आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

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चाकू (एक कहानी )

किसी शहर में एक लड़की अपने पिता के साथ रहती थी. लड़की का पिता था तो किसी फैक्ट्री में चौकीदार, पर उसे लोहारगिरी का शौक था.  वो तरह-तरह के औजार और हथियार बनाता रहता. कुल्हाड़ी, फावड़े, छेनी, हथौड़ी, आरी और तरह-तरह के चाकू.  कुछ छोटे, कुछ बड़े, कुछ लकड़ी के बेंट वाले, कुछ लोहे के, कुछ सीधे, तो कुछ मुड़ने वाले चाकू. लोग कहते थे कि किसी ज़माने में वो जाना-माना चाकूबाज था और पहलवानी भी करता था, इसीलिये उसे आसानी से चौकीदार की पक्की नौकरी मिल गयी थी. लड़की अपने पिता के बनाए चाकुओं को देखकर ललचाती रहती थी. खासकर उसे एक लकड़ी के बेंट वाला मुड़ने वाला (फोल्डिंग) चाकू बेहद पसंद था. वो सोचती थी कि उसके पिता उसे चाकू दें, तो अपनी सहेलियों को दिखायेगी कि वो कितने अच्छे कारीगर हैं. पर जब भी वो माँगती उसका पिता उसे टाल देता. वो चाहता था कि उसकी इकलौती बेटी पढ़ने में मन लगाए.

एक दिन लड़की बिल्कुल ‘चंद खिलौना लैहों’ वाले अंदाज़ में जिद कर बैठी,   “बप्पा, हमें वो मुड़ने वाला चाकू दे दो ना” “पर बिट्टो, तू उसका करेगी क्या?” पिता ने पूछा तो बोली, “बदमाशों को मारूँगी” पिता बड़ी देर तक हँसता रहा, फिर पूछा, “और बदमाश ने तुम्हारी चाकू छीनकर तुम्हें ही मार दिया तो?” लड़की कोई जवाब नहीं दे पायी. उसके पिता ने कहा, “बेटा, हथियार से ज्यादा अपने हौसले पर, अपनी हिम्मत पर भरोसा करना चाहिए. अगर तेरे पास हिम्मत है, तो तू दुश्मन का हथियार छीनकर उसे मार देगी और हिम्मत नहीं है, तो वही तेरा हथियार छीन लेगा.” लड़की को कुछ समझ में नहीं आया. उसने सोचा चाकू तो दिखता है. ये हौसला और हिम्मत कहाँ रहते हैं? जब दिखते ही नहीं तो इन पर कैसे भरोसा करें? उसे लगा उसके पिता फिर उसे टाल रहे हैं, पर पिता ने उसे चाकू दे दिया. लड़की खुश हो गयी.

लड़की हमेशा उस चाकू को अपने पास रखती. यहाँ तक कि चुपके से बस्ते में डालकर स्कूल भी ले जाती थी. पर डाँट पड़ने के डर से अपनी एक-दो सहेलियों के अलावा और किसी को नहीं बताती थी. उसे उस चाकू से बड़ा लगाव था. उसे वो अपना रक्षक समझने लगी थी.

ऊँचे क्लास में पहुंचने के साथ ही लड़की को ट्यूशन भी करना पड़ा. उसे वहाँ से लौटने में देर होती, तो उसका पिता चिंतित हो जाता. इस पर लड़की पिता को बच्चों की तरह बहलाने की कोशिश करती कि अगर कोई बदमाश उस पर हमला करेगा तो उसे चाकू मार देगी. उसका पिता उसके इस भोलेपन पर हँसकर रह जाता. पर लड़की का यही भोलापन  और बचपना उसके पिता की चिंता बढ़ा देता था.

एक दिन ट्यूशन से लौटते हुए लड़की को देर हो गयी. सर्दियों की शाम थी. सारी गलियाँ अँधेरे में डूब गयीं. लड़की ने घर जल्दी पहुँचने के लिए एक छोटा संकरा रास्ता पकड़ा, जो कि काफी सुनसान रहता था. वहीं दो शोहदों ने लड़की को घेर लिया और गंदे-गंदे फिकरे कसने लगे. लड़की बुरी तरह से डर गयी. उसके हाथ-पाँव सुन्न पड़ गए. मारे डर के उसके गले में चीख भी अटक गयी.  अचानक उसे चाकू का ध्यान आया. पर ज्यों ही उसने चाकू निकालने के लिए बैग में हाथ डाला, एक शोहदे ने उससे बैग छीनकर फ़ेंक दिया और दूसरे ने धक्का देकर उसे गिरा दिया. लड़की का सर ज़मीन से टकराया तो एक पल के लिए आँखों के सामने अँधेरा छा गया. उसी अँधेरे में उसे अपने पिता का चेहरा दिखा और उनके शब्द कानों में गूँज गए, “बेटा, हथियार से ज्यादा अपने हौसले पर, अपनी हिम्मत पर भरोसा रखना चाहिए.” लड़की ने तुरंत आँखें खोलीं और एक बदमाश को अपने ऊपर झुका पाया. अचानक लड़की ने अपनी पूरी ताकत लगाकर उस बदमाश की नाक पर घूँसा मारा. वो बदमाश तड़पकर पीछे हट गया. लड़की ने पास ही खड़े दूसरे बदमाश के पेट के निचले हिस्से पर घूँसा जड़ दिया. एक पल के लिए वो दर्द से झुक गया. फिर लड़की उतनी ही फुर्ती से उठी और अपना बैग उठाकर मुख्य सड़क की ओर दौड़ पड़ी. कुछ दूर आकर ही उसके मुँह से चीख निकली, तो उधर से कुछ लोग सहायता के लिए दौड़ पड़े.

बदमाश पकड़े गए. पुलिस, पड़ोसी और जान-पहचान के लोग सभी लड़की की तारीफ़ कर रहे थे. लड़की का पिता अपनी बेटी की बहादुरी पर आश्चर्यचकित था. लड़की को कुछ चोटें आयीं थीं. पिता ने उससे आराम करने को कहा, पर वो नहीं मानी और दूसरे दिन एकदम समय से स्कूल के लिए निकली. उसका चेहरा आत्मविश्वास से चमक रहा था, चाल बदल गयी थी. पिता ने देखा लड़की का मनपसंद चाकू उसकी पढ़ने वाली मेज पर रखा हुआ था. अब उसे इसकी ज़रूरत नहीं थी.

किस्सा नखलऊवा का…

नखलऊवा की कहानी में मैंने अपनी ओर से कोई मिलावट नहीं की है. ये ऐसे ही मिली थी मुझे मय नमक-मिर्च और बैसवारे के आमों से बने अमचूर पड़े अचार की तरह, चटपटी और जायकेदार. इसका महत्त्व इस बात में नहीं कि ये बनी कैसे ? इस बात में है कि हमारे सामने परोसी कैसे गयी?

ये कहानी सच्ची है. उतनी ही सच्ची जितनी कि ये बात कि लखनऊ के गाँवों में बहुत से लोग अब भी उसे ‘नखलऊ’ कहते हैं, जितना कि बैसवारे का ठेठपना और वहाँ के लोगों की बड़ी सी बड़ी समस्या को हँसी-हँसी में उड़ा देने की फितरत.

मेरे पिताजी के अभिन्न मित्र थे हमारे बसंत चाचा. उनका गाँव जैतीपुर में था, जो कि लखनऊ और उन्नाव के बीच में एक छोटा सा रेलवे स्टेशन है. हमलोग अक्सर वहाँ चले जाते थे. दूर तक फैली ऊसर ज़मीन, उस पर खजूर के पेड़ और एक बरसाती नाला मिलकर हमें अपनी ओर खींचते थे. ऐसे ही एक बार मैं और मेरी दीदी पहुँचे चाचा के गाँव. स्टेशन तक पैसेंजर गाड़ी से और उसके बाद बैलगाड़ी से.

चाचा की बहू बहुत ही हंसमुख थीं. जब हम घर पहुँचे तो आँगन में चारपाई पर बैठी सरौते से सुपारी काट रही थीं. भईयल (चाचा के बड़े लड़के) बरामदे में बैठे थे. हम दोनों को देखकर मुस्कुराए तो लगा जैसे कोई उनकी कनपटी पर कट्टा लगाकर उन्हें ऐसा करने के लिए विवश कर रहा हो. हमने भाभी से इशारों में पूछा तो बोलीं, “बेचारे परेसान हैं नखलऊवा वाली बात ते.” “ए” भैय्यल गुर्राए. भाभी हँसकर हमलोगों के लिए चाय बनाने चली गयीं.

चाय पीते-पीते हमने पूछा, “भाभी, ये नखलऊवा कौन है?” तो झपटकर जवाब भैय्यल ने दिया, “अरे कउनो नहीं बिटिया (वहाँ छोटी बहन को बिटिया कहते हैं) इ तुम्हरी भाभी के दिमाग का फितूर है” इस पर भाभी बोलीं, “अच्छा, तुम जाव हियाँ ते. बाहर बइठो” “बिटिया होरी, इनकी बातन में ना आयो. दिमाग फिरा परा है आजकल इनका” कहते हुए भैय्यल चले गए. बस फिर क्या था? भाभी शुरू हो गयीं कहानी कहने, “बिट्टी का देखे हो तुम पंचिन?”

“कौन ? वो जो लखनऊ में पढ़ती हैं. कलंदर चाचा की बिटिया?”

“हाँ, उनही का टांका याक लरिका ते भिड़िगा नखलऊ मा”

“हैं ?”

“गरमी की छुट्टी मा जब बिट्टी घरे आयीं. तो पीछे-पीछे नखलऊवौ चला आवा”

“फिर?”

“बिट्टी चुप्पे ते वहिका ख्यात (खेत) वाले घर कै चाबी दई दिहिन.”

“?”

“बिट्टी रोज सुबे-साम नखलऊवा का खाना देवै और और वहिसे मिलै खातिर जात रहिन. तो तुम्हरे भैया और इनके दोस्तन का सक हुईगा.”

“फिर?”

“फिर का ? इ लोग याक दिन बिट्टी के पीछे गयेन और ज्यों बिट्टी नखलऊवा ते मिलिके वापस गयिन. इ लोग नखलऊवा पे टूट परेन और वहिकै कम्बल परेड करि डारिन.”

“क्यों?” हमदोनों एक साथ बोले.

“अरे ! इन लोगन से बरदास्त नहीं हुआ कि इनके गाँव की लड़की कौनो बाहरी ते नैन-मटक्का करै.”

“हाँ-हाँ, खूब नमक-मर्चा लगाके सुनाव बिटियन का.” भैय्यल फिर टपक पड़े.

“तुम फिर आ गयो?” भाभी बोलीं.

“अउर का? तुम हमरी बदनामी काहे करि रही हो सबते?”

“तुम बड़े नाम वाले हो ना? तुम ते कहा ना, बाहर जाओ. हमका बिटियन ते कुछ पराइवेट बात करै का है.”

भैय्यल ने बरामदे में ताक पर रखा पान-मसाले का डिब्बा उठाया और उसमें से एक चुटकी मसाला मुँह में दबाकर बाहर चले गए. उनके बाहर जाते ही भाभी ने फुर्ती से बाहर का दरवाजा अंदर से बंद कर दिया. भैय्यल जब खटखटाने लगे, तो भाभी बोलीं, “जाओ, नहीं तो दद्दा से सिकायत करि देबे.” भाभी ‘दद्दा’ हमारे चाचा (यानी उनके ससुर जी) को कहती थीं. हमलोगों को भैया-भाभी की आँख-मिचौली देखने में खूब मज़ा आ रहा था. बेचारे भैय्यल को मन मारकर बाहर बैठना पड़ा. अब हमारी उत्सुकता चरम पर थी. दीदी ने झट से पूछा, “भाभी, फिर क्या हुआ?”

“इ लोग टूटे-फूटे नखलऊवा का नखलऊ जाए वाली पसिंजर मा बइठा दिहिन. इधर जब बिट्टी का पता चला तो वी धरना पर बइठ गयीं. कहीं ‘बिहाव करिबे तो परनब (नखलऊवा का नाम) ते नहीं तो बिहावै ना करिबे”

“वाह! क्या बात है!” मैंने कहा. दीदी ने आँखे तरेरकर मुझे देखा.

“तुम्हरी पंचिन तो जनती ही हो कि कलंदर चाचा की इकलौती लाड़ली बिटिया हैं बिट्टी. तो कलंदर चाचा मानि गएँ.”

“तो क्या बिट्टी की शादी उसी से हुयी है?” दीदी ने पूछा.

“अउर का? और तुम्हरे भईया लोगन जउने नखलऊवा का तोड़-फोड़ के नखलऊ पठाए रहेन, वही की पाँव पुजाही करै का पड़िगा”

“ओह तो इसीलिये भैय्यल इतना चिढ़ रहे हैं?”

तभी दरवाजा खटखटाने की आवाज़ आयी. मैंने लपककर दरवाजा खोला. इस किस्से के बाद भैय्यल का चेहरा देखने का बड़ा मन कर रहा था. वो “हें हें” करते आये, “बताय दिहिन पूरी इस्टोरी तुम्हरी भाभी” “हाँ” मैंने कहा. “तुम्हरी भाभी का बंबई भेज दिहा जाए तो इस्टोरी लिखिके खूब पईसा कमइहैं.”  भाभी के सर पर एक चपत लगाते हुए जाकर बरामदे में बैठे. भाभी बोलीं, “चैन नहीं परा नखलऊवा कै जूता चुराई करिके. दद्दा ते मार खइहो? चले रहें बिटियन की चौकीदारी करै.” भैय्यल ने तकिया उठाकर भाभी के ऊपर फेंका तो वो भागकर रसोई में छिप गईं.  बाद में पता चला कि पूरे गाँव में नखलऊवा, भैय्यल एंड पार्टी और भाभी को छोड़कर कोई नहीं जानता था कि कम्बल परेड की किसने? और भाभी इस बात का फायदा उठाकर भैय्यल को ये कहकर ब्लैकमेल करती थीं, “दद्दा से बता देबे.” बेचारे भैय्यल.

नखलऊवा की कहानी आज भी वहाँ से हमारे तार जोड़े हुए है. इस बार दीदी के यहाँ भरूच जाना हुआ, तो हमदोनों “नखलऊवा” का किस्सा याद करके खूब हँसे.

छुअन के चार पड़ाव

पहला पड़ाव

मेरा जन्मदिन. हम दिन भर घूमे थे. शाम को हॉस्टल के गेट पर खड़े होकर बातें कर रहे थे. मेरा मन नहीं हो रहा था कि तुम्हें छोड़कर अंदर जाऊँ. शाम का धुँधलका, गुलाबी ठण्ड. तभी हल्की हवा का एक झोंका आया और मेरे बालों की एक लट मेरे चेहरे पर बिखर गयी. जाने क्या सोचकर मेरी आँखे भर आयी थीं. तुमने अपने हाथों से मेरे चेहरे से वो लट उठाकर कानों के पीछे अटका दी, इस बात का पूरा ध्यान रखते हुए कि कहीं तुम्हारा हाथ मेरे कान या गर्दन से छू ना जाए, पर वो छू ही गया और मेरा पूरा शरीर सिहर उठा. तुमने कहा, “मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूँ” तुम्हारी वो छुअन, बातों की और हाथों की, अभी भी मुझे सिहरा देती है.

दूसरा पड़ाव

तुम मुझसे मिलने हॉस्टल आये. हम विजिटिंग हॉल में बैठे. मैं नाराज़ थी किसी बात पर और तुम मनाने की कोशिश कर रहे थे. अचानक तुमने मेरे दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए और बोले, “तुम्हारे हाथ तो आम के नवपल्लवों की तरह कोमल हैं.” मुझे तुम्हारी ये हिन्दी सुनकर हँसी आ गयी. मैं आज भी अपने हाथ अपने गालों पर रखकर महसूसने की कोशिश करती हूँ कि वे वाकई नव आम्रपल्लवों जैसे कोमल हैं कि नहीं.

तीसरा पड़ाव

हम बस से घर जा रहे थे. मैं आठ घंटे की यात्रा से बहुत थक गयी थी और बार-बार ऊँघ रही थी. मेरे बगल में बैठे हुए तुमने अपना हाथ पीछे से मेरे कन्धों पर रखा और मेरा सिर अपने कन्धों पर टिका लिया और मैं चुपचाप सोने का नाटक करती रही…

चौथा पड़ाव

तुम मेरे घर आये थे. गर्मियों की रात थी. गाँव में लाईट तो रहती नहीं. सबलोग रात का खाना खाकर बाहर बैठे हुए थे. मैं बारी-बारी से सबके बिस्तर लगा रही थी. मैं पिताजी के लिए  मच्छरदानी लेने कमरे में आयी तो पानी पीने का बहाना करके तुम भी आ गए. मेरा हाथ पकड़कर अपनी ओर खींचा और अचानक रुककर बोले, “डर गयी थी ना?” मैं तड़पकर रह गयी कि बेवकूफ ने इतना अच्छा मौका गँवा दिया… गले क्यों नहीं लगा लिया?

छुअन के इन पड़ावों के साथ ही हमारा नाता गहरा होता जाता है… …

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