आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

Archive for the category “आस-पड़ोस”

ऊपर वाले

कोई रात के तीन बजे होंगे जब ऊपर से लड़ने-झगड़ने और चीज़ें तोड़ने-पटकने की आवाजें आने लगीं. मैं समझ गई कि टॉप फ्लोर वाले आज फिर झगड़ने के मूड में है. पहले “धम्म” से कोई चीज़ ज़मीन पर गिरी, फिर स्टील की चम्मच-प्लेटें गिरने की आवाजें और सबसे आखिर में “छन्नऽऽ” का शोर. मतलब ऊपर वाली लड़की भी मेरी तरह अपना गुस्सा बेचारी क्रॉकरी पर उतार रही है. ‘आज नींद आ चुकी’ मैंने सोचा और उठकर एक किताब पढ़ने लगी.

थोड़ी देर बाद दरवाजा खुलने और फिर बंद होने की आवाज़ आई. शायद लड़की ने लड़के को कमरे से बाहर निकाल दिया था. वो पहले तो धीरे-धीरे दरवाजा खटखटाकर दबी आवाज़ में “ओपन द डोर-ओपन द डोर” कहता रहा. करीब पन्द्रह मिनट बाद उसके सीढ़ियों से नीचे जाने की आवाज़ सुनाई दी. मैंने चैन की सांस ली, किताब उठाकर टेबल पर रखी, टेबल लैम्प बंद किया और सोने की कोशिश करने लगी. अचानक फिर दरवाजा खुलने की आवाज़ आई. लड़की बालकनी में खड़े होकर रो-रोकर लड़के से वापस आने के लिए कह रही थी. उसकी सारी बातें मुझे सीढ़ियों के रोशनदान से सुनाई दे रही थीं, जबकि वह अपनी समझ से काफी धीरे बोल रही थी. शायद लड़का नीचे गली में या सामने वाले पार्क में ही था. पांच मिनट में हाज़िर हो गया. मैं डर गई कि कहीं फिर से लड़ाई-झगड़ा न शुरू हो जाय. लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

ऊपर वाले बच्चे अरुणाचल प्रदेश के हैं और मेरे मकान मालिक के प्रिय हैं. मकान मालिक की ख़ास बात यह है कि वे अपने कमरे नॉर्थ ईस्ट के छात्रों को देना पसंद करते हैं क्योंकि वे अपने से मतलब रखते हैं. ऊपर वाला कमरा लड़की ने किराए पर ले रखा है, उसका दोस्त आता-जाता रहता है और हफ्ते-दस दिन में उनके घमासान युद्ध की वजह से मेरी नींद खराब हो जाती है. कभी-कभी गुस्सा आता है, लेकिन फिर सोचती हूँ ‘जाने दो. वैसे ही प्यार के दुश्मन क्या कम हैं ज़माने में, जो मैं भी बन जाऊं.’ 🙂

दूसरे दिन शाम को मकान मालिक मेरे यहाँ आये, तो बातों ही बातों में पूछने लगे “आपको ऊपर वाली लड़की से कोई परेशानी तो नहीं है?” मैंने कहा “नहीं तो, क्यों?” “क्योंकि इसका दोस्त जहाँ रहता है (जाहिर है वह कमरा भी इन्हीं का है) वहाँ अक्सर इन दोनों में लड़ाइयाँ होती रहती थीं. आस-पड़ोस वाले काफी शिकायत करते थे.” “नहीं, ऐसी कोई ख़ास परेशानी तो नहीं.” कहते-कहते मेरे मुँह तक रात वाली बात आ ही गई थी. फिर जाने क्या सोचकर रुक गई. उन्होंने मानो खुद को विश्वास दिलाने के लिए पूछा, “पक्का?” मैंने जवाब दिया. “हाँ, पक्का!” उनको देखकर लगा जैसे उन्होंने चैन की सांस ली हो. जाते-जाते कहने लगे, “अगर थोड़ी बहुत परेशानी हो तो इग्नोर कीजियेगा. कुछ ही दिन पहले लड़की की माँ की कैंसर से डेथ हुयी है. बहुत स्ट्रेस में है बेचारी.”

उनके जाने के बाद मैं रात वाली घटना के बारे में दोबारा सोचने लगी. किसी की पृष्ठभूमि पता चल जाने के बाद कैसे हमारा नज़रिया उसके प्रति बदल जाता है. अब मुझे ऊपर वालों पर बिलकुल गुस्सा नहीं आ रहा था. वैसे आस-पड़ोस वालों की बातें नहीं सुननी चाहिए, लेकिन जब बातें अपने आप कानों में पड़ें तो क्या किया जाय 🙂

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चाइनीज़ खाने का स्वाद, ग्लूटामेट और मैगी विवाद

लगभग एक साल पहले हम तीन लडकियाँ (वैसे आप महिलायें भी कह सकते हैं 😀 ) अपने एक मित्र को देखकर हिन्दू राव अस्पताल से लौट रहे थे. मित्र तेज बुखार के चलते दो दिन से अस्पताल में भर्ती थे. बाकी दोनों लडकियों को जी.टी.बी. नगर स्टेशन से मेट्रो पकड़नी थी और मुझे ऑटो. इसलिए हमलोग कैम्प तक साथ आये. वहां पहुँचते-पहुँचते शाम के सात बज चुके थे और संयोग से हम तीनों ही अकेले रहने वाली हैं तो हमने सोचा कि घर जाकर बनाने से अच्छा बाहर खाकर चलते हैं.
तय किया गया कि चाइनीज़/मंचूरियन खाया जाय. हम एक रेस्टोरेंट में घुस गए और चाइनीज़ फ्राइड राईस और मंचूरियन के साथ स्वीट कॉर्न सूप का ऑर्डर दिया. सूप काफी गाढ़ा था. आमतौर पर मुझे गाढ़ा सूप पसंद नहीं है, लेकिन जब चखा तो जैसे आत्मा तृप्त हो गयी. इतना टेस्टी सूप मैंने पहले कभी नहीं पिया. खाना खाकर और हमेशा की तरह बचा हुआ खाना पैक करवाकर हम वहां से निकले. एक ने तो मेट्रो पकड़ ली और दूसरी जो मेरी बचपन की सहेली है, मेरे साथ मेरे घर आ गयी. देर रात तक हमने चाय पी-पीकर खूब गप्पें मारीं. रात में खाना बनाने से छुट्टी हो तो कितना हल्का-हल्का सा महसूस होता है ये वही जान सकता है जिसे रोज़ सुबह से ही रात के खाने के बारे में सोचना शुरू कर देना पड़ता है.
दूसरे दिन जब मैं सोकर उठी तो चेहरा बहुत भारी-भारी सा लग रहा था और आँखें पूरी नहीं खुल रही थीं. शीशे में देखा तो चौंक गयी. पूरा चेहरा सूजा हुआ था और आँखें छोटी हो गयी थीं. वैसे ये समस्या मेरे लिए नई नहीं है. एलर्जिक शरीर होने के नाते कभी-कभी ऐसा हो जाता है. अक्सर पीरियड्स के आसपास भी चेहरे में सूजन आ जाती है लेकिन इतना भारीपन नहीं होता. सिर अजीब ढंग से दुःख रहा था और नींद सी आ रही थी. हालांकि सहेली को मेरा चेहरा ज्यादा सूजा नहीं लग रहा था, लेकिन मुझे महसूस हो रहा था. खैर, मैंने सोचा की अभी सोकर उठी हूँ. थोड़ी देर में ठीक हो जाएगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ.
सहेली दोपहर तक चली गयी. मेरा चेहरे की सूजन और सिर दर्द शाम तक नहीं ठीक हुआ, तो मुझे थोड़ी चिंता हुई. मैंने नेट ऑन करके swollen face गूगल करना शुरू किया. उसमें मुझे जो जानकारी मिली, उसे पढ़कर मैं चौंक गयी. मैंने chinese restaurant syndrome के बारे में पढ़ा. यह एक समस्या है, जो कि माना जाता है कि Monosodium glutamate (MSG)  (लोकप्रिय नाम अजीनोमोटो) नामक तत्व के कारण होती है. मोनोसोडियम ग्लूटामेट सूप और नूडल्स जैसे खानों में अच्छे स्वाद के लिए मिलाया जाता है. हालांकि अभी इस पर पूरी तरह शोध नहीं हुआ है और यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि उक्त समस्या का कारण MSG ही है. आश्चर्य तो मुझे हो रहा था लेकिन साथ ही हंसी आ रही थी कि कहीं ये चीन वालों की सबको “चीनी” बनाने की साजिश तो नहीं….क्योंकि कसम से मेरा चेहरा बिलकुल चाइनीज़ लग रहा था 😀 . खैर, उस दिन तो रात हो गई थी. मैंने तय किया कि अगले दिन डॉ के पास जाकर पूछूंगी कि कोई खतरे की बात तो नहीं है क्योंकि मुझे पहले से ही फूड एलर्जी है और दूध, दूध से बने पदार्थ और नट्स आदि खाना मना है. लेकिन दूसरे दिन तक लक्षण कम हो गए थे और तीसरे दिन तक लगभग समाप्त.
जब मैगी पर इसी तत्व को लेकर बैन लगा तो मुझे बहुत आश्चर्य हुआ क्योंकि मैगी खाकर कभी भी इस तरह की कोई समस्या मुझे नहीं हुई. जाहिर है की यदि उसमें एम्.एस.जी. होगा भी तो उसकी मात्रा बहुत कम होगी. मैगी तो एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी का उत्पाद है इसलिए उसकी जांच हुई और उस पर बैन लगा दिया गया और ये रेस्टोरेंट वाले चाइनीज़ खाने में जो भर-भरके MSG डाल रहे हैं, उन पर बैन क्यों नहीं लगता? जांच क्यों नहीं होती? असल में, आमतौर पर लोगों को कोई समस्या ही नहीं होती और सौ में से एक किसी को होती भी है, तो उसे जानकारी ही नहीं होती. लेकिन यह भी बात तो सही है की यूँ तो सभी डिब्बा बंद उत्पादों और बाहर के खानों में कुछ न कुछ रासायनिक तत्व होते ही हैं. सब्जी और फल भी तो कीटनाशकों और रासायनिक खादों के कारण प्रदूषित होते हैं .उनमें फ्रूट हारमोंस डालकर पकाया या बड़ा किया जाता है, वह भी तो नुकसानदायक ही है. हम किस-किस चीज़ से बचेंगे और किस तरह से बचेंगे?

दिए के जलने से पीछे का अँधेरा और गहरा हो जाता है…

फिर फिर याद करना बचपन की छूटी गलियों को…

आराधना का ब्लॉग

मैं शायद कोई किताब पढ़ रही थी या टी.वी. देख रही थी, नहीं मैं एल्बम देख रही थी, बचपन की फोटो वाली. अधखुली खिड़की से धुंधली सी धूप अंदर आ रही थी. अचानक डोरबेल बजती है. मैं दरवाजा खोलती हूँ, कूरियर वाला हाथ में एक पैकेट थमाकर चला जाता है. मैं वापस मुडती हूँ, तो खुद को एक प्लेटफॉर्म पर पाती हूँ.

मैं अचकचा जाती हूँ. नंगे पैर प्लेटफॉर्म पर. कपडे भी घरवाले पहने हैं. अजीब सा लग रहा है. मेरे हाथ में एक टिकट है. शायद कूरियर वाले ने दिया है. अचानक एक ट्रेन आकर रुकती है और कोई अदृश्य शक्ति मुझे उसमें धकेल देती है. मैं ट्रेन में चढ़ती हूँ और एक रेलवे स्टेशन पर उतर जाती हूँ. ये कुछ जान जानी-पहचानी सी जगह है. हाँ, शायद ये उन्नाव है. मेरे बचपन का शहर. लेकिन कुछ बदला-बदला सा.

मुझे याद नहीं कि मैं इसके पहले मैं यहाँ…

View original post 656 और  शब्द

कितनी सदियाँ, कितने देश

‘प्यार का पंचनामा’ फिल्म देख रही थी. वैसे तो ये फिल्म पूरी तरह लड़कों के दृष्टिकोण से बनी है और लड़कियों को जिस तरह से चित्रित किया गया है, उसे देखकर गुस्सा भी आ रहा था, लेकिन बहुत हद तक ये फिल्म महानगरों में रहने वाली उच्च-मध्यमवर्गीय नयी पीढ़ी की जीवन-शैली को प्रतिबिंबित करती है. बहुत सोचने पर भी मुझे अपने आस-पास कोई ऐसी लड़की नहीं दिखी, जो फिल्म में दिखाई गयी नए ज़माने की बोल्ड लड़कियों के आस-पास भी ठहर सके.

मैं भी अजीब हूँ. फिल्म के पात्रों को वास्तविक जीवन में ढूँढ़ रही हूँ. लेकिन फ़िल्में कोई हवा में तो बनायी नहीं जातीं. फिल्मकार को कहीं न कहीं से तो पात्रों की प्रेरणा मिली होगी. तो कहाँ होती हैं ऐसी लड़कियाँ? मैं भी दिल्ली में रहती हूँ, मुझे तो नहीं दिखतीं. या हो सकता है कि मैं अब पुरानी पीढ़ी की हो गयी हूँ और मेरे बाद की कई पीढियाँ इस शहर में रहने लगी होंगी या फिर उनकी मेरी जीवन-शैली में इतना अंतर है कि मेरी सोच वहाँ तक नहीं पहुँच सकती.

वैसे तो दिल्ली में आते-जाते लड़कियों को देखती ही हूँ, लेकिन जबसे पढ़ाने जाने लगी हूँ और करीब से देखने का मौका मिल रहा है. इस महानगर में कई-कई शहर बसते हैं और वो भी कई-कई सदियों में. आमतौर पर बाहर के लोग ये समझते हैं कि डी.यू. की लड़कियाँ माडर्न और बोल्ड होती हैं, भकाभक सिगरेट फूँकती हैं और कुछ-कुछ दिनों पर ब्वायफ्रैंड बदलती रहती हैं. हाँ, ऐसी लड़कियाँ भी होती हैं, और आज से नहीं बहुत पहले से रहती हैं. लेकिन यह वर्ग सिर्फ बीस-पच्चीस प्रतिशत लड़कियों का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें इस महानगर तथा दूसरे महानगरों से आयी उच्च-मध्यमवर्गीय लड़कियां हैं.

लेकिन इन लड़कियों से अलग बहुत बड़ी संख्या में ऐसी लड़कियाँ हैं, जो अब भी अपनी पढ़ाई के लिए रोज़-रोज़ लड़ाई लड़ती हैं. फर्स्ट इयर की कक्षा में एक लड़की है, जो मेरठ से रोज़ ट्रेन से कॉलेज आती है पढ़ने के लिए. एक है जो जींस के ऊपर कुरता और दुपट्टा डालती है, पूछने पर जवाब मिला, “जींस हमारी च्वाइस है और कुरता-दुपट्टा माँ-पापा की.” कितनी आसानी से रोज़ के संघर्ष से जूझती लड़कियाँ बताती हैं अपने उस संतुलन के बारे में जो उन्होंने बड़ी सफाई से परम्परा और आधुनिकता के बीच आज भी बिठा रखा है. और मज़े की बात है कि ये उस महानगर के अन्दर है जो आधुनिक फैशन का गढ़ माना जाता है. जहाँ की लड़कियों की आधुनिक पोशाकें बाकी देश की लड़कियों के लिए फैशन गढ़ती हैं.

यहीं इस महानगर के बीचों-बीच कुछ गाँव हैं, जहाँ आज भी पुरानी परम्पराएँ जारी हैं. जहाँ के अभिभावक अपनी बेटियों को गर्ल्स कॉलेज में ही पढ़ने भेजते हैं. उन लड़कियों को सीधे कॉलेज जाना और वहाँ से सीधे वापस आना होता है. लड़कों से हँसना-बोलना तो दूर उन्हें देख भी नहीं सकतीं. यहीं ऐसी लड़कियाँ भी हैं जिन्हें सहेलियों के साथ भी सिनेमा जाने की छूट नहीं है. अगर कभी गयीं भी तो परिवार के साथ. आश्चर्यचकित होती हूँ ये सब देखकर कि क्या ये दिल्ली है?

हाँ, ये दिल्ली है, जहाँ एक साथ कई शहर बसते हैं अपने अन्दर कई सदियाँ लिए हुए. यहाँ कुछ इलाके अब भी पिछली सदी में जी रहे हैं, तो इसमें आश्चर्य की क्या बात है? इस देश में भी तो कई देश हैं, जो कई सदियों पीछे चल रहे हैं. यहीं पर प्रेमी-प्रेमिका को मौत का फरमान सुनाने वाली पंचायतें भी तो हैं. वे किस सदी में बनी थीं?

मीत के गुण्डा की गुण्डई के किस्से

फेसबुक पर मीत  ने हमको ‘गुण्डा’ नाम दिया है, जो कि हमारे स्वभाव को पूरी तरह चरितार्थ करता है 🙂 मीत कौन हैं? इनसे हमारा परिचय करीब साढ़े तीन साल पहले ब्लॉग लिखते-लिखते हुआ था. इनका एक ब्लॉग हुआ करता था (अब पता नहीं कहाँ गया?)- ‘किससे कहें.’ उस पर ये पुराने फ़िल्मी गीत, ग़ज़लें, गीतकारों और गजलकारों के किस्से और न जाने क्या-क्या छापा करते थे. कुछ पहेलियाँ भी पूछते थे. ऐसी ही किसी पहेली का जवाब सही-सही देने के बाद हमारा इनसे परिचय हो गया. (ये हमने आज तक किसी से नहीं बताया था कि हमको ये बहुत अच्छे लगते थे :)) खैर, मीत हमको ‘गुण्डा’ कहते हैं , तो हम अपनी गुण्डई के कुछ किस्से सुनायेंगे और आपको सुनना पड़ेगा नहीं तो हम कैसे गुण्डा?

(किस्सा नंबर एक)

ये इलाहाबाद की घटना है. मैं अपने एक दोस्त के साथ ‘धूम’ फिल्म देखने गौतम सिनेमाघर गयी. और हमेशा की तरह किनारे (कार्नर नहीं :)) वाली सीट पर बैठी. फिल्म अभी शुरू ही हुयी थी कि पीछे की सीट से एक लड़का उठकर बाहर गया और जाते-जाते मेरे कंधे को छूता गया. पहली बार मैंने सोचा कि हो सकता है कि हाथ गलती से लग गया हो. लेकिन वापस लौटने पर उसने फिर वही हरकत की. मैंने अपनी सीट से खड़े होकर तुरंत उसे टोका, “तुमने हाथ क्यों लगाया?” वो डर तो गया लेकिन अपनी गलती न मानते हुए लड़ने लगा, “गलती से लग गया होगा.” मैंने कहा, “गलती से एक बार हाथ लगता है दुबारा नहीं.” मेरा दोस्त भी उससे झगड़ पड़ा और कहा, ‘माफी माँगो’ इस पर वो लड़का भड़क गया. उसके दोस्त जब खड़े हुए तो पता चला कि वो करीब सात-आठ थे. शायद इसीलिये इतना अकड़ रहे थे. सिनेमाहाल के और लोगों को फिल्म छूटने की चिन्ता हो रही थी. उन्होंने उल्टा मुझे समझाया, “बहनजी, जाने दीजिए” मैंने ज़ोर से चिल्ला के कहा, “शर्म तो आती नहीं आपलोगों को. एक लड़का अँधेरे का फ़ायदा उठाकर बदतमीजी कर रहा है और आपलोग हमसे कह रहे हैं कि हम जाने दें.”

इसी बीच शोर-शराबा सुनकर चौकीदार आ गया. उसने उनलोगों को शांत करके बैठा दिया और मुझसे भी बैठने के लिए कहा. मैं बैठ तो गयी, लेकिन मेरा खून खौल रहा था कि जिस लड़के ने मेरे साथ बदतमीजी की, उसका मैं कुछ नहीं बिगाड़ पायी. मैंने सुना कि वो लड़का किसी से फोन पर बात कर रहा था, जिससे ये लगा कि वो कुछ और गुंडों को अपनी मदद के लिए बुला रहा है. मुझे और गुस्सा आया. मेरे दोस्त ने मेरा मूड और हालात देखते हुए वापस चलने के लिए कहा, तो मैंने मना कर दिया कि “फिल्म देखने आयी हूँ, तो देखकर जाऊँगी. इन कमीनों के कारण मैं भाग नहीं सकती.” और सच में मैं भागती कभी नहीं. हमेशा लड़ती हूँ.

तभी चौकीदार ने मेरे पास आकर कहा, “मैडम, आप आराम से बैठिये. मैनेजर ने गेट बंद करवा दिया है और पुलिस को बुला लिया है.” तब जाकर मेरा गुस्सा कुछ शांत हुआ. ठीक दस मिनट बाद पुलिस आ गयी. उस थाने का एस.एच.ओ. उन दिनों काफी मशहूर था ऐसे बदमाशों को सबक सिखाने के लिए. पुलिस ने दोनों पक्षों को बाहर बुलाया और मुझसे लड़के को पहचानने को कहा. मेरे इशारा करते ही उन्होंने डंडे बरसाने शुरू कर दिए, तो मेरे मुँह से निकला, “आप मार क्यों रहे हैं?” इंस्पेक्टर बोला, “मैडम, आप जानती नहीं. ये लोग ऐसे ही सीधे किये जाते हैं” पुलिस उससे पूछ रही थी कि वो किसे बुला रहा था. तब पता चला कि वो इलाके के किसी जाने-माने गुंडे का छोटा भाई था.

खैर, पुलिस उन बदमाशों को पकड़कर ले गयी. हमलोग पूरी फिल्म देखकर ही वापस लौटे.

(किस्सा नम्बर दो)

अभी इसी दीवाली की बात है. रात के दो बज गये थे, लेकिन नीचे रहनेवाले ‘लोकल्स’ ने पटाखे फोड़-फोड़कर सिर में दर्द कर दिया था. पटाखों की आवाज़ से ज़्यादा उससे उठने वाले धुएँ ने नाक में दम कर दिया था. तीसरे माले पर कमरा होने के कारण सारा धुँआ कमरे में भर गया था. मुझसे जब नहीं सहन हुआ, तो मैं बालकनी में जाकर चिल्लाई, “अब आपलोग पटाखे जलाना बंद कर दें प्लीज़.” नीचे से आवाज़ आयी, “अरे साल भर में एक दिन तो त्यौहार होता है. हम तो छुड़ाएंगे पटाखे. आपको क्या तकलीफ है?” और फिर से पटाखे दगाने लगे. मैंने कहा, “सारा धुँआ ऊपर आ रहा है” उन्होंने सुना नहीं. फिर मैंने कहा कि “आप ये बंद करें, वरना मैं पुलिस को कॉल कर दूँगी.” इस पर एक लड़का ऊपर मुँह करके चिढ़ाने लगा, “क्या कह रही हैं? आवाज़ नहीं आ रही है?”

उसकी इस हरकत से मुझे इतनी ज़ोर की चिढ़ मची कि मैंने मोटर ऑन करके टैप में पाइप फिट कर दिया और पानी से भिगो दिया उन सबको. अब नीचे भगदड़ मची हुयी थी. एक आदमी का ‘इगो’ जाग गया. वो ‘आउट ऑफ कंट्रोल’ होकर ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगा. बोला ये क्या बेहूदा हरकत है. मैंने चिल्लाकर कहा, “जैसे नीचे से धुँआ ऊपर आ सकता है. वैसे ही पानी भी नीचे जा सकता है.” सभी पटाखे छुड़ाने वाले और उनके पटाखे भीग चुके थे. ऊपर अँधेरा होने के कारण वो लोग ये नहीं देख पाये कि ये हरकत किसने और किस बिल्डिंग से की है? नीचे से आवाजें आ रही थीं…’ये क्या बदतमीजी है’ ‘किस मकान से फेंका गया पानी’ ‘मकान मालिक को बुलाओ और इनको निकलवा दो’

मैं थोड़ी देर तक उनका तमाशा देखती रही. फिर आकर अपने कमरे में सो गयी. वो लोग फिर कहीं से पटाखे ले आये और दुबारा वही काम शुरू कर दिया…लेकिन तब तक कुछ और लोगों ने भी विरोध करना शुरू कर दिया. बड़ी देर तक नीचे चिल्ल पों होती रही और इस सबकी शुरुआत करने वाली मैं गुंडी आराम से बिस्तर पर लेटी हुयी थी. मुझे हँसी आ रही थी कि ये सिरफिरे लोग मेरे कारण अपने पैसे से पटाखे खरीदकर फूँक रहे हैं 🙂

( किस्सा नंबर तीन)

हमारे मुहल्ले की एक तस्वीर

हमारे मुहल्ले की एक तस्वीर

रात के तीन बजे सामने की बिल्डिंग के तीसरे मंजिल वाले का दिल रोमैंटिक हो गया था और उसने फुल वोल्यूम में ‘साँस में तेरे साँस मिली तो मुझे साँस आयी’ गाना बजाना शुरू कर दिया. हमारा मुहल्ला ठहरा सँकरी गलियों वाला. ऐसा लगा जैसे गाना मेरे ही कमरे में बज रहा हो. मेरी आँख खुल गयी. बालकनी में निकली तो देखा कि एक-दो और लड़के देख रहे थे (यहाँ ज्यादातर सिविल की तैयारी करने वाले लड़के हैं, जिनकी पढ़ाई में विघ्न पड़ रहा था) पर समस्या ये कि इस बिल्डिंग से नीचे उतरकर सामने वाली बिल्डिंग में मना कौन करने जाय? वैसे भी सिविल वाले किसी से पंगा नहीं लेते. थोड़ी देर में सब अपने-अपने कमरों में चले गए.

मैंने सोचा कि जाने दो. बेचारा पूरा गाना सुन लेगा तो खुद ही बंद कर देगा. लेकिन पता नहीं सामने वाले को क्या फितूर सवार था कि उसने वही गाना करीब तीन बार रिपीट किया. जब चौथी बार गाना शुरू हो गया तो मेरी गुण्डई जाग गयी. मैंने दीवाली में बालकनी पर रखे पुराने ‘दीये’ उठाये और एक-एक करके सामने वाले के दरवाजे पर निशाना लगाना शुरू किया. सोचा कि बन्दा आजिज आकर दरवाजा खोलेगा तो उससे कहूँगी कि ‘तुमने मुझे डिस्टर्ब किया तो मैं तुम्हें कर रही हूँ.’ लेकिन वो नौबत नहीं आयी. तीसरा दीया फेंकते ही गाना बंद हो गया और दुबारा नहीं बजा 🙂

(किस्सा खतम पइसा हजम :))

सरकारी अस्पताल में एक दिन

अक्सर एक कहावत टाइप की कही जाती है कि दुश्मनों को भी वकील या डॉक्टर के चक्कर ना लगाने पड़ें। और वो भी सरकारी अस्पताल से तो भगवान ही बचाए। फिर भी हम मिडिल क्लास लोगों को कभी न कभी सरकारी अस्पताल जाना ही पड़ता है। आज मुझे भी जाना पड़ा, अपनी छोटी बहन वंदना के साथ।

वैसे तो वंदना उत्तर प्रदेश राज्य प्रशासनिक सेवा की अफसर है और प्राइवेट क्लीनिक में दिखाने का खर्च उठा सकती है, लेकिन हमारे दोस्तों और परिचित डॉक्टरों का ये मानना है कि प्राइवेट प्रैक्टिस करने वाले ज़्यादातर डॉक्टर मरीज को ‘पेशेंट’ न समझकर ‘कस्टमर’ समझते हैं। ‘कट्स’ और ‘कमीशन’ के रूप में अपना हिस्सा पाने के लिए आलतू-फालतू के टेस्ट लिख देते हैं। मजबूरन जहाँ से वो कहें, उसी जगह से टेस्ट करवाने पड़ते हैं, चाहे वो जगह आपके घर से कितनी ही दूर हो। दिल्ली जैसे महानगर में ये बहुत कष्टप्रद होता है। इसीलिये उसने खुद को सरकारी अस्पताल में दिखाने का निर्णय लिया। आज हम एल.एन.जे.पी. (लोकनायक जयप्रकाश चिकित्सालय) उसके कुछ टेस्ट करवाने गए थे। वो टेस्ट बाहर से करवाना चाहती थी, लेकिन डॉक्टर की सख्त हिदायत थी कि टेस्ट भी इसी जगह से करवाने होंगे।

ढेर सारी पर्चियाँ समेटते जब हम अस्पताल पहुँचे तो वहाँ समझ में ही नहीं आ रहा था कि जाना किधर है? बहुत सारी छोटी-छोटी बिल्डिंग अलग-अलग बनी हुयी हैं वहाँ। कुछ पर्चियों पर तो रूम नंबर लिखा था, तो हम पूछते-पूछते वहाँ पहुँच गए। पता चला रूम नम्बर 37 में ब्लड का सैम्पल देने के लिए नंबर लेना होगा, फिर रूम नंबर 34 में जाकर ब्लड सैम्पल देना होगा। दोनों जगह बारी-बारी लंबी लाइन लगानी पड़ी। जहाँ से ‘नम्बर’ लेना था, वो जगह गंदी और धूल भरी थी। ऐसा लग रहा था कि बरसों से वीरान पड़े किसी खण्डहर को अस्पताल के काम के लिए खोल दिया गया हो। गनीमत ये कि हवा नहीं चल रही थी। अगर जरा सी भी हवा चलती तो धूल उड़कर मेरे नाक-मुँह में जाती और फिर ‘डस्ट एलर्जी’ से खाँस-खाँसकर मेरा बुरा हाल होता। शायद धूल ‘उड़ने’ के ही डर से वहाँ झाड़ू न लगाई जाती हो।

फिर हम कमरा नम्बर 34 में पहुँचे। वंदना ब्लड सैम्पल देने के लिए लाइन में लगी और मुझसे कहा कि मैं पता करके आऊँ कि एक्स रे कहाँ होता है, जिससे कमरा ढूँढने में ज़्यादा समय ना व्यर्थ हो। मैंने उस बिल्डिंग से निकलकर गार्ड भैया से पूछा कि एक्स रे कहाँ होता है, उन्होंने कहा कि ‘जी होता तो दो जगह है। एक ऊपर, एक नीचे। आपको कहाँ जाना है?’ मैंने पर्ची को ध्यान से देखा, उस पर कहीं भी नहीं लिखा था कि एक्स रे किस नम्बर के कक्ष में करवाना है। मेरे साथ एक और महिला थी, जिसे अपनी सास का एक्स रे करवाना था। लोअर मिडिल क्लास में बच्चों और वृद्ध घरवालों को दिखाने औरतें ही अस्पताल का चक्कर लगाती हैं। मेरी कामवाली भी अक्सर अपने बच्चे को डॉक्टर के पास ले जाने के लिए छुट्टी लेती रहती है।

खैर हम दोनों दूसरे तल पर रूम नंबर 137 में पहुँचे। थोड़ी देर लाइन में लगे रहे। जब कक्ष से एक ‘परोपकारी क़िस्म का’ लड़का निकलकर कुछ लोगों के पर्चे देख रहा था, तो मेरे साथ की महिला ने अपना पर्चा भी दिखाया। पता चला ‘ये वाला’ एक्सरे नीचे रूम नम्बर 32 में होगा। मुझे ये नहीं समझ में आ रहा था कि अस्पताल वाले एक ही जगह ‘सब तरह’ के एक्स रे करवाने का प्रबंध करवा देते, तो इनका क्या बिगडता? लगे हाथ मैंने भी अपना पर्चा दिखाया और उसने मुझे भी नीचे जाने को कहा। नीचे जाते हुए ही वंदना का फोन आया कि यहाँ का काम खत्म हो गया। आप कहाँ हो? मैंने कहा अभी आती हूँ। मैं अक्सर रास्ते भूल जाती हूँ। इस बार भी भूल गयी। दूसरे दरवाजे से बाहर के गेट की ओर निकल गयी, फिर घूमकर वंदना की बिल्डिंग पहुँची और फिर उसे लेकर रूम नम्बर 32 में।

वहाँ फिर वही चक्कर। पहले नम्बर के लिए लाइन में लगना और फिर एक्स रे करवाने के लिए। इस बार फिर वंदना को लाइन में लगने को कहकर मैं अल्ट्रासाउंड वाले कमरे को ढूँढने निकल पड़ी। भला हो 137 वाले ‘परोपकारी’ लड़के का कि उसने इस पर्ची में नम्बर डाल दिया था- 128। मैं घुमावदार गलियों से होते हुए किसी तरह 128 के पास पहुँची, लेकिन थोड़ी दूर से ही वापस आ गयी कि कहीं भटककर दूसरे गेट से बाहर न निकल जाऊं। मुझे ये अस्पताल भूल-भुलैय्याँ की तरह लग रहा था।

मैं वापस वंदना के पास आकर खड़ी हो गयी और माहौल का जायजा लेने लगी। सरकारी अस्पतालों में ज़्यादातर ऐसे लोग जाते हैं, जिन्हें छूना और उनके आस-पास होना तक हम बर्दाश्त नहीं करते। उनके शरीर से पसीने की गंध आती है क्योंकि वो लोग ‘डीयो’ ‘अफोर्ड’ नहीं कर सकते। उन गंदे-मंदे, गन्हाते-बसाते लोगों के बीच से अगर कोई स्मार्ट, कान्फिडेंट और साफ-सुथरा आदमी या औरत निकलती दिखती थी, तो वो डॉक्टर होता/होती थी। उसके गले में लटक रहा स्टेथोस्कोप बोले तो ‘आला’ इस बात की ताकीद कर रहा होता। मुझे अलग ‘खाली’ खड़े देखकर एक औरत मेरे पास आयी और कमरा नम्बर 4 किधर है, पूछने लगी। उसके साथ एक बेहद बूढ़ी औरत थी, जिसे वह अम्मा कह रही थी। उसका कहना था कि “अम्मा को भर्ती कराना है।” मेरा दिमाग घूम गया। मैंने न में सिर हिलाया और सोचा कि ‘काश, मालूम होता कि कमरा नम्बर 4 किधर है, तो इस थकी-मांदी हताश सी दिखने वाली महिला की कुछ मदद कर सकती। मुश्किल से चल पा रही बूढ़ी औरत को लेकर बेचारी कहाँ-कहाँ भटकेगी?’

मेरे चिंतन में डूब जाने पर वो औरत वहाँ से चली गयी। थोड़ी देर बाद मैंने वंदना से कहा कि मैं बाहर जा रही हूँ। मुझे वहाँ घुटन हो रही थी और चाय पीने के तलब भी लग रही थी। बाहर आकर चाय पीते हुए मैंने सोचा कि आज इस पर पोस्ट लिखूँगी और धडाधड दो-तीन फोटो खींच लिए। बहुत से लोग दिल्ली/एन.सी.आर. के ग्रामीण इलाकों से इन सरकारी अस्पतालों में आते हैं। कई लोग पेड़ों के नीचे बैठे थे तो कई लोग गत्ता और चादर बिछाकर लेटे हुए थे। मुझे रेलवे प्लेटफार्म याद आने लगा। मैं वापस चिंतन मुद्रा में चली गयी- ‘ज़िंदगी एक प्लेटफार्म ही तो है, मुसाफिर आते हैं, जाते हैं, गाडियाँ आती-जाती हैं। या अस्पताल है…?’

मैंने जूस खरीदा और वंदना को ले जाकर दिया। वो खाली पेट घर से गयी थी। मैंने अगर हचक के “हैवी ब्रेकफास्ट” ना लिया होता, तो शायद मैं भी अगले दिन ओ.पी.डी. में किसी डॉक्टर को दिखाने की लाइन में लगी होती। मैंने वंदना से कहा “कैसा अस्पताल है ये? यहाँ तो मरीज टेस्ट करवाते-करवाते ही मर जाय।” हद है।

इस सारे घटनाक्रम में सबसे अच्छी लगी एक्स रे कर रही लड़की। वो इतनी तेजी और तन्मयता से अपना काम कर रही थी कि जी खुश हो गया। जब उसने नाम पुकारा तो हमें लगा कि ये दुबली-पतली सी लड़की ‘नाम पुकारने के लिए’ ही रखी गयी है। लेकिन अन्दर गए, तो देखा कि वो अकेली ही बुलाने का काम भी कर रही थी और एक्स रे लेने का भी। वो एक मरीज का नाम बुलाती…फलां कौन है? मरीज आगे बढ़ता। लड़का/आदमी होता तो कहती “शर्ट उतार दो” उसको एक्स रे लेने वाली जगह पर खड़ा करके कहती “ठुड्डी इसके ऊपर रखो…पैड को दोनों हाथों से पकड़ो…साँस ज़ोर से खींचकर रखना और रोके रखना”…फिर मशीन पर जाती, बटन दबाती और कहती “हो गया”। इसके बाद तेजी से एक्स रे फिल्म निकालकर उस पर पर्ची लगाकर अलग रखती और दूसरा नाम पुकारती…एक-एक मरीज को लड़की दो-तीन मिनट में निपटा रही थी। वंदना मुझे भी अन्दर ले गयी थी, तो मैंने उसकी कार्यकुशलता को ध्यान से देखा। मैं अनुमान नहीं लगा पा रही थी कि इस छोटी सी, महीन आवाज़ वाली लड़की ने सुबह से कितने मरीज़ ‘निपटाए’ होंगे? ईमानदारी से काम करने वाले हर जगह मिल जाते हैं 🙂

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एल.एन.जे.पी. अस्पताल का इमरजेंसी विभाग

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ज़मीन पर बैठे लोग

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बैठने के लिए चादर बिछाती औरत

कुछ प्रश्न

कुछ प्रश्न हैं, जो अक्सर मस्तिष्क में उमड़-घुमड़ मचाते हैं, लेकिन अफ़सोस उनका जवाब नहीं मिलता। गर किसी के पास किसी एक प्रश्न का उत्तर हो तो बताए प्लीज़-
1. -मुस्लिम आतंकवाद का राग अलापने वालों को हिंदू आतंकवाद क्यों नहीं दीखता और हिंदू आतंकवाद की बात करने वाले मुस्लिम आतंकवादियों की बात पर चुप क्यों हो जाते हैं?
2. -अफज़ल गुरु के लिए मानवाधिकार की दुहाई देने वाले, संसद हमले में शहीद पुलिसवालों की बात क्यों नहीं करते और उन पुलिस अधिकारियों के घरवालों के प्रति सहानुभूति रखने वालों को अफज़ल गुरु के घरवाले क्यों नहीं दिखाई देते?
3. -गुजरात दंगों की बात करने वालों को चौरासी के दंगे या कश्मीरी पंडितों का अपनी ज़मीन-जायदाद छोड़कर रिफ्यूज़ी कैम्पों में रहना क्यों नहीं दीखता और कश्मीरी पंडितों के दर्द को महसूस करने वालों को गुजरात में सरेआम हुआ कत्लेआम क्यों नहीं दीखता?
4. -नक्सली हिंसा में मरने वाले पुलिसवालों से सहानुभूति रखने वालों को पुलिसवालों द्वारा सोनी सोढी और ऐसे ही अन्य आदिवासियों पर किये गए अत्याचार नहीं दिखाई क्यों नहीं देते और सोनी सोढी के हक के लिए लड़ने वाले लोगों को नक्सलियों द्वारा बेरहमी से मार दिए गए पुलिसवालों से सहानुभूति क्यों नहीं होती?
5.- कश्मीरियों के लिए आत्मनिर्णय का समर्थन करने वाले ये क्यों भूल जाते हैं कि पूर्वोत्तर के भी बहुत से राज्य भारतीय संघ में कई शर्तों के साथ सम्मिलित किये गए थे, उनके आत्मनिर्णय का क्या? अगर कश्मीर अलग होगा तो क्या पूर्वोत्तर में अलगाव की माँग नहीं उठेगी? तमिलनाडू जो शुरू से भारत के विरुद्ध जाकर श्रीलंका में सिंघलियों के विरुद्ध तमिल लोगों की हिंसा का समर्थन करता रहता है उसका क्या?

मेरे सवालों की लिस्ट बहुत लंबी है…पर अभी बस यही सवाल! मैं न भाजपाई हूँ, न कांग्रेसी और न कम्युनिस्ट. मैं एक आम भारतीय नागरिक हूँ, जिसे हर पीड़ित का दुःख अपना दुःख लगता है, जो आतंकवाद की घटना या सामूहिक बलात्कार की घटना के बारे में सुनकर, गाना सुनना और खाना खाना भूल जाती है. बस सोचती रहती है कि जिनके घर के लोग मारे गए या शोषण का शिकार हुए, वो कैसे होंगे? जानती हूँ कि ये अति संवेदनशीलता है लेकिन होते हैं कुछ लोग ऐसे भी.
मुझे ये बात समझ में नहीं आती कि लोग आतंकवाद और मानवाधिकार के मामले में सेलेक्टिव कैसे हो सकते हैं?

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