आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

चाइनीज़ खाने का स्वाद, ग्लूटामेट और मैगी विवाद

लगभग एक साल पहले हम तीन लडकियाँ (वैसे आप महिलायें भी कह सकते हैं 😀 ) अपने एक मित्र को देखकर हिन्दू राव अस्पताल से लौट रहे थे. मित्र तेज बुखार के चलते दो दिन से अस्पताल में भर्ती थे. बाकी दोनों लडकियों को जी.टी.बी. नगर स्टेशन से मेट्रो पकड़नी थी और मुझे ऑटो. इसलिए हमलोग कैम्प तक साथ आये. वहां पहुँचते-पहुँचते शाम के सात बज चुके थे और संयोग से हम तीनों ही अकेले रहने वाली हैं तो हमने सोचा कि घर जाकर बनाने से अच्छा बाहर खाकर चलते हैं.
तय किया गया कि चाइनीज़/मंचूरियन खाया जाय. हम एक रेस्टोरेंट में घुस गए और चाइनीज़ फ्राइड राईस और मंचूरियन के साथ स्वीट कॉर्न सूप का ऑर्डर दिया. सूप काफी गाढ़ा था. आमतौर पर मुझे गाढ़ा सूप पसंद नहीं है, लेकिन जब चखा तो जैसे आत्मा तृप्त हो गयी. इतना टेस्टी सूप मैंने पहले कभी नहीं पिया. खाना खाकर और हमेशा की तरह बचा हुआ खाना पैक करवाकर हम वहां से निकले. एक ने तो मेट्रो पकड़ ली और दूसरी जो मेरी बचपन की सहेली है, मेरे साथ मेरे घर आ गयी. देर रात तक हमने चाय पी-पीकर खूब गप्पें मारीं. रात में खाना बनाने से छुट्टी हो तो कितना हल्का-हल्का सा महसूस होता है ये वही जान सकता है जिसे रोज़ सुबह से ही रात के खाने के बारे में सोचना शुरू कर देना पड़ता है.
दूसरे दिन जब मैं सोकर उठी तो चेहरा बहुत भारी-भारी सा लग रहा था और आँखें पूरी नहीं खुल रही थीं. शीशे में देखा तो चौंक गयी. पूरा चेहरा सूजा हुआ था और आँखें छोटी हो गयी थीं. वैसे ये समस्या मेरे लिए नई नहीं है. एलर्जिक शरीर होने के नाते कभी-कभी ऐसा हो जाता है. अक्सर पीरियड्स के आसपास भी चेहरे में सूजन आ जाती है लेकिन इतना भारीपन नहीं होता. सिर अजीब ढंग से दुःख रहा था और नींद सी आ रही थी. हालांकि सहेली को मेरा चेहरा ज्यादा सूजा नहीं लग रहा था, लेकिन मुझे महसूस हो रहा था. खैर, मैंने सोचा की अभी सोकर उठी हूँ. थोड़ी देर में ठीक हो जाएगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ.
सहेली दोपहर तक चली गयी. मेरा चेहरे की सूजन और सिर दर्द शाम तक नहीं ठीक हुआ, तो मुझे थोड़ी चिंता हुई. मैंने नेट ऑन करके swollen face गूगल करना शुरू किया. उसमें मुझे जो जानकारी मिली, उसे पढ़कर मैं चौंक गयी. मैंने chinese restaurant syndrome के बारे में पढ़ा. यह एक समस्या है, जो कि माना जाता है कि Monosodium glutamate (MSG)  (लोकप्रिय नाम अजीनोमोटो) नामक तत्व के कारण होती है. मोनोसोडियम ग्लूटामेट सूप और नूडल्स जैसे खानों में अच्छे स्वाद के लिए मिलाया जाता है. हालांकि अभी इस पर पूरी तरह शोध नहीं हुआ है और यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि उक्त समस्या का कारण MSG ही है. आश्चर्य तो मुझे हो रहा था लेकिन साथ ही हंसी आ रही थी कि कहीं ये चीन वालों की सबको “चीनी” बनाने की साजिश तो नहीं….क्योंकि कसम से मेरा चेहरा बिलकुल चाइनीज़ लग रहा था 😀 . खैर, उस दिन तो रात हो गई थी. मैंने तय किया कि अगले दिन डॉ के पास जाकर पूछूंगी कि कोई खतरे की बात तो नहीं है क्योंकि मुझे पहले से ही फूड एलर्जी है और दूध, दूध से बने पदार्थ और नट्स आदि खाना मना है. लेकिन दूसरे दिन तक लक्षण कम हो गए थे और तीसरे दिन तक लगभग समाप्त.
जब मैगी पर इसी तत्व को लेकर बैन लगा तो मुझे बहुत आश्चर्य हुआ क्योंकि मैगी खाकर कभी भी इस तरह की कोई समस्या मुझे नहीं हुई. जाहिर है की यदि उसमें एम्.एस.जी. होगा भी तो उसकी मात्रा बहुत कम होगी. मैगी तो एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी का उत्पाद है इसलिए उसकी जांच हुई और उस पर बैन लगा दिया गया और ये रेस्टोरेंट वाले चाइनीज़ खाने में जो भर-भरके MSG डाल रहे हैं, उन पर बैन क्यों नहीं लगता? जांच क्यों नहीं होती? असल में, आमतौर पर लोगों को कोई समस्या ही नहीं होती और सौ में से एक किसी को होती भी है, तो उसे जानकारी ही नहीं होती. लेकिन यह भी बात तो सही है की यूँ तो सभी डिब्बा बंद उत्पादों और बाहर के खानों में कुछ न कुछ रासायनिक तत्व होते ही हैं. सब्जी और फल भी तो कीटनाशकों और रासायनिक खादों के कारण प्रदूषित होते हैं .उनमें फ्रूट हारमोंस डालकर पकाया या बड़ा किया जाता है, वह भी तो नुकसानदायक ही है. हम किस-किस चीज़ से बचेंगे और किस तरह से बचेंगे?
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6 thoughts on “चाइनीज़ खाने का स्वाद, ग्लूटामेट और मैगी विवाद

  1. अरविंद मिश्र on said:

    मोनोसोडियम ग्लूटामेट बोले तो अजीनोमोटो?

    • अजीनोमोटो जापान की उस कम्पनी का नाम है जिसने सबसे पहले इस तत्व को कृत्रिम रूप से बनाया था. तो जैसे वनस्पति घी को डालडा और नूडल्स को मैगी कहा जाने लगा वैसे ही ग्लूटामेट को अजीनोमोटो के नाम से जाना जाने लगा

  2. डिब्बाबंद खाने में दुनिया के देशों में कड़े नियम हैं। नियमों की अनदेखी पर कड़े आर्थिक जुमार्ने का प्रावधान है। भारत में ये तब तक पता नहीं चलता, जबतक बहुत लोग प्रभावित नहीं होते, या फिर कोई कैंपेन नहीं चलता। दूसरे हमारे यहां सैंपल चेक होने के बाद भी कई दिन तक कार्रवाई नहीं होती। वैसे मजेदार बात ये है कि महात्मा गांधी वनस्पति घी का कड़ा विरोध करते थे। किसी तरह की मिलावट करने वाले के खिलाफ काफी कड़े दंड की वकालत भी महात्मा गांधी ने की थी।

    • गांधी जी ने बहुत सी अच्छी बातें कहीं थीं. अब मानता कौन है?

      • ये तो है…फिर भी तमाम गुस्से और नाराजगी के बाद भी गांधी अप्रसांगिक तो नहीं हुए हैं फिलहाल। जरूरी नहीं कि उनकी हर बात हमें सही ही लगे, जितने विषय पर, जितना उन्होंने विचार किया है, उतना किसी ने नहीं….एक बात याद आई कि वो कुत्तों को जहां-तहां, जब मर्जी खिलाने का भी कड़ा विरोध करते थे।

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