिया है और पुलिस को बुला लिया है.” तब जाकर मेरा गुस्सा कुछ शांत हुआ. ठीक दस मिनट बाद पुलिस आ गयी. उस थाने का एस.एच.ओ. उन दिनों काफी मशहूर था ऐसे बदमाशों को सबक सिखाने के लिए. पुलिस ने दोनों पक्षों को बाहर बुलाया और मुझसे लड़के को पहचानने को कहा. मेरे इशारा करते ही उन्होंने डंडे बरसाने शुरू कर दिए, तो मेरे मुँह से निकला, “आप मार क्यों रहे हैं?” इंस्पेक्टर बोला, “मैडम, आप जानती नहीं. ये लोग ऐसे ही सीधे किये जाते हैं” पुलिस उससे पूछ रही थी कि वो किसे बुला रहा था. तब पता चला कि वो इलाके के किसी जाने-माने गुंडे का छोटा भाई था.

खैर, पुलिस उन बदमाशों को पकड़कर ले गयी. हमलोग पूरी फिल्म देखकर ही वापस लौटे.

(किस्सा नम्बर दो)

अभी इसी दीवाली की बात है. रात के दो बज गये थे, लेकिन नीचे रहनेवाले ‘लोकल्स’ ने पटाखे फोड़-फोड़कर सिर में दर्द कर दिया था. पटाखों की आवाज़ से ज़्यादा उससे उठने वाले धुएँ ने नाक में दम कर दिया था. तीसरे माले पर कमरा होने के कारण सारा धुँआ कमरे में भर गया था. मुझसे जब नहीं सहन हुआ, तो मैं बालकनी में जाकर चिल्लाई, “अब आपलोग पटाखे जलाना बंद कर दें प्लीज़.” नीचे से आवाज़ आयी, “अरे साल भर में एक दिन तो त्यौहार होता है. हम तो छुड़ाएंगे पटाखे. आपको क्या तकलीफ है?” और फिर से पटाखे दगाने लगे. मैंने कहा, “सारा धुँआ ऊपर आ रहा है” उन्होंने सुना नहीं. फिर मैंने कहा कि “आप ये बंद करें, वरना मैं पुलिस को कॉल कर दूँगी.” इस पर एक लड़का ऊपर मुँह करके चिढ़ाने लगा, “क्या कह रही हैं? आवाज़ नहीं आ रही है?”

उसकी इस हरकत से मुझे इतनी ज़ोर की चिढ़ मची कि मैंने मोटर ऑन करके टैप में पाइप फिट कर दिया और पानी से भिगो दिया उन सबको. अब नीचे भगदड़ मची हुयी थी. एक आदमी का ‘इगो’ जाग गया. वो ‘आउट ऑफ कंट्रोल’ होकर ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगा. बोला ये क्या बेहूदा हरकत है. मैंने चिल्लाकर कहा, “जैसे नीचे से धुँआ ऊपर आ सकता है. वैसे ही पानी भी नीचे जा सकता है.” सभी पटाखे छुड़ाने वाले और उनके पटाखे भीग चुके थे. ऊपर अँधेरा होने के कारण वो लोग ये नहीं देख पाये कि ये हरकत किसने और किस बिल्डिंग से की है? नीचे से आवाजें आ रही थीं…’ये क्या बदतमीजी है’ ‘किस मकान से फेंका गया पानी’ ‘मकान मालिक को बुलाओ और इनको निकलवा दो’

मैं थोड़ी देर तक उनका तमाशा देखती रही. फिर आकर अपने कमरे में सो गयी. वो लोग फिर कहीं से पटाखे ले आये और दुबारा वही काम शुरू कर दिया…लेकिन तब तक कुछ और लोगों ने भी विरोध करना शुरू कर दिया. बड़ी देर तक नीचे चिल्ल पों होती रही और इस सबकी शुरुआत करने वाली मैं गुंडी आराम से बिस्तर पर लेटी हुयी थी. मुझे हँसी आ रही थी कि ये सिरफिरे लोग मेरे कारण अपने पैसे से पटाखे खरीदकर फूँक रहे हैं 🙂

( किस्सा नंबर तीन)

हमारे मुहल्ले की एक तस्वीर

हमारे मुहल्ले की एक तस्वीर

रात के तीन बजे सामने की बिल्डिंग के तीसरे मंजिल वाले का दिल रोमैंटिक हो गया था और उसने फुल वोल्यूम में ‘साँस में तेरे साँस मिली तो मुझे साँस आयी’ गाना बजाना शुरू कर दिया. हमारा मुहल्ला ठहरा सँकरी गलियों वाला. ऐसा लगा जैसे गाना मेरे ही कमरे में बज रहा हो. मेरी आँख खुल गयी. बालकनी में निकली तो देखा कि एक-दो और लड़के देख रहे थे (यहाँ ज्यादातर सिविल की तैयारी करने वाले लड़के हैं, जिनकी पढ़ाई में विघ्न पड़ रहा था) पर समस्या ये कि इस बिल्डिंग से नीचे उतरकर सामने वाली बिल्डिंग में मना कौन करने जाय? वैसे भी सिविल वाले किसी से पंगा नहीं लेते. थोड़ी देर में सब अपने-अपने कमरों में चले गए.

मैंने सोचा कि जाने दो. बेचारा पूरा गाना सुन लेगा तो खुद ही बंद कर देगा. लेकिन पता नहीं सामने वाले को क्या फितूर सवार था कि उसने वही गाना करीब तीन बार रिपीट किया. जब चौथी बार गाना शुरू हो गया तो मेरी गुण्डई जाग गयी. मैंने दीवाली में बालकनी पर रखे पुराने ‘दीये’ उठाये और एक-एक करके सामने वाले के दरवाजे पर निशाना लगाना शुरू किया. सोचा कि बन्दा आजिज आकर दरवाजा खोलेगा तो उससे कहूँगी कि ‘तुमने मुझे डिस्टर्ब किया तो मैं तुम्हें कर रही हूँ.’ लेकिन वो नौबत नहीं आयी. तीसरा दीया फेंकते ही गाना बंद हो गया और दुबारा नहीं बजा 🙂

(किस्सा खतम पइसा हजम :))

क्या किया जाय?

Untitled

कभी-कभी औरतों को सेक्सुअल अब्यूज़ इस तरह से झेलना पड़ता है कि समझ में नहीं आता कि इसे अब्यूज़ मानें या न मानें और अगर मानें तो प्रतिक्रिया किस तरह से व्यक्त करें? क्योंकि किसी बात को लिखने में किसी का क्या मंतव्य रहा होगा, ये पता नहीं किया जा सकता. अगर आपने शिकायत की तो अगला सीधे-सीधे कह देगा कि उसका ये मतलब नहीं था और इल्जाम आप पर लग जाएगा.

कुछ साल पहले मैं संस्कृत के एक सेमीनार में मसूरी गयी थी. वहाँ आधुनिक संस्कृत के जाने-माने साहित्यकार आये हुए थे, जिन्हें उसी साल संस्कृत का साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था. मैं उस सेमीनार की सबसे छोटी प्रतिभागी थी और आयोजनकर्ता मसूरी महाविद्यालय के संस्कृत विभाग के प्रवक्ता मेरे गाइड के परिचित थे, तो सबलोग मेरा बहुत ध्यान रख रहे थे. सबने मेरी तारीफ़ भी की कि मैं इतनी दूर से वहाँ पहुँची और ‘आधुनिक संस्कृत-नाटकों में चित्रित नारी-सम्बन्धी सामाजिक समस्याएँ’ विषय पर एक अच्छा शोध-पत्र पढ़ा.

उस सेमीनार के अगले ही दिन दिल्ली में एक सेमीनार था. मैं पूरी रात मसूरी से यात्रा करके आयी और दिल्ली वाले सेमीनार में भी पहुँची. भोजन के समय सब लोग आपस में बात कर रहे थे. वहाँ भी वे कवि महोदय थे, जिनकी बात मैंने ऊपर की है. मुझसे मेरे गाइड ने कहा था कि कुछ आधुनिक साहित्यकार मिलेंगे तो उनकी पुस्तक के प्रकाशनों का पता ले लेना, ताकि उन्हें डाक से मंगाया जा सके क्योंकि आधुनिक संस्कृत-साहित्य की पुस्तकें या तो पुस्तकालय में मिलती हैं, या प्रकाशन से मंगानी पड़ती हैं. सामान्य पुस्तक-वितरण केन्द्रों या दुकानों पर नहीं मिलतीं. मैंने इसी उद्देश्य से कवि महोदय के पास जाकर निवेदन किया कि ‘सर आप अपने प्रकाशन का पता दे दीजिए, मुझे एक शोध-पत्र के सम्बन्ध में पुस्तकें मंगवानी हैं.’ उन्होंने मुझसे कहा कि ‘मसूरी में तुम्हारा शोध-पत्र अच्छा था. तुम प्रतिभाशाली लड़की हो.’ मुझे खुशी हुयी कि इतने बड़े विद्वान ने मेरे शोध-पत्र की ओर ध्यान दिया. मैंने उनसे उनके पते और हस्ताक्षर के साथ कुछ प्रोत्साहन के शब्द भी लिखने को कहा. उन्होंने लिखा. जब मैंने पढ़ना चाहा तो उन्होंने कहा कि ‘यहाँ नहीं घर जाकर पढ़ना’ और मुझे देखकर मुस्कुराने लगे, तो मुझे थोड़ा अजीब लगा. लंच खत्म हो गया था, तो सबलोग अपनी-अपनी जगह बैठ गए.

कमरे पर आकर जब मैंने वो डायरी देखी, जिसमें कवि महोदय ने मेरे लिए “प्रोत्साहन के शब्द” लिखे थे, तो मेरे क़दमों के नीचे से ज़मीन निकल गयी. उन्होंने मेरे शारीरिक सौंदर्य पर एक श्लोक लिखा था संस्कृत में. जिसका भाव ये था कि “वैसे तो तुम्हारे कटि, वक्षस्थल, मुखमुद्रा और केश बहुत ही सुन्दर हैं, लेकिन जो तुम्हारे गालों के गढ्ढे में गिरा, उसके उबरने का कोई उपाय नहीं.” मैं दंग थी. समझ में नहीं आ रहा था कि एक कवि द्वारा अपनी तारीफ़ किये जाने पर खुश होऊँ या एक दादा के उम्र के आदमी के द्वारा एक तेईस-चौबीस साल की लड़की के शरीर को देखकर श्रृंगार-भाव जागृत होने पर रोऊँ. मैंने सोचा ‘इसका मतलब ये आदमी मेरे रिसर्च पेपर को नहीं सुन रहा था, बल्कि मेरे शरीर के अंग-प्रत्यंगों का निरीक्षण कर रहा था, नहीं तो इतनी सूक्ष्मता से वर्णन कैसे कर सकता था?’

ऐसा तब था जबकि सबको मालूम था कि मैं किसके पर्यवेक्षण में शोध कर रही थी और उसी के कहने से वहाँ गयी थी? मेरे गाइड एक जाने-माने व्यक्ति हैं और वो और उनकी पत्नी मुझे अपनी बेटी की तरह स्नेह करते थे. क्या इस आदमी को ज़रा-सा भी ये नहीं लगा कि उसका ये “श्रृंगार रससिक्त” श्लोक यदि मैं अपने सर को पढ़ा दूँ, तो इसकी क्या इमेज रह जायेगी? मुझे खुद भी समझ में नहीं आ रहा था कि कवि महोदय के मन में वह श्लोक लिखते समय सिर्फ काव्यात्मक प्रतिभा थी या कुछ और.

खैर, मैंने वो श्लोक अपने एक दोस्त के अलावा किसी को नहीं दिखाया. दोस्त श्लोक देखते ही गुस्से से उबल पड़ा. आखिर किसी सत्तर वर्षीय वृद्ध के मन में एक नवयुवती को देखकर ऐसे भाव कैसे आ सकते हैं? मान लो, ये माना जाय कि आदमी बूढा होता है, उसका दिल नहीं, तो भी, ऐसे पठन-पाठन के माहौल में इस ओर ध्यान कैसे जाता है किसी का? इस सबसे भी ऊपर कि संस्कृत के विद्वान होने के कारण उनको चारों आश्रमों के विषय में पता था, तो संन्यास आश्रम की अवस्था में श्रृंगार वाले भाव शोभा देते हैं क्या?

मैं नहीं जानती कि कवि महोदय की उक्त हरकत को लोग सेक्सुअल एब्यूज़ के श्रेणी में रखेंगे या नहीं. ये एक विवादित विषय हो सकता है. लोग रचनात्मक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की दुहाई देने लगेंगे. मैं इतनी शुद्धतावादी नहीं हूँ कि रचनाकार की हर रचना पर नैतिक आधारों पर प्रश्नचिन्ह लगाती फिरूँ, लेकिन एक बात मैं जानती हूँ कि मुझे अच्छा नहीं लगा था. बहुत दुःख हुआ था और धक्का लगा था. अब सोचती हूँ तो हँसी आती है, लेकिन ये सच है कि इस घटना ने मुझे इतना डरा दिया कि मैं सेमीनार में तो जाती थी, लेकिन किसी से बात नहीं करती. व्यक्तिगत पहचान बनाना न मेरा स्वभाव कभी रहा है और न मैंने कभी इसकी कोशिश की है, लेकिन शिष्टाचारवश भी किसी से बात करने से बचने लगी.

मुझे लगता है किसी के भी बारे में ऐसा कुछ लिखना जिसे पढ़कर उसे अच्छा न लगे, ‘अब्यूज़’ की ही श्रेणी में आना चाहिए. और यदि ऐसा सामने वाले के सेक्स को देखकर लिखा गया है, तो इसे ‘सेक्सुअल अब्यूज़’ कहेंगे. यदि सामने वाला आपको सकारात्मक संकेत दे रहा हो, तो आप एक क्या, उस पर सौ श्लोक लिखिए. ‘श्रृंगारशतक’ बना डालिए, लेकिन जो लड़की आपसे प्रोत्साहन की अपेक्षा रखती है, उसे उसके शरीर की तारीफ़ करके हतोत्साहित करना बिल्कुल भी उचित नहीं है. आपने उसे उत्साहित करने के बजाय इस तरह की शैक्षिक और अकादमिक गतिविधियों में भाग लेने से हतोत्साहित किया, तो आपने भी अब्यूज़ ही किया.

खैर, वो कवि महोदय इस समय दिवंगत हो चुके हैं, नहीं तो मैं यहाँ बाकायदा उनका नाम लिखती और उनका लिखा श्लोक भी. फिर मुझे परवाह नहीं होती कि उनसे पंगा लेने के कारण मुझे कहीं नौकरी न मिलती. और आज अगर वो मेरे साथ ऐसा करते तो मैं वहीं लंच की जगह पर सबको पढ़कर सुना देती कि देखो, कवि महोदय ने अपनी पोती की उम्र की लड़की पर कितना सुन्दर श्रृंगाररससिक्त श्लोक लिखा है.

बैसवारा और आल्हा-सम्राट लल्लू बाजपेयी

अभी कुछ दिन पहले ‘बैसवारा की शान’ कहे जाने वाले लोकप्रिय आल्हा गायक लल्लू बाजपेयी के देहांत की खबर सुनी तो मन जाने कैसा-कैसा हो गया? शायद पूरे भारत के लोग लल्लू बाजपेयी को न जानते हों, शायद उन्होंने बैसवारा का नाम भी कभी न सुना हो, लेकिन मैं बैसवारा क्षेत्र में ही पली-बढ़ी हूँ, इसलिए मेरा इससे बेहद लगाव है. लल्लू बाजपेयी को दूरदर्शन पर देखते और रमई काका उर्फ ‘बहिरे बाबा’ के किस्से सुन-सुनकर बड़ी होने के कारण मैं बैसवारा को इन दोनों नामों की वजह से ही ज़्यादा जानती हूँ.

मेरे चाचा वसंत सिंह तोमर ने मुझे बैसवारा के इतिहास, साहित्य और संस्कृति आदि के बारे में बताकर मेरी रूचि इस ओर पैदा की थी, लेकिन स्कूली पढ़ाई-लिखाई और जीवन के झंझावातों के चलते मैं इस सम्बन्ध में अधिक अध्ययन नहीं कर पायी. फिर भी जितना जाना-सुना था, उसके अनुसार किसी ज़माने में यह क्षेत्र अपनी पृथक पहचान रखता था. यह पहचान समय के साथ-साथ धीरे-धीरे मिटती गयी. आमतौर पर बैसवारा को लोग रायबरेली से जोड़कर देखते हैं (शायद वहाँ स्थित इसी नाम के रेलवे स्टेशन के कारण), जबकि वास्तविकता यह है कि बैस राजपूतों के प्रभाव के कारण इस क्षेत्र को बैसवारा कहा जाता है. पहले यह क्षेत्र बाईस परगनों में फैला हुआ था. इन बाइस परगनों में आधुनिक उन्नाव, रायबरेली, लखनऊ व बाराबंकी के थोड़े-थोड़े भाग सम्मलित हैं.  दैनिक जागरण में एक बार बैसवारा के इतिहास के बारे में एक मज़ेदार लेख पढ़ा था और उसे बुकमार्क कर लिया था. इस लेख को यहाँ पढ़ा जा सकता है.

हिंदी की एक बोली के रूप में ‘बैसवारी’ का उतना ज़िक्र नहीं होता या हो सकता है कि होता हो, मुझे ही नहीं पता. वैसे भी अवधी खुद एक बोली है और बैसवारा को अवधी से जुड़ी हिंदी की एक ‘उपबोली’ कहा जा सकता है. अवधी के बहुत से शब्दों से और लहजे से बैसवारा में काफी भिन्नता पायी जाती है, लेकिन मुख्यतः बैसवारी बोली से ज़्यादा “बैसवारा” क्षेत्र का अधिक महत्त्व है. किसी युग में इस क्षेत्र से हिंदी साहित्य के बड़े-बड़े नाम जुड़े हुए थे, जिनमें सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, महावीर प्रसाद द्विवेदी, राम विलास शर्मा, शिवमंगल सिंह सुमन, प्रताप नारायण मिश्र, भगवतीचरण वर्मा, रमई काका आदि प्रमुख हैं. अभी कुछ दिन पहले बैसवारा से सम्बन्धित कैलाश बाजपेयी जी का एक लेख अमर उजाला में पढ़ा था- बैसवारा में कविता की खेती ,जिसमें उन्होंने अपने कुछ अनुभवों के साथ बैसवारा की समृद्ध साहित्यिक विरासत पर प्रकाश डाला है.

हमलोग लल्लू बाजपेयी का आल्हा गायन लखनऊ दूरदर्शन के चौपाल कार्यक्रम में बचपन से ही सुनते आये हैं. वे एक ओर तो अपने जोशीले गायन के लिए जाने जाते थे, दूसरी ओर तलवार और मूँछों के लिए. आल्हा गाते हुए वे अपने हाथ में एक तलवार रखते थे और गाते-गाते उसे भाँजते रहते थे. दुबले-पतले शरीर पर खूब बड़ी-बड़ी मूँछें उन्हें एक अलग व्यक्तित्व प्रदान करती थीं. कभी-कभी आल्हा गाते हुए वे स्टेज पर पैर पटकते हुए इतनी आगे बढ़ जाते थे कि हम छोटे बच्चों को लगता था कि अभी तलवार भाँजते हुए टी.वी. के बाहर आ जायेंगे 🙂 शुरू में तो डर लगता था, फिर तो ये हाल था कि इधर उनका आल्हा-गायन शुरू उधर हमलोग पढ़ाई-लिखाई, खेल-कूद छोड़कर टी.वी. के सामने 🙂

माँ चन्द्रिका देवी के उपासक श्री लल्लू बाजपेयी उन्नाव जिले के नारायणदास खेड़ा गाँव के रहने वाले थे. इसी मई के पहले हफ्ते में श्री लल्लू बाजपेयी का देहांत हो गया. यूँ तो उनका असली नाम पं. चन्द्रनाथ था. पर हमलोग तो उन्हें लल्लू बाजपेयी के नाम से ही जानेंगे. उनको हार्दिक श्रद्धांजलि और नमन.

प्रस्तुत है उनके आल्हा-गायन का एक वीडियो-

कक्कू

पागल लोग होते हैं ना, उनका पाला ज़िंदगी में पागल लोगों से ही पड़ता है. मैं पागल हूँ, तो पागल लोग ही मिलते हैं. वो भी ऐसा ही है-कक्कू. खुद को वेल्ला कहने में ज़रा सी भी शर्म नहीं आती उसे. जाने कौन सी घड़ी में उससे मुलाक़ात हुयी और दोस्ती हो गयी. यूँ तो खुद को बड़ा होशियार समझता है, लेकिन मेरे सामने होशियारी किसी की नहीं चलती… 🙂

एक तो रोज़ रोज़ चला आता है. मैं कितना तो मना करती हूँ, उसके बाद भी. बहाने भी ऐसे-ऐसे बनाता है कि जी जल जाय. कभी फोन का बिल लेकर दरवाजा खटखटाएगा “मैडम, ये बाहर धूप में पड़ा सूख रिया था, मैंने सोचा इसे घर पहुंचा दूँ. थोड़ी कुल्लर की हवा लेगा, तो हरा हो जाएगा.” ‘लिफाफा है या मनीप्लांट?’ मैं लिफाफा लेकर दरवाजा बंद करना चाहूँगी तो बोलेगा “डाकिये को चाय नहीं पिलायेंगी? इत्ती मेहनत की बेचारे ने.” अब मैं तो इतनी बेशर्म हूँ नहीं कि दरवाजा बंद कर दूँ मुँह पर.

कभी-कभी दूध का पैकेट लेकर आ जाता है और बोलता है “पता चला है कि मैडम ने सुबह से चाय नहीं पी है” “पी चुकी हूँ” मैं बेरुखी से बोलूंगी, तो कहेगा “तो मुझे पिला दीजिए” मैं कहूँगी “शर्म तो आती नहीं तुम्हें” “नईं जी, बिल्कुल भी नईं, शर्म गल्त काम करने वालों को आती है. मैं गल्त करता नहीं और झूठ कदी मैं बोलता नईं.” …’बोलना तो ढंग से आता नहीं, झूठ क्या बोलेगा तू, बेशर्म’ मैं सोचूंगी… पर फिर भी, कितना भी बेशर्म हो, है तो अपना दोस्त ही.

यूँ तो उसकी बेतुकी बातों पर गुस्सा आता, लेकिन उसके जाने के बाद हँसी आती. ये भी कमाल की बात है कि आप किसी के भी घर में ‘मान न मान मैं तेरा मेहमान’ करके घुस जाओ, और मेजबान को आप पर गुस्सा भी न आये. पर धीरे-धीरे उससे गहरी दोस्ती होती गयी और पता चलता गया कि इस हँसी-खुशी वाले चेहरे के पीछे भी लंबी दर्दीली कहानी है. बड़ा स्ट्रगल किया है बंदे ने और खुद के बल पर खड़ा है.

एक दिन ऐसे ही आ गया. मैं थोड़ी परेशान थी, पर मैंने उससे ढेर सारी बातें की. करती ही गयी. वो मुझे लगातार देखे जा रहा था बस. मैंने उससे कहा भी “मेरी ओर ऐसे मत देखो” पर वो नहीं माना. मैंने उसकी आँखों में देखा और मुझे बड़ी ज़ोर का रोना आया. उसने उठकर पानी दिया. मैंने कहा, “मैं बहुत परेशान हूँ” तो बोला, “वो तो मुझे तभी लग गया था, जब तू लगातार बोले जा रही थी. मुझे पता है तू परेशान होती है, तो बकबक करके छिपाने की कोशिश करती है, पर इससे कोई फ़ायदा नहीं. मैं चाहता था कि तू रो ले. फूटकर बह जाने दे.”

मुझे बहुत आश्चर्य हुआ, गज़ब का मनोवैज्ञानिक है ये तो. “बड़ी-बड़ी बातें करने लग गए हो” मैंने कहा. तो बोला, “मैडम, ज़िंदगी की किताब है ही ऐसी. सब पढ़ा देती है” “चुप करो, तुम्हारे ऊपर ये दर्शन-वर्शन सूट नहीं करता.” मैं बोली, तो तपाक से बोला, “वो क्या होता है जी?”

मुझे दूसरा आश्चर्य तब हुआ, जब उसने कहा, “चाय बनाऊँ तेरे लिए” मुझे हँसी आ गयी. “चाय, और तुम?” अपने घर में उसने अपने बापजी को दूध गर्म करके देने के अलावा कभी रसोई का कोई काम नहीं किया.
मैंने कहा, “नीतू (उसकी पत्नी) के लिए भी कभी चाय बनायी है”
“अरे, वो मुझे किचेन से धक्के देकर भगा देती है”
“किया क्या था तुमने?”
“कुछ नहीं, वो बीमार थी, तो मैं चाय बनाने गया. मैंने वन-थर्ड दूध और टू-थर्ड पानी मिलाकर बर्तन में डालकर गैस पर रखा और वो बह गया”
“वाह-वाह! बह गया, अपने-आप? आप क्या कर रहे थे?”
“नहीं, मैंने कुछ नहीं किया था सच्ची. इतना भी पुअर कॉमन सेन्स नहीं मेरा”
“चलो-चलो, पता है मुझे. जो पेट्रोल की टंकी के ऊपर माचिस की तीली लगाकर देखे कि तेल बचा है कि नहीं, उसका कॉमन सेन्स कैसा होगा?” उसका मुँह देखने लायक था. (उसने ही ये बात बतायी थी मुझे. ये तब की बात थी जब वो अठारह साल का था और पहले-पहल अपने बापजी की ‘एल.एम.एल. वेस्पा’ लेकर दोस्त के साथ निकला था 🙂 )वो बोला, “लड़कियों को कोई बात नहीं बतानी चाहिए. जाने कब, किसके सामने, किस मौके पर उगल दें.”
“मुद्दे पर आओ और बताओ जब चाय का पानी उबलकर बहा, तो तुम कहाँ थे?”
“मैं एनीमल प्लेनेट देख रहा था” कहकर ज़ोर से हँसा,” फिर नीतू ने मुझे किचेन से निकाल दिया और तुरंत किचेन साफ करने लग गयी. उसकी तबीयत किचेन गन्दा देखकर ठीक हो गयी. हा हा हा हा! ”
“इसमें हँसने वाली कौन सी बात है? अपनी बीवियों को जो आपलोग “किचेन की शोभा” कहते फिरते हैं. दरअसल बात उनकी तारीफ़ की होती नहीं. मतलब तो ये होता है कि वो खाना बनाती है और आप बैठे-बैठे खाते हैं”
“अरे, तो क्या मैं कुछ नहीं करता?”
“क्या करते हो?”
“वो खाना बनाती है, तो मैं उसको पप्पी देता हूँ. वो खुश हो जाती है और मन से काम करती है. हे हे हे हे!”
“छिः”
“अरे, तू छिः बोल रही है, तो आगे से नहीं करूँगा.”
‘ओफ्फोह! किससे पाला पड़ा है. ऐसे दोस्तों को कौन झेल सकता है मेरे सिवा?’ मैं सोच रही थी कि वो चाय बनाकर ले आया.

“देख, कैसी बनी है, खराब बोलेगी, तो ऊपर फ़ेंक दूँगा. मैं किसी के लिए चाय नहीं बनाता.” अकड़ तो देखो इनकी. मैंने कहा, “मैं नहीं पीऊंगी. तुमने धौंस क्यों जमाई?” “अच्छा-अच्छा माफ कर. चल पी के बता” ‘ऐसे किसी से चाय पीने को कहते हैं भला?’ मैंने चाय पी. सच में अच्छी बनी थी. पर मैंने उसे बताया नहीं और बोला, “ठीक है” उसका मुँह उतर गया. बेचारा 🙂 फिर अचानक कुछ सोचकर चौंका.

(बात दरअसल ये थी कि एक साल पहले कुछ दोस्त ग्राउंड से वापस आकर चाय पी रहे थे. कक्कू अकड़ से बोला, “मैंने आज तक किसी के लिए चाय नहीं बनायी.” मैंने कहा, “मैं बनवा लूँगी एक दिन.”
“ओए चल.”
“अरे नहीं, तू ऐवें ही मत ले इसे कक्कू. तुझे पता नहीं ये लड़की पत्थर को कोल्हू में डालकर तेल निकाल सकती है और जार्ज बुश से अपनी रसोई में चाय बनवा सकती है.” एक दोस्त बोला.
“सुन लो.” मैंने कॉलर उचकाते हुए कक्कू से कहा.
“हुँह, देखूँगा.”
“तो लगी हज़ार-हज़ार की शर्त.” दोस्त बोला.
“लगी.”)

मुझे पता है इस समय अचानक कक्कू को वो शर्त याद आ गयी. मैंने सारा समय उसे बातों में लगाए रखा चाय बनाते समय. उसका ध्यान ही नहीं गया कि वो शर्त हार रहा है.

उसने मेरी ओर देखा और बोला, “मान गए  छोरी”
“तो रखो हज़ार रूपये.” कहते हुए मैंने उसकी ओर हथेली फैलाई. उसने बुरा सा मुँह बनाते हुए हज़ार रूपये मेरे हाथ पर रख दिए. मैं मन ही मन बोली, ‘तू बड़ा श्याणा है, तो मैं कम हूँ क्या कक्कू’ 🙂

जंगल जलेबी, स्लेटी रुमाल, नकचढ़ी लड़की और पहाड़ी लड़का

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बचपन की कुछ बातें ऐसी होती हैं, जिनका मतलब उस समय समझ में नहीं आता है. जब हम बड़े हो जाते हैं, तब समझ में आता है कि अमुक काम को करने से, किसी विशेष व्यक्ति से मिलने से या किसी जगह जाने से क्यों रोका गया था? समझ ही कितनी होती है तब? ऐसे ही कुछ दोस्त होते हैं, जो उस समय हमारे दुश्मन लगते हैं, जबकि बाद में पता चलता है कि अगर वो न होते, तो कुछ घटनाओं का मतलब ही बदल जाता. और हमारे बचपन की यादें इतनी खुशनुमा न होतीं.

मैंने जब होश संभाला था, तो खुद को उन्नाव जिले की बाबूगंज रेलवे कालोनी में पाया था. उसके पहले की सारी यादें इतनी धुँधली हैं कि उन्हें मिलाकर एक अब्स्ट्रेक्ट ही बन पाता है. अम्मा-बाऊ की बतायी गयी बातों से ही उन्हें आपस में जोड़ पाती थी. तो अब वे भी नहीं हैं. उस कालोनी में जब हम आये तो मेरी उम्र लगभग पाँच साल रही होगी. और कालोनी में जो सबसे पहला दोस्त बना, वो मुझसे तीन-चार साल बड़ा था. यूँ तो उसका नाम राघवेन्द्र सिंह जलाल था, लेकिन उसके घर में सब उसे राकेश बुलाते थे. चार भाइयों और एक बहन में सबसे छोटा लड़का. उसके पिताजी आर.पी.एफ. में थे. कुमाउँनी थे वे लोग. पता नहीं कब उसके घर से मेरे घर का नाता बन गया और अम्मा उन सभी भाइयों को अपने बेटों जैसे मानने लगीं.

मेरी माता जी की एक विशेषता थी कि जब उनकी किरपा किसी पर बरसती थी, तो उसकी सीमा नहीं होती थी. राकेश पर अम्मा की विशेष कृपा थी. वो हम-दोनों भाई-बहनों से बड़ा और अम्मा की नज़रों में बहुत समझदार था, तो अम्मा ने उसे हमारा अभिभावक नियुक्त कर दिया. क्योंकि उन्हें लगता था कि कालोनी के और सारे लड़के एक नम्बर के गुंडे हैं और उनसे हमारी रक्षा उनके द्वारा नियुक्त सेनापति ही कर सकता था 🙂 वो हमदोनों की हर बदमाशी की खबर अम्मा तक पहुँचाता, अम्मा हमें डाँटती और मैं मन ही मन कुढ़ती रहती थी. अम्मा को पता था कि मैं एक नम्बर की ढीठ और नकचढी लड़की थी, इसलिए मेरे मामले में तो अम्मा मेरा पक्ष भी नहीं सुनती थीं. राकेश ने शिकायत की नहीं कि सीधे डाँट पड़ती (और कभी-कभी मार भी 😦 )

जैसे-जैसे मेरी उम्र बढ़ती जा रही थी, राकेश की रोक-टोक और अम्मा की डाँट भी. उस कालोनी में दो फील्ड थीं, एक छोटी, जो रेलवे की सम्पत्ति थी और एक ठीक उसके बगल में खाली फील्ड, जो उस समय उन्नाव के सबसे बड़े मुहल्लों में से एक मोतीनगर से रेलवे कालोनी को अलग करती थी. राकेश मुझे बड़ी फील्ड में अकेले जाने से रोकता. हम आइस-पाइस खेलते, तो दो-तीन साल बड़े लड़कों के साथ छिपने से रोकता. एक बार जब मैंने उसकी बात नहीं मानीं, तो गुस्से में जाकर अम्मा से शिकायत कर दी. पता नहीं अम्मा के पास जाकर क्या खुसुर-फुसुर की कि अम्मा की बमबारी-गोलाबारी शुरू हो गयी- “कहा था तुमसे कि राकेश की बात माना करो, फिर क्यों उसके मना करने के बाद भी “उस लड़के” के साथ झाड़ी में छिपने गयी.” “तो क्या हुआ? ये कौन होता है मुझे मना करने वाला?” मेरे इतना कहने के साथ दो चांटे पड़े ‘तड़-तड़.’ मैंने रोना शुरू कर दिया. राकेश को भी मेरा मार खाना बुरा लगा. उसने कहा “जाने दो चाची, आगे से नहीं करेगी ऐसा” पर इससे क्या? वो मेरा पक्का दुश्मन बन गया.

इस सबके बावजूद राकेश के साथ रहना मजबूरी थी क्योंकि हमदोनों “बिगड़े हुए” भाई-बहन को बिना उसके साथ के, न खेलने की इजाज़त थी और न कहीं आने-जाने की. दीदी का स्कूल सुबह से शाम तक का होता था और अम्मा को घर के सारे काम करने होते थे. हमारा स्कूल ‘विवेकानंद’ रेलवे कालोनी के पीछे ही था और ग्यारह बजे हम प्राइमरी के बच्चे फ्री हो जाते. हम सारा दिन खेलते रहते. अम्मा हम पर नज़र नहीं रख सकती थीं, इसीलिये राकेश को कह रखा था इस काम के लिए और वो पूरी ईमानदारी से ये ज़िम्मेदारी निभाता था 🙂

मैं उससे कभी सीधे मुँह बात नहीं करती थी, उस समय के अलावा, जब वो हमारे लिए बाऊ की बनायी हुयी लग्गी से बड़ी फील्ड में लगे जंगल जलेबी और खजूर के पेड़ से फल तोड़ता था. जंगल जलेबी के विशालकाय पेड़ की निचली डालियों तक तो लग्गी पहुँच जाती थी, लेकिन ऊपर की डालों पर नहीं. एक दिन एक भी जंगल जलेबी न पाने से मेरा मुँह बन गया, तो राकेश पेड़ पर ही चढ़ गया. मुझे ये घटना पूरी तरह से याद नहीं क्योंकि उस समय मैं सिर्फ आठ या नौ साल की थी, लेकिन इतना याद है कि वो अपनी गंदी सी स्लेटी रुमाल में ऊपर से जंगल जलेबी के फल बाँधकर ले आया था. हम होली जलाने के लिए सूखी लकडियाँ काटकर ले आते, कभी-कभी उपले चुराते 🙂 वो एक काम और मेरी पसन्द का करता था. गर्मी की छुट्टियों में कैरम, लूडो और शतरंज खेलने के अलावा हमें कॉमिक्स पढ़ने का शौक चर्राया. वो पता नहीं कहाँ-कहाँ से प्रति चवन्नी एक दिन के किराए पर कॉमिक्स लेकर आता था और वापस भी वही करता था 🙂

एक-दो साल बाद बाऊ का ट्रांसफर उन्नाव के बगल में स्थित एक छोटे से स्टेशन मगरवारा हो गया. ट्रक में हमारे साथ चन्दन भैय्या भी गए हमें पहुँचाने. बाद में राकेश वहाँ भी आता था और कई बार ‘जंगल जलेबी’ भी लाता था क्योंकि मगरवारा में वो पेड़ नहीं था. कभी-कभी खुमानी वगैरह भी ले आता था, जो उसके गाँव से कोई लाया होता था. पर मुझे वो अच्छी नहीं लगती थी.

मैं बचपन में उससे इतना चिढ़ती थी कि कालोनी के कल्चर के विरुद्ध मैंने उसे राखी कभी नहीं बाँधी. जबकि उसके चन्दन भैया को बांधती थी. मुझसे चार साल बड़ा था, लेकिन मैंने उसे कभी ‘भैय्या’ नहीं कहा. मैं थोड़ी लंबी हो गयी तो वही मुझे चिढ़ाता था “गुड्डू, अब तो तू मुझसे बड़ी हो गयी. अब मैं तुझे ‘दीदी’ कहूँगा- गुड्डू दीदी” तब भी मैं बहुत गुस्सा होती थी- “तुम हमें दीदी कहोगे, तो सबलोग हमें तुमसे बड़ा समझने लगेंगे” और कौन लड़की बड़ी दिखना चाहती है भला 🙂

जब मैंने मगरवारा से उन्नाव ट्रेन से पढ़ने आना-जाना शुरू किया और भीड़ में अनचाहे स्पर्शों का सामना करना पड़ा, तब समझ में आया कि क्यों अम्मा और राकेश मुझे किशोरावस्था के लड़कों के साथ सुनसान जगहों पर जाने से मना करते थे? क्यों कुछ लड़कों के साथ खेलने पर इसलिए पाबंदी थी कि वे “गंदे लड़के” थे और ये बात राकेश अम्मा को बताता रहता था. तब ये भी समझ में आया कि क्यों एक बार एक लड़के के साथ घनी झाडियों में छिपने के कारण राकेश की शिकायत पर अम्मा से दो चांटे खाने पड़े थे और ये भी कि उसने अम्मा के पास जाकर खुसुर-फुसुर करके क्या बताया होगा?

आज मुझे लगता है कि दस-ग्यारह साल की उम्र तक मेरे साथ कोई अप्रिय घटना न होने का सबसे बड़ा कारण अम्मा की सतर्कता के साथ ही राकेश का होना भी था. मैं सोच नहीं सकती कि उसके बगैर मेरा बचपन कैसा होता? यूँ तो नकचढ़ी और ढीठ, लेकिन दुनियादारी की बातों से अनजान मैं निश्चिन्त होकर इसलिए खेल पायी क्योंकि राकेश मेरे साथ होता था. शायद वो नहीं होता, तो अम्मा मुझे बाहर खेलने ही न भेजतीं. डेली पैसेंजरी शुरू करते ही मैं इतनी समझदार हो गयी कि अपनी देखभाल खुद कर सकती थी. अम्मा वैसे भी बहुत सतर्क रहती थीं और मगरवारा की कालोनी भी बहुत छोटी थी. मैं खूब ऊधम मचाती लड़कों के साथ क्योंकि मुझे कभी उनके साथ असहज नहीं लगा. शायद एक अप्रिय घटना मेरी ये सहजता मुझसे छीन लेती.

राकेश और उसके घरवालों से हमारा सम्बन्ध बहुत बाद तक बना रहा. जब बाऊ के रिटायरमेंट के बाद हम गाँव शिफ्ट हुए, तब भी चन्दन भइय्या पहुँचाने गए थे और बाद में अक्सर हमारे गाँव आते रहते थे. हमलोग भी जब उन्नाव जाते थे, तो उनलोगों से मिलते थे. बाद में वो लोग भी नैनीताल शिफ्ट हो गए. केन्द्र सरकार की नौकरी करने वाले लोग जाने कहाँ-कहाँ से आकर मिलते हैं और फिर अपने-अपने देस चले जाते हैं. मेरे बचपन के साथी जाने कहाँ हैं? कुछ की तो बिल्कुल कोई खबर नहीं.

मैं लगभग ग्यारह-बारह साल से राकेश से नहीं मिली हूँ. अभी कुछ दिन पहले चन्दन भइय्या का फोन आया. शायद दीदी से मेरा फोन नम्बर लिया था. उन्होंने बताया कि उनकी अम्मा गुजर गयी हैं. उन्होंने शादी बना ली है (वो लोग ऐसे ही बोलते थे) और टीचर लग गए हैं नैनीताल जिले में ही. राकेश भी वहीं कहीं पढ़ा रहा है. मुझसे भईया ने पूछा “दीदी ने बताया तूने शादी नहीं बनायी. तुम्हारे लोगों को हुआ क्या है? कोई शादी ही नहीं बनाना चाहता. राकेश ने भी नहीं बनायी अब तक.”

काठगोदाम एक्सप्रेस से हल्द्वानी जाते वक्त रास्ते में लालकुआँ पड़ता है. वहीं के एक गाँव में मेरे दोस्त का घर है. उन लोगों ने पता भी दिया था, लेकिन वो घर पर छूटा है और सालों से घर ही नहीं गई. सोच रही हूँ, फिर से पता पूछकर कभी हो ही आऊँ.

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