आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

Archive for the month “नवम्बर, 2017”

कहाँ जाएँ?

कल की बात है. डॉ के यहाँ जाना ज़रूरी न होता तो घर से ज्यादा दूर निकलती ही नहीं, लेकिन मजबूरी हमसे जो कुछ भी कराये कम है. तीन-चार दिन से धुएं की वजह से जुगनू (मेरा पपी) की आँखों से पानी बह रहा था, इसलिए उसको भी दोपहर बारह बजे टहलाया वो भी सिर्फ पन्द्रह-बीस मिनट. डॉ के यहाँ जाने के लिए ऑटो लिया. मुँह पे मास्क देखकर ऑटो वाले भैया ने प्रदूषण के बारे में बातचीत शुरू कर दी. वैसे आजकल अधिसंख्य लोगों की बातचीत का मुख्य विषय आसपास फैली धुएँ की चादर ही है.

ऑटो वाले भैया ने पूछा मास्क कितने का मिलता है? मैंने उन्हें बताया कि इस मास्क का इस ज़हरीली हवा में कोई मतलब नहीं है, ये तो मैं धूल से बचने के लिए पहनती हूँ. फिर वो बताने लगे कि तीन-चार दिन से उनकी आँखों में मिर्ची सी लग रही है. खाँसी-जुकाम ठीक ही नहीं हो रहा है. मैंने उनसे पूछा पान क्यों खाते हैं, तो बताया ‘गला तर रखने के लिए.’ सफाई भी दी कि दिन में दो-तीन से ज्यादा नहीं खाते. उनको बच्चों की चिंता थी. कहने लगे कि बच्चों के अंग कोमल होते हैं, उनको ज्यादा परेशानी हो रही है. मैंने उन्हें सलाह दी कि कुछ दिन बच्चों को स्कूल न भेजें. सोचिये, कहाँ तो लोगों को बच्चों को स्कूल भेजने के लिए प्रेरित करती रहती हूँ, कहाँ उनको पढ़ने से रोकने के लिए कह रही हूँ. मन हुआ कि दिल्ली छोड़ देने की सलाह दूँ, लेकिन किस मुँह से दूँ. प्रदूषण से हरदम गला खराब रहने के बाद भी मैं ही कहाँ छोड़ पा रही हूँ. आखिर, रोजी-रोटी है हमारी यहाँ और फिर कौन-कौन सी जगहें छोड़ेंगे हम. ये तो हवा है, कहीं भी पहुँच जायेगी.

मैंने रिक्शे वाले भैया को दो कुछ नसीहतें दीं. पान में धीरे-धीरे तम्बाकू की मात्रा कम करें, गले के लिए मुलेठी चूसें और भाप लें और एक प्रदूषण वाला मास्क खरीद लें. और मैं क्या कर सकती हूँ. गंतव्य तक पहुँचते-पहुँचते रिक्शे वाले भैया मेरे गृह जनपद के पड़ोसी निकले. बड़े खुश हुए मिलकर. मैंने उन्हें अलविदा कहा और उनकी बातों पर गौर करने लगी. वो कह रहे थे कि मौसम विभाग झूठ कह रहा है कि ये कोहरा है. कोहरा आँखों में चुभता नहीं, उसे मिर्ची की तरह जलाता नहीं. उनसे क्या कहती कि हम आज न जाने कितने ही आँखों देखे झूठों को जी रहे हैं. हम देख कुछ और रहे हैं, महसूस कुछ और कर रहे हैं और हमें बताया कुछ और जा रहा है. खैर…

मुहल्ले में बहुत पेड़-पौधे हैं, तो धुएं का पता नहीं चलता. शहर में निकलकर पता चला कि किसी ‘Post Apocalypse Film’ जैसे माहौल में रह रहे हैं, जहाँ साँस लेने लायक ऑक्सीजन नहीं बचती. घरों-संस्थानों के अन्दर कृत्रिम ऑक्सीजन ढंग से ऑक्सीजन पैदा किया जाता है और घर के बाहर बिना ऑक्सीजन मास्क के नहीं निकला जा सकता.

धुआँ आँख-नाक और मुँह को छीलता हुआ अन्दर जाता है. पता नहीं मेरे साथ ही ऐसा हो रहा है या और लोगों के साथ भी. पहले की तरह मुझे लौटने के लिए एक घर न होने पर रोना नहीं आता था, कल आ रहा था. अगर वापस जाने का कोई ठिकाना होता तो मैं लौट जाती. लेकिन लोग पर्यावरण को लेकर इतने असंवेदनशील हैं कि वहाँ भी स्थिति यहाँ के जैसी होने में देर नहीं लगेगी. फिर वही बात ‘मरकर भी चैन न आया तो कहाँ जायेंगे?’

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