आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

शोकगीत

तुमने मेरा साथ तब दिया, जब एक-एक करके सबने छोड़ दिया था. या तो दूसरी दुनिया में चले गए या इसी दुनिया में अपनी अलग दुनिया बना ली. तुम साथ रहीं तब, जबकि मैंने खुद को एक खोल में बंद कर लिया था, एक ऐसे टापू पर कैद हो गयी, जहाँ जाने के लिए न कोई नौका थी न पुल…तब तुम ही थीं मेरी साथी सिर्फ तुम.

तुमने मुझे हँसाया, रुलाया, गुदगुदाया, बहलाया. दिन भर चौबीस घंटे जब भी चाहा मैंने तुम मेरे सामने हाज़िर रहीं, मेरे पास…तुमने कभी शिकायत नहीं की, न ही किया तंग बस एक बार को छोड़कर जब एक शरारती बच्चे ने तुमको छेड़कर नाराज़ कर दिया था…थोड़ी तबीयत नासाज़ हुयी तुम्हारी…लेकिन बस एक बार.

मैंने भी तो कितना प्यार किया तुमसे. जबकि सबने कहा कि छोड़ दो इसे…आगे बढ़ो, देखो दुनिया कहाँ से कहाँ चली गयी और तुम अभी इस पुरानी सी चीज़ से चिपकी हुयी हो. पर कैसे छोड़ देती तुम्हें मैं? आदत ही नहीं मेरी इस्तेमाल करके फेंक देने की, न चीज़ों को, न लोगों को, न रिश्तों को…

तुम साथी थीं मेरे अकेलेपन की. याद है मुझे बाऊ के देहांत के बाद चिपकी रहती थी मैं तुमसे रात-दिन और तुम बाँट लेती मेरे दुःख किसी पुरानी सहेली सी. कितनी ही पुरानी यादों, फिल्मों, फ़िल्मी गीतों को साथ-साथ गाया गुनगुनाया हमने…जबकि बह रहे होते थे आँसू, अचानक से आ जाती मुस्कान तुम पे कोई कॉमेडी फिल्म या सीरियल देखकर.

मैंने कई बार औरों से कहा पर तुमसे नहीं. आज कह रही हूँ मेरी प्यारी चौदह इंची की बुश टीवी! मुझे तुमसे बहुत प्यार है. इतना कि मैं बता नहीं सकती शब्दों में उसे. लोग कहते हैं कि चीजों से इस तरह प्यार करना मनोरोग है. पर क्या करूँ मैं मुझे तो घर के दरवाजों, बालकनी और दीवारों से प्यार है. इस शहर की गलियों, सड़कों, इमारतों और मीनारों से प्यार है और प्यार है हर उस शहर से जहाँ रही हूँ मैं. हर उस चीज़ से, जो मेरे साथ रही.

तुमसे प्यार है क्योंकि तुम मेरी कमाई से खरीदी हुयी पहली “उपभोक्ता वस्तु” हो. लेकिन मैंने कभी तुम्हें वस्तु नहीं माना और न उपभोग की चीज़. मेरे लिए हमेशा ही तुम मेरी सहेली रहीं…तुम ज़रूरत थीं मेरी, मगर मैंने तुम्हें अपनी ज़रूरत भी नहीं माना…माना केवल एक साथी.

जानती हूँ हर चीज़ नहीं होती हमेशा के लिए. संसार क्षण भंगुर है, लोग भी और चीज़ें भी. जैसे एक-एक करके अम्मा-बाऊ, चाचा, मेरे सर, मेरी प्यारी सहेली इस दुनिया से चले गए, तुम भी छोड़ गयीं साथ मेरा. और देखो तो मेरी प्यारी सखी, मैं तुमसे यह भी नहीं कह सकती कि दूसरी दुनिया में खुश रहना क्योंकि चीजों के लिए दूसरी दुनिया होती ही कहाँ है? क्योंकि उनकी आत्मा नहीं होती. वे तो कल-पुर्जों को जोड़कर बनाई गयी मशीन होती है. पर सोचती हूँ क्या इंसान के पास होती है आत्मा-वात्मा जैसी कोई चीज़ या वह भी कल-पुर्जों का गट्ठर मात्र होता है और याद करती हूँ चार्वाक को.

बीते साढ़े नौ सालों से साथ देने वाली तुम जब कुछ दिन बीमार रहकर चल बसीं, तो समझ में नहीं आया कि क्या करूँ तुम्हारा? दफना नहीं सकती क्योंकि टीवियों का कोई कब्रिस्तान भी तो नहीं होता. नहीं तो अंतिम संस्कार कर एक बड़े पत्थर पर तस्वीर लगाती तुम्हारी फ्रेम करके. जला भी तो नहीं सकती कि तुम ज़हरीली गैस छोड़ोगी और मुझे पसंद नहीं आएगा कि मेरी प्यारी टीवी को कोई प्रदूषण कारक समझे. कबाड़ में भी नहीं दे सकती तुमको. अब तुम ही कहो क्या करूँ?

चाहती नहीं तुम्हें खुद से दूर करना, पर करना पड़ता है. छोड़कर लोगों को, शहरों को, चीज़ों को आगे तो बढ़ना पड़ता है. तो मैं भी बढ़ गयी मेरी प्यारी टीवी और तुम्हारा काम सौंप दिया है किसी और को. लेकिन मुझे अब कोई दुःख नहीं क्योंकि तुम दुखी नहीं हो. तुम तो मर चुकी हो. WP_20150410_13_17_18_Pro

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3 thoughts on “शोकगीत

  1. जिस चीज से हमें लगाव होता है उसके दूर होने का दुःख एक संवेदनशील इंसान ही समझ सकता है … टीवी से अपनेपन से भरी संवेदनशील लेख ..

  2. बहुत अच्छा शोकगीत, मेरे भी कुछ ऐसे आर्टिकल लिखे हैं जो शायद पसंद आये तो कृपया मेरे http://www.gyanipandit.com पर आये
    धन्यवाद

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