आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

मीत के गुण्डा की गुण्डई के किस्से

फेसबुक पर मीत  ने हमको ‘गुण्डा’ नाम दिया है, जो कि हमारे स्वभाव को पूरी तरह चरितार्थ करता है🙂 मीत कौन हैं? इनसे हमारा परिचय करीब साढ़े तीन साल पहले ब्लॉग लिखते-लिखते हुआ था. इनका एक ब्लॉग हुआ करता था (अब पता नहीं कहाँ गया?)- ‘किससे कहें.’ उस पर ये पुराने फ़िल्मी गीत, ग़ज़लें, गीतकारों और गजलकारों के किस्से और न जाने क्या-क्या छापा करते थे. कुछ पहेलियाँ भी पूछते थे. ऐसी ही किसी पहेली का जवाब सही-सही देने के बाद हमारा इनसे परिचय हो गया. (ये हमने आज तक किसी से नहीं बताया था कि हमको ये बहुत अच्छे लगते थे :)) खैर, मीत हमको ‘गुण्डा’ कहते हैं , तो हम अपनी गुण्डई के कुछ किस्से सुनायेंगे और आपको सुनना पड़ेगा नहीं तो हम कैसे गुण्डा?

(किस्सा नंबर एक)

ये इलाहाबाद की घटना है. मैं अपने एक दोस्त के साथ ‘धूम’ फिल्म देखने गौतम सिनेमाघर गयी. और हमेशा की तरह किनारे (कार्नर नहीं :)) वाली सीट पर बैठी. फिल्म अभी शुरू ही हुयी थी कि पीछे की सीट से एक लड़का उठकर बाहर गया और जाते-जाते मेरे कंधे को छूता गया. पहली बार मैंने सोचा कि हो सकता है कि हाथ गलती से लग गया हो. लेकिन वापस लौटने पर उसने फिर वही हरकत की. मैंने अपनी सीट से खड़े होकर तुरंत उसे टोका, “तुमने हाथ क्यों लगाया?” वो डर तो गया लेकिन अपनी गलती न मानते हुए लड़ने लगा, “गलती से लग गया होगा.” मैंने कहा, “गलती से एक बार हाथ लगता है दुबारा नहीं.” मेरा दोस्त भी उससे झगड़ पड़ा और कहा, ‘माफी माँगो’ इस पर वो लड़का भड़क गया. उसके दोस्त जब खड़े हुए तो पता चला कि वो करीब सात-आठ थे. शायद इसीलिये इतना अकड़ रहे थे. सिनेमाहाल के और लोगों को फिल्म छूटने की चिन्ता हो रही थी. उन्होंने उल्टा मुझे समझाया, “बहनजी, जाने दीजिए” मैंने ज़ोर से चिल्ला के कहा, “शर्म तो आती नहीं आपलोगों को. एक लड़का अँधेरे का फ़ायदा उठाकर बदतमीजी कर रहा है और आपलोग हमसे कह रहे हैं कि हम जाने दें.”

इसी बीच शोर-शराबा सुनकर चौकीदार आ गया. उसने उनलोगों को शांत करके बैठा दिया और मुझसे भी बैठने के लिए कहा. मैं बैठ तो गयी, लेकिन मेरा खून खौल रहा था कि जिस लड़के ने मेरे साथ बदतमीजी की, उसका मैं कुछ नहीं बिगाड़ पायी. मैंने सुना कि वो लड़का किसी से फोन पर बात कर रहा था, जिससे ये लगा कि वो कुछ और गुंडों को अपनी मदद के लिए बुला रहा है. मुझे और गुस्सा आया. मेरे दोस्त ने मेरा मूड और हालात देखते हुए वापस चलने के लिए कहा, तो मैंने मना कर दिया कि “फिल्म देखने आयी हूँ, तो देखकर जाऊँगी. इन कमीनों के कारण मैं भाग नहीं सकती.” और सच में मैं भागती कभी नहीं. हमेशा लड़ती हूँ.

तभी चौकीदार ने मेरे पास आकर कहा, “मैडम, आप आराम से बैठिये. मैनेजर ने गेट बंद करवा दिया है और पुलिस को बुला लिया है.” तब जाकर मेरा गुस्सा कुछ शांत हुआ. ठीक दस मिनट बाद पुलिस आ गयी. उस थाने का एस.एच.ओ. उन दिनों काफी मशहूर था ऐसे बदमाशों को सबक सिखाने के लिए. पुलिस ने दोनों पक्षों को बाहर बुलाया और मुझसे लड़के को पहचानने को कहा. मेरे इशारा करते ही उन्होंने डंडे बरसाने शुरू कर दिए, तो मेरे मुँह से निकला, “आप मार क्यों रहे हैं?” इंस्पेक्टर बोला, “मैडम, आप जानती नहीं. ये लोग ऐसे ही सीधे किये जाते हैं” पुलिस उससे पूछ रही थी कि वो किसे बुला रहा था. तब पता चला कि वो इलाके के किसी जाने-माने गुंडे का छोटा भाई था.

खैर, पुलिस उन बदमाशों को पकड़कर ले गयी. हमलोग पूरी फिल्म देखकर ही वापस लौटे.

(किस्सा नम्बर दो)

अभी इसी दीवाली की बात है. रात के दो बज गये थे, लेकिन नीचे रहनेवाले ‘लोकल्स’ ने पटाखे फोड़-फोड़कर सिर में दर्द कर दिया था. पटाखों की आवाज़ से ज़्यादा उससे उठने वाले धुएँ ने नाक में दम कर दिया था. तीसरे माले पर कमरा होने के कारण सारा धुँआ कमरे में भर गया था. मुझसे जब नहीं सहन हुआ, तो मैं बालकनी में जाकर चिल्लाई, “अब आपलोग पटाखे जलाना बंद कर दें प्लीज़.” नीचे से आवाज़ आयी, “अरे साल भर में एक दिन तो त्यौहार होता है. हम तो छुड़ाएंगे पटाखे. आपको क्या तकलीफ है?” और फिर से पटाखे दगाने लगे. मैंने कहा, “सारा धुँआ ऊपर आ रहा है” उन्होंने सुना नहीं. फिर मैंने कहा कि “आप ये बंद करें, वरना मैं पुलिस को कॉल कर दूँगी.” इस पर एक लड़का ऊपर मुँह करके चिढ़ाने लगा, “क्या कह रही हैं? आवाज़ नहीं आ रही है?”

उसकी इस हरकत से मुझे इतनी ज़ोर की चिढ़ मची कि मैंने मोटर ऑन करके टैप में पाइप फिट कर दिया और पानी से भिगो दिया उन सबको. अब नीचे भगदड़ मची हुयी थी. एक आदमी का ‘इगो’ जाग गया. वो ‘आउट ऑफ कंट्रोल’ होकर ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगा. बोला ये क्या बेहूदा हरकत है. मैंने चिल्लाकर कहा, “जैसे नीचे से धुँआ ऊपर आ सकता है. वैसे ही पानी भी नीचे जा सकता है.” सभी पटाखे छुड़ाने वाले और उनके पटाखे भीग चुके थे. ऊपर अँधेरा होने के कारण वो लोग ये नहीं देख पाये कि ये हरकत किसने और किस बिल्डिंग से की है? नीचे से आवाजें आ रही थीं…’ये क्या बदतमीजी है’ ‘किस मकान से फेंका गया पानी’ ‘मकान मालिक को बुलाओ और इनको निकलवा दो’

मैं थोड़ी देर तक उनका तमाशा देखती रही. फिर आकर अपने कमरे में सो गयी. वो लोग फिर कहीं से पटाखे ले आये और दुबारा वही काम शुरू कर दिया…लेकिन तब तक कुछ और लोगों ने भी विरोध करना शुरू कर दिया. बड़ी देर तक नीचे चिल्ल पों होती रही और इस सबकी शुरुआत करने वाली मैं गुंडी आराम से बिस्तर पर लेटी हुयी थी. मुझे हँसी आ रही थी कि ये सिरफिरे लोग मेरे कारण अपने पैसे से पटाखे खरीदकर फूँक रहे हैं🙂

( किस्सा नंबर तीन)

हमारे मुहल्ले की एक तस्वीर

हमारे मुहल्ले की एक तस्वीर

रात के तीन बजे सामने की बिल्डिंग के तीसरे मंजिल वाले का दिल रोमैंटिक हो गया था और उसने फुल वोल्यूम में ‘साँस में तेरे साँस मिली तो मुझे साँस आयी’ गाना बजाना शुरू कर दिया. हमारा मुहल्ला ठहरा सँकरी गलियों वाला. ऐसा लगा जैसे गाना मेरे ही कमरे में बज रहा हो. मेरी आँख खुल गयी. बालकनी में निकली तो देखा कि एक-दो और लड़के देख रहे थे (यहाँ ज्यादातर सिविल की तैयारी करने वाले लड़के हैं, जिनकी पढ़ाई में विघ्न पड़ रहा था) पर समस्या ये कि इस बिल्डिंग से नीचे उतरकर सामने वाली बिल्डिंग में मना कौन करने जाय? वैसे भी सिविल वाले किसी से पंगा नहीं लेते. थोड़ी देर में सब अपने-अपने कमरों में चले गए.

मैंने सोचा कि जाने दो. बेचारा पूरा गाना सुन लेगा तो खुद ही बंद कर देगा. लेकिन पता नहीं सामने वाले को क्या फितूर सवार था कि उसने वही गाना करीब तीन बार रिपीट किया. जब चौथी बार गाना शुरू हो गया तो मेरी गुण्डई जाग गयी. मैंने दीवाली में बालकनी पर रखे पुराने ‘दीये’ उठाये और एक-एक करके सामने वाले के दरवाजे पर निशाना लगाना शुरू किया. सोचा कि बन्दा आजिज आकर दरवाजा खोलेगा तो उससे कहूँगी कि ‘तुमने मुझे डिस्टर्ब किया तो मैं तुम्हें कर रही हूँ.’ लेकिन वो नौबत नहीं आयी. तीसरा दीया फेंकते ही गाना बंद हो गया और दुबारा नहीं बजा🙂

(किस्सा खतम पइसा हजम :))

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29 thoughts on “मीत के गुण्डा की गुण्डई के किस्से

  1. गज़ब। आपके “गुण्डत्व” को नमन।

  2. aap ke pass ent ka jwab pathar hai.
    and you may be right. But i don’t know i have hard feeling that you probably want to handle issues in defined peculiar manner only even if other options were available to you.

    any ways bravo. will like to know if you agree to this or not.

    • हाँ, अच्छे बनकर सीधे तरीके से तो बहुत लड़ाइयां की हैं. यहाँ सिर्फ उतनी बातें हैं, जो गुण्डई वाली हैं.

  3. सबसे पहले तो खटका -थे

    किस्सा वन में गुंडे से निपटने के लिए बड़के गुंडे भाई को बुलाना ही था उस बंदे ने
    किस्सा टू में तो अगर आप नहीं भी कुछ करती तब भी सिरफिरे पटाखे खरीदकर फूँकते रहते
    किस्सा थ्री में गाना बंद होना ही था बेचारे की सांस जो अटक गई होगी

    एक हौसलाअफजाई भी मिली – सिविल वाले किसी से पंगा नहीं लेते !

    वैसे मीत हमसे डर कर ही भिलाई छोड़ भागे थे कोलकाता
    हा हा हा

  4. मीत ने नामकरण गलत नहीं किया है। सही ही है।
    तुम्हारे बकैती के किस्से खतम कैसे हो गये भाई? अभी तो शुरु ही हुये हैं?🙂

    • एकै पोस्ट में थोड़े ही आ जायेंगे सारे किस्से🙂 वैसे गुण्डई हम करते कम हैं. आमतौर पर सीधे रास्ते से काम करते हैं.

  5. मीनाक्षी on said:

    लगता है मीत से सभी को प्रीत है…और सुनकर अच्छा लगा कि गुंडई कम करती हो और सीधे रास्ते से काम करती हो…फिर भी मन यही कहता है कि ‘मुक्ति’ की चाह सब में पैदा हो जाए तो बात ही कुछ अलग हो🙂 खुश रहो….

  6. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन खुद को बचाएँ हीट स्ट्रोक से – ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है … सादर आभार !

  7. हफ्ता नहीं वसूलती हो तो … अभी पूरा ‘गुण्डा’ नहीं बनी हो … कसर रह गई है गुण्डई मे😉

  8. जय हो देवी जी, आप सदा विजयी रहें।

  9. तीसरा दीया फेंकते ही गाना बंद हो गया और दुबारा नहीं बजा

    बाप रे ………
    शुक्र है कुछ ईंट पत्थर नहीं रखे थे…
    ऐसे ही गुंडई जारी रखना – तभी समाज के कुछ शोदाई सीधे हो सकते हैं.
    शुभकामनाएं

  10. ईश्वर ऐसे मौकों पर सदा आपकी मदद करता रहे..।

  11. ऐसी गुंडई गुंडई नहीं निडरता है । पर तनिक सावधानी के साथ और एहतियात के साथ ।

  12. ठीक है बाबा मान लिया गुंडी हो पूरी🙂 .

  13. बस ऐसी ही बनी रहो…बड़े रोचक किस्से हैं…जारी रखो सुनाना .

  14. मान गये आपकी गुंडई को। अब एक मुम्बइया गुंडा-दादा छाप नाम भी रख लें।

  15. सही…आपका तो ये गुण्डा वाला रूप हमको पता ही नहीं था😀

  16. Apani hi sahodar ho. Lagi raho naaz hai tum pe.
    Peace,
    Desi Girl

  17. इलाहाबाद जैसे शाहर में रात के 2 बजे प्रयाग रेलवे स्टेशन पर सदल-बल जाकर चाय पी आने, काफी हाउस में ‘फेमिली’ केबिन छोड़ ‘मुख्य हाल में काफी पीने, बाइक पर पीछे बैठे हुए अचानक किसी पड़ोसी बाइकर को का हो का देखत हवा- पूछ लेना.. इनकी गुंडई के ऐसे तमाम हाहाकारी किस्सों के लिए संपर्क करें.. श्री — जा हटावा रजा..

  18. हाय,आप तो बिल्कुल हमारे जैसी निकलीं
    …..
    खूब जमेगी जब मिल बैठेंगे हम , आप और..ढ़ेर सारे मीत .. कैसी लगी ….🙂
    आइडिया ठीक है ????????????

  19. डर डर कर जिये तो क्या जिये ….. यही हौसला बना रहे ।

  20. गज़ब बकैती पोस्ट और गज़ब गुंडई.. हमका माफ़ी दई दो अगर कोनो गलती हुई गई हो तो… हम तो डर गए… हुहुहुहू….

  21. गुंडई बदस्तूर रहे! हम तो डर गए हैं !

  22. Inspired to do MORE gundayi🙂

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