आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

वो ऐसे ही थे (3)

मेरी और बाऊ की उम्र में लगभग 42-43 साल का अंतर था, यानि लगभग दो पीढ़ी जितना. कहते हैं कि एक पीढ़ी के बाद ‘पीढ़ी अंतराल’ समाप्त हो जाता है. इसीलिये दादा-पोते में ज़्यादा पटती है और शायद इसीलिए हम बच्चों की भी बाऊ से खूब बनती थी. मैं उनके ज़्यादा ही मुँह लगी थी.

वे बेहद मस्तमौला थे, ये तो मैं पहले ही बता चुकी हूँ-बेहद निश्चिन्त, फक्कड़ और दूरदर्शी होते हुए भी वर्तमान में जीने वाले. हमें उन्होंने बचपन से ही तर्क और प्रश्न करना सिखाया था और उनसे सबसे ज़्यादा बहस मैं ही करती थी. उनकी हर बात का विरोध करती थी. उन्होंने भी तो यही किया था 🙂

मुझे लेकर वे बहुत निश्चिन्त रहा करते थे. उनका मानना था कि मेरे अंदर बहुत अधिक जिजीविषा है और मैं सारी परेशानियों को झेलते हुए अपने जीवन में कहीं न कहीं पहुँच जाऊँगी. उन्हें मेरी शादी को लेकर भी कभी चिंता नहीं हुयी. शादी की तो खैर घर में बात ही नहीं होती थी, अगर होती भी तो सिर्फ दीदी की शादी की. बाऊ का मानना था कि मेरे लिए लड़का ढूँढना उनके बस की बात नहीं है 🙂

उनके मस्तमौलापन का एक किस्सा है. बाऊ ने अपनी पेंशन उन्नाव से आजमगढ़ ट्रांसफर कराई थी. कागज़ डाक में कहीं खो गया और उन्हें पूरा एक साल लग गया नया कागज़ बनवाने में. उस अवधि में बाऊ को पेंशन नहीं मिल रही थी और हम बहुत ज़बरदस्त आर्थिक संकट में पड़ गए. दीदी की शादी के बाद मैं अकेली पड़ गयी थी और ऊपर से यह मसला. इसके चलते मैं डिप्रेशन में आ गई. कई-कई बार आत्महत्या करने का मन होता था. बटाई पर मिला गेहूँ रखने के लिए घर में सल्फास की गोलियाँ रखी हुयी थीं. दो-तीन बार मैं सल्फास की गोलियों के डब्बे के पास पहुंचकर रुक गयी.

एक दिन मैंने बाऊ से पूछा ‘बाऊ, सल्फास की कितनी गोलियाँ खा लेने पर तुरन्त मौत हो जायेगी. उन्होंने अखबार से मुँह हटाये बगैर कहा “बड़ों के लिए 5-6 गोलियाँ काफी हैं. छोटे 3-4 में ही निपट जाते हैं. तुम चाहो तो दसों एक साथ खा लो, जिससे कहीं कोई कमी न रह जाए” मैं बाऊ का जवाब सुनकर गुस्से में आ गई. सोचा था कुछ सहानुभूति मिलेगी और यहाँ ये ऐसे बातें कर रहे थे, जैसे ‘आत्महत्या विज्ञान’ में डिप्लोमा करके बैठे हों. उसके बाद बाऊ ने कहा “वैसे एक बात याद रखो. सल्फास खाकर मारना बड़ा कष्टकर होता है. कितने लोग तो सल्फास की गोलियाँ खाते ही ‘बचाओ-बचाओ’ चिल्लाने लगते हैं. जहाँ-जहाँ से गोलियाँ जाती हैं, अंग गल जाता है. तुम ऐसा करो, फाँसी लगा लो.” मैंने उनकी बाद की बात ठीक से सुनी ही नहीं. मुझे तो सिर्फ सल्फास खाने के साइड  इफेक्ट सुनाई दे रहे थे. भला कोई अपने बच्चों से ऐसे बात करता है 🙂

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12 thoughts on “वो ऐसे ही थे (3)

  1. हा हा ठीक जवाब-एक तो आर्थिक बोझ का तनाव और सबसे लायक बेटी बेवकूफी की बात करें

  2. एक सास को ही बहू के द्वारा किसी दवा के खाने के बाद अस्‍पताल में भर्ती
    करवाते वक्‍त ऐसा कहते सुना था …. तुम्‍हें मरना ही था तो मुझे बताती ….
    ऐसी गोलियां देती कि बीच में अस्‍पताल नहीं आता …… शनि के प्रभाव से
    16-17-18 वें वर्ष में अक्‍सर बच्‍चों के मन में उलूल जुलूल बातें आती हैं …
    इसलिए तो टीन एजर बच्‍चों की संगति , उनके व्‍यवहार पर ध्‍यान रखा जाता है
    ….

  3. मस्त यार ! मेरे घर में भईया और बाबूजी FCI में थे। गाँव पर अनाज के लिए सल्फास भेजने की गरज से घर पर अक्सर आता था सल्फास आ जाता था। उसके प्रताप की चर्चा अक्सर घर में होती ही रहती थी। हमने भी एक बार इसी प्रकार का प्रश्न sympathy पाने को कर दिया था। कुछ इसी प्रकार का उत्तर हमे भी भईया से मिला।

    तब से सुसाइड को तो सोचा मगर सल्फास खाने को नहीं सोचा।

  4. अपने इलाके के किसी बच्चे की स्मृतियों से सल्फास खारिज नहीं है, हो ही नहीं सकता।

  5. आराधना जी, वैसे आजमगढ़ के लोग परेशानियों से मरने वाले तो नहीं बल्कि परेशानियों को मारने वाले होते है। लेकिन आप ????

    • ये जब की बात है, तब उम्र बहुत कम थी और मुश्किलें बहुत ज़्यादा. फिर भी हार कहाँ मानी. रही बात सुसाइडल होने की, वो तो हर इंसान उम्र के किसी न किसी मोड़ पर होता है. ज़रूरत है उससे लड़कर आगे बढ़ने की.
      आज इन्हीं सब मुश्किलों से लड़ते हुए तो डटी हूँ दिल्ली में नौ साल से बिना किसी सहारे, किसी फैनेंसिअल सपोर्ट के, सिर्फ और सिर्फ अपने दम पर.

  6. wow! weldon brilliant struggler
    ज़रूरत है उससे (मुश्किलों से) लड़कर आगे बढ़ने की.

  7. पहले भी पढ चुके हैं यह संस्मरण तुम्हारी किसी पोस्ट में। 🙂

  8. ऐसा लगता है कि किशोरावस्था का अवसाद अनुमान से कहीं अधिक विस्तृत है। सलफ़ास की गोली की खबरें खूब पढ़ी हैं, एक कहानी में ज़िक्र (मात्र) भी किया है लेकिन इन ज़हरीली गोलियों की सुलभता का अनुमान पहली बार लगा। बेशक, बाऊ अपनी बेटी को अच्छी तरह जानते होंगे फिर भी यह सोचकर ही आशंका होती है कि ऐसी खतरनाक परिस्थिति में यदि पिता के आकलन में बाल भर सी भी चूक हो जाये तो? फिर यह भी लगा कि अवसाद की परिस्थिति जब बनती है तो उसकी छाया शायद कमो-बेश सारे परिवार पर ही पड़ती होगी। खैर, कठिन वक्त भी बीत ही जाते हैं और बाद में एक रोचक संस्मरण में बादल जाते हैं।

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