आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

Archive for the category “किस्सा-कहानी”

शुक्रिया दोस्त, इंसानियत पर मेरा भरोसा बनाये रखने के लिए

बात तब की है, जब मैं इलाहाबाद में पढ़ती थी और वहाँ से आजमगढ़ के गाँव में स्थित अपने घर अक्सर अकेली आती-जाती थी. मैं बचपन से एक छोटे शहर में पली-बढ़ी थी, और वह भी रेलवे स्टेशन के आसपास जहाँ कभी रात नहीं होती. मेरे लिए बहुत मुश्किल था बस से इलाहाबाद से आजमगढ़ और वहाँ से तीस किलोमीटर दूर एकदम धुर गाँव में जाना. शाम होते ही कस्बों और गाँव में चहल-पहल कम होने लगती थी. सर्दियों में काफी परेशानी होती थी क्योंकि गाँव पहुँचते-पहुँचते अक्सर अँधेरा हो जाता था. और उस पर भी शहर से गाँव जाने में कम से कम तीन जगह सवारियाँ बदलनी पड़तीं. जल्दी सवारियाँ मिलती नहीं थीं. कभी-कभी घंटों इंतज़ार करना पड़ता. इन सब कठिनाइयों से बचने के लिए मैं इलाहाबाद से एकदम सुबह लगभग साढ़े पाँच-छः बजे निकलती, लेकिन तब भी देर हो ही जाती.

उस दिन भी ऐसा ही हुआ. मैं अकेली गाँव से लगभग पन्द्रह किलोमीटर दूर स्थित एक कस्बे में पहुँच गयी, लेकिन वहाँ से कोई सवारी नहीं मिल रही थी. मैं टैक्सी स्टैंड (टैक्सी का मतलब उस क्षेत्र में जीप ही होता है) पर खड़ी थी. अचानक एक जीप मेरे पास आकर रुकी. ड्राइवर ने पूछा कहाँ जाना है. मैंने गंतव्य बताया तो बोला ‘बैठ जाइए, हम उधर ही जा रहे हैं. छोड़ देंगे.’ उनका कहने का मतलब शायद यह था कि वे रोज़ सवारियाँ नहीं ढोते. जीप में और भी कई लोग बैठे थे. एक महिला भी थीं, तो मैं बैठ गयी.

मुश्किल तब शुरू हुयी, जब धीरे-धीरे एक-एक करके सारी सवारियाँ रास्ते में उतर गयीं. सर्दियों का समय था. साढ़े छः बजे से ही अँधेरा घिरने लगा था. मैं अपने गंतव्य से आधी दूरी पर ही थी कि जीप पूरी खाली हो गयी और बाहर अँधेरा भी हो गया. जीप में केवल ड्राइवर, क्लीनर और मैं बची. एक ओर तो मन में धुकधुकी लगी थी ऊपर से ड्राइवर की वेशभूषा और डरा रही थी. वह एक छः फुट का लंबा-तगड़ा नौजवान था. मूंछें तो उधर मर्द होने की निशानी मानी ही जाती हैं, उस पर भी जनाब पान चबाये जा रहे थे…मतलब विलेन के सारे गुण मौजूद थे बंदे में.

पता नहीं उन्हें खुद के बारे में बताने का शौक था या मुझे थोड़ा सकुचाया हुआ देखकर उन्होंने बात करनी शुरू कर दी. बताया कि यह जीप उन्हीं की है (कहने का मतलब यह कि “ड्राइवर” नहीं है) उनकी कई जीपें इलाके में सट्टे पर जाती हैं. रोज़ वाली सवारियाँ ढोने के लिए के जीप नहीं देते क्योंकि उससे गाड़ी कबाड़ा हो जाती है और बहुत झंझटी काम है . मुझे उनकी बातें सुनने में कोई दिलचस्पी नहीं थी, लेकिन इससे माहौल तो कुछ हल्का हो ही रहा था.

बता दूँ कि मैं जब शुरू में गाँव गयी थी तो मुझे उस क्षेत्र के लड़कों से एक चिढ़ जैसी हो गयी थी. लड़कियों को देखते ही उनकी निगाहें मधुमक्खी की तरह उनसे चिपक जाया करती हैं. मुझे सारे ही बड़े ‘चीप’ लगते थे. क्षेत्रवाद मेरे अंदर कूट-कूटकर भरा था. मुझे लगता था कि लखनऊ के आसपास के लड़के ज़्यादा सभ्य होते हैं. ये तो बहुत बाद में पता चला कि लड़के हर जगह के एक ही जैसे होते हैं. लेकिन इसमें गलती उनकी नहीं उनकी ‘कंडीशनिंग’ की होती है. जी हाँ, ‘नारीवाद’ का अध्ययन करने के बाद मुझे अक्ल आयी कि लड़कों का छिछोरापन भी समाजीकरण की देन है.

पर उस समय मुझे वे महाशय एकदम “छिछोरे,” मुम्बईया बोली में “टपोरी” और दिल्ली की भाषा में “वेल्ले” लग रहे थे. मुझे लग रहा था कि ये अपनी कहानी सुनाने के बाद मेरे बारे में ज़रूर पूछेंगे और वैसा ही हुआ. मैंने उनके सभी सवालों के जवाब दिए क्योंकि मेरे पास और कोई चारा ही नहीं था. पहले उनको लग रहा था कि मैं आजमगढ़ शहर से ही अपने गाँव आ रही हूँ. जब उन्होंने यह सुना कि मैं इलाहाबाद में पढ़ती हूँ तो खुश हो गए. उन्हें बहुत अच्छा लगा कि एकदम इंटीरियर के एक गाँव की लड़की इलाहाबाद जैसे बड़े विश्वविद्यालय में पढ़ती है क्योंकि मैंने उन्हें यह नहीं बताया था कि यहाँ पली-बढ़ी ही नहीं हूँ. गाँव में होती तो शायद सर पटककर मर जाती और कभी वहाँ पढ़ने का सपना पूरा न होता.

वे पलट-पलटकर बातें कर रहे थे और मैं डर रही थी कि कहीं जीप ही न पलट जाए. अब भी मेरा डर पूरी तरह गया नहीं था. मैं अपने गंतव्य से कुछ ही किलोमीटर दूर थी कि उन्होंने गाँव का नाम पूछा. पहले मैं थोड़ा हिचकी लेकिन फिर बता दिया. मेरा गंतव्य गाँव से तीन किलोमीटर पहले था, फिर वहाँ से मुझे पैदल घर तक जाना था. तब मेरे गाँव के पास तक जीपें जाती ही नहीं थीं क्योंकि सड़क बहुत खराब थी और गाँव एक तरफ पड़ जाता था किसी मुख्य सड़क से नहीं जुड़ा था. ड्राइवर साहब ने मुझसे कहा कि उन्हें भी उधर ही जाना है और वे मुझे गाँव के बगल में छोड़ देंगे. मैंने उन्हें मना भी किया पर वे माने नहीं.

जब तक मैं अपने गाँव पहुँच नहीं गयी, मेरा डर दूर नहीं हुआ. आश्वस्त मैं तब हुयी, जब उन्होंने मुझे गाँव के बगल में छोड़ा और मेरे थोड़ी दूर निकल जाने पर जीप घुमा ली. तब मुझे पता चला कि उन्होंने मुझसे झूठ कहा था कि मुझे उसी तरफ जाना है. वे सिर्फ मुझे छोड़ने मेरे गाँव तक आये और मेरी कृतघ्नता देखिये कि मैंने उनका आभार नहीं व्यक्त किया. बातचीत में वे तीन-चार बार कह चुके थे कि अपने इलाके की हैं तो आप बहन ही हुईं न और मैंने उन्हें पलटकर एक बार भी “हाँ, भईया” नहीं कहा. पता नहीं क्या हुआ कि इस बात से मेरी आँखों में आँसू आ गए. कृतज्ञता के आँसू. मानव के प्रति सहज प्रेम के आँसू. मुझे उन पर विश्वास नहीं था, या घर पहुँचने की जल्दी थी या उस क्षेत्र के लड़कों के प्रति मेरी नफ़रत , किसने मुझे रोका? मैं नहीं जानती लेकिन मुझे आभार व्यक्त करना चाहिए था.

न जाने कितनी बार ऐसे ही बिना स्वार्थ के लड़कों ने मेरी मदद की है. आजमगढ़ से इलाहाबाद और इलाहाबाद से आजमगढ़ की यात्राएँ ऐसी तमाम कहानियाँ समेटे हुए हैं. पर यह कहानी सबसे अलग है. इसने मुझे पुरुषों को एक अलग नज़रिए से देखने की नयी दृष्टि दी. यह सिखाया कि वेशभूषा हमेशा ही चरित्र का आइना नहीं हुआ करती. यह बताया कि सभी बक-बक करने वाले गहराई से सोचते न हों, ऐसा नहीं होता. और यह भी जनाया कि मदद करने वाले कहीं भी मिल जाते हैं. इस घटना को याद करके आज भी दिल में टीस उठती है कि काश वे फिर मिल जाते और मैं उनसे कह पाती “शुक्रिया दोस्त, इंसानियत में मेरा भरोसा बनाए रखने के लिए.”

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कार्य प्रगति पर है, कृपया धीरे चलें

रात के दस बज रहे थे, जब उसका फोन आया. सुबीर कैम्प के एक रेस्टोरेंट में दोस्तों के साथ साउथ इन्डियन खा रहा था. फोन उठाते ही ‘उसकी’ सिसकियाँ सुनाई देने लगीं. सुबीर परेशान हो गया. दोस्तों से माफी माँगकर बाहर आया और पूछा ‘क्या हुआ?’ ‘कुछ नहीं’ उसने सुबकते हुए कहा. ‘अब यही प्रॉब्लम है तुम्हारी. फोन कर देती हो और बताती नहीं कि क्या बात है?’ सुबीर ने थोड़ा खीझकर कहा, तो फोन काट दिया गया. सुबीर को लगा कि उसको चिढ़ना नहीं चाहिए था. जाने क्यों परेशान है वो? फिर वह बार-बार फोन करता रहा, लेकिन उधर से फोन कटता रहा. नाराज़ हो गयी थी वह.

‘अच्छी मुसीबत है’ सुबीर बड़बड़ाया. और दोस्तों से इजाज़त लेकर मेट्रो स्टेशन के गेट की ओर बढ़ गया. बारिश हल्की थी, मगर कपड़े गीले करने के लिए काफी थी. ऐसे मौसम के बाद भी कैम्प में काफी चहल-पहल थी. ज़्यादा भीड़ उन लड़के-लड़कियों की थी, जो टिफिन या कुक के बनाए बेस्वाद खाने से बचने के लिए आसपास के इलाकों से कैम्प भाग आते हैं डिनर करने.

मेट्रो में बैठे-बैठे सुबीर ‘उसके’ बारे में ही सोच रहा था. कितना परेशान करती है ये जिद्दी लड़की. लेकिन वो चाहकर भी उसे इग्नोर नहीं कर सकता. उसके बारे में कोई एक राय भी नहीं बना पाता. कभी-कभी उसे लगता है कि बिगड़ी हुयी है तो कभी बहुत समझदार. कभी लगता है कि उसे चाहती है और कभी लगता है कि बस मज़ाक करती है. घर से लड़-झगड़कर बाहर पढ़ने आयी है, इसलिए सुबीर उसका सम्मान करता है. सुबीर उसका ध्यान रखता है, लेकिन वो बेफिकरी. किसी बात से तो डर नहीं लगता उसको. न घरवालों से, न दुनिया से. एक बार उसके घरवाले यहाँ घूमने आये थे तो परिचय के सारे लड़के-लड़कियाँ भी साथ चल दिए. अचानक एक जगह ‘उसने’ सुबीर का हाथ पकड़कर पीछे खींचा. ‘थोड़ा धीरे चलिए, देखिये न क्या लिखा है’ उसने जिस ओर इशारा किया था, वहाँ लिखा था ‘मेट्रो का कार्य प्रगति पर है. कृपया धीरे चलें’ वह सच में धीरे चलना भूल गया था. निक्की उसकी ज़िंदगी में न आती तो शायद उसे इसकी अहमियत भी न पता चलती. सुबीर यह सोचकर मुस्कुरा उठा, फिर हडबडाकर चारों ओर देखा कि कोई देख तो नहीं रहा है.

एक घंटे बाद सुबीर लक्ष्मीनगर में था. उसे पता था कि ये लड़की फोन नहीं उठाएगी. तो सीधे उसके पी.जी. के बाहर पहुँचा और चिल्लाकर बुलाया उसको “निक्कीईईई.” ये नाम कोई और नहीं लेता तो उसने बालकनी से झाँका और बोली ‘आप?’ फिर ‘आंटी जी’ के रोकने के बावजूद धड़-धड़ करती नीचे आ गई. रो-रोकर आँखें सुजा रखी थीं उसने.

‘मुझे पता था कि आप ज़रूर आयेंगे’ चहककर बोली वो.
‘तुमने और कोई चारा छोड़ा था क्या? और ये क्या हालत बना रखी है?’
‘अच्छा, अब आप डाँटो मत’
‘हुआ क्या?’
‘कुछ नहीं’
‘रूममेट से झगड़ा हुआ?’
‘नहीं’
‘ऋचा ने कुछ कहा?’
‘उहूँ’
‘फिर क्या हुआ?’
‘पूरे तीन दिन से फोन नहीं किया आपने’
‘हाँ, तो मैंने तुमसे कहा था न कि पढ़ाई पर ध्यान दो. सेमेस्टर इक्ज़ाम हैं तुम्हारे और मुझे भी पढ़ना है’
‘तो मेरी वजह से आपकी पढ़ाई डिस्टर्ब होती है? और क्या मैं पढ़ती नहीं? क्या मेरी थर्ड पोजीशन नहीं आयी इस सेमस्टर में?’
‘ठीक है-ठीक है. माना कि तीसरी पोजीशन आयी तुम्हारी. पर अगर तुम इन सब ब्वॉयफ्रैंड वगैरह के चक्कर में न पड़तीं, तो फर्स्ट आतीं’
‘मुझे नहीं बनना किताबी कीड़ा. मुझे लाइफ एन्जॉय करनी है.’
‘निक्की, बस थोड़े दिन पढ़ाई पर ध्यान दे लो.’
‘हाँ, तो मैं कैसे ध्यान दूँ पढ़ाई में, जब आप मेरा ध्यान नहीं रखते’
उसने सुबीर की आँखों में देखते हुए कहा. उसके इस तरह से देखने पर सुबीर हमेशा असहज हो जाता है. सुबीर ने बात बदल दी.
‘बस इतनी सी ही बात थी कि मैंने फोन नहीं किया कि कुछ और?’
‘वो… … नितिन’
‘उफ़, तुम आजकल के लड़के-लड़कियों के ये चोंचले. झगड़ा हुआ उससे?’
‘नहीं ब्रेकअप’
‘चलो, अच्छा हुआ. झंझट छूटी. मुझे आपका ‘नितिन पुराण’ नहीं सुनना पड़ेगा और आप पढ़ाई की ओर ध्यान देंगी’ सुबीर मुस्कुराकर बोला.
‘मेरी लाइफ का इतना बड़ा टर्निंग प्वाइंट और आपको मज़ाक सूझ रहा है.’ उसने रोना सा मुँह बनाकर कहा.
‘अच्छा-अच्छा बोलो फटाफट. क्यों हुआ ब्रेकअप?
‘आपकी वजह से?’
‘मेरी वजह से?’ सुबीर एकदम से चौंक गया.
‘हाँ, नितिन ने कहा कि मैं हर समय आपकी बातें करती रहती हूँ. हर समय आपकी तारीफ़ करती रहती हूँ. मेरे हर तीसरे सेंटेंस में आपका नाम आता है ‘सुबीर ये-सुबीर वो’-तो मैं आपको ही ब्वॉयफ्रैंड क्यों नहीं बना लेती.’
सुबीर थोड़ी देर हँसता रहा.
फिर पूछा ‘तुमने क्या कहा?’
‘मैंने सोचा कि पहले आपसे तो पूछ लूँ. विल यू…?’ उसने शरारत से पूछा.
‘निक्की, मैं तुमसे सात साल बड़ा हूँ’
‘तो? आई डोंट केयर’
‘तुम्हारी सहेली का भाई हूँ.’
‘स्टिल आई डोंट केयर’
‘तुम्हारे घरवालों ने तुम्हारी ज़िम्मेदारी मेरे ऊपर छोड़ी है. वो लोग क्या कहेंगे?’
‘बस इत्ती सी बात है न? ये न होता तो बन जाते मेरे ब्वॉयफ्रैंड?’ उसने फिर सुबीर की आँखों में झाँका. पहली बार सच्चाई दिखी सुबीर को उसकी आँखों में. और वो घबरा गया.
‘बकवास मत करो. जाओ अपने रूम पर’ सुबीर ने उसे डांटते हुए कहा.
‘असल बात ये है कि आप अपने आप से डरते हो. फट्टू हो आप’ गुस्से में कहकर वो तेजी से निकल गयी.

चलते-चलते वे मेट्रो स्टेशन की सीढ़ियों के पास आ गए थे. सीढ़ी की छाया में खड़ा सुबीर सोचता रहा ‘ये बीस साल की लड़की कितनी सयानी, कितनी निडर और साहसी है? कैसे इसने अपनी बात रख दी झट से. कल को ऐसे ही झट से रिश्ता तोड़ भी देगी. लेकिन जब तक साथ है पूरी ईमानदारी से. कोई बेईमानी नहीं.’

बारिश अचानक काफी तेज हो गयी थी. विजिबिलिटी दस मीटर. निक्की अभी दस कदम ही चली होगी कि सामने से एक कार तेजी से आकर रुकी. ठीक समय पर कार ड्राइवर ने ब्रेक लगाया और ठीक समय पर निक्की रुक गयी, लेकिन इस झटके से वो बस गिरने वाली ही थी कि सुबीर ने दौड़कर उसे थाम लिया और कुछ सेकेण्ड वैसे ही खड़ा रहा. ‘तुम्हारी दुनिया? तुम्हारे लोग?’ निक्की ने पूछा. ‘भाड़ में जाएँ.’ सुबीर ने मुस्कुराकर जवाब दिया.

रात के साढ़े ग्यारह बज रहे थे. बारिश में भी मेट्रो की वजह से गुलज़ार लक्ष्मीनगर मेट्रो स्टेशन पर कई जोड़ी निगाहें उनको घूर रही थीं. उन सबसे बेखबर सुबीर ने निक्की को अपनी बाहों में भर लिया.

फूलों वाले कुर्ते

एक लड़की थी. सीधी-सादी सी, जैसी कि अमूमन प्रेम कहानियों में नायिकाएँ हुआ करती हैं- किशोरावस्था को पारकर यौवन की दहलीज पर पाँव रखने वाली, सपनों और उन्हें पूरा करने के जोश से भरी हुयी. एक लड़का था. नौजवान, सजीला और प्रेम-कहानियों के नायकों की तरह ही शरीफ.

लड़की जब लड़के के घर के सामने से निकलती, तो लड़का बैडमिंटन खेल रहा होता और अक्सर उसे देखने के चक्कर में या तो रैकेट को हवा में घुमा देता या इतनी जोर से मारता कि शटल बाहर जा गिरती. लड़की में ऐसा कुछ खास नहीं था कि उसे एक नज़र में चाहने लगा जाय, लेकिन प्रेम की केमिस्ट्री अलग ही होती है, क्या पता कब किससे मिल जाय?

लड़के को लड़की अच्छी लगती थी. वो उसको देखता था और इसका एहसास उसके दोस्तों के साथ-साथ लड़की को भी हो गया था. लड़की को भी लड़का अच्छा लगता था, इसका पता किसी को न था. फिर एक दिन लड़के ने साहस करके उससे उसका नाम पूछ ही लिया…फिर जैसा कि और प्रेम-कहानियों में होता है, उनमें दोस्ती हो गयी.

लड़की ने बताया कि वह छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने जाती है और खुद भी प्राइवेट बी.ए. कर रही है. और कुछ लड़के ने पूछा नहीं और लड़की ने बताया नहीं. लड़का बी.एस.सी. एजी कर रहा था और कॉलेज की ओर से बैडमिंटन खेलता था.  लड़के ने ये खुद बताया, लड़की ने पूछा नहीं.

लड़की ट्यूशन पढ़ाकर घर लौटते समय लड़के के घर के सामने वाले पार्क में रुकती, जहाँ लड़का इंतज़ार कर रहा होता. फिर दोनों खूब ढेर सारी बातें करते. लड़के को बारिश बहुत पसंद थी. सोंधी-सोंधी मिट्टी की खुशबू, मोर का नाचना, पेड़ के पत्तों का धुलकर ताजा हो जाना, अपने घर के बरामदे में बैठकर बारिश देखना और पकौड़े खाना लड़के को बहुत अच्छा लगता था. लड़की को बारिश नहीं पसंद थी. उसे नहीं अच्छा लगता जब पानी में भीगकर कांपते हुए परिंदे सिर छुपाने को ओट ढूँढते फिरते हैं. लड़की की इस बात पर लड़का खूब हँसता था. लड़की को बसंत पसंद था क्योंकि उस समय खूब फूल खिलते हैं.

लड़की को फूल कुछ ज़्यादा ही पसंद थे. वो रोज़ अपने कुर्तों पर तरह-तरह के फूल काढ़ा करती थी. लड़का उससे पूछता कि ये बेतरतीब से क्यूँ हैं, तो वो बताती कि उसे इस तरह बेतरतीब फूल अच्छे लगते हैं. यूँ लगता है मानो अभी-अभी डाली से टूटकर उसके कुर्ते पर बिखर गए हों. लड़के को उसकी बातें बहुत अच्छी लगतीं. उसे ये भी अच्छा लगता कि लड़की गुणी है और अच्छी सिलाई-कढ़ाई कर लेती है.

लड़का, अपनी बातों में कुछ ज़्यादा ही आगे निकल जाता और भविष्य की योजनाएं बनाने लगता. हम एक छोटा सा घर बनाएँगे. ये करेंगे, वो करेंगे. तब लड़की चुप होकर लड़के का चेहरा देखा करती. कभी-कभी वो डर जाती और कभी उसे लगता कि वो सिंड्रेला है और लड़का उसका राजकुमार. लड़के ने लड़की से अपने बारे में सब कुछ बता दिया था कि वह अपने माँ-बाप का इकलौता लड़का है. गाँव में उनकी अच्छी-खासी ज़मीन है. उसके ताऊ ज़मींदार और गाँव के प्रधान हैं. लड़का खेती की बातें करता और कहता कि एग्रीकल्चर की पढ़ाई करके वो बहुत अच्छे से खेती करेगा. लड़की बहुत कुछ सोचती, लेकिन बताती नहीं.

एक दिन लड़की फूलों वाले कुर्ते की जगह नया कुरता पहनकर आयी और खुश होकर बताया कि उसने ट्यूशन के पैसों से नए सूट सिलवाए हैं और अब उसे वो फूलों वाले कुर्ते नहीं पहनने पड़ेंगे. लड़का नाराज़ हो गया. उसने लड़की से वही कुर्ते पहनकर आने को कहा. उसने लड़की को बताया कि उन कुर्तों की वजह से ही तो सबसे अलग दिखती है. वो उससे ज़िद करने लगा कि कल से वही कुर्ते पहनकर आये. लड़की उसके इस व्यवहार से दंग रह गयी. उसने तो सोचा था कि लड़का तारीफ़ करेगा, लेकिन ये तो उल्टे नाराज़ हो गया.

लड़की बहुत भारी मन से वापस लौटी. वो लड़के को कैसे बताए कि उसके कुर्तों के वो फूल, फूल नहीं थे, पैबंद थे, जो वो कपड़ों के फटने पर की गयी रफू को छुपाने के लिए काढ़ दिया करती थी. वो कैसे बताए कि उसके पिता की लंबी बीमारी और मृत्यु के बाद उसकी माँ पाँच बच्चों को किस-किस तरह से पाल रही थी? वो कैसे बताए कि वो कुर्ते, जिन्हें वो इतने खूबसूरत मान रहा है, अब इतने जर्जर हो चुके हैं कि कभी भी फटकर तार-तार हो सकते हैं. वो कैसे बताए कि उन कुर्तों पर अब इतनी जगह भी नहीं बची कि और फूल काढ़े जा सकें.

लड़की को अचानक ये एहसास हुआ कि वो सिंड्रेला नहीं है. और उसने अपना रास्ता बदल दिया.

कक्कू

पागल लोग होते हैं ना, उनका पाला ज़िंदगी में पागल लोगों से ही पड़ता है. मैं पागल हूँ, तो पागल लोग ही मिलते हैं. वो भी ऐसा ही है-कक्कू. खुद को वेल्ला कहने में ज़रा सी भी शर्म नहीं आती उसे. जाने कौन सी घड़ी में उससे मुलाक़ात हुयी और दोस्ती हो गयी. यूँ तो खुद को बड़ा होशियार समझता है, लेकिन मेरे सामने होशियारी किसी की नहीं चलती… 🙂

एक तो रोज़ रोज़ चला आता है. मैं कितना तो मना करती हूँ, उसके बाद भी. बहाने भी ऐसे-ऐसे बनाता है कि जी जल जाय. कभी फोन का बिल लेकर दरवाजा खटखटाएगा “मैडम, ये बाहर धूप में पड़ा सूख रिया था, मैंने सोचा इसे घर पहुंचा दूँ. थोड़ी कुल्लर की हवा लेगा, तो हरा हो जाएगा.” ‘लिफाफा है या मनीप्लांट?’ मैं लिफाफा लेकर दरवाजा बंद करना चाहूँगी तो बोलेगा “डाकिये को चाय नहीं पिलायेंगी? इत्ती मेहनत की बेचारे ने.” अब मैं तो इतनी बेशर्म हूँ नहीं कि दरवाजा बंद कर दूँ मुँह पर.

कभी-कभी दूध का पैकेट लेकर आ जाता है और बोलता है “पता चला है कि मैडम ने सुबह से चाय नहीं पी है” “पी चुकी हूँ” मैं बेरुखी से बोलूंगी, तो कहेगा “तो मुझे पिला दीजिए” मैं कहूँगी “शर्म तो आती नहीं तुम्हें” “नईं जी, बिल्कुल भी नईं, शर्म गल्त काम करने वालों को आती है. मैं गल्त करता नहीं और झूठ कदी मैं बोलता नईं.” …’बोलना तो ढंग से आता नहीं, झूठ क्या बोलेगा तू, बेशर्म’ मैं सोचूंगी… पर फिर भी, कितना भी बेशर्म हो, है तो अपना दोस्त ही.

यूँ तो उसकी बेतुकी बातों पर गुस्सा आता, लेकिन उसके जाने के बाद हँसी आती. ये भी कमाल की बात है कि आप किसी के भी घर में ‘मान न मान मैं तेरा मेहमान’ करके घुस जाओ, और मेजबान को आप पर गुस्सा भी न आये. पर धीरे-धीरे उससे गहरी दोस्ती होती गयी और पता चलता गया कि इस हँसी-खुशी वाले चेहरे के पीछे भी लंबी दर्दीली कहानी है. बड़ा स्ट्रगल किया है बंदे ने और खुद के बल पर खड़ा है.

एक दिन ऐसे ही आ गया. मैं थोड़ी परेशान थी, पर मैंने उससे ढेर सारी बातें की. करती ही गयी. वो मुझे लगातार देखे जा रहा था बस. मैंने उससे कहा भी “मेरी ओर ऐसे मत देखो” पर वो नहीं माना. मैंने उसकी आँखों में देखा और मुझे बड़ी ज़ोर का रोना आया. उसने उठकर पानी दिया. मैंने कहा, “मैं बहुत परेशान हूँ” तो बोला, “वो तो मुझे तभी लग गया था, जब तू लगातार बोले जा रही थी. मुझे पता है तू परेशान होती है, तो बकबक करके छिपाने की कोशिश करती है, पर इससे कोई फ़ायदा नहीं. मैं चाहता था कि तू रो ले. फूटकर बह जाने दे.”

मुझे बहुत आश्चर्य हुआ, गज़ब का मनोवैज्ञानिक है ये तो. “बड़ी-बड़ी बातें करने लग गए हो” मैंने कहा. तो बोला, “मैडम, ज़िंदगी की किताब है ही ऐसी. सब पढ़ा देती है” “चुप करो, तुम्हारे ऊपर ये दर्शन-वर्शन सूट नहीं करता.” मैं बोली, तो तपाक से बोला, “वो क्या होता है जी?”

मुझे दूसरा आश्चर्य तब हुआ, जब उसने कहा, “चाय बनाऊँ तेरे लिए” मुझे हँसी आ गयी. “चाय, और तुम?” अपने घर में उसने अपने बापजी को दूध गर्म करके देने के अलावा कभी रसोई का कोई काम नहीं किया.
मैंने कहा, “नीतू (उसकी पत्नी) के लिए भी कभी चाय बनायी है”
“अरे, वो मुझे किचेन से धक्के देकर भगा देती है”
“किया क्या था तुमने?”
“कुछ नहीं, वो बीमार थी, तो मैं चाय बनाने गया. मैंने वन-थर्ड दूध और टू-थर्ड पानी मिलाकर बर्तन में डालकर गैस पर रखा और वो बह गया”
“वाह-वाह! बह गया, अपने-आप? आप क्या कर रहे थे?”
“नहीं, मैंने कुछ नहीं किया था सच्ची. इतना भी पुअर कॉमन सेन्स नहीं मेरा”
“चलो-चलो, पता है मुझे. जो पेट्रोल की टंकी के ऊपर माचिस की तीली लगाकर देखे कि तेल बचा है कि नहीं, उसका कॉमन सेन्स कैसा होगा?” उसका मुँह देखने लायक था. (उसने ही ये बात बतायी थी मुझे. ये तब की बात थी जब वो अठारह साल का था और पहले-पहल अपने बापजी की ‘एल.एम.एल. वेस्पा’ लेकर दोस्त के साथ निकला था 🙂 )वो बोला, “लड़कियों को कोई बात नहीं बतानी चाहिए. जाने कब, किसके सामने, किस मौके पर उगल दें.”
“मुद्दे पर आओ और बताओ जब चाय का पानी उबलकर बहा, तो तुम कहाँ थे?”
“मैं एनीमल प्लेनेट देख रहा था” कहकर ज़ोर से हँसा,” फिर नीतू ने मुझे किचेन से निकाल दिया और तुरंत किचेन साफ करने लग गयी. उसकी तबीयत किचेन गन्दा देखकर ठीक हो गयी. हा हा हा हा! ”
“इसमें हँसने वाली कौन सी बात है? अपनी बीवियों को जो आपलोग “किचेन की शोभा” कहते फिरते हैं. दरअसल बात उनकी तारीफ़ की होती नहीं. मतलब तो ये होता है कि वो खाना बनाती है और आप बैठे-बैठे खाते हैं”
“अरे, तो क्या मैं कुछ नहीं करता?”
“क्या करते हो?”
“वो खाना बनाती है, तो मैं उसको पप्पी देता हूँ. वो खुश हो जाती है और मन से काम करती है. हे हे हे हे!”
“छिः”
“अरे, तू छिः बोल रही है, तो आगे से नहीं करूँगा.”
‘ओफ्फोह! किससे पाला पड़ा है. ऐसे दोस्तों को कौन झेल सकता है मेरे सिवा?’ मैं सोच रही थी कि वो चाय बनाकर ले आया.

“देख, कैसी बनी है, खराब बोलेगी, तो ऊपर फ़ेंक दूँगा. मैं किसी के लिए चाय नहीं बनाता.” अकड़ तो देखो इनकी. मैंने कहा, “मैं नहीं पीऊंगी. तुमने धौंस क्यों जमाई?” “अच्छा-अच्छा माफ कर. चल पी के बता” ‘ऐसे किसी से चाय पीने को कहते हैं भला?’ मैंने चाय पी. सच में अच्छी बनी थी. पर मैंने उसे बताया नहीं और बोला, “ठीक है” उसका मुँह उतर गया. बेचारा 🙂 फिर अचानक कुछ सोचकर चौंका.

(बात दरअसल ये थी कि एक साल पहले कुछ दोस्त ग्राउंड से वापस आकर चाय पी रहे थे. कक्कू अकड़ से बोला, “मैंने आज तक किसी के लिए चाय नहीं बनायी.” मैंने कहा, “मैं बनवा लूँगी एक दिन.”
“ओए चल.”
“अरे नहीं, तू ऐवें ही मत ले इसे कक्कू. तुझे पता नहीं ये लड़की पत्थर को कोल्हू में डालकर तेल निकाल सकती है और जार्ज बुश से अपनी रसोई में चाय बनवा सकती है.” एक दोस्त बोला.
“सुन लो.” मैंने कॉलर उचकाते हुए कक्कू से कहा.
“हुँह, देखूँगा.”
“तो लगी हज़ार-हज़ार की शर्त.” दोस्त बोला.
“लगी.”)

मुझे पता है इस समय अचानक कक्कू को वो शर्त याद आ गयी. मैंने सारा समय उसे बातों में लगाए रखा चाय बनाते समय. उसका ध्यान ही नहीं गया कि वो शर्त हार रहा है.

उसने मेरी ओर देखा और बोला, “मान गए  छोरी”
“तो रखो हज़ार रूपये.” कहते हुए मैंने उसकी ओर हथेली फैलाई. उसने बुरा सा मुँह बनाते हुए हज़ार रूपये मेरे हाथ पर रख दिए. मैं मन ही मन बोली, ‘तू बड़ा श्याणा है, तो मैं कम हूँ क्या कक्कू’ 🙂

बीमारी

सुयश जॉगिंग करते हुए लगातार ऋचा के बारे में सोच रहा था. पिछले कुछ दिनों से वो बीमार सी दिख रही थी. हमेशा खिले-खिले चेहरे वाली तेज-तर्रार लड़की अचानक से निश्तेज लगने लगी थी. सुयश ने कई बार सोचा कि पूछे क्या बात है? उसे कोई परेशानी तो नहीं है, लेकिन हिम्मत नहीं जुटा पाया. जाने क्यों वो लड़की अपने आस-पास एक खोल बनाकर रखती है, जिसके अन्दर कोई प्रवेश नहीं पा सकता. वो कभी-कभी सोचता है कि इतना जिद्दी और खुद्दार भी नहीं होना चाहिए. अरे, अकेली रहती है, अपने पड़ोसी से कभी-कभार तो मदद माँग ही सकती है. लेकिन नहीं, बेकार का स्वाभिमान. अपना सारा काम अकेले करेगी. बीमार है, लेकिन मदद नहीं लेगी…सुयश को गुस्सा आने लगा था ‘जाने कुछ लड़कियाँ अपने-आप को क्या समझती हैं. उसके दोस्तों की गर्लफ्रेंड्स तो सारा काम करवा लेती हैं, पर ये लड़की किसी और ही मिट्टी की बनी हुयी है.’

2677419199_77bbabd9acवो दौड़ते-दौड़ते रुक गया. स्ट्रेचिंग करते हुए उसे ऋचा का फिर ध्यान आया. अगर वो उसकी जगह होता, तो क्या करता? एक अजनबी लड़के से मदद लेता? नहीं, वो भी नहीं लेता. लेकिन वो अजनबी कहाँ रहे अब? दो साल हो गए पड़ोसी बने हुए. कितनी बातें तो करती है, बेहिचक, बिंदास. हमेशा हँसकर मिलती है. पूरी बिल्डिंग में सभी तो उसे पसंद करते हैं. मिलनसार लड़की…बस कोई मदद नहीं लेती किसी से भी.
पर उसने भी तो कभी उससे पूछा नहीं. लेकिन पूछता भी कैसे? पुरुष अहंकार जो आ जाता है सामने. वो किसी से कम है क्या? फिर अगर ऋचा ने उसको ‘चीप टाइप’ का लड़का समझ लिया तो. एक बार सोसाइटी के गेट पर एक छोटे से एक्सीडेंट के बाद फोन नम्बर भी तो दिया था उसे. ज़ोर की मोच आयी थी लड़की को. लेकिन लड़की ने गलती से कभी एक मेसेज भी नहीं किया. हुँह, घमंडी कहीं की…

पर वो इतना सोच क्यों रहा है उसके बारे में? क्या वो भी सोचती होगी? बातें तो प्यार से करती है. हँसी-मज़ाक भी कर लेती है. इतनी बार चाय भी पी चुके हैं दोनों साथ, उसकी बालकनी में. उसकी मुस्कान कितनी प्यारी लगती है. पर उसने एक बार भी ऐसा कोई हिंट नहीं दिया, जिससे ये पता चले कि वो सुयश के बारे में सोचती क्या है?

दो दिनों से कितनी बेहाल लग रही है. ऑफिस जाते हुए और वापस आते हुए, रोज़ ही तो मिलती है. दोनों का ऑफिस टाइम एक ही है. नहीं सुयश का ऑफिस थोड़ी देर से होता है, लेकिन उसके साथ जाने के लिए वो थोड़ा पहले निकल जाता है. वो पसीना पोंछते हुए मुस्कुराया…आज तक किसी लड़की के लिए इतनी ज़हमत नहीं उठायी उसने. अब इस उम्र में टीनेज़र्स जैसा उत्साह रहता है रोज़ ऋचा का चेहरा देखने के लिए. लेकिन उसका चेहरा, इतना बेनूर क्यों दिख रहा है…आज तो ऑफिस भी नहीं गई. क्या हुआ है उसे?

सुयश बेचैन हो गया. उसे पूछना चाहिए कि ऋचा को किसी चीज़ की ज़रूरत तो नहीं है. ठीक है, इसलिए नहीं कि वो अच्छी लगती है, एक पड़ोसी के नाते सही…सुयश ने फोन की ओर हाथ बढ़ाया कि स्क्रीन पर एक अनजान नम्बर फ्लैश हो रहा था. “हैलो” “हाई, सुयश?” ये तो ऋचा की आवाज़ है. सुयश के पूरे शरीर में एक सिहरन सी दौड़ गयी.

“हाँ, मैं सुयश. आप कौन?” उसने जानबूझकर अनजान बनते हुए पूछा.
“…म् मैं ऋचा”
“अरे ऋचा, क्या बात है?”
“सुयश, वो चार-पाँच दिन से मेरी तबीयत ठीक नहीं है”
“अरे, तुमने बताया क्यों नहीं. बोलो डॉक्टर के यहाँ चलना है क्या?”

“नहीं…डॉक्टर को मैंने दिखा दिया. डेंगू है शायद. बहुत वीकनेस लग रही है. तुम एक काम करोगे प्लीज़.”

“अरे, बिल्कुल, तुम बोलो तो.”
“एक दूध का पैकेट लेते आना ग्राउंड से आते समय. और ब्रेड का पैकेट भी. मैं तुमसे नहीं कहती…लेकि…”
“अरे, कोई बात नहीं. आखिर पड़ोसी हूँ तुम्हारा.”

“और प्लीज़, अपने कुक से मेरे लिए खिचड़ी बनवा देना…वो…”

“बिल्कुल…बिल्कुल. तुम चिन्ता मत करो. आकर मिलता हूँ तुमसे.”

“ठीक है…आ जाओ” ऋचा ने फोन रख दिया.

सुयश के चेहरे पर एक मीठी सी मुस्कान थी. कोई बीमार है? भला कभी किसी की बीमारी से कोई इतना खुश हुआ करता है…भला हो डेंगू फैलाने वाले मच्छर का. सुयश मुस्कुराते हुए ग्राउंड से बाहर चल पड़ा- दूध का पैकेट लेने. उसके कान में ऋचा का बोला आख़िरी शब्द गूंज रहा था- “आ जाओ.”

आदत

उस घर में सिर्फ एक कमरा था, जिसमें एक रोशनदान था, एक खिड़की और एक ही दरवाजा. खिड़की के उस ओर दूसरी बिल्डिंग की दीवार होने की वजह से उससे उतनी रोशनी नहीं आती थी, जितनी आनी चाहिए. रोशनदान से थोड़ा सा आसमान दिखता था.  उसके साथ ही एक टाँड़ थी, जिस पर पिछले किरायेदार कुछ चीज़ें छोड़कर गये थे.

वो जबसे इस घर में आयी थी, एक अजीब सी बेचैनी घेरे रहती थी उसे. रात में सोते हुए भी बीच-बीच में नींद खुल जाती और उसे महसूस होता कि कोई उसे देख रहा है. हर वक्त  किसी की नज़रें अपने ऊपर चिपके रहने का एहसास होता रहता. कभी-कभी वो बेहद डर जाती थी, दूसरा घर ढूँढने के बारे में सोचती, लेकिन ये घर काफी सस्ता था और दूसरा ढूँढने के लिए न उसके पास पैसे थे और न ही फुर्सत.

एक बार रात के तीन बजे उसकी नींद खुली तो उसे महसूस हुआ कि कमरे में धुंआ फैला हुआ है. वो हडबड़ाकर उठी कि कहीं कुछ जल तो नहीं रहा, लेकिन कुछ नहीं मिला. आखिर उसने अपने मन को यह कहकर समझाया कि नीचे की बालकनी में लड़के सिगरेट पी रहे होंगे. उसने सोने की बहुत कोशिश की, पर नींद नहीं आयी. आखिर उसने एक कप चाय बनायी और पीते हुए एक किताब उठा ली.

दो-तीन दिन बाद उसे रात में पढ़ते हुए किसी की खुसुर-फुसुर सुनायी दी. ‘बगल के घर से आ रही होगी आवाज़’ उसने सोचा. पर धीरे-धीरे आवाज़ बढ़ती गयी और एकदम रसोई से आती सुनायी देने लगी. उसके रोंगटे खड़े हो गए डर के मारे. उसने ध्यान लगाकर सुनना चाहा. कोई और भाषा थी शायद.  उसने रजाई में मुँह छुपा लिया. कुछ देर बाद आवाजें बंद हो गयीं. जब उसने मुँह पर से रजाई हटाकर देखा तो टाँड़ पर एक साया सा नज़र आया. लगा कि कोई उकडूँ बैठा है. अगले ही पल उसे लगा कि बहुत अधिक डर जाने के कारण उसे भ्रम हुआ है. वहाँ कोई भी नहीं है. आखिर उसने अपना ध्यान बँटाने के लिए टी.वी. खोल लिया.

एक दिन दोपहर में उसे सोते हुए  महसूस हुआ कि किसी ने उसकी चोटी खींची. रजाई हटाने पर कोई नहीं था. वो थोड़ी परेशान हो गयी. ‘पहले तो रात में ही ये सब होता था और अब दिन में भी’ उसने सोचा. भूत-प्रेत में उसका बिलकुल विश्वास नहीं था. तो उसे ऐसे अनुभव क्यों हो रहे थे, ये समझ में नहीं आ रहा था. इस नए शहर में उसका कोई दोस्त भी नहीं था और किसी को फोन पर बताकर वो परेशान नहीं करना चाहती थी. उसे इसी कमरे में रहना था, इन्हीं अजीब हालात के साथ. उसने सोचा कि हो सकता है कि नयी जगह के साथ एडजस्टमेंट होने में अभी थोड़ा और समय लगे. उसने इन बातों पर ध्यान न देने का निश्चय किया.

उसके बाद भी अजीब घटनाएँ घटनी बंद नहीं हुईं. कभी उसे किसी चीज़ के जलने की गंध आती, कभी रसोई गैस की, तो कभी किसी के बात करने की आवाज़. पर उसे कोई परेशानी नहीं होती थी. हाँ, कभी-कभार बर्तनों के टूटने पर दुःख ज़रूर होता था. जब कांच के सभी कप और गिलासें टूट गयीं, तो वो स्टील की गिलास ले आयी और उसी में चाय पीना शुरू किया. चीनी-मिट्टी के प्लेट भी उसने दुबारा नहीं खरीदे. उसे आदत हो गयी थी रात में अचानक जल गयी बत्ती या अचानक खुल गए बाथरूम के नल को बंद करने की. बस, उसे कभी भी किसी भी घटना से नुकसान नहीं पहुँचा. ऐसा लगता था कि कोई अपनी उपस्थिति जताना चाहता है.

कोई सहेली या दोस्त आते तो असुविधा ज़रूर होती. उनके सवालों का जवाब उसे झूठ बोलकर देना पड़ता. ‘स्विच खराब है’ ‘नल ढीला है’ ‘नीचे वाले लड़के सिगरेट बहुत पीते हैं’ ‘बगल वाले बातें बहुत करते हैं’ वगैरह-वगैरह…उसने खुद को भी यही समझा लिया था कि ये घर थोड़ा डिस्टर्बिंग है, लेकिन कुल मिलाकर अच्छा है.

उसे इस घर में रहते हुए पूरा एक साल हो चुका था. एक दिन किसी ने कॉलबेल बजाई. उसने दरवाजा खोला तो देखा कि एक लड़का खड़ा है.

“आपको किससे मिलना है?” उसने पूछा.

“जी, दरअसल मैं इस घर में आपसे पहले कुछ दिन रहा था. एक दो फॉर्म में मैंने यहीं का एड्रेस दे दिया था, तो बीच-बीच में लेटर के लिए पूछने आ जाता हूँ.” लड़के ने बताया.

“पर मैंने तो आपको पहले कभी नहीं देखा”

“जी, अक्सर मैं फर्स्ट फ्लोर से ही लौट जाता हूँ. उन्हीं से मैंने कह रखा है कि मेरे नाम का लेटर आये तो वो रख लें. आज कोई नहीं था तो मैं यहाँ आ गया. आप यहाँ कबसे रह रही हैं?”

“एक साल से”

“क्या?” लड़के ने चौंककर पूछा.

“इसमें इतनी चौंकने वाली कौन सी बात है?”

“न…नहीं. ये घर तो…मेरा मतलब है…ये बहुत अजीब है. मैं यहाँ एक महीना नहीं रह पाया.”

“आप भूत-प्रेतों में विश्वास करते हैं?”

“नहीं…लेकिन…फिर भी इतने अजीब इंसिडेंट्स…पता नहीं आपको ऐसा महसूस हुआ या नहीं…जैसे…”

“जैसे धुएँ की गंध, अजीब आवाजें, कुछ साये दिखाई पड़ना”

“ह…हाँ, देखा ना…आपको भी महसूस होता है…प्रापर्टी एजेंट मान ही नहीं रहा था. कह रहा था कि मैं पागल हूँ”

“नहीं, आप पागल नहीं है, लेकिन भूतों से डरते हैं”

“मैं भूतों में बिलकुल विश्वास नहीं करता” लड़के ने खीझकर कहा.

“आप करते हैं और उनसे डरते भी हैं. मैं नहीं डरती. आपका कोई लेटर नहीं आया है. सॉरी” कहकर उसने दरवाजा बंद कर दिया.

अन्दर आकर उसने केतली से एक गिलास में अपने लिए चाय निकाली और दूसरी गिलास में निकालकर मेज के दूसरी ओर रख दिया. फिर उसने इत्मीनान से किताब उठाते हुए मुस्कुराकर रोशनदान की ओर देखा. कमरे में हल्का-हल्का धुँआ फैला हुआ था.

खुरपेंचें, खुराफातें…पीढ़ी दर पीढ़ी

जी, खुरपेंची होना हमारे बैसवारा की सबसे बड़ी विशेषता है. बड़े-बड़े लम्बरदार भी इससे बाज नहीं आते. बचपन से ऐसी खुराफातें देखकर बड़ी होने के बाद भी मैं इतनी सीधी (?) हूँ, इससे सिद्ध होता है कि वातावरण हमेशा ही आपके ऊपर ‘बुरा’ असर नहीं डालता 🙂

मेरे बाऊ के दोस्त बसंत चाचा, उम्र में बाऊ से सात-आठ साल छोटे थे और उन्हें ‘दद्दू’ कहते थे, लेकिन थे दोनों पक्के लँगोटिया यार. चाचा के तीन लड़के ही थे, इसलिए हम दोनों बहनों को अपनी बेटी की ही तरह मानते और बाऊ से ज्यादा लाड़ करते थे. अम्मा अक्सर उनकी बदमाशियों के किस्से सुनाती थीं. बाऊ कभी-कभी पान खाते थे और जब खाते, तो घंटों उसे मुँह में चुलबुलाते रहते थे. जितनी देर पान उनके मुँह में रहता था, सबकी बातों का जवाब चेहरा थोड़ा ऊपर करके ‘हूँ-हाँ-उहूँ’ में दिया जाता था. बसंत चाचा बाऊ की इस आदत से तंग रहते थे. एक दिन वो बाऊ से कुछ पूछ रहे थे और वो इसी तरह जवाब दिए जा रहे थे. चाचा को गुस्सा आया तो उन्होंने दोनों हाथों की मुट्ठियाँ बनाकर बाऊ के फूले गालों के ऊपर जड़ दिया. अब क्या था! पान की पीक चाचा की सफ़ेद कमीज़ के ऊपर. पूरी कमीज़ ‘छींट लाल-लाल’ हो गयी 🙂 चाचा को मौका मिला. दौड़कर घर के अन्दर आये और अम्मा से बोले, “देखो भाभी, दद्दू का कीन्हेंन” अम्मा गुस्से में आकर बाऊ को बडबडाने लगीं. अभी आधी पीच बाऊ के मुँह के अन्दर थी, तो बेचारे अपनी सफाई में कुछ बोल ही नहीं पा रहे थे. मुँह ऊपर करके जो भी बोलने की कोशिश करते थे, अम्मा को समझ में नहीं आता. वैसे भी अम्मा गुस्से में आती थीं, तो किसी की नहीं सुनती थीं. जितनी देर में बाऊ पान की पीक थूककर आते, उनकी क्लास लग चुकी थी. और चाचा खड़े-खड़े मुस्कुरा रहे थे.

जब अम्मा को पूरी बात पता चली, तो वो भी मुस्कुरा उठीं. अम्मा ने बड़ी कोशिश की उस पान की पीक का दाग छुड़ाने की, पर वो पूरी तरह नहीं छूटी. हल्का-हल्का दाग उस पर रह ही गया. चाचा तब भी अक्सर वो कमीज़ पहनकर घर आते थे और जब कोई पूछता कि ये दाग कैसे लगा, तो मुस्कुरा के कहते, “दद्दू पान खाकर थूक दिए रहेन”

चाचा की बहू यानी हमारी भाभी (वही जिन्होंने ‘नखलउवा’ का किस्सा सुनाया था) घूंघट नहीं निकालती थीं. कभी-कभी सर पर पल्ला रख लेती थीं बस. गाँव में अडोस-पड़ोस की औरतें इस बात से बहुत नाराज़ रहती थीं. एक दिन राजन भैय्या (चाचा के दूसरे नम्बर के लड़के यानि भाभी के देवर ) ने किसी की बात सुन ली और कहने लगे ‘हमरी भाभी कौनो पाप किये हैं का, जो मुँह छिपावत फिरैं’ ल्यो भाई इहौ कौनो कारन भवा घूंघट न करे का 🙂

तीसरी पीढ़ी यानि चाचा की पोती रूबी बड़ी प्यारी बच्ची थी. घर की इकलौती बेटी थी, सबकी दुलारी. अक्सर घर में सबलोग उसे चिढ़ाया करते थे कि “का करिहो पढ़ि-लिखि के, तुमका बटुइयै तो माँजे क है” जैसा कि आमतौर पर गाँवों में लड़कियों को चिढ़ाया जाता है. रूबी का पढ़ने में बहुत मन भी नहीं लगता था. धीरे-धीरे उसके नम्बर कम आने लगे. एक दिन चाचा ने गुस्से में आकर कहा कि ‘रूबी मन लगाकर क्यों नहीं पढ़ती?’ रूबी जी हाथ चमकाकर बोलीं, “बाबा, का करिबे पढ़ि-लिखि के, हमका बटुइयै तो माँजे क है” चाचा शॉक्ड. तुरंत घर के सदस्यों की ‘अर्जेंट मीटिंग’ बुलाई गयी और सबको अल्टीमेटम दिया गया कि आगे से किसी ने बिटियारानी को ऐसी बातें कहकर चिढ़ाया तो उसे घर से निकाल दिया जाएगा.

चाचा तो अब इस दुनिया में नहीं हैं,बाऊ के जाने से पहले ही चले गए. दस साल से भाभी और रूबी से मिलना नहीं हुआ. मैं याद करती हूँ सबको. बहुत याद करती हूँ. क्या खुशगवार मौसम था उन दिनों! हँसी-मज़ाक, टांग-खिंचाई, खुराफातें, खुरपेंचें…चाचा की आज बहुत याद आ रही है. पर इत्मीनान है कि बाऊ और चाचा दोनों दोस्त मिलकर ऊपर अम्मा की खिंचाई कर रहे होंगे और आज तो पक्का चाचा को हिचकी आ रही होगी 🙂

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