आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

उठो, आगे बढ़ो कि रुकना ख़त्म हो जाना है

ज़िंदगी में सब कुछ वैसा कभी नहीं हो सकता जैसा हमने सोचा होता है. कभी-कभी थोड़ा-बहुत वैसा होता है और कभी बिलकुल नहीं. मैंने बचपन से ही शादी के बारे में कभी नहीं सोचा और न अपने राजकुमार के बारे में कोई सपने देखे, लेकिन फिर भी यह तो कभी न कभी सोचा ही कि कोई ऐसा होगा जिसके लिए मैं ज़िंदगी में सबसे ज्यादा प्रिय होऊँगी… ऐसा कोई राजकुमार जो सफ़ेद घोड़े पर चढ़कर आएगा…नहीं सोचा था, लेकिन हुआ.. एक राजकुमार आया मेरी ज़िंदगी में. सफ़ेद घोड़े पर सवार. उसमें वो सारी खूबियाँ थीं जो एक लड़की अपने प्रेमी में चाहती है. संवेदनशील, खूब प्यार करने वाला, देखभाल करने वाला, मेरी भावनाओं को समझने वाला, मुझसे पहले ही मेरी परेशानियां जान जाने वाला, मेरे दुःख में मुझसे ज्यादा दुःखी और खुशी में मुझसे कहीं अधिक खुश होने वाला, मेरी तरक्की को अपनी तरक्की मानने वाला और सबसे बढ़कर मेरा बहुत सम्मान करने वाला…

लेकिन… कहीं कुछ तो गलत था. शायद वही कि सब कुछ वैसा नहीं होता जैसा हम चाहते हैं और जब जैसा हम चाहते हैं, वैसा होता है, तो वो हमारी ज़िंदगी में नहीं होता या बहुत कम समय के लिए होता है. मेरे राजकुमार के साथ भी यही था. वो घोड़े पर बैठकर आया था. पता नहीं कैसे उसका घोड़ा मेरे घर के पास रुक गया. वो वापस जाना चाहता था, तब तो घोड़ा टस से मस नहीं हुआ, लेकिन जब उसने रुकना चाहा तो घोड़ा चल पड़ा और ऐसा चला कि रुका ही नहीं. मैं अपने राजकुमार का साथ चाहती थी. वो भी हाथ बढ़ाकर मेरा हाथ पकड़ना चाहता था लेकिन रुकना उसके बस में नहीं था. मेरा घोड़ा हमेशा से मेरे बस में है. उसे बड़ी जतन से ट्रेंड किया है मैंने. उसकी लगाम पर मेरी पकड़ मजबूत है और उसकी वजह हमारे बीच अच्छी समझ. मेरा घोड़ा जिद्दी, लेकिन मेरी बात मानने वाला है. लेकिन वह बेचारा भी क्या करता. जब उसके पास पहुँचता वो और आगे निकल जाता.

आखिर मैंने तय कर लिया कि मैं अपनी राह चलूंगी. पीछा नहीं करूंगी. तब से हमदोनों ही अपने-अपने रास्ते दौड़ रहे हैं. हम एक-दूसरे को देख सकते हैं. बातें कर सकते हैं, लेकिन साथ नहीं हो सकते. वो दौड़ रहा है इस आस में कि कभी न कभी उसका घोड़ा रुक जाएगा, फिर वहीं कहीं हम रात्रि विश्राम के लिए शिविर लगा लेंगे. और मैं दौड़ रही हूँ बिना किसी आस कि मुझे बस दौड़ना है. मुझे नहीं पता कि आगे क्या होने वाला है. क्या कभी ज़िंदगी की ये दौड़ ख़त्म होगी? क्या कहीं कोई मंजिल भी होती है? क्या खानाबदोशों सी इस ज़िंदगी में कोई पड़ाव भी आता है? मुझे नहीं मालूम. न मैं मालूम करना चाहती हूँ.

मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मेरे बगल में कौन दौड़ रहा है? दौड़ते-दौड़ते मैं अगर गिर गयी तो कोई उठाने वाला भी होगा या नहीं? मैं तो बस तेज चलती हवाओं की सरसराहट को अपने कानों के पास से गुजरते महसूस करना चाहती हूँ, सफ़र की थकान को बारिश की बूंदों में धोकर बहा देना चाहती हूँ, खिलती धूप की तपिश से अन्दर की तपिश को जलाकर राख कर देना चाहती हूँ. मैं चल रही हूँ लेकिन किसी मंजिल की तलाश में नहीं. इसलिए चल रही हूँ कि रुकना ख़त्म हो जाना है. जब उदास होकर बैठती हूँ तो भवानी प्रसाद मिश्र की यह कविता पढ़ लेती हूँ.

बुरी बात है
चुप मसान में बैठे-बैठे
दुःख सोचना, दर्द सोचना !
शक्तिहीन कमज़ोर तुच्छ को
हाज़िर नाज़िर रखकर
सपने बुरे देखना !
टूटी हुई बीन को लिपटाकर छाती से
राग उदासी के अलापना !

बुरी बात है !
उठो, पांव रक्खो रकाब पर
जंगल-जंगल नद्दी-नाले कूद-फांद कर
धरती रौंदो !
जैसे भादों की रातों में बिजली कौंधे,
ऐसे कौंधो ।

ओह, मैं तो अपने राजकुमार को भूल ही गयी… बात तो वहीं से शुरू हुयी थी ना?

छोड़ो 🙂

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5 thoughts on “उठो, आगे बढ़ो कि रुकना ख़त्म हो जाना है

  1. चरैवेति चरैवेति

  2. भावपूर्ण प्रस्तुति.बहुत शानदार भावसंयोजन .आपको बधाई

  3. जब भी आराधना अपनी निजी ज़िन्दगी के बारे में लिखती हैं तो वो मन को भाता हैं! एक सहजता का अनुभव होता हैं. खैर इतने दिनो के बाद कुछ तो तुम्हारी तरफ से पढने को मिला.

  4. सच रुकने का मतलब जिंदगी ख़त्म .. चलना ही जिंदगी हैं ……मन के अंतर्द्वंद के बीच भवानी प्रसाद मिश्र जी की कविता बिंदास जीने का सलीका दे रहा है

    ..

  5. हम साहसी हैं क्योंकि हम दर्द सह सकते हैं…हम उदास है..क्योंकि संवेदना की लहरें हमें भिगो देती हैं…हम चलने की जिद करते हैं..क्योंकि हमें हारना गंवारा नहीं.. हम आंसू को दर्शन में बदल सकते हैं…क्योंकि हम मनुष्य हैं..और यही मनुष्य होने की सार्थकता है…। ईश्वर करे…एक दिन नील सरोवर के उस पार दोनों घोड़े फिर साथ खड़े हों..हरी दूब की चादर में..उड़ते बादलों के बीच..। आमीन ।

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