आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

पुस्तक मेला (2015) से लौटकर (२.)

मैं पहले ही दो दिन पुस्तक मेला घूम आयी थी, इसलिए फिर जाने का कोई इरादा नहीं था. लेकिन बीस फरवरी को जब पुस्तक मेले में थी, तभी अनु का मेसेज आया कि वह कल अपने बच्चों को लेकर आ रही है, मैं आ सकती हूँ क्या? मेरा बहुत दिनों से उसके बच्चों आदित और आद्या से मिलने का मन था, तो मैंने झट से हाँ का मेसेज कर दिया. उसके बाद शाम को फेसबुक पर आशुतोष के यह जिक्र करने पर कि उसने आराधना दी से पैसे लेकर पार्टी दी, उसकी मंडली ने उसको घेर लिया कि हमें भी पार्टी चाहिए. तय हुआ कि नेहा और प्रोमिला जी पार्टी देंगी. मज़े की बात तब तक मैं प्रोमिला जी को जानती तो थी, लेकिन फेसबुक पर दोस्त नहीं थी…🙂

दूसरे दिन पहले तो अनु से मिलना था, फिर नेहा और आशुतोष एंड कम्पनी के साथ पार्टी करनी थी. मेसेज के माध्यम से पता चला कि अनु फूड कोर्ट में है. मैं वहीं पहुँची. अनु ने अपने बच्चों से मेरा परिचय करवाया, फिर हम हॉल न. 12 के अंदर हिंदयुग्म के स्टाल पर आ गए. उसके पहले हमने एकलव्य प्रकाशन के स्टाल पर बच्चों के लिए कुछ किताबें लीं. आदित और आद्या बड़े ही प्यारे बच्चे हैं. अपनी उम्र के और बच्चों से कहीं अधिक समझदार और मम्मा का कहना मानने वाले. हिन्दयुग्म के स्टाल पर कई लोगों से मिलना हुआ. मैंने अनु की कहानी-संग्रह ‘नीला स्कार्फ’ लेकर उससे हस्ताक्षरित करवाई. फिर हमने साथ तस्वीरें खिंचवाई. फेसबुक मित्र सोनारुपा विशाल से भी मिलना हुआ. रमा भारती जी भी बहुत ही गर्मजोशी से मिलीं. वे तब तक फेसबुक पर मेरी मित्र नहीं थीं, लेकिन हम एक-दूसरे को जानते थे.

अनु को अपने घर जाना था, लेकिन चलते-चलते वे सत्यानन्द निरुपम जी से मिलना चाहती थीं, तो हम राजकमल प्रकाशन की ओर बढ़े. वहाँ बहुत अधिक भीड़ थी. पता चला कि रवीश कुमार अपनी पुस्तक “इश्क में शहर होना” पर आटोग्राफ दे रहे हैं. पाठकगण पुस्तक खरीदकर पंक्तिबद्ध होकर अपनी प्रति हस्ताक्षरित करवा रहे थे. यह भी खबर मिली कि थोड़ी देर में जावेद अख्तर भी आने वाले हैं. पहले ही स्टाल पूरा भरा हुआ था और भीड़ देखकर मुझे घबराहट हो रही थी. मैं यह सोच रही थी कि जावेद जी के आने पर क्या लोग डबल स्टोरी बनाकर खड़े होंगे😛 अनु रवीश जी के साथ काम कर चुकी है, इसलिए आद्या और आदित उनको व्यक्तिगत रूप से जानते हैं. आदित ने पूछा “ममा, रवीश अंकल के पास इतनी भीड़ क्यों है?” तो अनु ने जवाब दिया, “बेटा, रवीश अंकल सुपरस्टार हो गए हैं.”🙂

हम वहीं खड़े थे, तब तक विभावरी और प्रियंवद आते हुए दिखे. विभावरी ने बताया कि ‘विश्वस्त सूत्रों से पता चला कि आप पुस्तक मेले आयी हुयी हैं’ विश्वस्त सूत्र फेसबुक पर उपलब्ध होते हैं🙂 एक संक्षिप्त मुलाक़ात के बाद वे वाणी प्रकाशन की ओर बढ़ गए. वे प्रियदर्शन के किसी कार्यक्रम में शिरकत करने जा रहे थे. मैं थोड़ी देर अनु के साथ घूमती रही, फिर उससे विदा लेकर दखल प्रकाशन की ओर बढ़ गयी. इस बीच नेहा से मेसेज पर बात हो रही थी. उससे मैंने कहा था कि हॉल न. 12 में आ जाये. लेकिन आशुतोष के मिलने की पूरी संभावना दखल प्रकाशन के स्टाल पर ही थी. और वही हुआ🙂

दखल प्रकाशन के स्टाल पर एक साथ नेहा, आशुतोष, अदनान, नैयर, रितेश मिश्र और अभिनव सव्यसाँची मिल गए. आशुतोष और नेहा को छोड़कर बाकी सबसे मैं पहली बार मिल रही थी. नेहा के काम के सिलसिले में मैंने उसे अशोक भाई से भी मिलवाया. रितेश इलाहाबादी मित्र हैं और समर की वजह से उनसे फेसबुक पर परिचय हुआ था. आशुतोष ने मुझे सुघोष मिश्र से भी मिलवाया, जो रितेश के अनुज हैं और इलाहाबाद के मेधावी स्कॉलर. वे पूरा एक ट्राली बैग भर किताबें खरीदकर जाने कहाँ ले जा रहे थे🙂

हमलोग वहाँ से ‘पार्टी करने’ बाहर की ओर जा ही रहे थे कि नेहा लेखक मंच की ओर मुड गयी. हमलोग वहीं खड़े होकर उसका इंतज़ार करने लगे. तभी दूर से कोई इशारे करता दिखाई दिया. ध्यान से देखा तो फेसबुक मित्र ‘महाकवि और फोटोग्राफर’ शायक आलोक महोदय खड़े हुए थे. उनका नाम इतने सम्मान से इसलिए ले रही हूँ कि ऐसा नहीं करूँगी तो जनाब बुरा मान जायेंगे🙂 मैं उनके पास पहुँची तो इतनी गर्मजोशी से मिले मानो स्कूल टाइम के ‘चढी-बडी’ हों. साथ में संजय शेफर्ड और रचना आभा भी थे. फिर नेहा भी आ गयी. हमने आपसे में एक-दूसरे का परिचय करवाया और खूब फोटो खिंचाई हुयी.

नेहा फिर कहीं चली गयी. तब तक ब्लॉगर मित्र इंदु सिंह मिल गयीं. उनसे भी मैं दिल से मिलना चाहती थी क्योंकि फेसबुक ने मुझे बताया था कि वे मेरे बचपन के शहर उन्नाव की हैं. इंदु के साथ फेसबुक के युवा साथी सुशील कृष्णेत से भी पहली बार मुलाक़ात हुयी. सुशील से इसके पहले फेसबुक पर कई बार बातें हो चुकी थीं, लेकिन मेरे घर के बिल्कुल पास नेहरु विहार में रहते हुए कभी मुलाकात नहीं हुयी. उनके साथ रमा भारती जी भी थीं. हमने थोड़ी देर बातें कीं. फिर मैं सबसे विदा लेकर आशुतोष, अदनान और नैयर के पास आ गयी, जो बडी देर से भूखे पेट हमारा इंतज़ार कर रहे थे. लेकिन नेहा जी गायब थीं. उनको बुलाया गया. तब तक हम वहीं ज़मीन पर बैठकर पेट में कूद रहे चूहों को शांत करने की कोशिश कर रहे थे और फोटो खींचकर दिल बहला रहे थे😛

वहाँ बैठे-बैठे अनेक महान विभूतियों के दर्शन हुए. महान पत्रकार/संपादक ओम थान्वी जी और महान साहित्यकार/आलोचक नामवर सिंह जी. लेकिन हमलोग इन सबसे बेखबर फोटो खिंचाई  में व्यस्त थे🙂 नेहा आयी तो उसने कहा कि किसी काम से उसे वाणी प्रकाशन जाना है. शायद वर्तिका नंदा की पुस्तक का विमोचन होना था. स्टाल पर पता चला कि विमोचन वहाँ न होकर लाल चौक पर है. तो नेहा ने तय किया कि वह लाल चौक जायेगी, लेकिन हम क्या करते? भूख के मारे बुरा हाल था😛 आखिर नेहा को हमारी हालत पर दया आयी और उसने आशुतोष को खाने-पीने के लिए धन पकड़ाया. हम अकेले खाना तो नहीं चाहते थे, लेकिन भूख के हाथों मजबूर थे😦

फिर हम मतलब मैं, आशुतोष, नैयर, अदनान और अभिनव फूडकोर्ट पहुँचे. बहुत देर विचार-विमर्श करके खाने के लिए मँगवाया गया. प्रोमिला जी तब तक आयी नहीं थीं. आतीं भी तो मिलतीं कैसे क्योंकि किसी के पास एक-दूसरे का फोन नम्बर ही नहीं था. आखिर में, आशुतोष ने ‘विश्वस्त सूत्रों’ से फोन नंबर लेकर उन्हें फोन किया तो पता चला कि वे पुस्तक मेले में ही थीं. तब तक हमलोग मज़ाक कर रहे थे कि खाने वाले हाज़िर और मेजबान गुम🙂 थोड़ी देर में प्रोमिला जी आ गयीं. और उसके बाद नेहा. हम खाते-पीते और बातें करते रहे. थोड़ी देर की मुलाक़ात में ही लग रहा था कि हम वर्षों पुराने मित्र हैं और कई सालों के बाद दोबारा मिल रहे हैं.

खाने-पीने के बाद सबलोग विदा लेकर इधर-उधर हो लिए. मैंने फूडकोर्ट के बाहर के घास के मैदान (अंग्रेजी में लॉन) में महाकवि और फोटोग्राफर शायक आलोक महोदय को अकेले बैठे देखा तो उनसे बातचीत करने के मौके को गँवाना उचित नहीं समझा. मेरे साथ अदनान, नैयर और आशुतोष भी चल दिए. अक्षय भी वहीं बैठे थे. थोड़ी देर बाद अभिनव भी आ गए. फिर थोड़ी देर बाद आशु और अभिनव अपने फेफड़े फूँकने कहीं चले गए और बाकी लोग बैठे रहे. महाकवि शायक हमलोगों से बातें करते हुए एक के बाद एक समकालीन कवियों और साहित्यकारों की ‘खबर’ लेते रहे, जैसा कि वे फेसबुक पर भी करते हैं. उनका कहना है कि वे दिन में एक बार झगड़ न लें, तो उन्हें “जाने कैसा-कैसा” महसूस होता है🙂

महाकवि शायक थोड़ी देर के लिए पेटपूजा करने के लिए गए तो मैंने नैयर से बात की. नैयर ने अपने द्वारा खरीदी हुयी 40 किताबों की फोटो दिखाई, जिनमें हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी की किताबें सम्मिलित थीं. मैंने सोचा कि जनाब किसी साहित्य के विद्यार्थी होंगे, लेकिन पूछने पर पता चला कि वे “अर्थ साइंसेज” में आर.ए. यानि रिसर्च असिस्टेंट हैं. इन्हें कहते हैं असली पाठक🙂 महाकवि खाने-पीने का सामान लेकर लौटे और शिकायत करने लगे कि यहाँ खाना बहुत महँगा है. ये बात तो मैंने भी गौर की है कि प्रगति मैदान में हर जगह खाना ज़रूरत से ज़्यादा महँगा है. उसी समय महाकवि के पीछे कोई पहचाना सा चेहरा दिखा. मैंने महाकवि से पूछा, “उन्हें देख रहे हो. अज़दक वाले प्रमोद जी हैं न?” उन्हें भी ऐसा ही कुछ लगा था लेकिन पूछने की हिम्मत नहीं हो रही थी. वो तो जब उन्होंने सिगरेट सुलगाई, तो तुरंत दिमाग की बत्ती जल गयी क्योंकि मैंने सबसे पहले उनकी ऐसी ही फोटो देखी थी ब्लॉग पर.

मैं झट से उनके पास पहुँची और उन्हें अपना परिचय देकर बात करना शुरू कर दिया. प्रमोद जी कई बार मुझे उनके ब्लॉग पर की गयी टिप्पणी का जवाब दे चुके हैं, लेकिन उन्होंने मुझे पहचाना नहीं. मुझे अपना पूरा परिचय उन्हें देना पड़ा. वे थोड़ी देर तक टीचर की तरह मुझसे सवाल करते रहे और मैं आदर्श विद्यार्थी की तरह जवाब देती रही😦 फिर महाकवि भी आ गए. प्रमोद जी ने झट से उन्हें पहचान लिया. महाकवि से मुझे थोड़ी जलन भी हुयी इस बात को लेकर🙂 प्रमोद जी के पूछने पर ही महाकवि ने वह स्टेटमेंट दिया था कि जब तक वे झगड़ा न करें, उन्हें डिप्रेशन सा फील होता है🙂 और तभी हमें भी यह ज्ञान प्राप्त हुआ. थोड़ी देर बाद प्रत्यक्षा और वंदना राग जी भी आयीं और उनसे हेलो-हाय हुयी.

कुछ घटनाएँ बडी मज़ेदार हुईं पुस्तक मेले में. मैं कभी किसी सम्मलेन/काव्य पाठ/ साहित्य चर्चा आदि में नहीं जाती, इसलिए मुझे लगता था कि कोई मुझे पहचानेगा नहीं. लेकिन नूतन यादव जी मिलीं और झट से उन्होंने मुझे और मैंने उन्हें पहचान लिया. पाँच-सात मिनट बात हुयी उनसे. उन्होंने मुझे बताया कि उनके किसी दोस्त ने कहा है कि ‘मुक्ति आपकी मित्र हैं और नारीवादी हैं, तो आप उनसे क्यों नहीं पूछतीं कि वे लड़कों को “बाबू” कहकर क्यों बुलाती हैं’🙂 मुझे इस बात से यह महसूस हुआ कि लोग कितनी गंभीरता से लेते हैं मेरी बातों को. मैंने नूतन जी से कहा कि मैं बाबू सिर्फ उन लड़कों को कहती हूँ, जिन्हें छोटा भाई मानती हूँ, बाकी सबको नहीं कहती.

दूसरी घटना, जिस दिन शिखा जी से मिली थी, लालित्य ललित जी भी मिले और उन्होंने पूछा “कैसी हो आराधना?” मैंने कहा “मैंने तो सोचा कि आप पहचानेंगे ही नहीं” तो वे बोले “नहीं, मेरी मैगी ड्यू है न आपके यहाँ” एक बार फेसबुक पर ये बात हुयी थी कि वे मेरे घर पर मैगी पार्टी के लिए आयेंगे🙂 ये बात लगभग दो साल पुरानी है, लेकिन उन्हें याद है. तीसरी बात, सुघोष ने मुझे बताया कि उन्हें मेरा उपनाम ‘मुक्ति’ इतना अच्छा लगा कि उन्होंने अपनी किसी परिचित का उपनाम भी मुक्ति रख दिया है.

कुल मिलाकर इस खुशफहमी के साथ कि मुझे बहुत से लोग पढते हैं, पसंद करते हैं और प्यार करते हैं, मैं मेले से लौट आयी. मैं कभी प्रोफाइल देखकर दोस्ती नहीं करती और न दोस्ती होने के बाद हिसाब लगाती हूँ कि अगले से मुझे क्या और कितना फ़ायदा होने वाला है? मेरे इस “इम्प्रैक्टिकल एप्रोच” के कारण मेरे करीबी दोस्त बहुत कम हैं. लेकिन पुस्तक मेले में बहुत से लोगों से मिलकर ऐसा लगा कि नए दोस्त बनाए जा सकते हैं. हम नए-नए लोगों से मिलकर खुद को और समझ पाते हैं, खुद की कमियों को ढूँढ़ पाते हैं और खुद के थोड़ा और करीब आ जाते हैं.

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7 thoughts on “पुस्तक मेला (2015) से लौटकर (२.)

  1. पिंगबैक: पुस्तक मेला से लौटकर (१) | आराधना का ब्लॉग

  2. पिंगबैक: पुस्तक मेला (2015) से लौटकर (१) | आराधना का ब्लॉग

  3. सोच रहा हूँ कि आपका यह आत्मालाप साहित्य की किस कैटेगरी में आएगा

  4. बढ़िया लिखा है। कल की पोस्ट भी अच्छी है।

  5. वर्णन जीवंत लगा। आना-जाना, मिलना-मिलाना, खाना-खिलाना, सुनना-सुनाना, ये दौर चलते रहने चाहिए। जीवन में जीवन बना रहना चाहिए।🙂

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