आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

सम्बन्धों का जुड़ना-टूटना

“जब कोई दवा लंबे समय तक चलती रहती है, तो उसको अचानक बंद करने के परिणाम खतरनाक हो सकते हैं और मरीज़ पहले वाली स्थिति में जा सकता है. लंबे समय से इस्तेमाल की जा रही दवाओं की खुराक क्रमशः कम करते हुए उन्हें धीरे-धीरे खत्म करना चाहिए. पुराने रिश्ते भी ऐसे ही होते हैं. उन्हें अचानक से नहीं तोड़ना चाहिए. इससे चोट लग सकती है.” कोई समझा रहा था मुझे. और मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि ये “धीरे-धीरे” वाली अवधि कितनी लंबी होनी चाहिए? एक महीने, दो महीने या एक साल? और तब तक क्या किया जाय? उस रिश्ते को क्या नाम दिया जाय- “इट्स काम्प्लिकेटेड”?

ये ‘इंटरपर्सनल रिलेशंस’ कितना परेशान करते हैं यार. बाऊ अक्सर कहा करते थे कि हमारे देश में लोगों की ज़िंदगी का बड़ा हिस्सा समाज के रस्मो-रिवाज से उलझने और आपसी सम्बन्धों को सुलझाने में ‘बरबाद’ हो जाता है. इसीलिए हम इतने पिछड़े हुए हैं. क्या पश्चिमी समाज में लोग प्यार नहीं करते? करते ही हैं. लेकिन दो लोगों के आपसी सम्बन्धों के पचड़े में समाज नहीं पड़ता. पता नहीं क्या होता है और क्या नहीं होता? लेकिन अपने यहाँ दो लोगों की रिलेशनशिप उनकी ज़िंदगी पर कोई असर डाले या न डाले, औरों की बदहजमी का कारण ज़रूर बन जाती है. और उसका असर रिलेशनशिप पर ज़रूर पड़ता है. नतीजा- काम्प्लिकेशन…

मैं आजकल इस बात पर विचार कर रही हूँ कि कोई भी प्रेम-सम्बन्ध (वर्तमान भाषा में ‘रिलेशनशिप’) खत्म कैसे किया जाय? क्या प्रेम खत्म होने के बाद हमें अपने साथी के बारे में ज़रा सा भी नहीं सोचना चाहिए. हो सकता है कि एक तरफ़ से प्रेम खत्म हो गया हो, पर दूसरे का क्या? लेकिन एक के मन से प्रेम खत्म हो जाने पर सिर्फ दूसरे का मन रखने के लिए रिश्ते को निभाते जाना भी ठीक है क्या? हम अक्सर कई जोड़ों को ऐसा करते हुए देखते हैं. क्यों?

दरअसल, हमारे समाज में प्रेम-सम्बन्ध ‘जोड़ना’ जितना बड़ा पाप समझा जाता है, उसे ‘तोड़ना’ उससे भी बड़ा पाप. हमें रिश्तों को ‘निभाने’ के बारे में तो सौ बातें सिखाई जाती हैं, लेकिन उन्हें खत्म करने के बारे में नहीं बताया जाता. और कहीं ये प्रेम-सम्बन्ध है, तब तो जन्म-जन्मांतर का नाता मान लिया जाता है. ‘एक हिंदू लड़की सिर्फ एक बार अपना पति/प्रेमी चुनती है’ ये डायलाग बचपन से फिल्मों के माध्यम से हमारे सब-कांशस दिमाग में इस तरह बिठा दिया जाता है कि हम रिश्ता टूटने की कल्पना से ही कांप उठते हैं. अक्सर टीनेजर्स रिश्ते के टूटने पर अपना आत्मविश्वास खो उठते हैं, और कभी-कभी तो बात आत्महत्या तक पहुँच जाती है.

खैर, मैं ये बात नहीं मानती कि प्रेम-सम्बन्ध जन्म-जन्मांतर के लिए होते हैं. ये दो संवेदनशील व्यक्तियों के अस्तित्व से जुड़ा प्रश्न है, इस पर गंभीरता से विचार करने की ज़रूरत है.

मुझे लगता है कि हमें अपने बच्चों, खासकर टीनेजर्स को इस बात के लिए तैयार करना चाहिए कि अगर रिश्ते बनते हैं, तो खत्म भी होते हैं. हमें रिश्ते निभाने चाहिए, लेकिन सिर्फ ‘निभाने के लिए’ नहीं. अगर प्यार होता है, तो कोई भी किसी रिश्ते को नहीं तोड़ सकता, चाहे वो दोस्ती का रिश्ता हो या प्रेम का या कोई और, लेकिन अगर प्यार नहीं बचा है, तो सिर्फ नाम के लिए रिश्ते निभाने की कोई ज़रूरत नहीं. और न ही ये सोचने की ज़रूरत कि यदि रिश्ता टूट गया, तो हम खत्म हो जायेंगे. दुःख, तो हर रिश्ते के टूटने पर होता है, लेकिन उसे इस हद तक नहीं जाना चाहिए कि इंसान अपनी ज़िंदगी ही दाँव पर लगा दे. कोई भी चीज़ ज़िंदगी से ज़्यादा कीमती नहीं. इस विषय में आपके क्या विचार हैं?Image144c

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10 thoughts on “सम्बन्धों का जुड़ना-टूटना

  1. प्रकृति में गति का सिद्धान्त समझना आवश्यक है। जो सम्बन्ध प्रगाढ़ होते हैं, एक दिन में नहीं बनते हैं। उन्हें बुनने और बनने में बहुत समय लगता है। जब समय अधिक लगता है तो उतार चढ़ाव भी स्वाभाविक है। इन उतार चढ़ावों को बिखराएँ से अलग देखा जाना चाहिये। यदि फिर भी साधे न सधे और विवशता बन जायें तो त्यागना श्रेयस्कर।

  2. दो व्यक्तियों के आपसी रिश्ते तब तक जीवित रहे जब तक वे चाहे .अपनी जिन्दगी के बारे में फैसला लेने का उनका अधिकार है.उनके फैसले का सम्मान समाज को करना चाहिए .

  3. puri tarah se sahamat…phli bat to ye ki koi v rista aap ke vajud se jyada mahtvpurn nhi ho skta.hme ye bat man kr chalna chahiye ki hr riste me ek samay ke bad tharaw aata hai.hamesha ek jaisi gati or josh me koi rista tik hi nhi skta hai es liye sambandho ke utar chadaw ko v samjhna jruri hai.jindgi ko kisi ek insan ke liye khtm kr dena sab se badi murkhta hai……

  4. “life must go on..”
    और अगर कोई रिश्ता इसके आड़े आता है तो ‘आखिरी उपाय’ उसे खत्म करना ही है |

    सादर

  5. आपने रिश्ते के एक ऐसे तार को छेड़ा है..जो बग़ैर ग़मों की सौगात दिए लौटता नहीं…भले ही आप खुद को कितना भी ‘प्रैक्टिकल’ मानकर चलें। बहरहाल..साहिर साहब ने अरसे पहले बड़े ही खूबसूरत अंदाज में आपकी इस उलझन को राह दिखाने की कोशिश की थी…कुछ इस तरह….
    चलो इक बार फिर से, अजनबी बन जाएं हम दोनों
    न मैं तुमसे कोई उम्मीद रखूँ दिलनवाज़ी की
    न तुम मेरी तरफ़ देखो ग़लत अंदाज़ नज़रों से
    न मेरे दिल की धड़कन लड़खड़ाये मेरी बातों से
    न ज़ाहिर हो तुम्हारी कश्म-कश का राज़ नज़रों से
    तुम्हें भी कोई उलझन रोकती है पेशकदमी से
    मुझे भी लोग कहते हैं कि ये जलवे पराए हैं
    मेरे हमराह भी रुसवाइयां हैं मेरे माझी की
    तुम्हारे साथ भी गुज़री हुई रातों के साये हैं
    तार्रुफ़ रोग हो जाये तो उसको भूलना बेहतर
    ताल्लुक बोझ बन जाये तो उसको तोड़ना अच्छा
    वो अफ़साना जिसे अंजाम तक लाना ना हो मुमकिन
    उसे एक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा
    चलो इक बार फिर से, अजनबी बन जाएं हम दोनों..

  6. अपन तो भइया एक्कै बात जानत हैं एक बार जिससे प्रेम किया तो बस किया..। लागी नाहीं छूटे रामा..चाहे जीया जाये।

  7. रिश्ते टूटने का दुःख
    रिश्ते ढोने का दुःख
    किसका पलड़ा भारी है – इस पर सोचना जरुरी है
    समाज के ताने,मन के ताने
    किसे सुनना -समझना है – इस पर सोचना जरुरी है
    खुद को या साथवाले को जिन्दा लाश बनाकर चलने से बेहतर है
    खुद भी साँसें लीजिये
    दूसरे को भी खुली हवा दीजिये !
    ढोते रहने से न रिश्ते सुधर जाते हैं
    और ना ही कोई मेडल मिलता है
    बेहतर है अपना निर्णय स्वयं लें –
    ताकि पछतावा हो तो खुद पर
    मान हो तो खुद पर
    दूसरे तो वक़्त गुजारते हैं लम्बी-लम्बी बातों से

  8. रिश्ते मज़ाक बनते जा रहे हैं। काही तो कोई सच्चा प्यार दम तोड़ रहा है, तो काही लोग “ब्रेक अप कल्चर” के कायल हैं। हम रिश्तों का मर्म ही भूल चुके हैं। मुझे आपके विचार पसंद आए। समाज का दख्ल निजी रिश्तों कम होना चाहिए।

  9. Its Unbelieveably complicated, enagmatic, an eddy.

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