आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

साइकिल वाली लड़की

साइकिल चलाये ज़माना बीत गया. अब सोचते हैं कि चला कि पायेंगे या नहीं? पता नहीं. लेकिन फिर से एक बार साइकिल पर बैठकर दूर-दराज के गाँवों में निकल जाने का मन करता है, जैसे बचपन में करते थे. बाऊ  के ड्यूटी से वापस लौटते ही मेरे और भाई के बीच होड़ लग जाती थी कि पहले कब्ज़ा कौन जमाता है साइकिल पर. भाई लम्बाई में मात खा जाता था मुझसे. एक साल छोटा था तो लम्बाई भी उतनी ही कम थी. वैसे भी लड़कियाँ जल्दी लंबी हो जाती हैं. उसे साइकिल सीखनी होती थी और मुझे चलानी होती थी. अपनी लम्बाई के चलते वो चढ़ नहीं पाता था और मैं साइकिल पाते ही ये जा और वो जा🙂

ये जो आलिया भट्ट हैं न, आज स्कूटी पे बैठकर पूछती हैं “Why should boys have all the fun?” हम आज से चौबीस-पच्चीस साल पहले कहते थे, साइकिल पे बैठकर. स्कूटी तो हम निम्न-मध्यमवर्गीय परिवार के बच्चों के लिए तब भी एक सपना था और अब भी सपना ही है. जो थी, वो हमारी साइकिल और उससे जुड़े हमारे सुख-दुःख. साइकिल मिलते ही मानो पंख मिल जाते थे. घुमक्कड़ और आवारा मन, शरीर को अपने काबू में ले लेता था और फिर जहाँ-जहाँ मन कहे, वहाँ-वहाँ हम.एक अद्भुत आज़ादी का अनुभव.

लड़कों से साइकिल रेस लगाते थे. रेलवे कॉलोनी से मीलों दूर के गाँव चले जाते थे. कभी-कभी टक्कर मारकर किसी बदमाश लड़के को गिराकर सबक सिखा देते थे और कभी खुद ही गिर जाते थे. कई बार ऐसे ही गिरे तो घुटने छिल जाते थे बुरी तरह से. भलभल खून बहने लगता. हमें लगता कि अब तो हुयी अम्मा के हाथों कुटाई गुड्डू तुम्हारी. फिर तय करते कि जब तक खून बंद नहीं होगा घर ही नहीं जायेंगे. हैंडपंप पे जाकर चोट धोते. उसमें गड़ी हुयी एक-एक रोड़ी निकालते. घाव को ठीक से साफ़ करते और फूँक-फूँककर सुखाते. दर्द तो खूब होता, लेकिन वो अम्मा की कुटाई और डाँट से कम दर्दीला दर्द था🙂

घर जाते तो बेहद दर्द के बावजूद लंगड़ाकर नहीं चलते थे. धीरे-धीरे सीधा चलने की कोशिश करते. मालूम था हमको कि अम्मा को पता चला तो फिर वही उपदेश शुरू कर देंगी और साईकिल न चलाने के लिए दस-दस कारण गिनवायेंगी. “कहते हैं तुमसे कि अभी पैडल तक पूरा पैर नहीं पहुँचता है, इतनी ऊँची साइकिल मत चलाओ,”  “यहाँ के लड़के बहुत उजड्ड हैं. उनमें से किसी ने टक्कर मारी होगी. कहते हैं कि इन लड़कों के साथ साइकिल मत चलाओ,” “ज़मीन अच्छी नहीं है यहाँ की. रेह और रोड़ी भरी पड़ी है मिट्टी में. ऐसी मिट्टी में साईकिल मत चलाओ” वगैरह-वगैरह. मेरे साइकिल चलाने से मेरे गिरने को जोड़कर वो अपनी बात सिद्ध कर देंगी कि हमें किन-किन कारणों से साइकिल नहीं चलानी चाहिए.शुक्र है कि चोट लगने पर “लड़की हो, लड़की की तरह रहा करो” नहीं सुनने को मिलता. नहीं तो ये तो उनका फेवरेट डायलॉग था🙂

हम चुपचाप धीरे से डिटॉल की शीशी उठाते थे और टायलेट में घुस जाते था. पता था कि अम्मा की नज़र पड़े न पड़े, दीदी की ज़रूर पड़ जायेगी. तो सयाने हम अपने चोट को डिटॉल से अच्छी तरह धोकर-सुखाकर शीशी वापस उसकी जगह पर रख देते थे और किसी को कानोंकान खबर तक नहीं होती.

रात के समय दर्द उभरता. सोते समय पैर छूता चारपाई की पाटी से और मुँह से हल्की सी चीख निकल जाती. अम्मा लोग के तो जैसे चार कान होते हैं. बच्चों की चुन्नी सी भी आवाज़ सुनायी पड़ जाती  है. पूछतीं “का हुआ रे.” कुछ नहीं अम्मा कहते-कहते गला भर आता था. अम्मा को तुरंत शक हो जाता था. उठतीं और टॉर्च जलाकर देखतीं फ्रॉक़ थोड़ी ऊपर उठ जाने से घुटने की चोट दिख जाती थी, जिसमें पाटी से दुखकर खून रिस आया होता था. अम्मा बोलीं “ये चोट कैसे लगी रे?” “गिर गए थे” हम भर्राई आवाज़ में रुलाई रोकते-रोकते कहते. “साइकिल से गिर गए थे बोल” मैं हाँ में सर हिलाती और सर झुकाकर, आँख बंद करके उनकी मार का इंतज़ार करने लगती थी. लेकिन अम्मा तो अम्मा होती है. पट्टी ले आती थीं. अक्सर दिन की चोट पर अम्मा रात में पट्टी बाँधती. ये बात अलग है कि सबलोग सो रहे होते इसलिए चिल्लाकर तो नहीं, धीरे-धीरे बड़बड़ाती जातीं. वही बातें, जो ऊपर लिखी हैं🙂

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12 thoughts on “साइकिल वाली लड़की

  1. मुझे मेरी साईकिल याद दिला दी ….

  2. साइकिल खूब चलाई है। साइकिल मतलब आजादी दूर तक जाने की।

  3. अन्तर सोहिल on said:

    खूबसूरत संस्मरण

  4. बाइसिकल से जुड़ी जाने कितनी यादें ताज़ा करदी तुमने. ठीक तुम्हारी तरह ही चलते थे साइकल. आगे डंडे पे योगिता बैठती थी और पीछे कॅरियर पे भाई खड़ा होता था. फिर एक साल कभी रिंकी तो कभी मैं साइकल के डंडे पे बैठ कर स्कूल से घर आते रहे.
    फिर एक लंबा अरसा साइकल चलाने का मौका नहीं मिला. कुछ साल पहले यहाँ एक साइकल खरीदी थी खूब चलाने का आनंद लेते थे एक दिन जाने कहाँ खड़ी कर घर पैदल लौट आए अगले दिन गये लेने तो गायब हो चुकी थी. तब से पैदल ही हैं.
    Peace,
    Desi Girl

  5. घुमक्कड़ी में दोनो ने तय किया कि चलो साइकिल चलाना सीखते हैं। मुन्ना अपने बाबा की साइकिल ले आता और दोनो राजमंदिर से गायघाट की ओर जाने वाली चौड़ी गली में, जो दिन के समय प्रायः सुनसान रहती, साइकिल चलाना सीखते। मुन्ना बड़ा था इसलिए जल्दी ही चलाना सीख लिया लेकिन आनंद धीरे-धीरे सीखने का प्रयास कर रहा था। वह आनंद को साइकिल में बिठाकर घुमाने लगा। धीरे-धीरे हिम्मत बढ़ी और दोनो टाउनहॉल के मैदान, कंपनी गार्डेन में जाकर साइकिल चलाने लगे। एक दिन कंपनी गार्डेन में वह आनंद को आगे बिठाकर साइकिल चला रहा था। दिन ढल रहा था। वृक्षों की परछाइयाँ लम्बी हो चली थीं। अपनी धुन में मस्त दोनो मित्र साइकिल की सवारी में व्यस्त थे। एक स्थान पर लोहे के कंटीले तार से मार्ग अवरूद्ध था। कम रोशनी में मुन्ना को कुछ दिखाई न दिया और साइकिल कंटीले तार के ऊपर ही चढ़ा दिया ! आगे बैठे होने के कारण साइकिल से पहले आनंद की गरदन तार में फंस चुकी थी। लोहे के कांटे गरदन में धंस चुके थे ! दोनों उलझ कर वहीं गिर गए। जब तक आनंद संभल कर खड़ा होता मुन्ना ने देखा कि आनंद की शर्ट खून से लाल हुई जाती है ! वह मारे डर के चीखने-चिल्लाने और फुग्गा फाड़कर रोने लगा। आनंद, जिसके गले की नस कट चुकी थी, इस बात से अचंभित था कि मुन्ना क्यों रो रहा है ! आनंद को अभी तक दर्द का एहसास नहीं हुआ था मगर दूसरे ही पल, मुन्ना के इशारे से या दर्द के एहसास ने उसे यह बता दिया कि माज़रा क्या है ! चोट किसे लगी है !! खून किसे बह रहा है !!! और मुन्ना क्यों चीख रहा है !!!!
    http://aanand-ki-yadein.blogspot.in/2010/10/15.html से।

  6. हम इस बार अंडमान गए थे तो वहाँ रेंट पर साइकिल लेकर चलायी…. सालों बीत गए थे, पहले पैडल में लड़खड़ाए लेकिन चला ली…. फिए अगले दिन अपनी टांगें पकड़ के बैठे रहे…..😉

  7. पढ़कर लगा जैसे मेरी खोई सायकिल मिल गयी और मैं उस पर सवार हूँ
    बहुत सुन्दर

  8. yeh dekh kar tumhari yaad aayi.

    Azaadi ke saath laad di jati hain zimmedariya lao bhaji tarkari, ladke mar jo dete hain dandi

    http://www.ndtv.com/video/player/prime-time/prime-time-not-mine-nor-ours-it-is-the-bihar-of-girls/386736

    Peace,
    DG

  9. Ya Dr. Aradhana, sorry to put here this message.
    We are started a movement to establish a University in Azamgarh district of Uttar Pradesh. (for cause you may visit on the petition ) For this, we are requesting to all, please give your valuable support to this mission. Please do online signature on the petition. Link is

    http://www.change.org/university

    thank for your kind co-operation
    have a good day

  10. बचपन की याद दिला दी इस पोस्ट ने … बहुत साईकिल चलायी है और चोट भी खूब खायी है🙂

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