आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

पुस्तक मेला (2015) से लौटकर (१)

बहुत दिनों से खुद को एक अदृश्य खोल में बंद कर रखा था. पता नहीं सभी को ऐसा लगता है या सिर्फ मेरे साथ ऐसा होता है कि कभी-कभी किसी से भी मिलने का मन नहीं होता, बात करने का मन नहीं होता. बस अकेले में खुद के साथ वक्त बिताना अच्छा लगता है- किताबों, फिल्मों, रंग-ब्रश, कैनवस और अपने पालतू पिल्ले के साथ. पता नहीं इंसानों के साथ से क्यों डर लगता है? जाने ये अवसाद का कोई लक्षण है या स्वाभाविक मनःस्थिति, लेकिन लोगों से मिलने-जुलने, घुलने-मिलने में एक संकोच और हिचक का भाव तो हमेशा ही दिल में रहता है.

पुस्तक मेला एक बहुत अच्छा मौका होता है, अपने आभासी दुनिया के दोस्तों से मिलने का. लेकिन जाने क्यों पिछली बार किसी से मिलने का मन ही नहीं हुआ. बस एक दिन जाकर अपने शोध से सम्बन्धित पुस्तकें ले आयी. इतनी तेजी से घूमकर वापस आ गयी कि कहीं कोई टकरा न जाय. जानबूझकर उन स्टालों पर नहीं गयी, जहाँ किसी परिचित के मिल जाने की संभावना थी. जब हम पहले से डरे होते हैं, तो और भी ज़्यादा डर लगता है ठोकरें लगने से. इस बात से डर लगता है कि कहीं ऐसा न हों कि जो व्यक्ति आभासी दुनिया में इतना अच्छा दोस्त है, वास्तविकता में वैसा न हो? मैं ऐसी बातों से बहुत डरती हूँ.

लेकिन, आखिर कब तक खुद को एक दायरे में बाँधकर रखती. तो इस साल अपनी इन सारी आशंकाओं को एक किनारे करके पहुँच ही गयी पुस्तक मेले में और यह मेरे जीवन का यादगार पुस्तक मेला हो गया. वैसे तो इससे पहले भी पुस्तक मेले में अपने ब्लॉगर मित्रों से मिली हूँ, लेकिन ब्लॉगर मित्र तो विचारों से इतने निकट आ जाते हैं कि उनसे वास्तविक दुनिया में मिलना बिल्कुल भी अचंभित नहीं करता. फिर वैसे भी ब्लॉगिंग के मित्र कम से कम चार-पाँच साल से मित्र तो हैं ही. इस बार नया यह रहा कि बहुत से फेसबुक के मित्र भी मिले, जिनसे मेरा परिचय एक साल से भी कम का है.

18 फरवरी को ज्यों हाल न. 12 में पहुँची त्यों आशीष राय जी से मुलाक़ात हो गयी. वैसे हम पहले से तय करके गए थे कि पुस्तक मेले में मिलेंगे. कहाँ मिलेंगे यह तय नहीं था और फोन से तय करना था, लेकिन हिंद युग्म के स्टाल पर पहुँचते ही वे मिल गए. उनसे बात ही कर रही थी कि रंजू भाटिया जी, अंजू जी और सुनीता जी भी आ गयीं. शैलेश भारतवासी जी ने हम सब लोगों की फोटो ली. मुकेश कुमार सिन्हा जी भी मिले. मृदुला शुक्ला जी भी आयीं हिन्दयुग्म के स्टाल पर उन्होंने सबसे पहले मेरे गर्दन दर्द के बारे में पूछा और कहा कि उन्हें भी ये समस्या हो गयी. लगा कि फेसबुक मित्र कितना ध्यान देते हैं हमारे स्वास्थ्य की तरफ 🙂 शैलेश जी, मुकेश जी और अंजू जी से मैं पहले भी मिल चुकी हूँ, लेकिन बाकी सबसे पहली बार मिलना हुआ. आशीष जी से तो खूब गप्पें मारीं. जूनियर होने का फ़ायदा भी उठाया और फूड कोर्ट जाकर चाय-नाश्ता किया 🙂

उसके बाद मैं हिंद युग्म प्रकाशन से दखल प्रकाशन के बीच चक्कर लगाती रही. दखल प्रकाशन पर अशोक भाई और किरण से बातें कीं थोड़ी देर. उसके बाद फेसबुक मित्र तारा शंकर, रिफाह खान, इलाहाबादी मित्र सूचित कपूर और उनकी पत्नी श्रुति से भी मुलाक़ात हुयी. संज्ञा जी से भी भेंट और संक्षिप्त बातचीत हुयी. इन सबसे भी पहली बार ही मिलना हुआ, लेकिन सभी इतनी गर्मजोशी से मिले कि जैसे बरसों से जानते हों.

वापस हिन्दयुग्म के स्टाल पर आयी, तो आशीष जी से बात करने के दौरान ही स्टाल के अंदर से किसी ने ज़ोर-ज़ोर से ‘आराधना-आराधना’ पुकारना शुरू किया. चौंककर उधर देखा तो पूजा और अनु खड़ी थीं. उनके पास पहुँची तो पूजा ने पूछा “पहचाना?” उनका दावा था कि पूरे पुस्तक मेले में उन्हें कोई नहीं पहचान पाया 🙂 मैंने कहा कि “तुम्हें कौन पहचान पायेगा?” आखिर में यह सिद्ध करने के लिए कि मैंने उन्हें पहचान लिया है, मुझे पूजा और अनु का नाम लेना पड़ा 😛 थोड़ी देर हम गपियाये. फिर वो लोग चले गए. पता चला कि किशोर चौधरी भी स्टाल पर आने वाले हैं, तो मैं वहीं बैठकर इंतज़ार करने लगी. इसी बीच आशीष जी चले गए. वहाँ अनिमेष से मुलाक़ात हुयी. शैलेश जी ने कोई परचा पकड़ाया था मुझे जिसमें वास्तु “विज्ञान” लिखा हुआ था. मैंने उस पर आपत्ति की कि वास्तु कोई विज्ञान थोड़े ही है. इसी बात पर अनिमेष से बातचीत होने लगी. बाद में उनसे फेसबुक पर मित्रता हो गयी 🙂 दोस्त ऐसे भी बनते हैं 🙂 किशोर चौधरी आये तो उनसे मिलकर और किताब भेंट लेकर मैं दखल प्रकाशन वापस चली गयी.

दखल प्रकाशन के स्टाल पर फेसबुक मित्र और छोटे भाई आशुतोष मिले, जिन्होंने ‘और लोगों’ को जलाने के ;लिए मेरे साथ एक फोटो ली. वहीं पर फेसबुक मित्र अभिनव सब्यसाची से भी मुलाक़ात हुयी. नीलिमा जी को ब्लॉगिंग के शुरुआती दिनों से ही उनके ब्लॉग ‘चोखेर बाली’ के कारण जानती हूँ, उनसे भी पहली बार वहीं मिली, लेकिन समयाभाव के कारण बात नहीं हुयी. अपनी पुरानी साथी रूपाली दी और उनकी बिटिया से मिलना भी सुखद रहा.

20 फरवरी का पूरा दिन शिखा वार्ष्णेय जी, सोनल और अभिषेक के नाम था. शिखा जी और सोनल से मिलना कई सालों से स्थगित हो जाता है किसी न किसी कारणवश. कभी मेरी तबीयत खराब होती है, कभी कोई आवश्यक कार्य पड़ जाता है. इस बार उनसे मिलना फेसबुक पर तय हुआ. अभिषेक के माध्यम से पता चलता रहा कि वे कहाँ हैं. जब मैं मेला पहुँची तो शिखा जी हॉल न. 12 के लेखक मंच पर अप्रवासी भारतीय साहित्यकारों के कार्यक्रम में लगभग ऊँघ सी रही थीं. अभिषेक ने बताया कि वे बारह बजे से ही आकर एक के बाद एक अप्वाइंटमेंट और कार्यक्रम निपटा रही थीं. सोनल कहीं गयी हुयी थी कि पीछे से आकर उसने मुझे चौंका सा दिया. इसी बीच नीतीश मुझे देखकर आ गया और मुझे लगभग घुमाकर अपनी ओर करके शिकायत करना शुरू किया कि आप मेले में आयीं तो मुझे क्यों नहीं बताया. सच में मैं उसकी इस प्यार भरी शिकायत पर झेंप गयी क्योंकि मैंने उससे वादा किया था कि जब भी बुक फेयर जाऊँगी, उसे बता दूँगी. उसके दोस्तों की मंडली बाहर थी. वो मुझसे मिलने का वादा लेकर चला गया.

कार्यक्रम खत्म होने पर शिखा जी भी नीचे आयीं और गले लगाकर मिलीं. सोनल और शिखा जी से मैं पहली बार मिली, लेकिन इतनी गर्मजोशी से कि जैसे बरसों की बिछड़ी सहेलियाँ हों. वहाँ कोई न कोई शिखा जी को रोककर मिलना चाह रहा था और मैं, सोनल और अभिषेक उनको सेलिब्रिटी कहकर चुटकी ले रहे थे. शिखा जी भीड़ से बचने के लिए हमलोगों को लेकर बाहर फूडकोर्ट के सामने वाले लॉन में गयीं. हमने साथ में छोले-भटूरे खाए. सोनल को मेरे स्वास्थ्य की इतनी चिंता थी कि उसने मुझे पहले एक सेब खाने को दिया, जिससे मेरे पेट पर छोले-भटूरे का दुष्प्रभाव न पड़े 🙂 बहुत करीबी दोस्तों को ही मालूम है कि मुझे पेट-सम्बन्धी समस्या है. सोनल से मैं कभी नहीं मिली, लेकिन उसे ये पता है :). फिर काफी देर तक हम वहीं बैठकर गपियाते रहे. मित्र राकेश कुमार सिंह जी ने आकर खुद अपना परिचय दिया और बहुत ही गर्मजोशी से मिले. मित्रों की सदाशयता कभी-कभी दिल को छू जाती है.

इसी बीच एक और फेसबुक मित्र अभिलाषा, जो कि बिना मिले ही छोटी बहन बन गयी है, मुझसे मिलने वहाँ आ गयी. उसके साथ आशुतोष भी था. थोड़ी देर में शिखा जी अपने अगले कार्यक्रम के लिए चली गयीं. अभिषेक और सोनल भी उनके साथ ही चले गए. बीच में नितीश अपने दोस्तों की मंडली के साथ मुझसे मिलकर चला गया था. उसकी दोस्त शिवा और अनमोल जो कि फेसबुक पर मेरी भी दोस्त है, से भी पहली बार मिलना हुआ. आशुतोष ने हमको खाते हुए देखा तो कुछ खिलाने के लिए कहने लगा. इलाहाबादी जूनियर होने का पूरा फ़ायदा उठाया उसने 🙂

फूडकोर्ट में बैठकर बच्चों (मेरे लिए तो ये बच्चे ही हैं) ने थोड़ा-बहुत खाना खाया और फिर कुछ देर तक बातें करते रहे. अभिलाषा और उसके दोस्त चले गए. आशुतोष का दोस्त अक्षय, जो देखने में बहुत अंतर्मुखी सा लग रहा था, बाद में पता चला कि फेसबुक पर बहुत अच्छे विचार व्यक्त करता है. हम किसी को देखकर कैसे अंदाज़ा लगा सकते हैं कि वह कितना चिंतनशील है? अक्षय को मैंने उसी रात फेसबुक पर मैत्री प्रस्ताव भेजकर मित्र मंडली में सम्मिलित कर लिया 🙂

इसके बाद हम दखल के स्टाल पर गए. किरण और वेरा मुझे रास्ते में मिल गयीं. किरण ने कहा कि कल हमारी कोई फोटो नहीं खींची गयी तो आज एक लेते हैं यादगार के लिए. वेरा ने हमारी फोटो ली. बहुत ही प्रभावशाली व्यक्तित्व है अशोक भाई और किरण की इस बिटिया का. दखल के स्टाल पर पंकज श्रीवास्तव जी मिले. अशोक भाई से मिलकर और एक पुस्तक लेकर मैं शिखा जी और अभिषेक के साथ मेट्रो स्टेशन आ गयी. वहाँ से हम अपने-अपने रास्ते हो लिए.

तो 18 और 20 फरवरी दोनों ही दिन कुछ आभासी मित्र वास्तविक दुनिया में मिले और कुछ अचानक मिले और बाद में आभासी दुनिया के मित्र बने. मित्रों के मिलने और बनने का यह सिलसिला ज़िंदगी भर चलता है, लेकिन यह बहुत ही नया अनुभव है कि आप जिससे कभी भी न मिलें हों और न उनके विचारों से बहुत परिचित हों, वे अचानक से मिलें और इतने अपने से लगें.

क्रमशः

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7 thoughts on “पुस्तक मेला (2015) से लौटकर (१)

  1. ब्लागिंग अभी भी कभी कभार जीवंत लगने लगती है।

  2. आशीष जायसवाल on said:

    आप बहुत ही उम्दा लिखती है आपका लिखा पढ़ते समय एक अलग भावनाओ की दुनिया में चले जाते है उसी अनुसार सोचने लग जाते है मैं आपको काफी दिनों से पढ़ रहे है हमने आपको फेसबुक पर रेक़ुएस्ट भी भेजी है कृपया स्वीकार कर लीजियेगा 🙂

    • आप मुझे मेसेज भेज दीजिए फेसबुक पर. मैं आपको ढूँढ लूँगी. असल में बहुत दिनों से फेसबुक से दूर रहने के कारण बहुत से मैत्री-प्रस्ताव पीछे चले गए हैं.

  3. मेरा जिक्र नहीं किया 😦

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