आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

Archive for the day “दिसम्बर 2, 2016”

ऊपर वाले

कोई रात के तीन बजे होंगे जब ऊपर से लड़ने-झगड़ने और चीज़ें तोड़ने-पटकने की आवाजें आने लगीं. मैं समझ गई कि टॉप फ्लोर वाले आज फिर झगड़ने के मूड में है. पहले “धम्म” से कोई चीज़ ज़मीन पर गिरी, फिर स्टील की चम्मच-प्लेटें गिरने की आवाजें और सबसे आखिर में “छन्नऽऽ” का शोर. मतलब ऊपर वाली लड़की भी मेरी तरह अपना गुस्सा बेचारी क्रॉकरी पर उतार रही है. ‘आज नींद आ चुकी’ मैंने सोचा और उठकर एक किताब पढ़ने लगी.

थोड़ी देर बाद दरवाजा खुलने और फिर बंद होने की आवाज़ आई. शायद लड़की ने लड़के को कमरे से बाहर निकाल दिया था. वो पहले तो धीरे-धीरे दरवाजा खटखटाकर दबी आवाज़ में “ओपन द डोर-ओपन द डोर” कहता रहा. करीब पन्द्रह मिनट बाद उसके सीढ़ियों से नीचे जाने की आवाज़ सुनाई दी. मैंने चैन की सांस ली, किताब उठाकर टेबल पर रखी, टेबल लैम्प बंद किया और सोने की कोशिश करने लगी. अचानक फिर दरवाजा खुलने की आवाज़ आई. लड़की बालकनी में खड़े होकर रो-रोकर लड़के से वापस आने के लिए कह रही थी. उसकी सारी बातें मुझे सीढ़ियों के रोशनदान से सुनाई दे रही थीं, जबकि वह अपनी समझ से काफी धीरे बोल रही थी. शायद लड़का नीचे गली में या सामने वाले पार्क में ही था. पांच मिनट में हाज़िर हो गया. मैं डर गई कि कहीं फिर से लड़ाई-झगड़ा न शुरू हो जाय. लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

ऊपर वाले बच्चे अरुणाचल प्रदेश के हैं और मेरे मकान मालिक के प्रिय हैं. मकान मालिक की ख़ास बात यह है कि वे अपने कमरे नॉर्थ ईस्ट के छात्रों को देना पसंद करते हैं क्योंकि वे अपने से मतलब रखते हैं. ऊपर वाला कमरा लड़की ने किराए पर ले रखा है, उसका दोस्त आता-जाता रहता है और हफ्ते-दस दिन में उनके घमासान युद्ध की वजह से मेरी नींद खराब हो जाती है. कभी-कभी गुस्सा आता है, लेकिन फिर सोचती हूँ ‘जाने दो. वैसे ही प्यार के दुश्मन क्या कम हैं ज़माने में, जो मैं भी बन जाऊं.’ 🙂

दूसरे दिन शाम को मकान मालिक मेरे यहाँ आये, तो बातों ही बातों में पूछने लगे “आपको ऊपर वाली लड़की से कोई परेशानी तो नहीं है?” मैंने कहा “नहीं तो, क्यों?” “क्योंकि इसका दोस्त जहाँ रहता है (जाहिर है वह कमरा भी इन्हीं का है) वहाँ अक्सर इन दोनों में लड़ाइयाँ होती रहती थीं. आस-पड़ोस वाले काफी शिकायत करते थे.” “नहीं, ऐसी कोई ख़ास परेशानी तो नहीं.” कहते-कहते मेरे मुँह तक रात वाली बात आ ही गई थी. फिर जाने क्या सोचकर रुक गई. उन्होंने मानो खुद को विश्वास दिलाने के लिए पूछा, “पक्का?” मैंने जवाब दिया. “हाँ, पक्का!” उनको देखकर लगा जैसे उन्होंने चैन की सांस ली हो. जाते-जाते कहने लगे, “अगर थोड़ी बहुत परेशानी हो तो इग्नोर कीजियेगा. कुछ ही दिन पहले लड़की की माँ की कैंसर से डेथ हुयी है. बहुत स्ट्रेस में है बेचारी.”

उनके जाने के बाद मैं रात वाली घटना के बारे में दोबारा सोचने लगी. किसी की पृष्ठभूमि पता चल जाने के बाद कैसे हमारा नज़रिया उसके प्रति बदल जाता है. अब मुझे ऊपर वालों पर बिलकुल गुस्सा नहीं आ रहा था. वैसे आस-पड़ोस वालों की बातें नहीं सुननी चाहिए, लेकिन जब बातें अपने आप कानों में पड़ें तो क्या किया जाय 🙂

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