आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

Archive for the category “आस-पड़ोस”

सडकों पर जीने वाले

हर शनिवार मोहल्ले में सब्जी बाज़ार लगता है. वहीं सब्जी बेचता है वो. इतना ज़्यादा बोलता है कि लडकियाँ उसको बदतमीज समझकर सब्जी नहीं लेतीं और लड़के मज़ाक उड़ाकर मज़े लेते हैं. मैं उससे सब्जी इसलिए लेती हूँ क्योंकि उनकी क्वालिटी अच्छी होती है. मुझे देखकर दूर से ही बुलाता है. कभी ‘बहन’ कहता है कभी ‘मैडम’. मैंने एक दो बार नाम पूछा तो हँस दिया. नाम नहीं बताया आज तक.

पहले बहुत ज़्यादा बीड़ी पीता था. मैं हमेशा टोकती थी, तो मुझे देखकर बीड़ी बुझा देता था. एक-डेढ़ साल पहले से उसे खाँसी रहने लगी. मैंने उससे कहा भी कि तुम जिस तरह से खाँस रहे हो, मुझे लगता है फेफड़े ठीक नहीं हैं तुम्हारे. डॉक्टर को दिखाने के लिए बोला तो बात हँसी में उड़ा दी. करीब छः महीने पहले उसकी आवाज़ बदल गयी. मैंने पूछा “दर्द होता है” बोला नहीं. मैंने कहा कि किसी अच्छे डॉक्टर को दिखाओ नहीं तो कैंसर हो जायेगा. दो बच्चे हैं उसके, बताया था उसने. मैंने उसे बच्चों का वास्ता दिया. इस पर बस चुप हो गया.

उसके बाद दो हफ्ते दिखा ही नहीं. फिर जब दिखा तो अपने आप से बताया “डॉक्टर को दिखाया मैने. दवा लम्बी चलेगी. डॉक्टर बोला ‘बीड़ी पिएगा तो आवाज़ चली जाएगी’, तो बीड़ी भी कम कर दिया” मुझे बहुत ख़ुशी हुयी उसकी बात सुनकर. उसके अगले हफ्ते उसकी आवाज़ काफी ठीक हो गयी. स्वस्थ भी लगने लगा. लेकिन सब्जी न लगाने की वजह से काम कम हो गया. सब्जी की क्वालिटी भी कुछ हल्की लगी, फिर भी मैं उसी से सब्जी लेती रही. धीरे-धीरे उसने फिर से काम जमा लिया है.

आज सब्जी लेने गयी तो सीधे उसके पास पहुँची. मैंने बीन्स माँगी तो उसने मना कर दिया क्योंकि बीन्स की क्वालिटी अच्छी नहीं थी. मैंने उससे कहा भी कि दे दो मैं छाँट लूँगी लेकिन वो नहीं माना. उदास होकर बोला किसी को नहीं दिया बहन, पूरी बोरी ख़राब निकल गयी. लेकिन गलत सौदा नहीं दूँगा अपने गाहकों को. खैर, मैंने उससे दूसरी सब्जियाँ लीं और लौटने लगी.

एक बूढ़े व्यक्ति हैं. अदरक, मिर्च, लहसुन बेचते हैं. राजनीति की बड़ी बातें करते हैं. उनसे मैं तीखी वाली मिर्च लेती हूँ. आज पूछा तो कहने लगे “तीखे की गारंटी नहीं है आज की मिर्च में” मैंने कहा कोई बात नहीं दे दीजिये. एक लड़की ने आकर धनिया का दाम पूछा तो सीधे बोले “बिटिया धनिया सूख गयी है. लेने लायक नहीं है”

कई बार ऐसा हुआ है कि किसी रिक्शे वाले को नियमित किराये से ज़्यादा पैसे दिए हैं, तो उसने ईमानदारी से लौटा दिए. एक बार गलती से फुटकर पैसे लेकर नहीं गयी. पास में दो हज़ार की नोट थी और रिक्शे वाले के पास इतने पैसे खुल्ले नहीं थे. उसने कहा “मैडम, मोहल्ले में ही तो खड़ा रहता हूँ. फिर दे देना.” एक चाय वाले बाबा हैं. रात में दोस्त के साथ वहाँ चाय पी थी. लगभग दो महीने बाद हम दोबारा चाय पीने गए तो बाबा ने पैसे नहीं लिए और दस रूपये वापस दिए. बोले “पिछली बार बीस की जगह पचास रूपये दे गये थे आप.”

मैं इस पोस्ट के अंत में कोई ‘नैतिक शिक्षा’ नहीं देने वाली हूँ, लेकिन जबसे सब्जी बाज़ार से लौटकर आई हूँ सोच नहीं पा रही हूँ कि वो लोग, जो देश के हजारों करोड़ रूपये हड़पकर ऐशो आराम की ज़िन्दगी बिता रहे होते हैं या विदेश भाग जाते हैं, वो लोग किस मिटटी के बने होते हैं? उन्हें रात में नींद आती होगी क्या?

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शनिवार की सब्जी बाज़ार

कहाँ जाएँ?

कल की बात है. डॉ के यहाँ जाना ज़रूरी न होता तो घर से ज्यादा दूर निकलती ही नहीं, लेकिन मजबूरी हमसे जो कुछ भी कराये कम है. तीन-चार दिन से धुएं की वजह से जुगनू (मेरा पपी) की आँखों से पानी बह रहा था, इसलिए उसको भी दोपहर बारह बजे टहलाया वो भी सिर्फ पन्द्रह-बीस मिनट. डॉ के यहाँ जाने के लिए ऑटो लिया. मुँह पे मास्क देखकर ऑटो वाले भैया ने प्रदूषण के बारे में बातचीत शुरू कर दी. वैसे आजकल अधिसंख्य लोगों की बातचीत का मुख्य विषय आसपास फैली धुएँ की चादर ही है.

ऑटो वाले भैया ने पूछा मास्क कितने का मिलता है? मैंने उन्हें बताया कि इस मास्क का इस ज़हरीली हवा में कोई मतलब नहीं है, ये तो मैं धूल से बचने के लिए पहनती हूँ. फिर वो बताने लगे कि तीन-चार दिन से उनकी आँखों में मिर्ची सी लग रही है. खाँसी-जुकाम ठीक ही नहीं हो रहा है. मैंने उनसे पूछा पान क्यों खाते हैं, तो बताया ‘गला तर रखने के लिए.’ सफाई भी दी कि दिन में दो-तीन से ज्यादा नहीं खाते. उनको बच्चों की चिंता थी. कहने लगे कि बच्चों के अंग कोमल होते हैं, उनको ज्यादा परेशानी हो रही है. मैंने उन्हें सलाह दी कि कुछ दिन बच्चों को स्कूल न भेजें. सोचिये, कहाँ तो लोगों को बच्चों को स्कूल भेजने के लिए प्रेरित करती रहती हूँ, कहाँ उनको पढ़ने से रोकने के लिए कह रही हूँ. मन हुआ कि दिल्ली छोड़ देने की सलाह दूँ, लेकिन किस मुँह से दूँ. प्रदूषण से हरदम गला खराब रहने के बाद भी मैं ही कहाँ छोड़ पा रही हूँ. आखिर, रोजी-रोटी है हमारी यहाँ और फिर कौन-कौन सी जगहें छोड़ेंगे हम. ये तो हवा है, कहीं भी पहुँच जायेगी.

मैंने रिक्शे वाले भैया को दो कुछ नसीहतें दीं. पान में धीरे-धीरे तम्बाकू की मात्रा कम करें, गले के लिए मुलेठी चूसें और भाप लें और एक प्रदूषण वाला मास्क खरीद लें. और मैं क्या कर सकती हूँ. गंतव्य तक पहुँचते-पहुँचते रिक्शे वाले भैया मेरे गृह जनपद के पड़ोसी निकले. बड़े खुश हुए मिलकर. मैंने उन्हें अलविदा कहा और उनकी बातों पर गौर करने लगी. वो कह रहे थे कि मौसम विभाग झूठ कह रहा है कि ये कोहरा है. कोहरा आँखों में चुभता नहीं, उसे मिर्ची की तरह जलाता नहीं. उनसे क्या कहती कि हम आज न जाने कितने ही आँखों देखे झूठों को जी रहे हैं. हम देख कुछ और रहे हैं, महसूस कुछ और कर रहे हैं और हमें बताया कुछ और जा रहा है. खैर…

मुहल्ले में बहुत पेड़-पौधे हैं, तो धुएं का पता नहीं चलता. शहर में निकलकर पता चला कि किसी ‘Post Apocalypse Film’ जैसे माहौल में रह रहे हैं, जहाँ साँस लेने लायक ऑक्सीजन नहीं बचती. घरों-संस्थानों के अन्दर कृत्रिम ऑक्सीजन ढंग से ऑक्सीजन पैदा किया जाता है और घर के बाहर बिना ऑक्सीजन मास्क के नहीं निकला जा सकता.

धुआँ आँख-नाक और मुँह को छीलता हुआ अन्दर जाता है. पता नहीं मेरे साथ ही ऐसा हो रहा है या और लोगों के साथ भी. पहले की तरह मुझे लौटने के लिए एक घर न होने पर रोना नहीं आता था, कल आ रहा था. अगर वापस जाने का कोई ठिकाना होता तो मैं लौट जाती. लेकिन लोग पर्यावरण को लेकर इतने असंवेदनशील हैं कि वहाँ भी स्थिति यहाँ के जैसी होने में देर नहीं लगेगी. फिर वही बात ‘मरकर भी चैन न आया तो कहाँ जायेंगे?’

ऊपर वाले

कोई रात के तीन बजे होंगे जब ऊपर से लड़ने-झगड़ने और चीज़ें तोड़ने-पटकने की आवाजें आने लगीं. मैं समझ गई कि टॉप फ्लोर वाले आज फिर झगड़ने के मूड में है. पहले “धम्म” से कोई चीज़ ज़मीन पर गिरी, फिर स्टील की चम्मच-प्लेटें गिरने की आवाजें और सबसे आखिर में “छन्नऽऽ” का शोर. मतलब ऊपर वाली लड़की भी मेरी तरह अपना गुस्सा बेचारी क्रॉकरी पर उतार रही है. ‘आज नींद आ चुकी’ मैंने सोचा और उठकर एक किताब पढ़ने लगी.

थोड़ी देर बाद दरवाजा खुलने और फिर बंद होने की आवाज़ आई. शायद लड़की ने लड़के को कमरे से बाहर निकाल दिया था. वो पहले तो धीरे-धीरे दरवाजा खटखटाकर दबी आवाज़ में “ओपन द डोर-ओपन द डोर” कहता रहा. करीब पन्द्रह मिनट बाद उसके सीढ़ियों से नीचे जाने की आवाज़ सुनाई दी. मैंने चैन की सांस ली, किताब उठाकर टेबल पर रखी, टेबल लैम्प बंद किया और सोने की कोशिश करने लगी. अचानक फिर दरवाजा खुलने की आवाज़ आई. लड़की बालकनी में खड़े होकर रो-रोकर लड़के से वापस आने के लिए कह रही थी. उसकी सारी बातें मुझे सीढ़ियों के रोशनदान से सुनाई दे रही थीं, जबकि वह अपनी समझ से काफी धीरे बोल रही थी. शायद लड़का नीचे गली में या सामने वाले पार्क में ही था. पांच मिनट में हाज़िर हो गया. मैं डर गई कि कहीं फिर से लड़ाई-झगड़ा न शुरू हो जाय. लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

ऊपर वाले बच्चे अरुणाचल प्रदेश के हैं और मेरे मकान मालिक के प्रिय हैं. मकान मालिक की ख़ास बात यह है कि वे अपने कमरे नॉर्थ ईस्ट के छात्रों को देना पसंद करते हैं क्योंकि वे अपने से मतलब रखते हैं. ऊपर वाला कमरा लड़की ने किराए पर ले रखा है, उसका दोस्त आता-जाता रहता है और हफ्ते-दस दिन में उनके घमासान युद्ध की वजह से मेरी नींद खराब हो जाती है. कभी-कभी गुस्सा आता है, लेकिन फिर सोचती हूँ ‘जाने दो. वैसे ही प्यार के दुश्मन क्या कम हैं ज़माने में, जो मैं भी बन जाऊं.’ 🙂

दूसरे दिन शाम को मकान मालिक मेरे यहाँ आये, तो बातों ही बातों में पूछने लगे “आपको ऊपर वाली लड़की से कोई परेशानी तो नहीं है?” मैंने कहा “नहीं तो, क्यों?” “क्योंकि इसका दोस्त जहाँ रहता है (जाहिर है वह कमरा भी इन्हीं का है) वहाँ अक्सर इन दोनों में लड़ाइयाँ होती रहती थीं. आस-पड़ोस वाले काफी शिकायत करते थे.” “नहीं, ऐसी कोई ख़ास परेशानी तो नहीं.” कहते-कहते मेरे मुँह तक रात वाली बात आ ही गई थी. फिर जाने क्या सोचकर रुक गई. उन्होंने मानो खुद को विश्वास दिलाने के लिए पूछा, “पक्का?” मैंने जवाब दिया. “हाँ, पक्का!” उनको देखकर लगा जैसे उन्होंने चैन की सांस ली हो. जाते-जाते कहने लगे, “अगर थोड़ी बहुत परेशानी हो तो इग्नोर कीजियेगा. कुछ ही दिन पहले लड़की की माँ की कैंसर से डेथ हुयी है. बहुत स्ट्रेस में है बेचारी.”

उनके जाने के बाद मैं रात वाली घटना के बारे में दोबारा सोचने लगी. किसी की पृष्ठभूमि पता चल जाने के बाद कैसे हमारा नज़रिया उसके प्रति बदल जाता है. अब मुझे ऊपर वालों पर बिलकुल गुस्सा नहीं आ रहा था. वैसे आस-पड़ोस वालों की बातें नहीं सुननी चाहिए, लेकिन जब बातें अपने आप कानों में पड़ें तो क्या किया जाय 🙂

चाइनीज़ खाने का स्वाद, ग्लूटामेट और मैगी विवाद

लगभग एक साल पहले हम तीन लडकियाँ (वैसे आप महिलायें भी कह सकते हैं 😀 ) अपने एक मित्र को देखकर हिन्दू राव अस्पताल से लौट रहे थे. मित्र तेज बुखार के चलते दो दिन से अस्पताल में भर्ती थे. बाकी दोनों लडकियों को जी.टी.बी. नगर स्टेशन से मेट्रो पकड़नी थी और मुझे ऑटो. इसलिए हमलोग कैम्प तक साथ आये. वहां पहुँचते-पहुँचते शाम के सात बज चुके थे और संयोग से हम तीनों ही अकेले रहने वाली हैं तो हमने सोचा कि घर जाकर बनाने से अच्छा बाहर खाकर चलते हैं.
तय किया गया कि चाइनीज़/मंचूरियन खाया जाय. हम एक रेस्टोरेंट में घुस गए और चाइनीज़ फ्राइड राईस और मंचूरियन के साथ स्वीट कॉर्न सूप का ऑर्डर दिया. सूप काफी गाढ़ा था. आमतौर पर मुझे गाढ़ा सूप पसंद नहीं है, लेकिन जब चखा तो जैसे आत्मा तृप्त हो गयी. इतना टेस्टी सूप मैंने पहले कभी नहीं पिया. खाना खाकर और हमेशा की तरह बचा हुआ खाना पैक करवाकर हम वहां से निकले. एक ने तो मेट्रो पकड़ ली और दूसरी जो मेरी बचपन की सहेली है, मेरे साथ मेरे घर आ गयी. देर रात तक हमने चाय पी-पीकर खूब गप्पें मारीं. रात में खाना बनाने से छुट्टी हो तो कितना हल्का-हल्का सा महसूस होता है ये वही जान सकता है जिसे रोज़ सुबह से ही रात के खाने के बारे में सोचना शुरू कर देना पड़ता है.
दूसरे दिन जब मैं सोकर उठी तो चेहरा बहुत भारी-भारी सा लग रहा था और आँखें पूरी नहीं खुल रही थीं. शीशे में देखा तो चौंक गयी. पूरा चेहरा सूजा हुआ था और आँखें छोटी हो गयी थीं. वैसे ये समस्या मेरे लिए नई नहीं है. एलर्जिक शरीर होने के नाते कभी-कभी ऐसा हो जाता है. अक्सर पीरियड्स के आसपास भी चेहरे में सूजन आ जाती है लेकिन इतना भारीपन नहीं होता. सिर अजीब ढंग से दुःख रहा था और नींद सी आ रही थी. हालांकि सहेली को मेरा चेहरा ज्यादा सूजा नहीं लग रहा था, लेकिन मुझे महसूस हो रहा था. खैर, मैंने सोचा की अभी सोकर उठी हूँ. थोड़ी देर में ठीक हो जाएगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ.
सहेली दोपहर तक चली गयी. मेरा चेहरे की सूजन और सिर दर्द शाम तक नहीं ठीक हुआ, तो मुझे थोड़ी चिंता हुई. मैंने नेट ऑन करके swollen face गूगल करना शुरू किया. उसमें मुझे जो जानकारी मिली, उसे पढ़कर मैं चौंक गयी. मैंने chinese restaurant syndrome के बारे में पढ़ा. यह एक समस्या है, जो कि माना जाता है कि Monosodium glutamate (MSG)  (लोकप्रिय नाम अजीनोमोटो) नामक तत्व के कारण होती है. मोनोसोडियम ग्लूटामेट सूप और नूडल्स जैसे खानों में अच्छे स्वाद के लिए मिलाया जाता है. हालांकि अभी इस पर पूरी तरह शोध नहीं हुआ है और यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि उक्त समस्या का कारण MSG ही है. आश्चर्य तो मुझे हो रहा था लेकिन साथ ही हंसी आ रही थी कि कहीं ये चीन वालों की सबको “चीनी” बनाने की साजिश तो नहीं….क्योंकि कसम से मेरा चेहरा बिलकुल चाइनीज़ लग रहा था 😀 . खैर, उस दिन तो रात हो गई थी. मैंने तय किया कि अगले दिन डॉ के पास जाकर पूछूंगी कि कोई खतरे की बात तो नहीं है क्योंकि मुझे पहले से ही फूड एलर्जी है और दूध, दूध से बने पदार्थ और नट्स आदि खाना मना है. लेकिन दूसरे दिन तक लक्षण कम हो गए थे और तीसरे दिन तक लगभग समाप्त.
जब मैगी पर इसी तत्व को लेकर बैन लगा तो मुझे बहुत आश्चर्य हुआ क्योंकि मैगी खाकर कभी भी इस तरह की कोई समस्या मुझे नहीं हुई. जाहिर है की यदि उसमें एम्.एस.जी. होगा भी तो उसकी मात्रा बहुत कम होगी. मैगी तो एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी का उत्पाद है इसलिए उसकी जांच हुई और उस पर बैन लगा दिया गया और ये रेस्टोरेंट वाले चाइनीज़ खाने में जो भर-भरके MSG डाल रहे हैं, उन पर बैन क्यों नहीं लगता? जांच क्यों नहीं होती? असल में, आमतौर पर लोगों को कोई समस्या ही नहीं होती और सौ में से एक किसी को होती भी है, तो उसे जानकारी ही नहीं होती. लेकिन यह भी बात तो सही है की यूँ तो सभी डिब्बा बंद उत्पादों और बाहर के खानों में कुछ न कुछ रासायनिक तत्व होते ही हैं. सब्जी और फल भी तो कीटनाशकों और रासायनिक खादों के कारण प्रदूषित होते हैं .उनमें फ्रूट हारमोंस डालकर पकाया या बड़ा किया जाता है, वह भी तो नुकसानदायक ही है. हम किस-किस चीज़ से बचेंगे और किस तरह से बचेंगे?

दिए के जलने से पीछे का अँधेरा और गहरा हो जाता है…

फिर फिर याद करना बचपन की छूटी गलियों को…

आराधना का ब्लॉग

मैं शायद कोई किताब पढ़ रही थी या टी.वी. देख रही थी, नहीं मैं एल्बम देख रही थी, बचपन की फोटो वाली. अधखुली खिड़की से धुंधली सी धूप अंदर आ रही थी. अचानक डोरबेल बजती है. मैं दरवाजा खोलती हूँ, कूरियर वाला हाथ में एक पैकेट थमाकर चला जाता है. मैं वापस मुडती हूँ, तो खुद को एक प्लेटफॉर्म पर पाती हूँ.

मैं अचकचा जाती हूँ. नंगे पैर प्लेटफॉर्म पर. कपडे भी घरवाले पहने हैं. अजीब सा लग रहा है. मेरे हाथ में एक टिकट है. शायद कूरियर वाले ने दिया है. अचानक एक ट्रेन आकर रुकती है और कोई अदृश्य शक्ति मुझे उसमें धकेल देती है. मैं ट्रेन में चढ़ती हूँ और एक रेलवे स्टेशन पर उतर जाती हूँ. ये कुछ जान जानी-पहचानी सी जगह है. हाँ, शायद ये उन्नाव है. मेरे बचपन का शहर. लेकिन कुछ बदला-बदला सा.

मुझे याद नहीं कि मैं इसके पहले मैं यहाँ…

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कितनी सदियाँ, कितने देश

‘प्यार का पंचनामा’ फिल्म देख रही थी. वैसे तो ये फिल्म पूरी तरह लड़कों के दृष्टिकोण से बनी है और लड़कियों को जिस तरह से चित्रित किया गया है, उसे देखकर गुस्सा भी आ रहा था, लेकिन बहुत हद तक ये फिल्म महानगरों में रहने वाली उच्च-मध्यमवर्गीय नयी पीढ़ी की जीवन-शैली को प्रतिबिंबित करती है. बहुत सोचने पर भी मुझे अपने आस-पास कोई ऐसी लड़की नहीं दिखी, जो फिल्म में दिखाई गयी नए ज़माने की बोल्ड लड़कियों के आस-पास भी ठहर सके.

मैं भी अजीब हूँ. फिल्म के पात्रों को वास्तविक जीवन में ढूँढ़ रही हूँ. लेकिन फ़िल्में कोई हवा में तो बनायी नहीं जातीं. फिल्मकार को कहीं न कहीं से तो पात्रों की प्रेरणा मिली होगी. तो कहाँ होती हैं ऐसी लड़कियाँ? मैं भी दिल्ली में रहती हूँ, मुझे तो नहीं दिखतीं. या हो सकता है कि मैं अब पुरानी पीढ़ी की हो गयी हूँ और मेरे बाद की कई पीढियाँ इस शहर में रहने लगी होंगी या फिर उनकी मेरी जीवन-शैली में इतना अंतर है कि मेरी सोच वहाँ तक नहीं पहुँच सकती.

वैसे तो दिल्ली में आते-जाते लड़कियों को देखती ही हूँ, लेकिन जबसे पढ़ाने जाने लगी हूँ और करीब से देखने का मौका मिल रहा है. इस महानगर में कई-कई शहर बसते हैं और वो भी कई-कई सदियों में. आमतौर पर बाहर के लोग ये समझते हैं कि डी.यू. की लड़कियाँ माडर्न और बोल्ड होती हैं, भकाभक सिगरेट फूँकती हैं और कुछ-कुछ दिनों पर ब्वायफ्रैंड बदलती रहती हैं. हाँ, ऐसी लड़कियाँ भी होती हैं, और आज से नहीं बहुत पहले से रहती हैं. लेकिन यह वर्ग सिर्फ बीस-पच्चीस प्रतिशत लड़कियों का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें इस महानगर तथा दूसरे महानगरों से आयी उच्च-मध्यमवर्गीय लड़कियां हैं.

लेकिन इन लड़कियों से अलग बहुत बड़ी संख्या में ऐसी लड़कियाँ हैं, जो अब भी अपनी पढ़ाई के लिए रोज़-रोज़ लड़ाई लड़ती हैं. फर्स्ट इयर की कक्षा में एक लड़की है, जो मेरठ से रोज़ ट्रेन से कॉलेज आती है पढ़ने के लिए. एक है जो जींस के ऊपर कुरता और दुपट्टा डालती है, पूछने पर जवाब मिला, “जींस हमारी च्वाइस है और कुरता-दुपट्टा माँ-पापा की.” कितनी आसानी से रोज़ के संघर्ष से जूझती लड़कियाँ बताती हैं अपने उस संतुलन के बारे में जो उन्होंने बड़ी सफाई से परम्परा और आधुनिकता के बीच आज भी बिठा रखा है. और मज़े की बात है कि ये उस महानगर के अन्दर है जो आधुनिक फैशन का गढ़ माना जाता है. जहाँ की लड़कियों की आधुनिक पोशाकें बाकी देश की लड़कियों के लिए फैशन गढ़ती हैं.

यहीं इस महानगर के बीचों-बीच कुछ गाँव हैं, जहाँ आज भी पुरानी परम्पराएँ जारी हैं. जहाँ के अभिभावक अपनी बेटियों को गर्ल्स कॉलेज में ही पढ़ने भेजते हैं. उन लड़कियों को सीधे कॉलेज जाना और वहाँ से सीधे वापस आना होता है. लड़कों से हँसना-बोलना तो दूर उन्हें देख भी नहीं सकतीं. यहीं ऐसी लड़कियाँ भी हैं जिन्हें सहेलियों के साथ भी सिनेमा जाने की छूट नहीं है. अगर कभी गयीं भी तो परिवार के साथ. आश्चर्यचकित होती हूँ ये सब देखकर कि क्या ये दिल्ली है?

हाँ, ये दिल्ली है, जहाँ एक साथ कई शहर बसते हैं अपने अन्दर कई सदियाँ लिए हुए. यहाँ कुछ इलाके अब भी पिछली सदी में जी रहे हैं, तो इसमें आश्चर्य की क्या बात है? इस देश में भी तो कई देश हैं, जो कई सदियों पीछे चल रहे हैं. यहीं पर प्रेमी-प्रेमिका को मौत का फरमान सुनाने वाली पंचायतें भी तो हैं. वे किस सदी में बनी थीं?

मीत के गुण्डा की गुण्डई के किस्से

फेसबुक पर मीत  ने हमको ‘गुण्डा’ नाम दिया है, जो कि हमारे स्वभाव को पूरी तरह चरितार्थ करता है 🙂 मीत कौन हैं? इनसे हमारा परिचय करीब साढ़े तीन साल पहले ब्लॉग लिखते-लिखते हुआ था. इनका एक ब्लॉग हुआ करता था (अब पता नहीं कहाँ गया?)- ‘किससे कहें.’ उस पर ये पुराने फ़िल्मी गीत, ग़ज़लें, गीतकारों और गजलकारों के किस्से और न जाने क्या-क्या छापा करते थे. कुछ पहेलियाँ भी पूछते थे. ऐसी ही किसी पहेली का जवाब सही-सही देने के बाद हमारा इनसे परिचय हो गया. (ये हमने आज तक किसी से नहीं बताया था कि हमको ये बहुत अच्छे लगते थे :)) खैर, मीत हमको ‘गुण्डा’ कहते हैं , तो हम अपनी गुण्डई के कुछ किस्से सुनायेंगे और आपको सुनना पड़ेगा नहीं तो हम कैसे गुण्डा?

(किस्सा नंबर एक)

ये इलाहाबाद की घटना है. मैं अपने एक दोस्त के साथ ‘धूम’ फिल्म देखने गौतम सिनेमाघर गयी. और हमेशा की तरह किनारे (कार्नर नहीं :)) वाली सीट पर बैठी. फिल्म अभी शुरू ही हुयी थी कि पीछे की सीट से एक लड़का उठकर बाहर गया और जाते-जाते मेरे कंधे को छूता गया. पहली बार मैंने सोचा कि हो सकता है कि हाथ गलती से लग गया हो. लेकिन वापस लौटने पर उसने फिर वही हरकत की. मैंने अपनी सीट से खड़े होकर तुरंत उसे टोका, “तुमने हाथ क्यों लगाया?” वो डर तो गया लेकिन अपनी गलती न मानते हुए लड़ने लगा, “गलती से लग गया होगा.” मैंने कहा, “गलती से एक बार हाथ लगता है दुबारा नहीं.” मेरा दोस्त भी उससे झगड़ पड़ा और कहा, ‘माफी माँगो’ इस पर वो लड़का भड़क गया. उसके दोस्त जब खड़े हुए तो पता चला कि वो करीब सात-आठ थे. शायद इसीलिये इतना अकड़ रहे थे. सिनेमाहाल के और लोगों को फिल्म छूटने की चिन्ता हो रही थी. उन्होंने उल्टा मुझे समझाया, “बहनजी, जाने दीजिए” मैंने ज़ोर से चिल्ला के कहा, “शर्म तो आती नहीं आपलोगों को. एक लड़का अँधेरे का फ़ायदा उठाकर बदतमीजी कर रहा है और आपलोग हमसे कह रहे हैं कि हम जाने दें.”

इसी बीच शोर-शराबा सुनकर चौकीदार आ गया. उसने उनलोगों को शांत करके बैठा दिया और मुझसे भी बैठने के लिए कहा. मैं बैठ तो गयी, लेकिन मेरा खून खौल रहा था कि जिस लड़के ने मेरे साथ बदतमीजी की, उसका मैं कुछ नहीं बिगाड़ पायी. मैंने सुना कि वो लड़का किसी से फोन पर बात कर रहा था, जिससे ये लगा कि वो कुछ और गुंडों को अपनी मदद के लिए बुला रहा है. मुझे और गुस्सा आया. मेरे दोस्त ने मेरा मूड और हालात देखते हुए वापस चलने के लिए कहा, तो मैंने मना कर दिया कि “फिल्म देखने आयी हूँ, तो देखकर जाऊँगी. इन कमीनों के कारण मैं भाग नहीं सकती.” और सच में मैं भागती कभी नहीं. हमेशा लड़ती हूँ.

तभी चौकीदार ने मेरे पास आकर कहा, “मैडम, आप आराम से बैठिये. मैनेजर ने गेट बंद करवा दिया है और पुलिस को बुला लिया है.” तब जाकर मेरा गुस्सा कुछ शांत हुआ. ठीक दस मिनट बाद पुलिस आ गयी. उस थाने का एस.एच.ओ. उन दिनों काफी मशहूर था ऐसे बदमाशों को सबक सिखाने के लिए. पुलिस ने दोनों पक्षों को बाहर बुलाया और मुझसे लड़के को पहचानने को कहा. मेरे इशारा करते ही उन्होंने डंडे बरसाने शुरू कर दिए, तो मेरे मुँह से निकला, “आप मार क्यों रहे हैं?” इंस्पेक्टर बोला, “मैडम, आप जानती नहीं. ये लोग ऐसे ही सीधे किये जाते हैं” पुलिस उससे पूछ रही थी कि वो किसे बुला रहा था. तब पता चला कि वो इलाके के किसी जाने-माने गुंडे का छोटा भाई था.

खैर, पुलिस उन बदमाशों को पकड़कर ले गयी. हमलोग पूरी फिल्म देखकर ही वापस लौटे.

(किस्सा नम्बर दो)

अभी इसी दीवाली की बात है. रात के दो बज गये थे, लेकिन नीचे रहनेवाले ‘लोकल्स’ ने पटाखे फोड़-फोड़कर सिर में दर्द कर दिया था. पटाखों की आवाज़ से ज़्यादा उससे उठने वाले धुएँ ने नाक में दम कर दिया था. तीसरे माले पर कमरा होने के कारण सारा धुँआ कमरे में भर गया था. मुझसे जब नहीं सहन हुआ, तो मैं बालकनी में जाकर चिल्लाई, “अब आपलोग पटाखे जलाना बंद कर दें प्लीज़.” नीचे से आवाज़ आयी, “अरे साल भर में एक दिन तो त्यौहार होता है. हम तो छुड़ाएंगे पटाखे. आपको क्या तकलीफ है?” और फिर से पटाखे दगाने लगे. मैंने कहा, “सारा धुँआ ऊपर आ रहा है” उन्होंने सुना नहीं. फिर मैंने कहा कि “आप ये बंद करें, वरना मैं पुलिस को कॉल कर दूँगी.” इस पर एक लड़का ऊपर मुँह करके चिढ़ाने लगा, “क्या कह रही हैं? आवाज़ नहीं आ रही है?”

उसकी इस हरकत से मुझे इतनी ज़ोर की चिढ़ मची कि मैंने मोटर ऑन करके टैप में पाइप फिट कर दिया और पानी से भिगो दिया उन सबको. अब नीचे भगदड़ मची हुयी थी. एक आदमी का ‘इगो’ जाग गया. वो ‘आउट ऑफ कंट्रोल’ होकर ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगा. बोला ये क्या बेहूदा हरकत है. मैंने चिल्लाकर कहा, “जैसे नीचे से धुँआ ऊपर आ सकता है. वैसे ही पानी भी नीचे जा सकता है.” सभी पटाखे छुड़ाने वाले और उनके पटाखे भीग चुके थे. ऊपर अँधेरा होने के कारण वो लोग ये नहीं देख पाये कि ये हरकत किसने और किस बिल्डिंग से की है? नीचे से आवाजें आ रही थीं…’ये क्या बदतमीजी है’ ‘किस मकान से फेंका गया पानी’ ‘मकान मालिक को बुलाओ और इनको निकलवा दो’

मैं थोड़ी देर तक उनका तमाशा देखती रही. फिर आकर अपने कमरे में सो गयी. वो लोग फिर कहीं से पटाखे ले आये और दुबारा वही काम शुरू कर दिया…लेकिन तब तक कुछ और लोगों ने भी विरोध करना शुरू कर दिया. बड़ी देर तक नीचे चिल्ल पों होती रही और इस सबकी शुरुआत करने वाली मैं गुंडी आराम से बिस्तर पर लेटी हुयी थी. मुझे हँसी आ रही थी कि ये सिरफिरे लोग मेरे कारण अपने पैसे से पटाखे खरीदकर फूँक रहे हैं 🙂

( किस्सा नंबर तीन)

हमारे मुहल्ले की एक तस्वीर

हमारे मुहल्ले की एक तस्वीर

रात के तीन बजे सामने की बिल्डिंग के तीसरे मंजिल वाले का दिल रोमैंटिक हो गया था और उसने फुल वोल्यूम में ‘साँस में तेरे साँस मिली तो मुझे साँस आयी’ गाना बजाना शुरू कर दिया. हमारा मुहल्ला ठहरा सँकरी गलियों वाला. ऐसा लगा जैसे गाना मेरे ही कमरे में बज रहा हो. मेरी आँख खुल गयी. बालकनी में निकली तो देखा कि एक-दो और लड़के देख रहे थे (यहाँ ज्यादातर सिविल की तैयारी करने वाले लड़के हैं, जिनकी पढ़ाई में विघ्न पड़ रहा था) पर समस्या ये कि इस बिल्डिंग से नीचे उतरकर सामने वाली बिल्डिंग में मना कौन करने जाय? वैसे भी सिविल वाले किसी से पंगा नहीं लेते. थोड़ी देर में सब अपने-अपने कमरों में चले गए.

मैंने सोचा कि जाने दो. बेचारा पूरा गाना सुन लेगा तो खुद ही बंद कर देगा. लेकिन पता नहीं सामने वाले को क्या फितूर सवार था कि उसने वही गाना करीब तीन बार रिपीट किया. जब चौथी बार गाना शुरू हो गया तो मेरी गुण्डई जाग गयी. मैंने दीवाली में बालकनी पर रखे पुराने ‘दीये’ उठाये और एक-एक करके सामने वाले के दरवाजे पर निशाना लगाना शुरू किया. सोचा कि बन्दा आजिज आकर दरवाजा खोलेगा तो उससे कहूँगी कि ‘तुमने मुझे डिस्टर्ब किया तो मैं तुम्हें कर रही हूँ.’ लेकिन वो नौबत नहीं आयी. तीसरा दीया फेंकते ही गाना बंद हो गया और दुबारा नहीं बजा 🙂

(किस्सा खतम पइसा हजम :))

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