आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

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अपने अपने दुःख

मैं और शीतल रोज़ रात में खाने के बाद मुहल्ले के पीछे जुगनू गोली को टहलाने निकलते हैं। वहाँ लगभग रोज़ एक बुजुर्ग सरदार जी टहलते दिखते हैं।

कुछ दिनों से हमारा शगल था उनके बारे में अनुमान लगाने का। उनको फोन पर बात करते देख मैं कहती कि परिवार से छिपकर घर से बाहर अकेले टहलकर अपनी किसी प्रेमिका से बात करते हैं। शीतल गेस करती कि हो सकता है अकेले हों। परिवार हो ही न।
कल उन्होंने ख़ुद ही हमको रोका। शीतल को देखकर पूछा कि बेटा खाना-वाना नहीं खाते हो क्या? यहीं से बात शुरू हुई तो वे अपनी कहानी बताने लगे।

उनके अनुसार उन्होंने एक आँख वाली अफ़गानी औरत से शादी की। उसे पढ़ाया लिखाया। दो लड़के और एक लड़की पैदा हुई। उन सबको भी अच्छी शिक्षा दिलाई। अस्सी लाख की कोठी बेचकर उन्हें विदेश भेज दिया।

विदेश जाकर उनकी पत्नी ने अपनी बहन के देवर से शादी कर ली। लड़के-लड़की दोनों ने इन बुजुर्ग से बोलना चालना छोड़ दिया। बड़े लड़के ने इनका फोन ही ब्लॉक कर दिया। इन्होंने बहुत कहा कि इन्हें भी वहाँ बुला लें लेकिन कोई तैयार नहीं हुआ।

उनके दो भाई भी हैं। वे भी बात नहीं करते। एक माँ थी जिसकी देखभाल में वक्त गुज़रता था। पिछले साल उनका देहांत हो गया तो ये इस मोहल्ले में आ गये। कोठी बेचकर बचे पैसों में से कुछ लाख बचे हैं, उसी में काम चल रहा है। खाना बनाना आता नहीं गुरुद्वारे में खाते हैं और रोज़ मरने की दुआ करते हैं।

उनकी ये कहानी सुनकर हमदोनों बहुत दुःखी हो गए। गोली भी दो पंजे उनके पैरों पर रखकर दुःख जताने लगी। कुत्तों को जाने कैसे पता चल जाता है कि सामने वाला परेशान है।

ख़ैर, उन्होंने मेरे बारे में पूछा तो बात-बात में मैंने बताया कि मैंने शादी नहीं की है। सबकी तरह उन्होंने भी कारण पूछा मैंने कहा मुझे अकेले रहना अच्छा लगता है। तो वे समझाने लगे कि बेटा अभी ठीक लग रहा है बुढ़ापा कैसे कटेगा? मैं मन ही मन में हँस पड़ी। नहीं, उन पर नहीं इस सोच पर कि कोई बुढ़ापे का सहारा बनेगा? मैंने उनसे कहा कि अंकल, कहीं मैंने भी शादी कर ली और मेरा पति और बच्चे मुझे छोड़कर और मेरे पैसे लेकर भाग गए तो मैं क्या करूँगी। इसीलिए अकेले रहना ज़्यादा अच्छा है। चलते-चलते मैंने कहा कि आपको अपनी प्रॉपर्टी नहीं बेचनी चाहिए थी।


न मैं किसी के निर्णय को जज करने वाली कोई नहीं होती हूँ, लेकिन कुछ प्रश्नों में मन उलझ गया। अपनी सारी सम्पत्ति बेचकर बच्चों पर खर्च कर देना कहाँ की समझदारी है? जीवनसाथी या बच्चे बुढ़ापे का सहारा बनेंगे इस बात की क्या गारण्टी है? लोग धोखा खाने के बाद भी दूसरों से कैसे कह लेते हैं कि एक बार तुम भी धोखा खाने का प्रयास करो।

फिर से

कहते हैं हर लिखने वाले के जीवन में एक समय ऐसा ज़रूर आता है, जब उसका लिखने-पढने से जी उचट जाता है. अंग्रेजी में इसे राइटर्स ब्लॉक कहते हैं. मैं खुद को कोई लेखक-वेखक नहीं मानती और न ही अपने जीवन में कभी इसका अनुभव किया था. लेकिन पिछले दो-तीन सालों में मुझे ऐसा ही कुछ महसूस हो रहा है. ऐसा लगता है मानो दिमाग बंद हो गया हो. न कुछ पढ़ पा रही हूँ न ही लिख पा रही हूँ. मैंने कभी नहीं सोचा था कि मेरे जीवन में ऐसा भी समय आएगा. एक वाक्य लिख पाना भी मुश्किल हो गया. अगर कुछ लिखती भी हूँ तो ऐसा बकवास होता है कि खुद ही पढ़ने का मन नहीं होता.

ऐसा सब के साथ होता होगा या नहीं भी. मुझे ज़्यादा नहीं पता. लेकिन इसे इतना लम्बा नहीं चलना चाहिए. इतना कि लगे अब दोबारा कभी कुछ नहीं लिख पाऊँगी. कभी-कभी खूब ज़ोर-ज़ोर से रोने का मन होता है. मैं बचपन से लेकर कुछ सालों पहले  तक बस पढ़ती ही रही हूँ. पढ़ाई के लिए सब कुछ छोड़ दिया मैंने- संगीत, पेंटिंग, स्केचिंग, स्पोर्ट्स सब कुछ. ये मेरी जिंदगी है और अभी लगता है कि जिंदगी ही खत्म हो गयी और मैं बेजान हूँ. ये उसी तरह है मानो किसी धावक के पैर कट गये हों, या किसी पेंटर के हाथ या किसी गायक का गला बुरी तरह ख़राब हो गया हो. जो जिसके लिए जीता है उससे वही छिन जाय.

कोशिश कर रही हूँ कि इससे उबर पाऊं. मुझे खुद समझ में नहीं आ रहा है कि मैं लिख क्या रही हूँ? पिछले पूरे साल एक भी ब्लॉग पोस्ट नहीं लिखी और इस साल की यह पहली ब्लॉग पोस्ट है. मुझे नहीं पता कि मेरे साथ ऐसा क्यों हो रहा है? क्या मेरा मन कहीं और लगा हुआ है या इसका कारण डिप्रेशन है या मेरे मन-मस्तिष्क ने काम करना बंद कर दिया है या अब क्षमता नहीं रही या बूढ़ी हो गयी हूँ? कारण कुछ भी हो, मैं दिल से लिख नहीं पा रही.

क्या मैं इससे कभी उबर पाऊँगी? क्या मैं फिर से लिख पाऊँगी?

 

लिखि लिखि पतियाँ

एक बार फिर एक चिट्ठी…तुम्हारी याद आती नहीं, जाती जो नहीं…

आराधना का ब्लॉग

सुनो प्यार,

तुमने कहा था जाते-जाते कि शर्ट धुलवाकर और प्रेस करवाकर रख देना। अगली बार आऊंगा तो पहनूँगा। लेकिन वो तबसे टंगी है अलगनी पर, वैसी ही गन्दी, पसीने की सफ़ेद लकीरों से सजी। मैंने नहीं धुलवाई।

उससे तुम्हारी खुशबू जो आती है।

*** *** ***

तुम्हारा रुमाल, जो छूट गया था पिछली बार टेबल पर। भाई के आने पर उसे मैंने किताबों के पीछे छिपा दिया था। आज जब किताबें उठाईं पढ़ने को, वो रूमाल मिला।

मैंने किताबें वापस रख दीं। अब रूमाल पढ़ रही हूँ।

*** *** ***

तुम्हारी तस्वीर जो लगा रखी है मैंने दीवार पर, उसे देखकर ट्यूशन पढ़ने आये लड़के ने पूछा, “ये कौन हैं आपके” मुझसे कुछ कहते नहीं बना।

सोचा कि अगली बार आओगे, तो तुम्हीं से पूछ लूँगी।

*** *** ***

सुनो, पिछली बार तुमने जो बादाम खरीदकर रख दिए थे और कहा था कि रोज़ खाना। उनमें घुन लग गए…

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मृच्छकटिक, अभिसरण और नुसरत की कव्वाली

‘अभिसारिका नायिका’ मुझे शुरू से ही बड़ी अच्छी लगती है. आधुनिक अर्थों में निडर और बोल्ड. अभिसारिका उस स्त्री को कहते हैं, जो अपने प्रिय से मिलने एक नियत ‘संकेत स्थल’ पर जाती है. कोई उसे देख न ले, इसलिए प्रायः यह समय रात्रि का होता है. लेकिन समय नियत नहीं. संकेत स्थल खेत, भग्न मंदिर, दूती का घर, जंगल, तीर्थ स्थान यहाँ तक कि श्मशान भी हो सकता है.

संस्कृत साहित्य में सम्भोग श्रृंगार के वर्णन में अभिसारिका नायिका का कई स्थलों पर वर्णन हुआ है, किन्तु मुझे अभिसरण का सबसे सुंदर दृश्य ‘मृच्छकटिक’ का लगता है. नायिका वसंतसेना, जो कि एक समृद्ध गणिका है, एक निर्धन ब्राह्मण चारुदत्त से प्रेम करती है. बरसात के मौसम में जबकि चारों ओर काले-काले मेघ छाये हुए हैं और उसके कारण तारों की रोशनी भी धरा तक नहीं पहुँच रही. मेघों के गर्जन और दामिनी के साथ मूसलाधार बारिश हो रही है. ऐसे घोर अन्धकार में वसंतसेना चारुदत्त से मिलने उसके घर जाती है.

अचानक हुए मेघ गर्जन से भयभीत वसंतसेना चारुदत्त के ह्रदय से लग जाती है. विदूषक ‘दुर्दिन’ को उपालंभ देता है कि वह नायिका को मेघ गर्जन से डरा रहा है, तो चारुदत्त उससे कहता है कि ऐसा मत कहो. इसी दुर्दिन से भयभीत होकर तो वसंतसेना मेरे ह्रदय से लगी है.

चारुदत्त कहता है-
धन्यानि तेषां खलु जीवितानि ये कामिनीनां गृहमगतानाम्।
आर्द्राणि मेघोदकशीतलानि गात्राणि गात्रेषु परिष्वजन्ति॥

-अर्थात् वास्तव में उनके जीवन धन्य हैं, जो घर में आयी हुयी कामिनियों के बादल के जल से शीतल हुए शरीरों का अपने शरीरों से आलिंगन करते हैं.

(ये विचार मुझे नुसरत फ़तेह अली खान की कव्वाली ‘है कहाँ का इरादा तुम्हारा सनम, किसके दिन को अदाओं से बहलाओगे. ये बता दो तुम इस चाँदनी रात में, किससे वादा किया है, कहाँ जाओगे’ सुनते हुए आया.)

दिए के जलने से पीछे का अँधेरा और गहरा हो जाता है…

फिर फिर याद करना बचपन की छूटी गलियों को…

आराधना का ब्लॉग

मैं शायद कोई किताब पढ़ रही थी या टी.वी. देख रही थी, नहीं मैं एल्बम देख रही थी, बचपन की फोटो वाली. अधखुली खिड़की से धुंधली सी धूप अंदर आ रही थी. अचानक डोरबेल बजती है. मैं दरवाजा खोलती हूँ, कूरियर वाला हाथ में एक पैकेट थमाकर चला जाता है. मैं वापस मुडती हूँ, तो खुद को एक प्लेटफॉर्म पर पाती हूँ.

मैं अचकचा जाती हूँ. नंगे पैर प्लेटफॉर्म पर. कपडे भी घरवाले पहने हैं. अजीब सा लग रहा है. मेरे हाथ में एक टिकट है. शायद कूरियर वाले ने दिया है. अचानक एक ट्रेन आकर रुकती है और कोई अदृश्य शक्ति मुझे उसमें धकेल देती है. मैं ट्रेन में चढ़ती हूँ और एक रेलवे स्टेशन पर उतर जाती हूँ. ये कुछ जान जानी-पहचानी सी जगह है. हाँ, शायद ये उन्नाव है. मेरे बचपन का शहर. लेकिन कुछ बदला-बदला सा.

मुझे याद नहीं कि मैं इसके पहले मैं यहाँ…

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‘चौराहे पर सीढियाँ’ को पढ़ते हुए…

आज ही किशोर चौधरी का कहानी संग्रह ‘चौराहे पर सीढियाँ’ पढ़कर समाप्त (?) किया है। समाप्त के आगे प्रश्नचिन्ह इसलिए लगा है क्योंकि कोई भी किताब पढ़कर समाप्त नहीं की जा सकती और चौराहे पर सीढियाँ जैसी किताब तो बिल्कुल नहीं। ऐसी किताबें शुरू तो की जा सकती हैं, लेकिन खत्म नहीं क्योंकि आप उनके असर से ही बाहर नहीं निकाल पाते खुद को।

मैं इस पुस्तक की समीक्षा नहीं लिखने जा रही क्योंकि पहली बात तो मैं खुद को इस काबिल नहीं समझती और दूसरी बात किसी भी निरपेक्ष समीक्षा के लिए उसके प्रभावक्षेत्र से बाहर आना ज़रूरी होता है और मैं अभी वहीं अटकी हुयी हूँ। इस नज़रिए से देखा जाय, तो शायद मैं कभी इसकी समीक्षा न लिख सकूँ…मैं बस अपने अनुभव बाँटना चाहती हूँ, जैसा कि मैंने इस किताब को पढ़ते हुए महसूस किया।

चौदह कहानियों वाली दो सौ पेज की इस किताब को पढ़ने में मुझे एक महीना लग गया। एक तो पिछले कुछ दिन से मैं और मेरी दिनचर्या बहुत अस्त-व्यस्त है…दूसरे एक कहानी को पढ़ने के बाद उसका असर कम से कम दो-तीन दिन तक दिमाग पर हावी रहता है। नौ फरवरी को ये किताब मुझे मिली। मैंने एक कहानी तो दूसरे ही दिन पढ़ डाली, लेकिन बाकी को पढ़ने में काफी समय लगा।

किशोर की कहानियों को पढ़ना मानो ज़िंदगी को एक नए नज़रिए से देखना है। हर एक कहानी का कथ्य और शिल्प अपने में बेजोड़ है। मानवीय सम्बन्धों के सूक्ष्म बुनावट पर बारीकी से नज़र डालती हुयी ये कहानियाँ आपको अपने आस-पास के माहौल को एकदम अलग ढंग से दिखाती हैं। कुछ बेहद नए बिम्ब सामने आते हैं, जिन्हें पढ़कर मैं चकित रह जाती हूँ कि किसी बात को इस ढंग से भी कहा जा सकता है। जो कहानियाँ मुझे सबसे अधिक पसंद आयीं, वो हैं- गीली चाक, चौराहे पर सीढियाँ, खुशबू बारिश की नहीं मिट्टी की है, गली के छोर पर अँधेरे में डूबी एक खिड़की और अंजलि तुम्हारी डायरी से बयान मेल नहीं खाते। मुझे ये कहानियाँ ही क्यों ज़्यादा पसंद आयीं, इसका कोई ठीक-ठीक जवाब नहीं है मेरे पास। हो सकता है कि मैं उनके पात्रों के साथ खुद का जुड़ाव महसूस कर रही हूँ या कहानी ही अपनी सी लगी हो या कहानी कहने का ढंग बेहद रोचक रहा हो।

अंजलि की कहानी पढ़ने के बाद मैं अवाक् थी और दुखी भी। ये एक अभागी लड़की की कहानी हो सकती है, लेकिन ऐसी लड़कियाँ अपने आस-पास मिल जायेंगी आपको। खासकर मेरे जैसी लड़की को, जो खुद एक हॉस्टल में रही हो और अनगिनत लड़कियों की ज़िंदगी की कहानियों को करीब से देख चुकी हो। इस दुनिया में भोली-भाली और भावुक लड़की की कोई जगह नहीं अगर वो अकेली हो तो। हाँ, उसे कोई अच्छा साथी मिल जाय, जो उसको ‘इस्तेमाल’ न करे, तो ये उसकी खुशकिस्मती है। इस कहानी को पढ़ने के बाद मन घोर निराशा में डूब जाता है और मैं ये सोचती हूँ कि कहानीकार ने कैसे एक घटना के चारों ओर कहानी बुन डाली?

कहानी ‘चौराहे पर सीढियाँ’, जिसके नाम पर संग्रह का नाम रखा गया है, अद्भुत कहानी है। कथ्य तो बेमिसाल है, लेकिन शिल्प की दृष्टि से यह कहानी मुझे अद्वितीय लगी। मैं ज़्यादा कुछ नहीं कहूँगी, बस कुछ अंश उद्धृत कर रही हूँ-
“यह कई बार सुना गया था कि कुछ लोग रिश्तों को सीढ़ी बनाकर चढ़ जाते हैं और फिर वापस लौटना भूल जाते हैं। लेकिन ये कभी नहीं सुना कि चलने में समर्थ लोग नीचे रह गए किसी रिश्ते को उठाने के लिए कुछ देर घुटनों के बल चले हों।”…
“रास्ते के बारे में यह प्रसिद्ध था कि वह कहीं जाया करता है। लोग पूछा करते थे कि ये रास्ता कहाँ जाता है। ऐसा पूछने वालों से कुछ मसखरे कहते थे कि रास्ते कहीं नहीं जाते। वे यहीं पड़े रहते हैं लेकिन ये बात सच न थी। रास्ते समय के साथ चलते रहते थे। वे आपको समय से आगे-पीछे होने का सही ठिकाना बता सकने का हुनर रखते थे।”

‘खुशबू बारिश की नहीं मिट्टी की है’ एक बेहद खूबसूरत कहानी है, जो स्त्री-पुरुष सम्बन्धों की सूक्ष्म पड़ताल करती हुयी एक खूबसूरत नोट के साथ खत्म होती है… खुशबू तो मिट्टी में पहले से मौजूद होती है, बारिश बस उसकी याद दिला देती है। शहरी जीवन के दिखावटी माहौल में रिश्तों की गर्मी को बचाए रखना बहुत कठिन होता है। एक उदाहरण देखिये। पार्टी का एक दृश्य-
“अपने-अपने ग्लास थामे हुए सब मर्द एक-दूसरे से इतने दूर खड़े थे कि कहीं छूत फैली हो। लेकिन शहरी जीवन में एक-दूसरे से दूर हो जाना ही असली सफलता है।”

‘गली के छोर पर अँधेरे में डूबी एक खिड़की’ प्रेम के रहस्यों को टटोलती है। प्रेम में डूबे दो युवाओं के मन की उद्विग्नता, आकुलता, छटपटाहट, दुस्साहस, नफरत आदि को अलहदा ढंग से प्रस्तुत करती है.
“लेकिन उन मुलाकातों से राहत आने की जगह बेचैनी की आफ़त आ जाया करती थी। दो बार देखा और तीन बार इशारे किये फिर आगे का पूरा दिन और रात खराब हो जाती थी।”
“…खिड़की में लगे हुए एक लोहे के सरिये को पकड़े हुए वह विदा लेने को ही था तभी एक नर्म नाज़ुक स्पर्श ने पागल-सा कर दिया। वह खुशी से झूमना चाह रहा था किन्तु इस नाज़ुक और प्रतीक्षित स्पर्श से उपजी उत्तेजना के अतिरेक में जड़वत हो गया।” (ये टुकड़ा पढ़ते हुए मुझे लगा कि मैं संस्कृत का कोई काव्य पढ़ रही हूँ।)
“इस बढ़ते जा रहे प्रेम में अब चाँद की परवाह कौन करता! एक नए किस्म का दुस्साहस उसमें भर गया था। वह पगलाया हुआ दूधिया रौशनी के बिछावन पर खड़ा खिड़की को चूमता रहता था। कुछ नयी खुशबुएँ भी उसी खिड़की में पहली बार मिलीं। एक अनूठी देहगंध बिस्तर के पसीने और सलवटों से भरी हुयी, उसके बदन के पास मंडराती रहती।”

मेरी सबसे अधिक मनपसंद कहानी ‘गीली चाक’ लगभग हर युवा पाठक की फेवरेट कहानी होगी, ये मैं पूरे दावे के साथ कह सकती हूँ। इस कहानी के बारे में कुछ बताकर मैं पाठकों का मज़ा किरकिरा नहीं करना चाहती। लेकिन कुछ खूबसूरत टुकड़े (वन लाइनर्स) ज़रूर शेयर करना चाहूँगी।
“पानी खत्म हो गया, बोतल बोझ हो गयी। प्रेम नहीं रहा, देह से नाता भी जाता रहा। ऐसे ही काश हर बंधन से आज़ाद हुआ जा सकता।”
“दीवारों पर पान गुटके की पीक फैली थी। जैसे किसी महबूब ने पिए हुए कह दिया हो, हाँ मैं तुम पर मरता था। और महबूबा भूत काल के ‘था’ को पकड़कर बैठ गयी हो।”
“सुबह की सर्द हवा में सफ़ाई वाली औरत ने अपने झाडू से कचरे को एक तरफ किया और गर्द चारों तरफ़ हो गयी। जैसे प्रेम कोई करता है और खुशबू सब तक आती है।”
“ये कोई ज़िंदगी थी? इसमें सिवा इसके कोई ख़ूबसूरती न थी कि ये बहुत अनिश्चित जीवन था।”
मैं ये कहानी पढ़कर बहुत रोई।क्यों? पता नहीं। लेकिन बहुत से युवा इस कहानी खुद को आसानी से जोड़ सकते हैं, खासकर वे, जो अपने घरों से दूर किसी बड़े शहर या महानगर में रहकर अपने जीवन के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

बहुत दिनों बाद कोई किताब पढ़कर रोई, निराश हुयी, मुस्कुराई, उदास और बेचैन हुयी। बहुत दिनों बाद रात-रात में जागकर कहानियों की कोई किताब पढ़ी। वो कहानी ही क्या जो आपको भीतर तक हिला न दे? और किशोर की हर एक कहानी ने अन्दर तक प्रभावित किया। अभी मैं उस असर से बाहर नहीं निकल पायी हूँ।

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दुनिया रंगीन सपनों वाली फूलों की सेज नहीं

नहीं समझ में आ रहा है बात शुरू कहाँ से करूँ? शीर्षक देने का भी मन नहीं हो रहा। मेरी समस्या ये है कि मैं अति संवेदनशील हूँ। कोई भी समस्या सुनती हूँ, तो परेशान हो जाती हूँ। ये परेशान होना उसके हल के लिए इतना बल देने लगता है कि समस्या की जड़ ढूँढने की कोशिश करने लगती हूँ और उसके समाधान को खोजने की भी। पर इस समस्या का कोई हल मुझे नहीं मिल रहा। बहुत सोचा पर कभी-कभी ये खुद के बस में होता ही नहीं।

ये एक  कहानी है। गल्प नहीं। वास्तविक कहानी। वास्तविकता, जो कभी-कभी कल्पना से बहुत अधिक भयावह होती है। एक झटके में आपके आगे से एक पर्दा हटता है और आपको सच्चाई का वो घिनौना चेहरा दिखता है, कि खून के रिश्तों से नफ़रत होने लगती है, दुनिया कपटी-छली लोगों से भरी लगती है और ईश्वर के अस्तित्व पर संदेह होने लगता है।

कहानी एक लड़की की है, जो शहर से कहीं दूर एक गाँव में रहती है। उसके पिता सरकारी कर्मचारी थे, जो अब रिटायर हो गए हैं। लड़की चार बहनों में से एक थी। बाकी सबकी शादी हो चुकी थी। पहले तो पिता ने लड़की को आठवाँ पास कराके घर में बिठा दिया था, लेकिन कुछ पढ़े-लिखे लोगों के समझाने पर पढ़ाने को राजी हो गए। लड़की होशियार थी, पढ़ती गयी। उसने एम.ए. किया बी.एड. किया। जब दूसरे शहर जाकर नौकरी करने की सोची, तो उसे मना कर दिया गया। कहा गया कि तुम्हारी शादी हो जाय, तो पति और ससुराल वाले नौकरी करवाएं तभी करना।

पिता के रिटायर होने के बाद से छोटा भाई घर का मालिक बन गया। ग्रेच्युटी और फंड के पैसों को देखकर उसे लालच आ गया। भाई ज़्यादा दहेज देना नहीं चाहता। इसलिए ऐसे-ऐसे रिश्ते खोजकर लाता, जो लड़की को पसन्द ही नहीं आते। लड़की ने जब एक-दो बार मना कर दिया, तो भाई कहने लगा कि लड़की शादी करना ही नहीं चाहती। रिश्ते अब भी आते हैं। लड़के वाले दहेज माँगते हैं, लड़की वाले देना नहीं चाहते। बिना दहेज के वही लड़का शादी करने को तैयार होता है, जो या फिर विधुर है या तलाकशुदा या उसमें कोई शारीरिक कमी है। लड़की इस तरह के लड़कों को अपना मुँह दिखा-दिखाकर थक गयी है।

पिछले छः साल से लड़की इसी स्थिति में है। उसकी आयु बत्तीस साल हो गयी है। न उसकी शादी हो रही है और न उसे नौकरी करने दी जा रही है। लड़की कहीं भाग न जाय, इसलिए उस पर कड़ा पहरा है। उसके बाहर निकलने पर नज़र रखी जाती है। हालत ये है कि लड़की ना किसी गाँववाले से बात करना चाहती है और न किसी रिश्तेदार से। वो भयंकर डिप्रेशन में है। हाँ, उसके भाई ने ये ज़रूर कहा है कि वो आत्महत्या कर ले, तो सारी समस्या हल हो जायेगी क्योंकि भागने पर प्रतिष्ठा धूमिल होगी, जबकि आत्महत्या करने पर ये कहा जा सकता है कि डिप्रेशन में थी। इसलिए खुद को खत्म कर लिया।

लड़की के घरवाले इतने गरीब नहीं हैं कि दहेज ना दे सकें। उनके पास अच्छी-खासी खेत की ज़मीन भी है और आबादी की भी। कुछ ज़मीन सड़क किनारे भी है, जिसका कमर्शियल इस्तेमाल हो सकता है। यहाँ शायद लड़की का ब्राह्मण परिवार का होना बहुत से लोगों को प्रासंगिक न लगे, लेकिन मेरे विचार से है क्योंकि तथाकथित सवर्ण परिवारों में प्रतिष्ठा, कभी-कभी व्यक्ति के जीवन से कहीं ज़्यादा बढ़कर हो जाती है। पश्चिमी यू.पी. में होने वाली ऑनर किलिंग और हमारे पूर्वी यू.पी. में लड़कियों को घर से बाहर खेतों तक भी न जाने देना, इसी प्रतिष्ठा से जुड़े हैं। दूर-दराज के गाँवों में ऐसी एक नहीं, कई कहानियाँ हैं, जहाँ अभी तक इक्कीसवीं सदी की किरण तक नहीं पहुँची है। लोग लड़कियों को पढ़ा तो देते हैं, लेकिन उन्हें अपने फैसले खुद लेने की आज़ादी नहीं है।

लड़की ने कुछ शुभचिंतकों से मदद माँगी। कहा कि मेरी यहाँ से निकलने में मदद करो। शादी करवा दो या नौकरी लगवा दो, बस इस “शादी के इंतज़ार” से मुक्ति दिलवा दो। लेकिन उन्होंने उल्टा उसे ही समझा दिया कि ‘दुनिया बहुत खराब है। बाहर भेडिये घूम रहे हैं। तुम कहाँ जाओगी? घर से भागी हुयी लड़कियों की कोई कीमत नहीं होती। सब उनका इस्तेमाल करना चाहते हैं.’ गाँवों में वैसे भी कोई किसी की दुश्मनी मोल नहीं लेना चाहता। लड़कियों के मामले में तो और नहीं पड़ना चाहता। उन्हें कोई घर में भी नहीं रखना चाहता कि कहीं लड़की के माँ-बाप अपहरण का केस न करा दें।

मैं अगर इस समस्या का हल पूछूँ तो शायद कुछ लोग ये कहें कि लड़की के घरवालों को दहेज दे देना चाहिए, लेकिन क्या ये दहेज प्रथा का समर्थन करना नहीं हुआ? जब भी मैं सम्पत्ति में अधिकार की बात करती हूँ, तो लोग भाई-बहन के सम्बन्धों की दुहाई देने लगते हैं। इस मामले के बारे में उनका क्या कहना है? अगर लड़की भी लड़कों की तरह ही सम्पत्ति में बराबर की हकदार होती, तो क्या भाई को इस तरह से घर का मालिक बन जाने की हिम्मत होती?

मैं नहीं कहती कि सारे भाई ऐसे होते हैं। मैं ये भी नहीं कहती कि सारे माँ-बाप ऐसे होते हैं। सारी लड़कियों की कहानी भी ऐसी नहीं होती। मुश्किल उनकी नहीं है, जिन्होंने रोशनी देखी ही नहीं है। मुश्किल उनके लिए है, जिन्होंने रोशनी देख ली है, लेकिन अँधेरे में रहने को मजबूर हैं। मैं शाम से बहुत दुखी हूँ। प्रेम का सारा सुरूर हवा हो गया है, फागुनी हवाएँ काटने को दौड़ रही हैं। मैं दुखी हूँ। बहुत दुखी।

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