आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

सुबह की बारिश और आत्मालाप

रात देर से सोई। अनु की कहानियाँ पढ़ रही थी। आख़िरी कहानी पढ़कर रोना आ गया। थोड़ी देर तक कुछ सोचती रही, फिर हल्की झपकी लग गयी। अचानक कुछ आवाजों से नींद खुली। मेरी नींद है ही इतनी कच्ची। ज़रा सी आहट होने पर भाग जाती है। पहले सोचा गोली कोई शरारत कर रही होगी, लेकिन वो अपने बिस्तर पर थी। मैं उठी और जाकर दरवाजा खोल दिया। थर्ड फ्लोर पर रहने का नतीजा है या यहाँ रहते-रहते आठ साल हो जाने से उपजा आत्मविश्वास, कि अब मैं बेखटके रात के किसी भी पहर बाहर बालकनी में निकल आती हूँ।

सुबह के छः बजे थे, लेकिन अभी उजाला नहीं हुआ था। बाहर हल्की-हल्की बारिश हो रही थी। मुझे ये बारिश अच्छी लग रही थी। और भी बहुत से लोग इसका आनंद ले रहे होंगे, लेकिन अगर बारिश तेज हो गयी तो? इन्हीं दिनों ओले भी पड़ जाते हैं, जिनका असर उल्टा होता है। गेहूँ की बालियाँ झड जायेंगी, किसानों का कितना नुक्सान होगा? आम के बौर टूट जायेंगे और आम की फसल खराब हो जायेगी। मैं भी अजीब हूँ। हर घटना के साइड इफेक्ट्स ज़रूर सोचने लग जाती हूँ।

जाने क्या सूझा कि बालकनी से सिर बाहर निकाल दिया। बारिश की बूँदें ‘टप-टप’ सिर पर पड़ने लगीं। कोई होगा मेरे जैसा पागल जो सुबह के छः बजे बालकनी में खड़े होकर ऐसी हरकत करेगा? कम से कम मेरी उम्र की कोई ‘महिला’ तो ऐसा करने के  बारे में नहीं ही सोच सकती। वैसे पागलों की कमी नहीं है दुनिया में। मैंने गली से बाहर पार्क की ओर झाँका कि देखूँ कोई और भी मेरी ही तरह जाग रहा है या नहीं। एक पेड़ की कुछ सूखी डालियाँ दिखीं, मेरी ही तरह पानी में भीगती हुयी। कोने के घर की खिड़की के शेड पर बैठा एक कबूतर पता नहीं क्यों भीग रहा था? पानी से बचने के लिए बहुत सी जगहें हैं। कई बालकनियाँ, जिनमें कपड़े टाँगने के लिए डोर बंधी होती हैं। लेकिन शायद कबूतर भी मेरी ही तरह भीगने के मज़े ले रहा हो या वो सिर छुपाने के लिए खतरा उठाने को तैयार नहीं।

मुझे ये दृश्य बहुत मनभावन लग रहा था। अंदर आकर एक कप चाय बनायी और मोढा लेकर बाहर बालकनी में बैठ गयी। याद नहीं पड़ता कि इससे पहले कब मैं अपने इतने पास थी। अजीब सी बात है न? अक्सर अकेले होते हुए भी हम अपने पास नहीं होते? या कभी-कभी अकेले होने पर हम खुद से ज़्यादा दूर हो जाते हैं। जाने कहाँ-कहाँ मन भटकता रहता है? और कभी भीड़ में भी अपने बहुत पास होते हैं। मुझे रह-रहकर अरविन्द जी का दिया शब्द ‘आत्मालाप’ याद आ रहा था। खुद से ही तो बातें कर रही थी मैं। हममें से जो भी ब्लॉग पर अपने बारे में कुछ लिखता है, आत्मालाप ही तो होता है।

सोचा कि किसी को फोन किया जाय। और अपने सबसे करीबी साथी को फोन किया। अगर आपके पास एक भी ऐसा साथी है, जिससे आप कभी भी फोन करके कुछ भी शेयर कर सकते हैं, तो आप दुनिया के सबसे खुशनसीब इंसान है। थोड़ी देर बातें करने के बाद फोन रख दिया। पर कह नहीं पायी “शुक्रिया दोस्त, मेरी ज़िंदगी में होने के लिए। मुझे हर पल यह एहसास दिलाने के लिए कि डेढ़ करोड़ की आबादी वाले इस शहर में मैं अकेली नहीं हूँ।”

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9 thoughts on “सुबह की बारिश और आत्मालाप

  1. आत्मालाप बढ़िया है लेकिन सर पोछ लो।

  2. डायरी नुमा आत्मलाप बहुत ही अच्छा लगा … सधा हुआ …

  3. Thanks for giving me credit-I am honoured!

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