आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

सडकों पर जीने वाले

हर शनिवार मोहल्ले में सब्जी बाज़ार लगता है. वहीं सब्जी बेचता है वो. इतना ज़्यादा बोलता है कि लडकियाँ उसको बदतमीज समझकर सब्जी नहीं लेतीं और लड़के मज़ाक उड़ाकर मज़े लेते हैं. मैं उससे सब्जी इसलिए लेती हूँ क्योंकि उनकी क्वालिटी अच्छी होती है. मुझे देखकर दूर से ही बुलाता है. कभी ‘बहन’ कहता है कभी ‘मैडम’. मैंने एक दो बार नाम पूछा तो हँस दिया. नाम नहीं बताया आज तक.

पहले बहुत ज़्यादा बीड़ी पीता था. मैं हमेशा टोकती थी, तो मुझे देखकर बीड़ी बुझा देता था. एक-डेढ़ साल पहले से उसे खाँसी रहने लगी. मैंने उससे कहा भी कि तुम जिस तरह से खाँस रहे हो, मुझे लगता है फेफड़े ठीक नहीं हैं तुम्हारे. डॉक्टर को दिखाने के लिए बोला तो बात हँसी में उड़ा दी. करीब छः महीने पहले उसकी आवाज़ बदल गयी. मैंने पूछा “दर्द होता है” बोला नहीं. मैंने कहा कि किसी अच्छे डॉक्टर को दिखाओ नहीं तो कैंसर हो जायेगा. दो बच्चे हैं उसके, बताया था उसने. मैंने उसे बच्चों का वास्ता दिया. इस पर बस चुप हो गया.

उसके बाद दो हफ्ते दिखा ही नहीं. फिर जब दिखा तो अपने आप से बताया “डॉक्टर को दिखाया मैने. दवा लम्बी चलेगी. डॉक्टर बोला ‘बीड़ी पिएगा तो आवाज़ चली जाएगी’, तो बीड़ी भी कम कर दिया” मुझे बहुत ख़ुशी हुयी उसकी बात सुनकर. उसके अगले हफ्ते उसकी आवाज़ काफी ठीक हो गयी. स्वस्थ भी लगने लगा. लेकिन सब्जी न लगाने की वजह से काम कम हो गया. सब्जी की क्वालिटी भी कुछ हल्की लगी, फिर भी मैं उसी से सब्जी लेती रही. धीरे-धीरे उसने फिर से काम जमा लिया है.

आज सब्जी लेने गयी तो सीधे उसके पास पहुँची. मैंने बीन्स माँगी तो उसने मना कर दिया क्योंकि बीन्स की क्वालिटी अच्छी नहीं थी. मैंने उससे कहा भी कि दे दो मैं छाँट लूँगी लेकिन वो नहीं माना. उदास होकर बोला किसी को नहीं दिया बहन, पूरी बोरी ख़राब निकल गयी. लेकिन गलत सौदा नहीं दूँगा अपने गाहकों को. खैर, मैंने उससे दूसरी सब्जियाँ लीं और लौटने लगी.

एक बूढ़े व्यक्ति हैं. अदरक, मिर्च, लहसुन बेचते हैं. राजनीति की बड़ी बातें करते हैं. उनसे मैं तीखी वाली मिर्च लेती हूँ. आज पूछा तो कहने लगे “तीखे की गारंटी नहीं है आज की मिर्च में” मैंने कहा कोई बात नहीं दे दीजिये. एक लड़की ने आकर धनिया का दाम पूछा तो सीधे बोले “बिटिया धनिया सूख गयी है. लेने लायक नहीं है”

कई बार ऐसा हुआ है कि किसी रिक्शे वाले को नियमित किराये से ज़्यादा पैसे दिए हैं, तो उसने ईमानदारी से लौटा दिए. एक बार गलती से फुटकर पैसे लेकर नहीं गयी. पास में दो हज़ार की नोट थी और रिक्शे वाले के पास इतने पैसे खुल्ले नहीं थे. उसने कहा “मैडम, मोहल्ले में ही तो खड़ा रहता हूँ. फिर दे देना.” एक चाय वाले बाबा हैं. रात में दोस्त के साथ वहाँ चाय पी थी. लगभग दो महीने बाद हम दोबारा चाय पीने गए तो बाबा ने पैसे नहीं लिए और दस रूपये वापस दिए. बोले “पिछली बार बीस की जगह पचास रूपये दे गये थे आप.”

मैं इस पोस्ट के अंत में कोई ‘नैतिक शिक्षा’ नहीं देने वाली हूँ, लेकिन जबसे सब्जी बाज़ार से लौटकर आई हूँ सोच नहीं पा रही हूँ कि वो लोग, जो देश के हजारों करोड़ रूपये हड़पकर ऐशो आराम की ज़िन्दगी बिता रहे होते हैं या विदेश भाग जाते हैं, वो लोग किस मिटटी के बने होते हैं? उन्हें रात में नींद आती होगी क्या?

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शनिवार की सब्जी बाज़ार

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6 thoughts on “सडकों पर जीने वाले

  1. कई बार जब कर्ज माफी की कहानी सुनता हूँ तो यही बात अनुभव करता हूँ कि अच्छे लोग सदा ही लोन बहुत आवश्यकता होने पर ही लेते हैं, और लेते भी हैं तो बड़े भीरु होते हैं और समय से लोन लौटा देते हैं, पर मक्कार लोग लोन को लटकाए रहते हैं(कुछ मजबूर भी होंगे)। ऐसे मे उनको कुछ नहीं मिलता जो ईमानदारी से समय से टैक्स जमा कर देते हैं या अपनी मेहनत के भरोसे सीमा मे खर्च करते हैं और लोन नहीं लेते…

  2. अजय नारायण पाण्डेय on said:

    बिल्कुल जी,, आपकी बातों से पूर्ण रूप से सहमत हूँ।कई बार मैंने भी ये फील किया है कि ऐसे ग़रीब लोगों के साथ अगर थोड़ा सा भी उपकार कर दिया जाए तो वे उसे बहुत ज्यादा तवज्जो देते हैं।मेरे जैसा व्यक्ति जिसने ग़रीबी को बहुत नज़दीक से देखा है,, आज भाग्य और कर्मों के संयोग से उस स्थिति में हूँ कि गरीबों की थोड़ी बहुत मदद कर सकता हूँ।पेशे से शिक्षक होने के कारण ये जिम्मेदारी और बढ़ जाती है।भगवान का बहुत धन्यवाद,,, वो इसलिए कि ऐसे वक़्त पर मैं दिल की सुनता हूँ,,,, दिमाग की तो बिल्कुल भी नहीं।मेरे साथ अक्सर ये होता है कि जो लोग मुझे नहीं जानते हैं वे यही सोचते हैं कि मेरा एटीट्यूड बहुत है,,,, पर जो लोग मुझे करीब से जानते हैं वे मुझे बेहद प्यार करते हैं।मेरी ज़िन्दगी में ऐसे ही लोगों का प्यार ही मेरा सबसे बड़ा बल है।प्रणाम!

  3. आपकी पोस्ट पढ़कर मुझे मेरे अनुभव याद आ गए। और इस तरह के अनुभव दिल्ली जाकर ही हुए। जाने क्यों लोग कहते हैं, कि दिल्ली में लोग अच्छे नहीं… मुझे हमेशा बहुत अच्छे लोग मिले।

  4. इनमें छल कपट नहीं है, अब तो बेइमान भी बहुत हैं ।

  5. अनामिका चक्रवर्ती on said:

    सच ऐसा बहुत बार हुआ है और खास ऐसे वक्त पर उनके मुस्कुराते हुए चेहरे बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर देते हैं।
    बहुत सच लिखा है और आज के समय में ये सब बातें सभी तक पहुंचनी भी चाहिए क्योंकि ऐसे भी कुछ लोग हैं जो ज़बरदस्ती बोलकर धनिया मिर्च सब्जी के साथ फ्री में लेने में जरा भी नहीं हिचकिचाते।

  6. गरीब और मेहनतकश लोगों में आज भी ईमानदारी और मानवता मौजूद है। अमीरों की क्या बात करें उनकी तो दुनियां और रिश्ते ही पैसे के लेवल पर बनते हैं।
    रामराम

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