आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

क्या किया जाय?

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कभी-कभी औरतों को सेक्सुअल अब्यूज़ इस तरह से झेलना पड़ता है कि समझ में नहीं आता कि इसे अब्यूज़ मानें या न मानें और अगर मानें तो प्रतिक्रिया किस तरह से व्यक्त करें? क्योंकि किसी बात को लिखने में किसी का क्या मंतव्य रहा होगा, ये पता नहीं किया जा सकता. अगर आपने शिकायत की तो अगला सीधे-सीधे कह देगा कि उसका ये मतलब नहीं था और इल्जाम आप पर लग जाएगा.

कुछ साल पहले मैं संस्कृत के एक सेमीनार में मसूरी गयी थी. वहाँ आधुनिक संस्कृत के जाने-माने साहित्यकार आये हुए थे, जिन्हें उसी साल संस्कृत का साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था. मैं उस सेमीनार की सबसे छोटी प्रतिभागी थी और आयोजनकर्ता मसूरी महाविद्यालय के संस्कृत विभाग के प्रवक्ता मेरे गाइड के परिचित थे, तो सबलोग मेरा बहुत ध्यान रख रहे थे. सबने मेरी तारीफ़ भी की कि मैं इतनी दूर से वहाँ पहुँची और ‘आधुनिक संस्कृत-नाटकों में चित्रित नारी-सम्बन्धी सामाजिक समस्याएँ’ विषय पर एक अच्छा शोध-पत्र पढ़ा.

उस सेमीनार के अगले ही दिन दिल्ली में एक सेमीनार था. मैं पूरी रात मसूरी से यात्रा करके आयी और दिल्ली वाले सेमीनार में भी पहुँची. भोजन के समय सब लोग आपस में बात कर रहे थे. वहाँ भी वे कवि महोदय थे, जिनकी बात मैंने ऊपर की है. मुझसे मेरे गाइड ने कहा था कि कुछ आधुनिक साहित्यकार मिलेंगे तो उनकी पुस्तक के प्रकाशनों का पता ले लेना, ताकि उन्हें डाक से मंगाया जा सके क्योंकि आधुनिक संस्कृत-साहित्य की पुस्तकें या तो पुस्तकालय में मिलती हैं, या प्रकाशन से मंगानी पड़ती हैं. सामान्य पुस्तक-वितरण केन्द्रों या दुकानों पर नहीं मिलतीं. मैंने इसी उद्देश्य से कवि महोदय के पास जाकर निवेदन किया कि ‘सर आप अपने प्रकाशन का पता दे दीजिए, मुझे एक शोध-पत्र के सम्बन्ध में पुस्तकें मंगवानी हैं.’ उन्होंने मुझसे कहा कि ‘मसूरी में तुम्हारा शोध-पत्र अच्छा था. तुम प्रतिभाशाली लड़की हो.’ मुझे खुशी हुयी कि इतने बड़े विद्वान ने मेरे शोध-पत्र की ओर ध्यान दिया. मैंने उनसे उनके पते और हस्ताक्षर के साथ कुछ प्रोत्साहन के शब्द भी लिखने को कहा. उन्होंने लिखा. जब मैंने पढ़ना चाहा तो उन्होंने कहा कि ‘यहाँ नहीं घर जाकर पढ़ना’ और मुझे देखकर मुस्कुराने लगे, तो मुझे थोड़ा अजीब लगा. लंच खत्म हो गया था, तो सबलोग अपनी-अपनी जगह बैठ गए.

कमरे पर आकर जब मैंने वो डायरी देखी, जिसमें कवि महोदय ने मेरे लिए “प्रोत्साहन के शब्द” लिखे थे, तो मेरे क़दमों के नीचे से ज़मीन निकल गयी. उन्होंने मेरे शारीरिक सौंदर्य पर एक श्लोक लिखा था संस्कृत में. जिसका भाव ये था कि “वैसे तो तुम्हारे कटि, वक्षस्थल, मुखमुद्रा और केश बहुत ही सुन्दर हैं, लेकिन जो तुम्हारे गालों के गढ्ढे में गिरा, उसके उबरने का कोई उपाय नहीं.” मैं दंग थी. समझ में नहीं आ रहा था कि एक कवि द्वारा अपनी तारीफ़ किये जाने पर खुश होऊँ या एक दादा के उम्र के आदमी के द्वारा एक तेईस-चौबीस साल की लड़की के शरीर को देखकर श्रृंगार-भाव जागृत होने पर रोऊँ. मैंने सोचा ‘इसका मतलब ये आदमी मेरे रिसर्च पेपर को नहीं सुन रहा था, बल्कि मेरे शरीर के अंग-प्रत्यंगों का निरीक्षण कर रहा था, नहीं तो इतनी सूक्ष्मता से वर्णन कैसे कर सकता था?’

ऐसा तब था जबकि सबको मालूम था कि मैं किसके पर्यवेक्षण में शोध कर रही थी और उसी के कहने से वहाँ गयी थी? मेरे गाइड एक जाने-माने व्यक्ति हैं और वो और उनकी पत्नी मुझे अपनी बेटी की तरह स्नेह करते थे. क्या इस आदमी को ज़रा-सा भी ये नहीं लगा कि उसका ये “श्रृंगार रससिक्त” श्लोक यदि मैं अपने सर को पढ़ा दूँ, तो इसकी क्या इमेज रह जायेगी? मुझे खुद भी समझ में नहीं आ रहा था कि कवि महोदय के मन में वह श्लोक लिखते समय सिर्फ काव्यात्मक प्रतिभा थी या कुछ और.

खैर, मैंने वो श्लोक अपने एक दोस्त के अलावा किसी को नहीं दिखाया. दोस्त श्लोक देखते ही गुस्से से उबल पड़ा. आखिर किसी सत्तर वर्षीय वृद्ध के मन में एक नवयुवती को देखकर ऐसे भाव कैसे आ सकते हैं? मान लो, ये माना जाय कि आदमी बूढा होता है, उसका दिल नहीं, तो भी, ऐसे पठन-पाठन के माहौल में इस ओर ध्यान कैसे जाता है किसी का? इस सबसे भी ऊपर कि संस्कृत के विद्वान होने के कारण उनको चारों आश्रमों के विषय में पता था, तो संन्यास आश्रम की अवस्था में श्रृंगार वाले भाव शोभा देते हैं क्या?

मैं नहीं जानती कि कवि महोदय की उक्त हरकत को लोग सेक्सुअल एब्यूज़ के श्रेणी में रखेंगे या नहीं. ये एक विवादित विषय हो सकता है. लोग रचनात्मक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की दुहाई देने लगेंगे. मैं इतनी शुद्धतावादी नहीं हूँ कि रचनाकार की हर रचना पर नैतिक आधारों पर प्रश्नचिन्ह लगाती फिरूँ, लेकिन एक बात मैं जानती हूँ कि मुझे अच्छा नहीं लगा था. बहुत दुःख हुआ था और धक्का लगा था. अब सोचती हूँ तो हँसी आती है, लेकिन ये सच है कि इस घटना ने मुझे इतना डरा दिया कि मैं सेमीनार में तो जाती थी, लेकिन किसी से बात नहीं करती. व्यक्तिगत पहचान बनाना न मेरा स्वभाव कभी रहा है और न मैंने कभी इसकी कोशिश की है, लेकिन शिष्टाचारवश भी किसी से बात करने से बचने लगी.

मुझे लगता है किसी के भी बारे में ऐसा कुछ लिखना जिसे पढ़कर उसे अच्छा न लगे, ‘अब्यूज़’ की ही श्रेणी में आना चाहिए. और यदि ऐसा सामने वाले के सेक्स को देखकर लिखा गया है, तो इसे ‘सेक्सुअल अब्यूज़’ कहेंगे. यदि सामने वाला आपको सकारात्मक संकेत दे रहा हो, तो आप एक क्या, उस पर सौ श्लोक लिखिए. ‘श्रृंगारशतक’ बना डालिए, लेकिन जो लड़की आपसे प्रोत्साहन की अपेक्षा रखती है, उसे उसके शरीर की तारीफ़ करके हतोत्साहित करना बिल्कुल भी उचित नहीं है. आपने उसे उत्साहित करने के बजाय इस तरह की शैक्षिक और अकादमिक गतिविधियों में भाग लेने से हतोत्साहित किया, तो आपने भी अब्यूज़ ही किया.

खैर, वो कवि महोदय इस समय दिवंगत हो चुके हैं, नहीं तो मैं यहाँ बाकायदा उनका नाम लिखती और उनका लिखा श्लोक भी. फिर मुझे परवाह नहीं होती कि उनसे पंगा लेने के कारण मुझे कहीं नौकरी न मिलती. और आज अगर वो मेरे साथ ऐसा करते तो मैं वहीं लंच की जगह पर सबको पढ़कर सुना देती कि देखो, कवि महोदय ने अपनी पोती की उम्र की लड़की पर कितना सुन्दर श्रृंगाररससिक्त श्लोक लिखा है.

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41 thoughts on “क्या किया जाय?

  1. ईश्वर ऐसे व्यग्रमनाओं को मन की शान्ति दे जिससे उनका अगला जनम ऐसी प्रजातियों में न हो जो २४ घंटे बस यही मनन करती रहती हैं।

  2. It is definitely sexual harrassment. Similar thing happened to me while I was still in grad school. These creeps are in academia just coz’ it gives them access to young women. Wish I had a raport with my future Ph.D. guide then I could have told him, though I told him just few years later and he was pretty disappointed in this teacher but could not do anything officially but he made is displeasure known in his own way.

    It is important we expose these scumbags then and there itself. Wish we could give our young female students a confidence about looking up the person in eye and say it loud this is who you are and you cannot clip my wings by your ugly thinking.
    Peace,
    Desi Girl

    • जी.डी., बात सही है. हमें अपनी लड़कियों को इतना आत्मविश्वासी बनाना ही चाहिए कि वे इस तरह की किसी भी बात का विरोध कर सकें. हर जगह ही ऐसे लोग होते हैं, पर आगे तभी बढ़ पाते हैं, जब लड़कियाँ कुछ बोल न पायें, चाहे डर के कारण या किसी और वजह से. मेरे विभाग के कुछ लड़के मुझसे बात तक नहीं करते थे क्योंकि मैं उनके भद्दे मजाकों का विरोध करती थी. एक बार एक लड़के ने स्टाफरूम में सबके सामने कहा, “जबसे मोटा गयी हो, अच्छी लगने लगी हो” मैंने तुरंत पलटकर जवाब दिया, “मैं अपने शरीर पर इस तरहे की बेहूदा टिप्पणी बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करती’ आखिर उसे माफी माँगनी पड़ी. उनकी आगे बढ़ने की हिम्मत तब होगी, जब आप मुस्कुराकर बात को टाल जाएँ. आप सोचें कि ये आपके शारीरिक सौंदर्य की प्रशंसा है, जबकि वास्तव में वह अपनी कुंठा का शमन कर रहा होता है.

  3. भारत में मरणोपरांत भी सम्मानित करने की परम्परा है .उनके सम्मान से उस पथ के पथिक दूसरे कवियों को भी दिशा मिलेगी .

    • मैंने यही सोचकर किसी से कुछ नहीं बताया कि लोग सोचेंगे कि मैं ओवररिएक्ट कर रही हूँ. बाद में उनकी मृत्यु हो गयी, तो सोचा कि जाने दो, अब किसी और के साथ ऐसा करने की सम्भावना नहीं है, तो क्या किसी को नाम बताना? वैसे भी क्या फर्क पड़ता है. वो नहीं होता, तो उसकी जगह कोई और होता और किसी और लड़की के साथ ऐसा ही कुछ करता.

  4. Aapke aahat man Ke prati samvedanheen na hote huye Bhi …. Itna to avashya kahunga Ki is ghatna Ko praudh aur udaatt swabhav se dekhatein to sambhav tha man itnee katuta se sntrast. Ahi hotaa…. Kaviyon ko yu hi kaaljayee to nahee Kahaa gayaa hotaa …?yadi wo umra Ki seema Ka ullanghan Bhi na kar paate……..
    Vaise Mai na hi kavi hu aur na hi vayovridha…. Haan striyo Ke prati samman Bhav rakhte huye Bhi ….apne vicharo Ke prati tarksangat tatasthataa par poora yaqeen hai mujhe….
    Vichar aamantrit the is liye vyakt kar raha hu ….Ki is ghatna ko abuse Ki shreni me rakhne Ki anivaaryataa mujhe nahi Samajh me nahi aa raheeeeeeee…….

    • आपकी सोच अपनी जगह सही है. लेकिन मैं मानती हूँ कि सिर्फ अपने सुख के लिए किसी को दुःख पहुँचाना मेरी समझ में अब्यूज़ ही है. कवि अपनी प्रेमिका के तारीफ़ करने के लिए स्वतंत्र है, लेकिन किसी और स्त्री की नहीं.

  5. इतना आसान नहीं हो पाता एक शोध छात्र के रूप में एक वरिष्ठ के आगे, मगर आपको अपनी नापसंदगी जाहिर कर देनी चाहिए थी.

    • मैंने वहाँ पढ़ा नहीं था. अगर पढ़ा भी होता, तो पता नहीं मैं तुरंत कुछ कह पाती कि नहीं.लिखा है ना मैंने कभी-कभी आप ठीक उस समय ये निश्चय नहीं कर पाते कि जो हो रहा है उसे क्या समझा जाय और कैसे प्रतिक्रिया दी जाय?

  6. बिना असावधानी और और लापरवाही के कोई भी किसी गड़्ढे में नहीं गिरता। उम्र के साथ जैसे जैसे पैर कमजोर होते जाते हैं सावधानी का घनत्व बढ़ना चाहिए। बेचारे विद्वान उम्र के साथ घनत्व विकसित नहीं कर सके। काबुल के घोड़े प्रसिद्ध हैं, लेकिन इस का अर्थ यह तो नहीं कि वहाँ गधे नहीं होते।
    यह इरादतन सैक्सुअल एब्यूज था। एक दम अक्षम्य! इसे तो तुरन्त ही सार्वजनिक होना चाहिए था।
    हमारे समाज का ढाँचा ऐसा ही है जिस में लड़कियों /स्त्रियो को हर कदम पर सावधान रहने की जरूरत है और इन प्रवृत्तियों के विरुद्ध लड़ाई तेज करने की भी।

  7. आप की इस टिप्पणी को हिंदी समय पर लेना चाहता हूँ। कृपया अनुमति दें।
    आप का शोधपत्र ‘आधुनिक संस्कृत-नाटकों में चित्रित नारी-सम्बन्धी सामाजिक समस्याएँ’ पढ़ना चाहता हूँ। मेल कर दें, तो कृपा होगी।

    • इस टिप्पणी को लेने की अनुमति है. शोध-पत्र ढूँढना पड़ेगा. प्रकाशित नहीं हुआ था, इसलिए कहीं किसी डब्बे में बंद करके रख दिया था. वैसे मेरा पूरा शोध ही “आधुनिक संस्कृत नाट्य-साहित्य में नारी” विषय पर है. लेकिन उसकी भी साफ्ट कॉपी नहीं है मेरे पास. टाइपिंग के झंझट के कारण वो भी प्रकाशित नहीं हो पाया.

  8. सेक्सुअल अब्यूज ही है !

  9. its sexual abuj and you should show it your guide

  10. its sexual abuse and you should show it your guide also make it a point to keep away from such persons in future . we dont need praise from “every tom dick and harry ” .

    • रचना जी, सर को न बताने की कई दूसरी वजहें थीं. मैं उस समय सिविल की तैयारी कर रही थी और दिल्ली में थी. उसके बाद से सिर्फ एक बार इलाहाबाद जाना हुआ और वह भी डी.फिल. के इंटरव्यू के लिए. तो सर को बताने का मौक़ा ही नहीं मिला. बाद में उन कवि महोदय का देहांत हो गया, तो मैंने सोचा जाने दो.

      • Ham saamajik manko ko samvednaawon Ki itni naazuk kasautiyon par kasne Ki swabhaavik aaturtaa se swayam ko vanchit Bhi nahi rakhna chahte …… Aur ek sashakt samaaj nirmaan me aap jaise prabudha varg Ka yogdaan Sirf is liye shlaaghniytaa ke bajaay anuttarit prashn nirmit karne me apni urjaa sraav kar detaa hai…. Kyo Ki unhe aatmkendrit sammaan Ke prati sahanubhuti pradaan karne vale log ….atyadhik aadarshwan aur kartvya nishthaa Ke pramaan prateet hone lagte hain…..
        Aur jabtak ye vaichaarik daaridya Bhartiy samaaj Ka abhinna ang hai…..
        Tab tak aatmashlagha hetu apne prati sahaanubhootiyo ke liye lobh samvaran Bhi sambhav na hoga….
        Pataa nahi par mujhe aisaa lagtaa hai Ki yadi ham apni Shakti Ka Adhik bhaag sakaratmak nirmaan ki dishaa me vyay kare ….to kuchh prayogaatmak udaaharan prastut kar ……swayam Ke liye aur prasanshako Ke liye Bhi Adhik shreyaskar siddha hoge……
        Anyathaa apne dukhad sansmarno Ki pradarshni lagaakar yu hi sukhad sahaanubhootiyo Ki sngoshthiyo ka aanand laabh prapt kijiye…..
        Khed hai Ki Maine aap par apne vichar vyakt kiye…. kyo Ki ye aapke prati nishthawaan nahi the….
        Aapki ya kisee Ki Bhi post par Mai apne mashvire nahi deta aage Bhi shayad nahi hi dunga….

      • शक्ति जी, बात अपने दुखद अनुभवों को बाँटकर सहानुभूति लेने की नहीं है, बात ऐसी बातों को सामने लाने की है, जिसे औरतें आज भी झेल रही हैं. ऐसी स्थिति में जो किंकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति आती है, उससे हर महिला कभी न कभी गुज़री होती है.

  11. Vibha Rani Shrivastava on said:

    मंगलवार 21/05/2013 को आपकी यह बेहतरीन पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं ….
    आपके सुझावों का स्वागत है ….
    धन्यवाद !!

  12. पता नहीं लेकिन मुझे लगता , जो बातें निकल आतीं है जो कुछ एक का जिक्र हो जाता, अन्यथा ये हादसे और अनुभव से अब और आज भी शायद बहुतों को गुजरना पड़ रहा है….. जिसका कहिन और कोई जिक्र नहीं हो रहा ……… संभव हो तो ऐसी बातें सार्वजनिक होनी चाहिए, ताकि अब और बाद की पीढ़ी को बिरोध करने का साहस मिले………..

  13. मुझे तो ऐसे नामों को आज भी सार्वजनिक करने मिएँ बुराई नज़र नहीं आती … जिसकी जो सच्चाई है वो सामने आनी चाहिए … मरने के बाद भी कुछ लोग उनको देव मानते रहें ये तो ठीक नहीं …

  14. किसी कवि का ऐसा लिखना और किसी लड़की का यूँ चुप रह जाना दोनों ही नयी बात नहीं है….अक्सर ये कवि/प्रोफ़ेसर (सारे नहीं ) इस तरह की हरकत कर जाते हैं और लडकियां संकोच में कुछ कह नहीं पातीं.
    इस तरह के लोगो की मानसिकता हमेशा एक सी होती है, उम्र से कोई फर्क नहीं पड़ता….बस जब मौक़ा मिल जाता है,वे लोग ऐसी हरकतें कर जाते हैं.

  15. मोहन श्रोत्रिय on said:

    नाम भी दिया ही जाना चाहिए था. चुप रहना ऐसे दुष्टों को बढ़ावा देना होता है. यह अब्यूज़ के आलावा कुछ नहीं था.

    • नाम दे सकती थी, यदि उनकी मृत्यु न हो चुकी होती. किसी व्यक्ति के बारे में नाम लेकर पीठ पीछे टिप्पणी करना ठीक नहीं होता. जो आदमी मर चुका है, वो अपनी सफाई नहीं दे सकता. इसलिए उसका नाम लेना ठीक नहीं समझा.

  16. Relax… vidvaan hona or charitrawan hona dono alag-alag batain hain… dono ka apas me door door tak koi sambandh nahi hai… me hairaan hun aap dono ko kyon jod baithi…

  17. kavi adesh agarwal prakash on said:

    आपकी व्यथा सही थी यदि आपकी जगह मै होता तो उन महोदय को उन्ही की तरह श्लोक लिखकर उनकी औकात बता देता की उम्र के हिसाब से वो अपना मन प्रभु भक्ति में लगायें , शायद अगला जन्म सवंर जाये,

  18. निंसंदेह ये आपकी शारीरिक सौंदर्य की प्रशंसा में कहा गया था…अगर उक्त महोदय के मन में कुछ न होता तो वो वहीं आपके सामने ही कह सकते थे..ये न कहते कि घर जाकर पढ़ना….आपके सामने कहने पर आपकी प्रतिक्रिया देती या नहीं..ये उस वक्त पर मयस्सर होता..सही है कि आप कई बार तुरंत प्रतिक्रिया नहीं दे पाते..पर ये एक छोटी सी घटना थी…मगर उसका आप पर काफी गहरा असर पड़ा..वो इसलिए कि आप उन्हें एक सम्मानित प्रोफेसर और गाइड के तौर पर देख रही थीं…ऐसे व्यक्ति से इस तरह के व्यवहार की शंका कभी नहीं होती..इसलिए इस तरह का उनका व्यवहार आप को उद्देलित कर गया….। आमतौर पर इसतरह की बातों का दोस्तों में कहना चलता है औऱ लोग इसका बुरा नहीं मानते..उल्टा कई लोग तारीफ न सुनकर बुरा मान जाते हैं। दरअसल ये आपकी उस वक्त की अवस्था…कहने वाले व्यक्ति कि छवि….उसके आपके रिश्ते पर निर्भर करता है…कई बार निर्दोष भाव से की गई प्रशंसा का भी लोग गलत मतलब निकाल लेते हैं…ये बातें इतनी महीन है कि कुछ का कुछ मतलब निकल जाता है…। अगर आपके दोस्त अच्छे हैं तो उन्हें पता होता है कि किस बात का आप बुरा मानेंगे….और नहीं..तो आप उन्हें शालीनता से कह सकते हैं कि यार इस तरह तारीफ न किया कर..मुझे अच्छा नहीं लगता…।

  19. यशवन्त माथुर on said:

    आपने लिखा….हमने पढ़ा
    और भी पढ़ें;
    इसलिए आज 21/05/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक है http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    पर (विभा रानी श्रीवास्तव जी की प्रस्तुति में)
    आप भी देख लीजिए एक नज़र ….
    धन्यवाद!

  20. .
    .
    .
    आराधना जी,

    कोई भी और ब्लॉग होता तो मैं पोस्ट पढ़कर आगे बड़ जाता… यह टीप यहाँ केवल और केवल इसलिये दे रहा हूः क्योंकि मुझे पूरा विश्वास है कि आपमें मेरी बात समझने लायक खुला दिमाग है…
    यहाँ दो बातें हैं…
    पहली यह कि क्या उन कविवर का सेकसुअल एब्यूज का पुराना इतिहास रहा था, यदि नहीं तो पकी उमर में कोई अचानक गन्दा नहीं हो जाता…
    दूसरी बात यह कि हो सकता है कि उन्हें उस समय आप वाकई सुन्दर लगी हों और काव्य रच गया हो…
    I will give you a situation, A senior lady executive compliments a Junior male colleague by saying “although you have a good physique and a pleasant personality, but one can not evade the mesmerizing intensity of your eyes”… now, there will always be two opposite views about this comment… I rest my case here…

    • आपकी बात से सहमत हूँ. ये प्रशंसा भी हो सकती है. लेकिन उन्होंने जिस तरह मुस्कुराकर उसे घर जाकर पढ़ने को कहा, इस बात से मुझे लगा कि उनके दिल में खोट थी.

  21. मेरे हिसाब से आपको वहीँ मौका देखकर अकेले में उन महाशय को थोडा बहुत कड़े शब्दों में तो समझा ही देना था ..खैर अब वे न रहे तो कोई बात ही नहीं …लेकिन यह बात आपने ब्लॉग पर लिखकर बहुत अच्छा किया कम से ऐसी कु मानसिक प्रवृति के जीवित आत्माओं को सबक मिले ..

  22. इसका मतलब अब कभी पता नहीं चल पाएगा कि वो कौन थे ?

    • ज़रूरत क्या है? बस इतना समझ लीजिए कि ऐसे बहुत से लोग होते हैं और ‘वो बहुत से लोग’ ये समझ लें कि अब लड़कियाँ बोलने का साहस कर पा रही हैं क्योंकि उनके पास ब्लॉग जैसा हथियार है.

  23. R…..E……L…..A…..X

  24. “लड़कियों के पास लुभाने को कुछ होता भी है, मगर नौकरी न पाने वाले सामान्य युवक के पास कुछ भी नहीं होता.” -ये “उच्च” विचार वरिष्ठ साहित्यकार और प्रगतिशील माने जाने वाले एक लेखक विश्वनाथ त्रिपाठी के हैं, जो उन्होंने “शुक्रवार” पत्रिका के साहित्य वार्षिकांक में प्रकट किए हैं।

    सवाल उठता है कि देश-दुनिया के साहित्य और समाज का विश्लेषण करने के बावजूद एक महान कहा जाने वाला व्यक्ति अगर अपने बुजुर्गावस्था में भी इतने कुत्सित विचार के साथ महान बना रह सकता है तो हम खालिस सामंती और मर्दवादी समाज के मनोविज्ञान में तैयार हुए एक साधारण पुरुष से क्या उम्मीद करेंगे। त्रिपाठी जी को नौकरी मांगने के लिए लड़कियों के पास लुभाने का एक हथियार दिखाई देता है। दरअसल, स्त्री की क्षमताओं को खारिज़ किए बिना पितृसत्ता का जिंदा रहना संभव नहीं होगा। इसलिए सबसे पहली चोट उनकी क्षमताओं पर ही किया जाता है। इसके लिए सबसे आसान यही है कि उनके अस्तित्व को उनके शरीर में समेट दिया जाए।
    (ये पंक्तियां नीचे दिए गए लिंक वाले ब्लॉग पर प्रकाशित एक पोस्ट का हिस्सा है।)
    http://vallarionly.blogspot.in/2013/04/blog-post_4.html

    इसके अलावा, नीचे दिए गए लिंक में भी इस मसले पर अच्छा विश्लेषण है।
    http://vallarionly.blogspot.in/2013/04/blog-post.html

  25. वैसे अक्सर लोग हंसते हुए, मज़ाक में अपनी कुंठायें ज़ाहिर कर देते हैं जिन पर रियेक्ट करने पर सुनने मिलता है कि गजब हैं आप! इस तरह से क्यों ले रही है. मज़ाक को मज़ाक ही रहने दें और बाकि लोग भी सुर में सुर मिलाते हैं. इस तरह की बातों को बोलना और बताना और उन पर रियेक्ट करना आवश्यक है.

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