आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

कितनी सदियाँ, कितने देश

‘प्यार का पंचनामा’ फिल्म देख रही थी. वैसे तो ये फिल्म पूरी तरह लड़कों के दृष्टिकोण से बनी है और लड़कियों को जिस तरह से चित्रित किया गया है, उसे देखकर गुस्सा भी आ रहा था, लेकिन बहुत हद तक ये फिल्म महानगरों में रहने वाली उच्च-मध्यमवर्गीय नयी पीढ़ी की जीवन-शैली को प्रतिबिंबित करती है. बहुत सोचने पर भी मुझे अपने आस-पास कोई ऐसी लड़की नहीं दिखी, जो फिल्म में दिखाई गयी नए ज़माने की बोल्ड लड़कियों के आस-पास भी ठहर सके.

मैं भी अजीब हूँ. फिल्म के पात्रों को वास्तविक जीवन में ढूँढ़ रही हूँ. लेकिन फ़िल्में कोई हवा में तो बनायी नहीं जातीं. फिल्मकार को कहीं न कहीं से तो पात्रों की प्रेरणा मिली होगी. तो कहाँ होती हैं ऐसी लड़कियाँ? मैं भी दिल्ली में रहती हूँ, मुझे तो नहीं दिखतीं. या हो सकता है कि मैं अब पुरानी पीढ़ी की हो गयी हूँ और मेरे बाद की कई पीढियाँ इस शहर में रहने लगी होंगी या फिर उनकी मेरी जीवन-शैली में इतना अंतर है कि मेरी सोच वहाँ तक नहीं पहुँच सकती.

वैसे तो दिल्ली में आते-जाते लड़कियों को देखती ही हूँ, लेकिन जबसे पढ़ाने जाने लगी हूँ और करीब से देखने का मौका मिल रहा है. इस महानगर में कई-कई शहर बसते हैं और वो भी कई-कई सदियों में. आमतौर पर बाहर के लोग ये समझते हैं कि डी.यू. की लड़कियाँ माडर्न और बोल्ड होती हैं, भकाभक सिगरेट फूँकती हैं और कुछ-कुछ दिनों पर ब्वायफ्रैंड बदलती रहती हैं. हाँ, ऐसी लड़कियाँ भी होती हैं, और आज से नहीं बहुत पहले से रहती हैं. लेकिन यह वर्ग सिर्फ बीस-पच्चीस प्रतिशत लड़कियों का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें इस महानगर तथा दूसरे महानगरों से आयी उच्च-मध्यमवर्गीय लड़कियां हैं.

लेकिन इन लड़कियों से अलग बहुत बड़ी संख्या में ऐसी लड़कियाँ हैं, जो अब भी अपनी पढ़ाई के लिए रोज़-रोज़ लड़ाई लड़ती हैं. फर्स्ट इयर की कक्षा में एक लड़की है, जो मेरठ से रोज़ ट्रेन से कॉलेज आती है पढ़ने के लिए. एक है जो जींस के ऊपर कुरता और दुपट्टा डालती है, पूछने पर जवाब मिला, “जींस हमारी च्वाइस है और कुरता-दुपट्टा माँ-पापा की.” कितनी आसानी से रोज़ के संघर्ष से जूझती लड़कियाँ बताती हैं अपने उस संतुलन के बारे में जो उन्होंने बड़ी सफाई से परम्परा और आधुनिकता के बीच आज भी बिठा रखा है. और मज़े की बात है कि ये उस महानगर के अन्दर है जो आधुनिक फैशन का गढ़ माना जाता है. जहाँ की लड़कियों की आधुनिक पोशाकें बाकी देश की लड़कियों के लिए फैशन गढ़ती हैं.

यहीं इस महानगर के बीचों-बीच कुछ गाँव हैं, जहाँ आज भी पुरानी परम्पराएँ जारी हैं. जहाँ के अभिभावक अपनी बेटियों को गर्ल्स कॉलेज में ही पढ़ने भेजते हैं. उन लड़कियों को सीधे कॉलेज जाना और वहाँ से सीधे वापस आना होता है. लड़कों से हँसना-बोलना तो दूर उन्हें देख भी नहीं सकतीं. यहीं ऐसी लड़कियाँ भी हैं जिन्हें सहेलियों के साथ भी सिनेमा जाने की छूट नहीं है. अगर कभी गयीं भी तो परिवार के साथ. आश्चर्यचकित होती हूँ ये सब देखकर कि क्या ये दिल्ली है?

हाँ, ये दिल्ली है, जहाँ एक साथ कई शहर बसते हैं अपने अन्दर कई सदियाँ लिए हुए. यहाँ कुछ इलाके अब भी पिछली सदी में जी रहे हैं, तो इसमें आश्चर्य की क्या बात है? इस देश में भी तो कई देश हैं, जो कई सदियों पीछे चल रहे हैं. यहीं पर प्रेमी-प्रेमिका को मौत का फरमान सुनाने वाली पंचायतें भी तो हैं. वे किस सदी में बनी थीं?

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15 thoughts on “कितनी सदियाँ, कितने देश

  1. क्यों न ऐसा देश काल हो जहाँ हर किसी को अपने ढंग से जीने रहने खाने की स्वतंत्रता हो !

  2. समय कोई भी हो, हर समाज एक साथ कई सदियों में जीता है। अच्छा हुआ कि पढाने के बहाने लिखने का भी मन किया।

  3. अच्छा आलेख

    सादर

  4. समस्या तब होती है जब हम एक मानक से सबको मापना चाहते हैं सा एक को देख कर उसे सबमें देखने लगते हैं। विविधता रहने दें और उसे विविध आयाम मान कर स्वीकार कर लें। फिल्म वाला भी तो नहीं कहता है कि प्रस्तुत चारित्रिक गुण वह सब पर लागू है।

    • मेरा भी यही कहना है कि ‘आधुनिक लड़की’ के रूप में हमने माडर्न पोशाक पहनी हुए धडाधड अंग्रेजी बोलती लड़की की छवि गढ़ रखी है. क्या प्रतिदिन अपनी शिक्षा-दीक्षा के लिए लड़ाई लड़ती, परम्परागत पोशाक पहनने वाली लड़की आधुनिक नहीं होती.

  5. कल 27/10/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद!

  6. 21th century ke bharat mein aaj bhi 17th, 18th aur jaane kitni shatabdiyaan rahti hain .. cinema wahi dikhata hai jo aasani se bik jaaye jo 1st week collection karwaa de .. chaahe wo real ho ya fantasy.

  7. तभी तो ये दिल्ली है … हर तरह के रंग को समावेश किये …
    अलग अलग परिवेश माहोल आचार व्यवहार … पर नारी की समस्या लगभग एक जैसी …

  8. इस भेद का मूल कारण आर्थिक है। आर्थिक विषमता जब तक रहेगी यह भेद बना रहेगा। समाज इसी में जीता रहेगा। कथा, कहानी, फिल्में ..कुछ सच्चाई पर आधारित होती हैं कुछ कल्पनाओं का सहारा लेकर अगली पीढ़ी की पटरियों पर सरपट भागने लगती हैं। यह फिल्म में भी वैसे ही काल्पनिक तथ्य होंगे। मैने नहीं देखी।

  9. दरअसल यह समाजीकरण की प्रक्रिया है। जींस पहनना, भकाभक सिगरेट फूंकना, आधुनिक परिधान पहनना और हर महीने बोयफ्रेंड बदलना बेशक 20% वर्ग का ही शगल है आज भी और 30 साल पहले भी और उससे पहले भी। यह वर्ग हर तरह की वर्जनाओं को तोड़ता दिखाई देता है और इस तरह एक तरह का आइकन बन जाता है जो सिनेमा और साहित्य में डिकाही देता है। धीरे धीरे समाज इस चलन को अपनी तरह अपना लेता है। हम छोटे थे तो जींस पहने लड़की अजूबा और उसका चरित्र ठीक ना होने का पैमाना भी होता था। आज दिल्ली ही नहीं दूर ग्रामीण क्षेत्रों में लड़कियों ने बिलकुल अपनी तरह का पहनावा निकाला है – जींस के ऊपर कुर्ता और मुँह पर लपेटा दुपट्टा जो वक्ष पर भी आता है। यह भी डीयू, जे एन यू पहनावा ही था। रही बात सिगरेट की तो उसकी कोई सामाजिक उपयोगिता अभी तक नहीं मिली – ना यहाँ और ना ही पश्चिम में।

  10. bahut sundar likha hai aapne .
    mere blog par aapka swagat hai
    http://iwillrocknow.blogspot.in/

  11. sochne par mazboor krdene wala post tha yeh.

  12. पिंगबैक: कितनी सदियाँ, कितने देश: जनवाणी में 'आराधना का ब्लॉग' - Blogs In Media

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