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'अहमस्मि'- अपनी खोज में

बैसवारा और आल्हा-सम्राट लल्लू बाजपेयी

अभी कुछ दिन पहले ‘बैसवारा की शान’ कहे जाने वाले लोकप्रिय आल्हा गायक लल्लू बाजपेयी के देहांत की खबर सुनी तो मन जाने कैसा-कैसा हो गया? शायद पूरे भारत के लोग लल्लू बाजपेयी को न जानते हों, शायद उन्होंने बैसवारा का नाम भी कभी न सुना हो, लेकिन मैं बैसवारा क्षेत्र में ही पली-बढ़ी हूँ, इसलिए मेरा इससे बेहद लगाव है. लल्लू बाजपेयी को दूरदर्शन पर देखते और रमई काका उर्फ ‘बहिरे बाबा’ के किस्से सुन-सुनकर बड़ी होने के कारण मैं बैसवारा को इन दोनों नामों की वजह से ही ज़्यादा जानती हूँ.

मेरे चाचा वसंत सिंह तोमर ने मुझे बैसवारा के इतिहास, साहित्य और संस्कृति आदि के बारे में बताकर मेरी रूचि इस ओर पैदा की थी, लेकिन स्कूली पढ़ाई-लिखाई और जीवन के झंझावातों के चलते मैं इस सम्बन्ध में अधिक अध्ययन नहीं कर पायी. फिर भी जितना जाना-सुना था, उसके अनुसार किसी ज़माने में यह क्षेत्र अपनी पृथक पहचान रखता था. यह पहचान समय के साथ-साथ धीरे-धीरे मिटती गयी. आमतौर पर बैसवारा को लोग रायबरेली से जोड़कर देखते हैं (शायद वहाँ स्थित इसी नाम के रेलवे स्टेशन के कारण), जबकि वास्तविकता यह है कि बैस राजपूतों के प्रभाव के कारण इस क्षेत्र को बैसवारा कहा जाता है. पहले यह क्षेत्र बाईस परगनों में फैला हुआ था. इन बाइस परगनों में आधुनिक उन्नाव, रायबरेली, लखनऊ व बाराबंकी के थोड़े-थोड़े भाग सम्मलित हैं.  दैनिक जागरण में एक बार बैसवारा के इतिहास के बारे में एक मज़ेदार लेख पढ़ा था और उसे बुकमार्क कर लिया था. इस लेख को यहाँ पढ़ा जा सकता है.

हिंदी की एक बोली के रूप में ‘बैसवारी’ का उतना ज़िक्र नहीं होता या हो सकता है कि होता हो, मुझे ही नहीं पता. वैसे भी अवधी खुद एक बोली है और बैसवारा को अवधी से जुड़ी हिंदी की एक ‘उपबोली’ कहा जा सकता है. अवधी के बहुत से शब्दों से और लहजे से बैसवारा में काफी भिन्नता पायी जाती है, लेकिन मुख्यतः बैसवारी बोली से ज़्यादा “बैसवारा” क्षेत्र का अधिक महत्त्व है. किसी युग में इस क्षेत्र से हिंदी साहित्य के बड़े-बड़े नाम जुड़े हुए थे, जिनमें सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, महावीर प्रसाद द्विवेदी, राम विलास शर्मा, शिवमंगल सिंह सुमन, प्रताप नारायण मिश्र, भगवतीचरण वर्मा, रमई काका आदि प्रमुख हैं. अभी कुछ दिन पहले बैसवारा से सम्बन्धित कैलाश बाजपेयी जी का एक लेख अमर उजाला में पढ़ा था- बैसवारा में कविता की खेती ,जिसमें उन्होंने अपने कुछ अनुभवों के साथ बैसवारा की समृद्ध साहित्यिक विरासत पर प्रकाश डाला है.

हमलोग लल्लू बाजपेयी का आल्हा गायन लखनऊ दूरदर्शन के चौपाल कार्यक्रम में बचपन से ही सुनते आये हैं. वे एक ओर तो अपने जोशीले गायन के लिए जाने जाते थे, दूसरी ओर तलवार और मूँछों के लिए. आल्हा गाते हुए वे अपने हाथ में एक तलवार रखते थे और गाते-गाते उसे भाँजते रहते थे. दुबले-पतले शरीर पर खूब बड़ी-बड़ी मूँछें उन्हें एक अलग व्यक्तित्व प्रदान करती थीं. कभी-कभी आल्हा गाते हुए वे स्टेज पर पैर पटकते हुए इतनी आगे बढ़ जाते थे कि हम छोटे बच्चों को लगता था कि अभी तलवार भाँजते हुए टी.वी. के बाहर आ जायेंगे 🙂 शुरू में तो डर लगता था, फिर तो ये हाल था कि इधर उनका आल्हा-गायन शुरू उधर हमलोग पढ़ाई-लिखाई, खेल-कूद छोड़कर टी.वी. के सामने 🙂

माँ चन्द्रिका देवी के उपासक श्री लल्लू बाजपेयी उन्नाव जिले के नारायणदास खेड़ा गाँव के रहने वाले थे. इसी मई के पहले हफ्ते में श्री लल्लू बाजपेयी का देहांत हो गया. यूँ तो उनका असली नाम पं. चन्द्रनाथ था. पर हमलोग तो उन्हें लल्लू बाजपेयी के नाम से ही जानेंगे. उनको हार्दिक श्रद्धांजलि और नमन.

प्रस्तुत है उनके आल्हा-गायन का एक वीडियो-

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18 thoughts on “बैसवारा और आल्हा-सम्राट लल्लू बाजपेयी

  1. ओह….लल्लू बाजपेई को बचपन में कई बार प्रत्यक्षतः सुना है। बैसवारा में तो आल्हा के वे पर्याय बन गए थे। आल्हा कहने का उनका ढंग निराला था।उनके जाने की ख़बर अभी कुछ दिन पहले ही मिली,पर आपने उन पर आलेख लिखकर हमारी अभिव्यक्ति दी है। असल बैसवारी आप ही निकलीं।
    हम बाजपेई जी को हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं 😦

    • बैसवारा या बैसवाडा के बारे में सटीक और पुख्ता जानकारी के लिए डॉ राम विलास शर्मा जी की आत्मकथा “अपनी धरती,अपने लोग’ या उन्हीं के द्वारा लिखित ‘निराला की साहित्य साधना’ में मिल सकता है.वहाँ विस्तार से इस क्षेत्र के लोगों के रहन-सहन और भाषा,प्रकृति के बारे में पता चलता है.

  2. पहली बार जाना इनके बारे में ….विनम्र नमन

  3. मैंने उनको लाइव सुना था . उनकी बेटी उनके पदचिन्हों पर चल रही है .

  4. बहुत अच्छा लेख लिखा।

    आज सुबह-सुबह इसे टहलते हुये मोबाइल पर बांचा। फ़िर लौटकर आराम से पढ़ा और सुना भी। अच्छा लगा।
    एक बार मैं और आशीष राय जागरण की एक संस्था द्वारा कराये गये कार्यक्रम में लल्लू बाजपेयी को सुनने गये थे। वहां उनकी शिष्या को भी सुना। बहुत अच्छा सिखाया है लल्लू बाजपेयी जी ने उसको। एक तरह से देखा जाये तो नयी परंपरा डाली। पुरुषों के लिये आरक्षित से वीर रस के आल्हा गायन में लड़की को स्थापित किया।

    लल्लू बाजपेयी जी की स्मृति को नमन।

  5. आल्हा महोबा की कथा है और प्रसारित करने में अग्रणी रहा बैसवारा, वाह रे सांस्कृतिक संबद्धता।

    • हाँ, यूँ तो आल्हा-गायन महोबा से ही सम्बन्धित है, लेकिन इसका प्रसार पूरे बुन्देलखण्ड, मैनपुरी, बैसवारी-अवधी और अब तो भोजपुरी इलाके तक हो गया है. यह विधा है ही ऐसी कि इसकी लोकप्रियता बढ़ती गयी.
      वर्तमान में टी.वी., इंटरनेट और अन्य मनोरंजन के माध्यमों के प्रसार के कारण अन्य लोकविधाओं की तरह इस पर भी प्रभाव पड़ा है, लेकिन लल्लू बाजपेयी और अन्य आल्हा-गायकों ने आल्हा को बचाए रखने और इसके प्रचार-प्रसार की दिशा में भी सराहनीय कार्य किया है.

  6. bahut sarahneeya lekh hai , purani yaden taza ho gayi .ek baar baajpai ji hamare gawn men navratri ke uplakshya men aaye the bahut chhota tha mai tb kintu bade utsaah se baba ji ke saath aalhaa sunne gya tha .

  7. इस सब के बारे में पहली बार जाना ….. इस जानकारी के लिए शुक्रिया ….. बाजपेयी जी को विनम्र श्रद्धांजलि ।

  8. bahut achchha alekh lekhika vaakai sadhuvad ki patra hai bajpay ji ko meri vinamra shrandhanjali

  9. बहुत अच्छी लगी यह पोस्ट। हम भी कभी खूब सुनते थे..अब भूली बिसरी यादें शेष रह गई हैं। आपने याद ताजा कर दिया और श्रद्धांजलि अर्पित करने का अवसर प्रदान किया।..आभार।

  10. आल्हा देख/सुनकर आनंद आ गया। लल्लू बाजपेई जी को श्रद्धांजलि!

  11. Mai Aapke madhyam se Divangat Shri Lallu Bajpai Ji ko shraddhanjali dena chahta hu apna ek sanyog aap sabhi se share karke…….Pratham to unke nidhan Ke samachaar se man bahut aahat Huaa …. Aapki is post Ke madhyam se hi mujhe abhi gyaat Huaa …..
    Jab Mai Aapki is post ko padh rahaa tha to jaisaa aapne likha yu lagaa Ki Mai apne hi bachpan me pahunch Gaya hu…. Sab kuchh itna saman tha apke anubhavo jaisaa hi Ki lagaa Mano Maine swayam hi ye Sab likha ho….. Kahne Ki aavshyaktaa nahi Ki unke Aalhaa Ka aur unke vyaktitva Ka kitna bhavnatmak prbhav tha mujh par ….. Ek baar Kanpur me sakshaat Bhi unko sunaa tha….
    Ab wo sanyog Jo mujhe batanaa tha…. Mai 1993 me Mumbai chalaa gayaa….. 2009 me Mumbai se Adelaide Australia aagayaa …. Pichhale 20 saalo me Kayee baar nihayat vyaktigat kshano me un par aur un Dino par vichar kartaa gayaa hu…. Idhar ek arse se shayad vismrit sa ho chukaa tha wo sampurn ateet ….. Achak isee 13 may 2013 ko lagbhag yahaan Ke samyaanusaar 2 se 3 baje Ka samay rahaa hoga ….. Jane Kahaan se vichaar aaya Ki aawo dekhta hu shayad Lallu Bajpai Ji Ka Aalhaa you tube par mil jaye aur fir kya tha Kareeb teen ghanto tak unke videos dekhta raha …. Aur un ekaantik palo me Kayee baar bhaavuk Bhi Huaa .. .unka dehaant ……
    Ye agar isee may Ki ghatna hai to fir vaakayee mere liye kisee chamtkar jaisee hai….khair….
    Mai is post aur is suchna Ke liye Aapke prati hridaypurvak aabhar prakat karta hu….
    Jis bhaugolik sthiti Ka aapne varnan kiya hai …. Mooltah Mai Bhi useeke aaspaas Ka hi hu…. Aur Allahabad university se snaatak hu…. Haan par ek aur prasang par Maine Jo apna vaicharik mat prakat kiya hai Mai us par abhi Bhi utnaa hi tatasth hu…..

    • शक्ति जी, अपने अनुभवों को हमसे बाँटने के लिए धन्यवाद! अच्छा लगा इसी बहाने आपसे परिचय हुआ. लल्लू जी का देहांत इसी मई के प्रथम सप्ताह में हुआ है.

  12. आल्हा गायन बहुत ही वीरोचित और गौरवपूर्ण लगा … साधुवाद आपको कि अपने ये वीडियो भी इस पोस्ट के साथ सलग्न किया है….

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