आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

पंखुरियाँ

एक पत्थर पर थोड़ी चोट लगी थी. उस पर मिट्टी जम गयी. बारिश हुयी और कुछ दिन बाद उस मिट्टी में जंगली फूल खिल गए. उन फूलों पर मँडराती हैं पीले रंग की तितलियाँ और गुनगुनाते हैं भवँरे. उन्हें देख मुझे तुम्हारी याद आती है.

तुम्हीं ने तो बताया था सबसे पहली बार कि फूल की पंखुरियाँ पिघला सकती हैं पत्थर का दिल भी.

*** *** ***

वो दिन ‘कुछ अलग’ होते हैं. जब फ्रिज की सारी बोतलों में पानी भरा होता है. मैं पढ़ती रहती हूँ और दोनों टाइम का खाना मेरी टेबल पर सज जाया करता है. कोई प्यार से कहता है, ‘चलो, किताब हटाओ और खाना खा लो.’ रात में पढ़ते-पढ़ते इधर-उधर बिखरी किताबें, सुबह करीने से मेज पर सजी होती हैं.

नहीं, ये कोई सपना नहीं. ये वो दिन हैं, जब तुम साथ होते हो.

*** *** ***

मेरी ज़िंदगी की सबसे खूबसूरत सुबहें वो होती हैं, जब सुबह-सुबह तुम चाय बनाते हो. मेरे सिर पर हाथ फेरकर और माथा चूमकर मुझे उठाते हो, ‘उठो, चाय पी लो’ मैं घड़ी देखती हूँ. सुबह के दस बज गए होते हैं.

और मुझे पता है कि तुम सात बजे से जाग रहे हो.

*** *** ***

हम रात-दिन की तरह हैं. मैं रात की तरह शांत, ठंडी, डार्क और रहस्यों से भरी हुयी. तुम दिन की तरह प्रकाशवान, पारदर्शी, ओजस्वी और ऐक्टिव. हम अलग-अलग होते हुए भी सुबह और शाम के जरिये मिले हुए हैं. जैसे तुम मुझे सबसे पहले बचपन में मिले थे. खेलते-खेलते मैंने तुम्हें धक्का मारकर गिरा दिया था और तुम्हारा घुटना छिल गया था.

और अभी कुछ दिन पहले तुमने कहा ‘हम अभी साथ हों न हों. बुढ़ापे में साथ-साथ ही रहेंगे.’ तबसे मुझे बुढ़ापे से डर नहीं लगता, बल्कि वो पहले से अधिक रूमानी लगता है.(हाँ, मैं उन पागल लोगों में से हूँ, जिन्हें बुढ़ापा अट्रैक्ट करता है)

मैं बुढ़ापे के आने का इंतज़ार करती हूँ और तबके लिए मैंने कोई इंश्योरेंस पालिसी नहीं ली है.

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18 thoughts on “पंखुरियाँ

  1. .
    .
    .
    बड़ी प्यारी रसबतियाँ, पर मैं मानता हूँ कि साथ साथ तो जीवन गुजरना चाहिये केवल बुढ़ापा नहीं…

  2. बुढापे के लिए इंतज़ार नहीं करना होता आराधना वह अचानक ही आ धमकता है 😦

  3. प्रेम कुछ ऐसा ही होता है। जब व्यक्ति खुद को भूल जाता है उसे बस वही याद रहता है जिसे वह प्रेम करता है।

  4. मैं सोच रहा था कि “निर्भरता” से मुक्ति क्या कभी संभव है

  5. ज़िन्दगी को व्यवस्थित करने वाला अगर ऐसा कोई साथ हो तो बुढापे से कैसा डर? मुझे भी बुढापा बहुत रोमानी लगता है, जो अब आने को ही है 🙂

  6. सतीश सिंह ठाकुर on said:

    अराधनाजी आप हर बार कुछ ऐसा लिख जाती हैं कि कमेंट करने से खुद को रोक नहीं पाता। जिस तरलता, सरलता और सहजता के साथ आपने एक रिश्ते को रेखांकित किया है, वो जादुई है। आपको मैं व्यक्ति के तौर पर नहीं जानता पर इतना कह सकता हूं कि आपके अंतस में सृजनात्मकता की एक भट्ठी धधक रही है। इस धधकन को, इस तपिश को हमेशा बचाकर रखिएगा।

  7. जब इतना प्यार भरा हो हृदय में, इतना विश्वास हो मन में तो फिर आपका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता।

    प्रेम हो जब हृदय मे, विश्वास हो मन में गहरा
    सभी रूमानी लगेंगे,,क्या बुढापा, क्या जवानी!

  8. मानव मन की रचना बहुत गहन है, अकेलापन भाता भी है, और नहीं भी। अपने पैरों पर खड़ा होना अच्छा लगता है, जबकि औरों के कांधों पर सर टिकाना और भी अच्छा।

  9. खूबसूरती से लिखे मनोभाव

  10. “मैं बुढ़ापे के आने का इंतज़ार करती हूँ और तबके लिए मैंने कोई इंश्योरेंस पालिसी नहीं ली है”क्या कहना आराधना। बहुत खूब!!

  11. आपकी इस रचना को सोमवारीय चर्चा(http://hindibloggerscaupala.blogspot.in/) में शामिल किया गया है। आभार।

  12. budhape ka intzaar kaun karta hai 🙂 wo to khud dhamak padta hai………..dekho na mere baal ke kone safed hone lage 😀

  13. bahut sunder likha aap sabhi ne …………aap sabhi se milkar achcha laga

  14. क्या कमाल लिखा है आराधना। रात और दिन की तरह वाला हिस्सा अद्भुत है।

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