आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

Archive for the tag “अम्मा”

साइकिल वाली लड़की

साइकिल चलाये ज़माना बीत गया. अब सोचते हैं कि चला कि पायेंगे या नहीं? पता नहीं. लेकिन फिर से एक बार साइकिल पर बैठकर दूर-दराज के गाँवों में निकल जाने का मन करता है, जैसे बचपन में करते थे. बाऊ  के ड्यूटी से वापस लौटते ही मेरे और भाई के बीच होड़ लग जाती थी कि पहले कब्ज़ा कौन जमाता है साइकिल पर. भाई लम्बाई में मात खा जाता था मुझसे. एक साल छोटा था तो लम्बाई भी उतनी ही कम थी. वैसे भी लड़कियाँ जल्दी लंबी हो जाती हैं. उसे साइकिल सीखनी होती थी और मुझे चलानी होती थी. अपनी लम्बाई के चलते वो चढ़ नहीं पाता था और मैं साइकिल पाते ही ये जा और वो जा 🙂

ये जो आलिया भट्ट हैं न, आज स्कूटी पे बैठकर पूछती हैं “Why should boys have all the fun?” हम आज से चौबीस-पच्चीस साल पहले कहते थे, साइकिल पे बैठकर. स्कूटी तो हम निम्न-मध्यमवर्गीय परिवार के बच्चों के लिए तब भी एक सपना था और अब भी सपना ही है. जो थी, वो हमारी साइकिल और उससे जुड़े हमारे सुख-दुःख. साइकिल मिलते ही मानो पंख मिल जाते थे. घुमक्कड़ और आवारा मन, शरीर को अपने काबू में ले लेता था और फिर जहाँ-जहाँ मन कहे, वहाँ-वहाँ हम.एक अद्भुत आज़ादी का अनुभव.

लड़कों से साइकिल रेस लगाते थे. रेलवे कॉलोनी से मीलों दूर के गाँव चले जाते थे. कभी-कभी टक्कर मारकर किसी बदमाश लड़के को गिराकर सबक सिखा देते थे और कभी खुद ही गिर जाते थे. कई बार ऐसे ही गिरे तो घुटने छिल जाते थे बुरी तरह से. भलभल खून बहने लगता. हमें लगता कि अब तो हुयी अम्मा के हाथों कुटाई गुड्डू तुम्हारी. फिर तय करते कि जब तक खून बंद नहीं होगा घर ही नहीं जायेंगे. हैंडपंप पे जाकर चोट धोते. उसमें गड़ी हुयी एक-एक रोड़ी निकालते. घाव को ठीक से साफ़ करते और फूँक-फूँककर सुखाते. दर्द तो खूब होता, लेकिन वो अम्मा की कुटाई और डाँट से कम दर्दीला दर्द था 🙂

घर जाते तो बेहद दर्द के बावजूद लंगड़ाकर नहीं चलते थे. धीरे-धीरे सीधा चलने की कोशिश करते. मालूम था हमको कि अम्मा को पता चला तो फिर वही उपदेश शुरू कर देंगी और साईकिल न चलाने के लिए दस-दस कारण गिनवायेंगी. “कहते हैं तुमसे कि अभी पैडल तक पूरा पैर नहीं पहुँचता है, इतनी ऊँची साइकिल मत चलाओ,”  “यहाँ के लड़के बहुत उजड्ड हैं. उनमें से किसी ने टक्कर मारी होगी. कहते हैं कि इन लड़कों के साथ साइकिल मत चलाओ,” “ज़मीन अच्छी नहीं है यहाँ की. रेह और रोड़ी भरी पड़ी है मिट्टी में. ऐसी मिट्टी में साईकिल मत चलाओ” वगैरह-वगैरह. मेरे साइकिल चलाने से मेरे गिरने को जोड़कर वो अपनी बात सिद्ध कर देंगी कि हमें किन-किन कारणों से साइकिल नहीं चलानी चाहिए.शुक्र है कि चोट लगने पर “लड़की हो, लड़की की तरह रहा करो” नहीं सुनने को मिलता. नहीं तो ये तो उनका फेवरेट डायलॉग था 🙂

हम चुपचाप धीरे से डिटॉल की शीशी उठाते थे और टायलेट में घुस जाते था. पता था कि अम्मा की नज़र पड़े न पड़े, दीदी की ज़रूर पड़ जायेगी. तो सयाने हम अपने चोट को डिटॉल से अच्छी तरह धोकर-सुखाकर शीशी वापस उसकी जगह पर रख देते थे और किसी को कानोंकान खबर तक नहीं होती.

रात के समय दर्द उभरता. सोते समय पैर छूता चारपाई की पाटी से और मुँह से हल्की सी चीख निकल जाती. अम्मा लोग के तो जैसे चार कान होते हैं. बच्चों की चुन्नी सी भी आवाज़ सुनायी पड़ जाती  है. पूछतीं “का हुआ रे.” कुछ नहीं अम्मा कहते-कहते गला भर आता था. अम्मा को तुरंत शक हो जाता था. उठतीं और टॉर्च जलाकर देखतीं फ्रॉक़ थोड़ी ऊपर उठ जाने से घुटने की चोट दिख जाती थी, जिसमें पाटी से दुखकर खून रिस आया होता था. अम्मा बोलीं “ये चोट कैसे लगी रे?” “गिर गए थे” हम भर्राई आवाज़ में रुलाई रोकते-रोकते कहते. “साइकिल से गिर गए थे बोल” मैं हाँ में सर हिलाती और सर झुकाकर, आँख बंद करके उनकी मार का इंतज़ार करने लगती थी. लेकिन अम्मा तो अम्मा होती है. पट्टी ले आती थीं. अक्सर दिन की चोट पर अम्मा रात में पट्टी बाँधती. ये बात अलग है कि सबलोग सो रहे होते इसलिए चिल्लाकर तो नहीं, धीरे-धीरे बड़बड़ाती जातीं. वही बातें, जो ऊपर लिखी हैं 🙂

woman-and-bicycle - Copy

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अँगीठी पर भुने भुट्टे और स्टीम इंजन के दिन

बचपन अलग-अलग मौसमों में अलग खुशबुओं और रंगों के साथ याद आता है। डॉ॰ अनुराग के एक अपडेट ने यादों को क्या छेड़ा, परत दर परत यादें उधड़ती गयीं, जिंदगी के पन्ने दर पन्ने पलटते गए। जैसे बातों से बातें निकलती हैं, वैसे ही यादों से यादें। अब बरसात का मौसम है, तो भुट्टे याद आये, भुट्टे याद आये तो अँगीठी याद आयी, फिर कोयला याद आया, फिर स्टीम इंजन और दिल बचपन की यादों में डुबकियाँ लगाने लगा। बहुत से छूटे हुए शब्द याद आये। बचपन के रहन-सहन का तरीका याद आया। तब की बातें सोचती हूँ और आज को देखती हूँ, तो लगता ही नहीं है कि ये वही दुनिया है… वो दुनिया सपने सी लगती है।

तब छोटे शहरों में खाना मिट्टी के तेल के स्टोव पर या अँगीठी पर बनता था। तब तक वहाँ तक गैस सिलेंडर नहीं पहुँचा था। रेलवे कालोनी के तो सारे घरों में कोयले की अँगीठी पर ही खाना बनता था क्योंकि स्टीम इंजन की वजह से कोयला आराम से मिल जाता था। कच्चा कोयला भी और पक्का कोयला भी।पक्का कोयला आता कहाँ से था, ये शायद नए ज़माने के लोग नहीं जानते होंगे। स्टीम इंजन में इस्तेमाल हुआ कोयला भी आधा जलने पर उसी तरह खाली किया जाता था, जैसे अंगीठी को खोदनी से खोदकर नीचे से खाली करते थे, जिससे राख और अधजला कोयला झड़ जाय और आक्सीजन ऊपर के कोयले तक पहुँचकर उसे ठीक से जला सके।.. इंजन के झड़े कोयले को बीनकर बेचने के लिए रेल विभाग ठेके देता था। बड़े रेलवे स्टेशनों का तो नहीं मालूम, पर छोटे स्टेशनों पर किसी एक ठेकेदार की मोनोपली चलती थी। उस ‘पक्के कोयले’ का इस्तेमाल अँगीठी को तेज करने में होता था और सबकी तरह हमलोग भी किलो के भाव से इसे ठेकेदार से खरीदते थे। बाऊ प्लास्टिक के बोरे में साइकिल के पीछे लादकर इसे घर लाते थे… … आजकल की पीढ़ी ने अपने पापा को साइकिल चलाते देखा है क्या?

बरसात में ये कोयला बड़े काम आता था क्योंकि अक्सर लकड़ी सीली होने के कारण कच्चा कोयला मुश्किल से जलता था। लकड़ी ? अँगीठी सुलगाने के लिए उसके अन्दर पहले लकड़ी अच्छे से जला ली जाती थी, उसके बाद कोयला डाला जाता था।  रेलवे ट्रैक के बीच में पहले पहाड़ की लकड़ी के स्लीपर बिछाये जाते थे, वही खराब होने पर जब निकलते थे, तो रेलवे कर्मचारी सस्ते दामों पर अँगीठी के लिए खरीद लेते थे। ये लकड़ी अच्छी जलती थी और जलते समय उसमें से एक तारपीन के तेल जैसी गंध आती थी। अम्मा या दीदी कुल्हाड़ी से काटकर उसके छोटे-छोटे टुकड़े करती थीं। कितनी मेहनत लगती रही होगी उसमें, मैं नहीं जानती। मैं बहुत छोटी थी, केवल देखती थी। कोयला और लकड़ी आँगन में रखे जाते थे और बरसात में भीग जाते थे। इसलिए बरसात में अँगीठी सुलगाने में बहुत मुश्किल होती थी। जब अँगीठी काम लायक सुलग जाती थी, तो उसे अँगीठी आना कहते थे। तब उसे उठाकर बरामदे में रखा जाता था और उस पर अम्मा भुट्टे भूनती थीं। जब आँगन में झमाझम बारिश होती थी, तब हमलोग बरामदे में अम्मा के चारों ओर बैठकर अपने भुट्टे के भुनने का इंतज़ार करते थे…अभी तो न जाने कितने सालों से आँगन नहीं देखा और ना ही अम्मा के हाथ से ज्यादा अच्छा भुना भुट्टा खाया है… …!

मेरे बाऊ रेलवे क्वार्टर के सामने की जगह को तार से घेरकर क्यारी बना देते थे और उसमें हर साल भुट्टा बोते थे। कभी-कभी तो इतना भुट्टा हो जाता था कि उसे सुखाकर बाँधकर छत पर लगी रॉड में बाँधकर लटका दिया जाता था। फिर हमलोग कभी-कभी उसके दाने छीलकर अम्मा को देते थे और वो लोहे की कड़ाही में बालू डालकर लावा भूनती थीं। एक भी दाना बिना फूटे नहीं रहता था। भुट्टे के खेतों में तोते बहुत नुक्सान करते थे जिस दिन हमारी छुट्टी होती थी, हम सारा दिन तोते भगाते रहते थे 🙂

आज की पीढ़ी ने स्टीम इंजन चलते नहीं देखा। उसके शोर को नहीं सुना। उसके धुएँ से काले हो जाते आसमान को नहीं देखा। बहुत सी और यादें हैं, और भूले हुए शब्द। अनेक लोहे के औजार बाऊ अपने हाथों से बनाते थे और उस पर ‘टेम्पर’ भी खुद ही देते थे। संडसी, बंसुली, खुरपी, कुदाल, फावड़ा, नहन्न्नी, पेंचकस, कतरनी, गँड़ासी, आरी, रेती ... इनके नाम सुने हैं क्या? या सुने भी हैं तो याद हैं क्या?

दिए के जलने से पीछे का अँधेरा और गहरा हो जाता है…

मैं शायद कोई किताब पढ़ रही थी या टी.वी. देख रही थी, नहीं मैं एल्बम देख रही थी, बचपन की फोटो वाली. अधखुली खिड़की से धुंधली सी धूप अंदर आ रही थी. अचानक डोरबेल बजती है. मैं दरवाजा खोलती हूँ, कूरियर वाला हाथ में एक पैकेट थमाकर चला जाता है. मैं वापस मुडती हूँ, तो खुद को एक प्लेटफॉर्म पर पाती हूँ.

मैं अचकचा जाती हूँ. नंगे पैर प्लेटफॉर्म पर. कपडे भी घरवाले पहने हैं. अजीब सा लग रहा है. मेरे हाथ में एक टिकट है. शायद कूरियर वाले ने दिया है. अचानक एक ट्रेन आकर रुकती है और कोई अदृश्य शक्ति मुझे उसमें धकेल देती है. मैं ट्रेन में चढ़ती हूँ और एक रेलवे स्टेशन पर उतर जाती हूँ. ये कुछ जान जानी-पहचानी सी जगह है. हाँ, शायद ये उन्नाव है. मेरे बचपन का शहर. लेकिन कुछ बदला-बदला सा.

मुझे याद नहीं कि मैं इसके पहले मैं यहाँ कब आयी थी. स्टेशन के प्लेटफॉर्म साफ-सुथरे दिख रहे हैं. मैं स्वतः बढ़ चलती हूँ. यहाँ स्टेशन मास्टर का ऑफिस था, फिर टी.सी. ऑफिस, फिर बाहर जाने के लिए गेट. मैं कैलाश चाचा का बुकस्टाल ढूँढ रही हूँ, पर कहीं नहीं मिला… ये प्लेटफॉर्म भी बहुत लंबा है. लगता है खत्म ही नहीं होगा. मैं बाहर निकलती हूँ और खुद को एक वीरान सी जगह पर पाती हूँ. यहाँ से तो एक सड़क जाती थी, जिसके दाहिने कोने पर गोलगप्पे वाला ठेला लगाता था और बाईं ओर ‘संडीले के लड्डू’ वाले की दूकान थी… कुछ पेड़ भी थे, लेकिन अब यहाँ रेगिस्तान है और आँधी सी चल रही है. मैं आगे बढ़ चलती हूँ, शायद कचौड़ी गली मिल जाय.

अचानक देखती हूँ कि अम्मा मेरा हाथ पकड़कर खींच रही हैं ‘चलतू काहे ना’ अम्मा ने अपनी मनपसंद सफ़ेद ज़मीन पर नीले बूटे वाली उली साड़ी पहनी हुयी है, हमेशा की तरह पल्लू सर पर लिया हुआ है और तेज हवा से बचने के लिए उसका एक कोना मुँह में दबाये हुए हैं. मै लगभग घिसटते हुए अम्मा के साथ चल पड़ती हूँ. मैं एक छोटी सी बच्ची हूँ और मैंने लाल छींट वाली फ्राक पहनी है. हम कचौड़ी गली में हैं . खूब सारी दुकाने हैं– खील, बताशे, लइय्या, चूड़ा, चीनी वाले खिलौने. अम्मा एक-एककर सब सामान तुलवाकर अपनी कंडिया और झोले में रख रही है. मेरी नज़र प्रेम भईया की दूकान पर है, जहाँ रंग-बिरंगे टाफी-कम्पट-लेमनचूस अलग-अलग जारों में रखे हैं.

मेरा हाथ अम्मा के हाथ से छूट गया. वो पता नहीं कहाँ चली गयी? मैं गली में अकेली खड़ी हूँ. यहाँ तो कोई दूकान नहीं है या शायद बाज़ार बंद है. इसी मोहल्ले में बुकस्टाल वाले चाचा का घर था. घर के सामने एक बड़ा सा कुआँ, जिसके आस-पास हम बच्चों का जाना मना था. पर मैंने कई बार उसके अंदर झाँका था. कितना गहरा था वो और कितना अन्धेरा था उसके अंदर!…पर, वो गली ही नहीं मिल रही. मैं बहुत परेशान हूँ. नंगे पाँव हूँ. घर के कुचड़े-मुचड़े कपडे पहन रखे हैं. मौसम भी पता नहीं कैसा है. हर तरफ धूल ही धूल. धुंधलका सा छाया हुआ है. दूर तक कोई भी इंसान नहीं दिख रहा है.

मैं कचौड़ी गली से निकलकर बड़े चौराहे पहुँचती हूँ, पर ये वैसा नहीं है, जैसा मेरे बचपन में हुआ करता था. ये तो बहुत छोटा है. शायद बचपन में चीज़ें ज्यादा बड़ी दिखती हैं. मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा है. रोना आ रहा है. यहाँ कितनी भीड़ है. मैं घबराकर बेतहाशा भागने लगती हूँ. ऐसा लगता है सारी भीड़ मेरे पीछे दौड रही है. सब तेजी से पीछे छूट रहा है, मेडिकल रोड, अमर बुक डिपो, प्रकाश मेडिकल स्टोर…स्टेशन रोड, जनता फुटवियर, गुप्ता चाचा की दूकान.

मैं हाँफते-हाँफते स्टेशन पर पहुँचती हूँ. इलेक्ट्रानिक्स बोर्ड पर गाड़ियों के बारे में सूचना चल रही है. सन 2000 में जाने वाली गाड़ी प्लेटफॉर्म नंबर 1 पर आयेगी, सन 1995 में जाने वाली गाड़ी प्लेटफॉर्म नंबर 3 पर आ रही है… सन 1980 में जाने वाली गाड़ी प्लेटफॉर्म नंबर 4 पर आ रही है… … गाडियाँ इतनी तेजी से आ-जा रही हैं कि पता नहीं चल पा रहा है कि कब रुकी, कब चली, पर कोई भी आने-जाने वाला नहीं दिख रहा है. ये कौन सी जगह है और कोई यात्री क्यों नहीं है? तभी कोई मेरे कान में बुदबुदा गया “कोई नहीं दिखेगा. इन गाड़ियों से जिसको जाना होता है, सिर्फ़ वही चढ़ पाता है. यहाँ बहुत से लोग हैं, पर कोई किसी को नहीं देख पाता.” मैंने आस-पास देखा तो कोई नहीं था. मैं बुरी तरह डर गयी. मुझे नहीं रहना यहाँ. मुझे वापस जाना है.

लेकिन ये सारी गाडियाँ तो अतीत में जा रही हैं. मैं हूँ कहाँ? कहीं मैं मैट्रिक्स के नियो की तरह दो दुनियाओं के बीच तो नहीं…

मैंने बहुत इंतज़ार किया. अभी तक मेरी गाड़ी नहीं आयी. शायद मैं अतीत में फँस गयी हूँ.

(त्योहारों पर ऐसे सपने ज्यादा आते हैं. प्रस्तुत पोस्ट परसों देखे गए एक सपने पर आधारित है.)

अम्मा के सपने

वैसे तो माँ को याद करने के लिए कोई एक ख़ास दिन नहीं होता, वो हर समय पास-पास ही रहती है, उसकी तस्वीर आँखों में और यादें हर वक्त दिल में होती हैं,लेकिन फिर भी एक ख़ास दिन जब सब अपनी-अपनी माँ को याद करते हैं तो मुझे भी अम्मा की याद बेतरह आने लगती है. उसके छोटे-छोटे अरमान, कुछ बेहद साधारण आकांक्षाएं और मामूली से सपने उसे इतना ख़ास क्यों बनाते हैं?

डेढ़ साल पहले माँ पर लिखी एक कविता याद आ रही है, जो कि मेरे ब्लॉग फेमिनिस्ट पोयम्स पर प्रकाशित हो चुकी है.

मेरी अम्मा
बुनती थी सपने
काश और बल्ले से,
कुरुई, सिकहुली
और पिटारी के रूप में,
रंग-बिरंगे सपने…
अपनी बेटियों की शादी के,

कभी चादरों और मेजपोशों पर
काढ़ती थी, गुड़हल के फूल,
और क्रोशिया से
बनाती थी झालरें
हमारे दहेज के लिये,
खुद काट देती थी
लंबी सर्दियाँ
एक शाल के सहारे,

आज…उसके जाने के
अठारह साल बाद,
कुछ नहीं बचा
सिवाय उस शाल के,
मेरे पास उसकी आखिरी निशानी,
उस जर्जर शाल में
महसूस करती हूँ
उसके प्यार की गर्मी…

अम्मा और मैं- एक अनोखा रिश्ता (3.)

कुछ महीने पहले एक कोशिश की थी, अठारह साल पहले इस दुनिया से रूठ गयी अपनी माँ से अपने रिश्ते को समझने की, उसे शब्दों में बाँधने की. सोचा था तीन कड़ियों में कुछ समेट पाऊँगी. वैसे तो माँ की यादों को कुछ शब्दों में नहीं समाया जा सकता, पर ये कोशिश, कुछ लिखने के बहाने इस अनोखे रिश्ते को समझने की थी- माँ-बेटी का रिश्ता, एक अनुशासनप्रिय माँ और एक उद्दंड बेटी का.

पर लिखने का ये सिलसिला साहस की कमी के कारण रुक गया, इस बात के डर से कि अम्मा के इस दुनिया से जाने के बारे में कैसे लिखूँगी? फिर सोचा कि जब खुद ही ये मानती हूँ कि वो हमेशा एक साये की तरह मेरे साथ हैं, तो फिर ये डर कैसा? इसलिए हिम्मत कर पायी कि ये पोस्ट लिखूँ. ये मेरा कन्फेशन होगा … जो शायद मेरे इस अपराधबोध को दूर कर सके कि मैंने उनके जीते जी कभी उन्हें समझने की कोशिश नहीं की, मेरी इस आत्मग्लानि को मिटा सके कि मैं कभी उनकी कोई सेवा नहीं कर सकी. हो सकता है कि इस बहाने मैं अपने आप को माफ़ कर पाऊँ या किसी तरह खुद को समझा पाऊँ.

किसी अपने के चले जाने पर हमें ना सिर्फ़ उसके ना होने का दुःख होता है, बल्कि उन तमाम बातों का भी दुःख होता है, जो उसके होने पर होतीं या जो हमने उससे कही होतीं. अम्मा का जाना अचानक नहीं हुआ. वो अक्सर बीमार रहती थीं. उन्हें आँतों की टी.बी. थी और मारे जिद के कभी ठीक से दवा नहीं कराती थीं. इस कारण बहुत अधिक दुबली हो गयीं और एक दिल के दौरे ने उनकी जान ले ली. पर उनके जाने के ठीक एक दिन पहले तक नहीं मालूम था कि कल वो नहीं होंगी. नहीं तो मैं वो सारी बात कह देती, जो उनके ना होने पर सोच-सोचकर रोती रहती.

मैं उनसे कहती कि मैं पूरी कोशिश करूँगी एक अच्छी लड़की बनने की, मन लगाकर पढूँगी, घर के काम में दीदी का हाथ बटाऊँगी, हमेशा दीदी का कहना मानूँगी, छोटे भाई से लड़ाई नहीं करूँगी, किसी को पलटकर जवाब नहीं दूँगी, लड़कों के साथ नहीं खेलूँगी, ज़ोर-ज़ोर से हँसूँगी नहीं और ऊँची आवाज़ में गाना भी नहीं गाऊँगी और… और भी बहुत कुछ. मैं उनसे बताती कि मैं उनकी बात का जवाब इसलिए देती हूँ कि वो डाँटकर बात करती हैं, अगर वो प्यार से कहें तो मैं हर काम कर दूँगी… अगर मुझे ज़रा सा भी पता होता कि कल वो हमारे बीच नहीं होंगी तो मैं अपने स्वभाव के विपरीत उनके गले लग जाती और कहती कि “अम्मा, तुम हमें सबसे प्यारी हो. हमें छोड़कर मत जाओ. तुम भले ही बिस्तर पर पड़ी रहो. हम तुम्हारी पूरी सेवा करेंगे, पर तुम रहो. तुम्हारा होना ही सब कुछ है.” पर, मैं नहीं कह पायी, कुछ नहीं कह पायी और एक पल में ही मेरे देखते-देखते वो विदा हो गयीं. मुझे लगा मानो वो मेरे ही व्यवहार से रूठकर इस दुनिया से चली गयीं.

किसी के जाने के ठीक पहले तक हमें नहीं पता होता कि कल वो हमारे बीच नहीं रहेगा. किसी के रहने ना रहने की बात छोड़ भी दें, तो भी हमें अपने अगले पलों के बारे में कुछ नहीं पता होता. आज जो हमारे साथ चल रहे हैं, कल रहें ना रहें. हम ही आज जैसे हैं, वैसे कल हों कि नहीं. पता नहीं आज जो हैं, कल वो परिस्थितियाँ रहें ना रहें. पता नहीं कल आज के जैसा हो कि नहीं… तो जब हमें कल का पता नहीं तो आज को क्यों गवाएँ? हमें आज को जीना चाहिए, उसे समझने की कोशिश करनी चाहिए. हमें जिसके लिए जो महसूस होता है कह देना चाहिए, किसी के दिल को दुखाये बिना…कोई काम ऐसा नहीं छोड़ना चाहिए, जिसके ना करने के कारण कल पछताना पड़े…

आज रुककर सोचती हूँ कि ये बातें तब समझ में आ गयी होतीं, तो शायद मुझे इस तरह पछताना नहीं पड़ता. हाँ, मैं छोटी थी, पर इतनी ज्यादा छोटी भी नहीं थी कि ये बातें ना समझ सकती. ये अपराधबोध मुझे अब भी सताता है कि मैंने अम्मा को कभी वो सम्मान नहीं दिया, जिसकी वो हकदार थीं. मैं हमेशा अपने में ही रहती थी. अम्मा के पास जाने से कतराती थी. उनके आख़िरी दिनों में मैंने कभी उनके पास बैठने की ज़रूरत नहीं समझी, कभी नहीं पूछा कि उन्हें किसी चीज़ की ज़रूरत तो नहीं, कि वो कुछ कहना तो नहीं चाहती हैं, और अब ये अपराधबोध मुझे सताता रहता है, ये ग्लानि मुझे परेशान करती रहती है. शायद मेरी ये सज़ा है कि मैं ज़िंदगी भर इस पछतावे में जीती रहूँ.

पिछली कड़ियाँ

अम्मा और मैं- एक अनोखा रिश्ता (1.)

अम्मा और मैं- एक अनोखा रिश्ता (2.)

भागना परछाइयों के पीछे-पीछे

भागना परछाइयों के पीछे-पीछे…

छुटपन में, जब पेड़ों की परछाइयाँ धूप से लड़ते-लड़ते, शाम को थककर ज़मीन पर पसर जाती थीं, तो हम उनकी फुनगियों पर उछल-कूद  मचाते थे और कहते थे “देखो, हम पेड़ की फुनगी पर हैं”—बचपन कितना मासूम होता है, परछाइयों से खेलकर खुश हो लेता है. पर, हम अब भी तो वही कर रहे हैं—आभासी दुनिया की वाहवाहियों पर खुश हो लेते हैं… आभासी अनबन पर दुश्मनी कर बैठते हैं… पर क्या ये खुशी और दुःख भी आभासी होते हैं… पता नहीं, लेकिन हम फिर भी खुश भी होते हैं और दुःखी भी… हम परछाइयों के पीछे-पीछे भागते रहते हैं…

लोग कहते हैं कि परछाइयाँ अँधेरे में साथ छोड़ देती हैं… मुझे नहीं लगता. अँधेरे में परछाइयाँ फैलकर अँधेरे का रूप ले लेती हैं. उजाले में हमारे एक ओर चलती हैं, पर अँधेरे में चारों ओर से घेरे रहती हैं… हमारे साथ होती हैं… बस दिखती नहीं.

पिछले कुछ दिनों से बाउ-अम्मा की यादों को समेट रही थी, जो दिमाग के हर कोने में बिखरी हुयी हैं कि अम्मा पर लिखते-लिखते अचानक रुक गयी. जितने दिन लिखा उनके बारे में, तो लगा जैसे वो दिन फिर से जी लिये हैं, उनके साथ… तीसरी किस्त इसलिये नहीं लिख पा रही कि उसमें मुझे उनको फिर से खोना पड़ेगा… वास्तविक दुनिया में खोने के बाद… एक बार फिर से आभासी दुनिया में…

पर, अब धीरे-धीरे समझ में आ रहा है कि वो खोयी कहाँ है? यहीं तो हैं मेरे साथ… कभी परछाईं कभी अँधेरा बनकर… वो यहीं हैं, पर मैं उन्हें छू नहीं सकती… ज्यों आगे बढ़ती हूँ छूने के लिये, वो आगे बढ़ती जाती हैं, और मैं उनके पीछे-पीछे…

…शायद ऐसे ही भागती रहूँगी परछाइयों के पीछे, जब तक कि वो परछाईं शाम ढले थककर, निढाल होकर ज़मीन पर पसर नहीं जाती… और फिर मैं उसकी गोद में जा बैठूँगी और ये सोचकर खुश हो लूँगी कि मैं अम्मा की गोद में बैठी हूँ


अम्मा और मैं- एक अनोखा रिश्ता (2.)

मेरे और अम्मा के अघोषित युद्ध में अक्सर दीदी शान्ति-स्थापना का असफल प्रयास किया करती थीं. वो एक ओर मुझे समझाती कि अम्मा तुम्हें बहुत प्यार करती हैं, बस दिखाती नहीं हैं, दूसरी तरफ अम्मा से कहती कि ज्यादा मार-पीट से गुड्डू और ढीठ होती जायेगी. न मुझे दीदी की बात समझ में आती और न अम्मा मार-पीट से बाज आतीं. मुझे समझ में आती भी कैसे दीदी की बात, प्यार कोई तीसरा थोड़े ही महसूस करवा सकता है. वो तो अपने आप से महसूस होता है. खैर, दीदी बेचारी और कुछ नहीं तो मुझे अम्मा की मार से ज़रूर बचा लेती थी कभी-कभी.

कई बार मुझे दीदी की बात सच भी लगती थी. पर अम्मा अपना प्यार दिखाती क्यों नहीं हैं, ये नहीं समझ में आता. मुझे लगता कि वो हमेशा मुझसे नाराज़ रहती हैं. पता नहीं क्यों? असल में हमारे देश में हम अपनों से ज्यादा दूसरों की चिन्ता करते हैं. शायद अम्मा को ये लगता हो कि उनके प्यार जताने से मैं और बिगड़ जाउँगी और फिर लोग क्या कहेंगे? मामला बेटियों का हो तो माँएँ कुछ अधिक ही सतर्क रहती हैं.

पर अम्मा के प्यार की गर्मी मुझे महसूस होती थी. मैं देखती थी कि उन्हें मेरे खाने-पीने की ज्यादा ही चिन्ता रहती है क्योंकि मैं भूख बिल्कुल बर्दाश्त नहीं कर पाती थी और मुझे तुरन्त कुछ न कुछ खाने के लिये चाहिये होता था. दोनों भाई-बहन इस मामले में थोड़े नकनकहे थे, पर मैं नहीं. भूख लगने पर कुछ भी खा लेती थी. इसीलिये जब स्कूल की तरफ से पहली बार मंडलीय प्रतियोगिता में भाग लेने लखनऊ जाना हुआ, तो हमेशा की तरह पहले तो अम्मा ने विरोध किया और जब तैयार भी हुईं, तो दुनिया भर के शकरपारे, पुए, नमकीन आदि बाँध दिये मेरे साथ. मानो मैं खेलने नहीं पिकनिक मनाने जा रही थी. और तो और मेरे जाने के बाद, जब तक मैं लौटकर नहीं आ जाती थी, ठीक से खाना भी नहीं खाती थीं, ये सोच-सोचकर कि पता नहीं गुड्डू को खाना मिला होगा या नहीं. बाउ उनको चिढ़ाते थे कि “हाँ, तुम्हारी बिटिया को टीचर लोग भूखा मारने के लिये ही तो ले गई हैं.” वो तीन दिन मुझे इतना याद करती थीं कि मुझे बात-बात पर रोना आता था. रात को सारी लड़कियाँ घर से बाहर होने के मज़े लूटती थीं. देर रात तक बातें करती थीं और अन्ताक्षरी खेलती थीं और मैं चादर से मुँह ढककर रोती रहती थी. सब सोचते थे कि मैं बड़ी अच्छी बच्ची हूँ, जल्दी सो जाती हूँ.

एक घटना है, जिसने अम्मा के प्रति मेरे व्यवहार को काफी कुछ बदल दिया. हमलोग तब मगरवारा में थे और वहाँ से उन्नाव डेली पैसेन्जरी करते थे पढ़ने के लिये. मगरवारा उन्नाव जिले का एक छोटा सा स्टेशन है, जहाँ इक्का-दुक्का गाड़ियाँ ही रुकती थीं. स्कूल के एक फ़ंक्शन की वजह से मेरी शाम पाँच बजे वाली ट्रेन मिस हो गई और दूसरी गाड़ी नौ बजे रात में थी. भाई उस दिन स्कूल गया नहीं था और बाकी साथी पाँच बजे वाली गाड़ी से घर पहुँच गये. तब फोन की सुविधा तो होती नहीं थी. मेरी कोई खबर घर पर न पहुँचने पर अम्मा चिन्ता से परेशान हो गईं. बाउ ड्यूटी पर थे. अम्मा की तबीयत खराब थी, पर फिर भी वो तैयार होकर उन्नाव जाने के लिये स्टेशन पर आ गईं. संयोग से उसी समय मेरी नौ बजे वाली गाड़ी पहुँच गई. एक पोर्टर ने मुझे गाड़ी से उतरते देखा और दौड़कर अम्मा को खबर किया. जब मैं अम्मा के सामने पहुँची, तो उन्होंने गुस्से से घूरकर मुझे देखा और दनदनाते हुये वापस चली गईं. मैं डरते-डरते उनके पीछे घर पहुँची.

घर पहुँचकर देखा कि अम्मा सर नीचा किये हुये वो खाना खा रही थीं, जिसे आधा छोड़कर वो ट्रेन पकड़ने चल दी थीं. उनकी आँखों से लगातार आँसू बहकर खाने में गिर रहे थे, और वो गुस्से में जल्दी-जल्दी एक के बाद एक कौर मुँह में डाले जा रही थीं. घर में अजीब सा माहौल हो गया था. सब चुप थे. उस समय मेरी क्या हालत हुई, उसे मैं शब्दों में नहीं बता सकती. लेकिन मुझे पता चला कि इस कठोर मुखौटे के पीछे एक नर्म सा दिल है- माँ का दिल, जो अपने बच्चों के लिये अपार प्रेम से भरा होता है और जिसकी तुलना दुनिया में किसी चीज़ से नहीं की जा सकती.


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