आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

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फेसबुक, ज़िंदगी, अवसाद और आत्महत्या

पिछले एक महीने में फेसबुक की दो महिला मित्रों की आत्महत्या की खबर ने अंदर तक हिलाकर रख दिया है. समझ में नहीं आता कि ज़िंदगी से भरी, नियमित फेसबुक अपडेट्स करने वाली लड़कियों को आखिर किस दुःख ने ज़िंदगी खत्म करने को मजबूर किया होगा? वो बात इतनी मामूली तो नहीं ही हो सकती कि ज़िंदगी उसके सामने हल्की पड़ जाय. कुछ भी हो इस बात को किसी के व्यक्तित्व की कमजोरी मानकर खारिज नहीं किया जा सकता.

इस तरह की आत्महत्या की घटनाओं के पीछे अक्सर अवसाद ही उत्तरदायी होता है. और अन्य मानसिक स्थितियों की तरह ही अवसाद को लेकर हमारे समाज में तरह-तरह की भ्रान्तियाँ हैं. बहुत से लोग तो यह मान बैठते हैं कि अवसाद कोई ऐसी भयानक बीमारी है, जिससे पीड़ित व्यक्ति अजीब सी हरकतें करता है और इससे पता चल जाता है कि अवसादग्रस्त है. जबकि एक बेहद सामान्य सा लगने वाला इंसान भी अवसादग्रस्त हो सकता है. लक्षण इतने सूक्ष्म होते हैं कि उसके व्यक्तित्व में कोई बड़ा परिवर्तन नहीं आता. अक्सर हमारे बीच बैठा हँसता-बोलता, चुटकुले सुनाता इंसान भी अवसादग्रस्त होता है और उसके करीबी दोस्तों और रिश्तेदारों को भी यह बात पता नहीं होती. कई बार तो खुद रोगी को ही यह पता नहीं होता कि वह डिप्रेशन में है.

हम अक्सर डिप्रेशन को कमजोरी की निशानी मानकर उस पर बात नहीं करना चाहते. लेकिन मुझे लगता है कि अपना अनुभव साझा करने से कुछ लोगों को मदद मिल सकती है, खासकर उनलोगों को, जो खुद यह नहीं समझ पाते या समझकर भी मानने को तैयार नहीं होते कि वे अवसादग्रस्त हैं. मैं यहाँ इस विषय में अपना अनुभव साझा करना चाहूँगी. स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद जब मैंने एम.ए. में प्रवेश लिया था, उस समय मेरे जीवन में कुछ ऐसी परिस्थितियाँ आयीं कि मैं अवसादग्रस्त हो गयी. कारण बहुत से थे- आर्थिक संकट, दीदी, जिसने मुझे माँ की तरह पाला और जो मेरी सबसे अच्छी सहेली हैं, उनकी शादी हो जाना और पेट की लंबी बीमारी. मेस के खाने से मुझे amoebiasis नामक बीमारी हो गयी थी. उसके कारण लगभग दो-तीन साल तक लगातार पेट दर्द रहा. इलाज के बाद पेट तो ठीक हो गया, लेकिन दर्द नहीं गया. आखिर में मेरी एक मित्र मुझे एक न्यूरोलॉजिस्ट के पास ले गयीं. डॉक्टर ने कहा कि इसे डिप्रेशन है, तो मेरी मित्र आश्चर्य में पड़ गयीं. उन्होंने कहा “इतनी बैलेंस्ड लड़की डिप्रेस्ड कैसे हो सकती है?” तो डॉक्टर ने कहा कि “अक्सर बैलेंस बनाने के चक्कर में लोग डिप्रेशन में चले जाते हैं”

उस समय मुझे नहीं बताया गया था कि मुझे ऐसी कोई समस्या है. मेरे दो मित्र मनोविज्ञान की पढ़ाई कर रहे थे. उनमें से एक समर ने मेरी दवाइयों का प्रेसक्रिप्शन देखकर मुझे बताया कि ये दवाईयाँ तो डिप्रेशन की हैं. दूसरी मित्र ने बताया कि तुम्हें साइकोफिज़िकल प्रॉब्लम है. मैं यह सोचकर हैरान थी कि दिमागी परेशानी शरीर पर इतना बुरा प्रभाव डाल सकती है. मैं एक खिलाड़ी रही थी और उस बीमारी के पहले मैं कभी इतनी बीमार नहीं पड़ी थी. खैर, मुझे तभी पता चला कि मानसिक बीमारी कभी भी किसी को भी हो सकती है.

मेरे दोस्तों ने मेरा उस समय बहुत साथ दिया. मुझे कभी-कभी आत्महत्या का ख़याल भी आता था, लेकिन खुद को सँभाल लेती थी, ये सोचकर कि ये सब डिप्रेशन के कारण है और मुझे इस बीमारी से हार नहीं माननी है.. मेरे साइकोलॉजी वाले दोनों दोस्तों ने हॉस्टल की सहेलियों से कह रखा था कि मुझे एक मिनट के लिए भी अकेला न छोड़ें. ये बात मुझे बाद में पता चली. समर अक्सर मेरी काउंसलिंग के लिए बाहर मिलता था और ये बात समझने की कोशिश करता कि आखिर मुझे सबसे ज़्यादा कौन सी बात सता रही है. मेरी पेट की बीमारी के समय मेरी दो सबसे करीबी सहेलियों पूजा और चैंडी ने मेरा बहुत ध्यान रखा. उस समय दोस्तों के साथ ने धीरे-धीरे मुझे गहरे अवसाद से बाहर निकाल लिया. हालांकि दवाएँ नहीं छूटीं. मैं अब भी दवाएँ ले रही हूँ. पर उन्हें खुद ही रिड्यूस कर रही हूँ और धीरे-धीरे एक दिन ये दवाएँ भी छोड़ दूँगी.

अलग-अलग व्यक्ति के डिप्रेशन में जाने के कारण बिल्कुल भिन्न होते हैं, लेकिन सबसे प्रमुख कारण जो मुझे समझ में आता है, वह है अकेलापन. कभी-कभी दोस्तों से घिरे होते हुए भी हम बिल्कुल अकेले हो जाते हैं क्योंकि कोई भी दोस्त हमें इतना अपना नहीं लगता, जिससे अपनी बेहद व्यक्तिगत या बचकानी समस्या साझी की जा सके. कभी-कभी सारे दोस्त छोड़कर आगे बढ़ जाते हैं या अपने-अपने जीवन में व्यस्त हो जाते हैं. कई बार तो पति-पत्नी भी एक-दूसरे से हर बात शेयर नहीं कर पाते.

हज़ार कारण है डिप्रेशन में जाने के, लेकिन किसी को गहरे अवसाद में जाने से रोकने का एक ही उपाय है- अपने दिल की बात साझा करना. जिन्हें लगने लगा है कि वो ज़िंदगी को लेकर निगेटिव होने लगे हैं, उन्हें दोस्तों से और परिवार वालों से बात करना चाहिए और अगर कोई नहीं है तो लिखना चाहिए-डायरी में, ब्लॉग पर फेसबुक पर या कहीं भी.

लेकिन इतना भी काफी नहीं है. ज़्यादा सावधान तो परिवारवालों और दोस्तों को होना चाहिए. डिप्रेशन के कोई प्रकट लक्षण नहीं होते, एक सायकायट्रिस्ट ही पता कर सकता है कि कोई डिप्रेशन में है या नहीं. आप सिर्फ इतना कर सकते हैं कि अपने किसी दोस्त को एकदम से अकेला न छोड़ें. खासकर उन दोस्तों को जो बहुत अधिक संवेदनशील हैं और अकेले रहते हैं. आप ये सोचकर मत बैठिये कि वे डिस्टर्ब होंगे. अगर लगता है कि कोई डिप्रेशन में जा सकता है तो उससे बार-बार बात कीजिये. भले ही वह मना करे. उसकी परेशानी का कारण मत पूछिए, बस इधर-उधर की हल्की-फुल्की बात कीजिये. उसे यह एहसास दिलाइये कि आप उसके साथ हैं.

सबसे ज़रूरी बात – अगर आपको लगता है कि आप अपनी ज़िंदगी में खुश हैं, संतुष्ट हैं, तो खुशियाँ बाँटिए. हो सकता है कि आपका कुछ समय का साथ या थोड़ी सी हल्की-फुल्की बातें किसी का बड़ा सा दुःख दूर कर दें. अपने में सीमित मत रहिये. खुद को खोलिए, इतना कि दूसरा भी आपके सामने खुद को खोलने पर मजबूर हो जाय.

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ब्लू

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ज़िंदगी, एक कैनवस पर बनी इन्द्रधनुषी तस्वीर है, जिसमें बैंगनी और हरे के बीच नीला रंग आता है। वही नीला रंग जो आकाश, समुद्र और पहाड़ों को अपने रंग में रंग लेता है। मेरा मनपसंद उदासी का गहरा नीला रंग, जितना उदास, उतना ही सुकून देने वाला भी।

वैसे  तो और भी बहुत से रंग हैं ज़िंदगी में, लेकिन ब्लू इतना ज्यादा है कि सबको अपने प्रभाव में ले लेता है। हर ओर नीला, नीला और नीला। कल कई बार इस रंग ने पूरी तरह भिगोकर रख दिया। ऐसा लग रहा था कि होली आ गयी। पर होली में नीला रंग कौन खेलता है भला…?

एक दोस्त है। बहुत परेशान है। दूर विदेश में अकेला और बीमार। रात में फोन किया उसने। अक्सर करता है। मैं उसकी बात सुनती हूँ क्योंकि उसको बहुत मानती हूँ। वो कहता जाता है अपनी बातें। कई बार रोता है। मैं बस सुनती हूँ।  इसलिए कि वो अकेला है। मैं खुद परेशान हूँ, लेकिन वो मुझे खुद से ज़्यादा परेशान लगता है। उसके दिमाग में खून के थक्के हैं। कई आपरेशन हो चुके हैं और भी कई होने हैं। हमारे देश में इस बीमारी का कोई स्थायी इलाज नहीं है शायद और अगर होगा भी तो बहुत मँहगा।

वो फोन करता है और मुझसे कुछ पूछता है। एक ऐसी बात, जो मैं उसे बता नहीं सकती। वो मुझे वास्ता देता है अपनी अपनी ज़िंदगी का, जो कि बिल्कुल अनिश्चित है…मैं तब भी नहीं बता सकती। मैं कुछ नहीं कर सकती। उदासी का गहरा रंग घेर लेता है मुझको। वो उधर रोता है, मैं इधर रोती हूँ। वो बार-बार पूछता है, पर मैं नहीं बताती। छः बार फोन करने पर भी नहीं। आखिर मैं फोन काटकर ऑफ कर देती हूँ…और सारी रात गहरे नीले रंग में डूबी रहती हूँ…

एक बहन है। गाँव में रहती है। उसकी कहानी लिखी थी मैंने अपनी पोस्ट पर। वो वहाँ घुट-घुटकर जीती है और उसकी घुटन मैं यहाँ महसूस करती हूँ। वो निकलने की कोशिश कर रही है एक अंधे कुँए से। छटपटाती है, कुछ ऊपर चढ़ती है और फिर फिसलकर वापस कुँए में गिर जाती है। कल एक फोन आया। शायद फिर वो बाहर निकलने की सोच रही है। एक सीढ़ी लगाने की कोशिश की है, देखो क्या होता है? मैं बस इतना कर सकती हूँ। मैंने परसों अपने एक दोस्त से कहा था कि मैं दूसरों की चिन्ता ज़्यादा करती हूँ। इसलिए दुखी रहती हूँ। सिर्फ अपने बारे में सोचने वाले लोग खुश रहते हैं या नहीं… पता नहीं…

एक सहली है। ज़िंदगी के दोराहे पर भ्रमित। दो रास्तों से एक रास्ता चुनना था उसे। अक्सर लड़कियों के पास विकल्प बहुत कम होते हैं और जो विकल्प होते भी हैं, उनमें से किसी एक को चुनना बहुत कठिन होता है। लड़कियाँ निश्चित दायरों में पाली-पोसी जाती हैं। उन्हें बहुत सीमित आज़ादी मिली होती है। बस ये समझ लो कि एक छोटे पिंजरे से निकालकर बड़े पिंजरे में डाल दिया जाता है। इस पिंजरे में वो थोड़े बड़े दायरे में उड़ान भरती हैं। ज़्यादा उड़ने की कोशिश करती हैं, तो पिंजरे की दीवारों से टकराकर खुद ही गिर जाती हैं। पर दरवाजे नहीं खुलते। उन्हें उसी दायरे में अपनी दुनिया बनानी होती है। जो लड़कियाँ खुला आकाश देखकर आहें भरती है, वो खुद को परेशान करती हैं। कुछ मिलने वाला नहीं होता इस चाहत से। एक और चिड़िया पिंजरे की दीवार से टकराकर गिर पड़ी और हार मान ली। शायद उसे लगा हो कि पिंजरे की गुलामी से कहीं ज़्यादा खतरनाक नीले आकाश की आज़ादी है…या शायद कुछ और…

एक दोस्त ने लंबे समय बाद फोन किया। वो बड़ा अफसर बन गया है और तबसे उसकी दुनिया दिन पर दिन चमकीली होती जा रही है। उसकी ज़िंदगी में उदासी के गाढ़े नीले रंग की कोई जगह नहीं। उसे मेरा एक काम करना था। चार महीने हो गए, काम नहीं हुआ। वो मुझे बता रहा था कि वो कितना व्यस्त है। मैं बेमन से सुन रही थी अपने नीले वालपेपर को देखते हुए….मेरे साथ बहुत बड़ी दिक्कत ये है कि जब कोई दोस्त सिर्फ अपनी खुशी के लिए मुझसे बात करता है, तो मुझे लगता है कि वो मतलबी है और जब सिर्फ मेरी हालचाल लेने के लिए फोन करता है, तो लगता है कि मेरे ऊपर एहसान कर रहा है। खासकर ऐसे बड़े अफसर बन गए दोस्तों के बारे में न चाहते हुए भी ऐसा सोचने लगती हूँ। दोस्त ऐसे हैं नहीं, मुझे ऐसा लगता है, ये मेरी प्रॉब्लम है। मुझे ये लगता है कि इस ‘सिर्फ’ को दोस्ती के बीच में नहीं होना चाहिए। खैर…

कल फिर देर रात तक नींद नहीं आयी। एक कोरे हैंडमेड कागज़ पर एक लैंडस्केप बनाया, और अधूरा छोड़ दिया। फिर कभी शायद उसे पूरा कर सकूँ…और फिर रंग भर सकूँ…अपना मनपसंद नीला रंग…

धूसर

दुनिया को जिस रंग के चश्मे से देखो, उस रंग की दिखती है. अभी धूसर रंग छाया हुआ है. जैसे अभी-अभी आँधी आयी हो और सब जगह धूल पसर गई हो या कहीं आग लगने पर धुँआ फैला हो या सूरज डूब चुका हो और चाँद अभी निकला ना हो.

उम्र का तीसरा दशक होता ही कुछ ऐसा है. एक-एक करके सारे रूमानी सपने चिंदी-चिंदी करके बिखरने लगते हैं और उड़ती हुयी चिन्दियाँ सब कुछ धुँधला कर देती हैं. फिर धीरे-धीरे एक खोल सा उतरने लगता है. परत-दर परत दुनिया की सच्चाइयाँ सामने आने लगती हैं. मधुर सपनों के बीच रहने वाला सुकुमार मन इन सच्चाइयों की गर्मी को सह नहीं पाता. आँखें बंद कर लेता है. लेकिन इसकी जलन से बचकर कहाँ जाय? इसमें एक बार तो झुलसना ही पड़ेगा. हो सकता है कई बार भी…

कितना तो समझाया था मन को, सावधान किया था कि मत ओढ़ सपनों की ये मखमली चादर. इसमें भले ही कितना सुकून हो, पर इसे हटना ही है एक दिन. कितना कहा था कि मत चल इस राह पर. यहाँ दिखने वाले फूल असल में पत्थर हैं. जहाँ आगे बढ़े कदम लहूलुहान हो जायेंगे. पर मन अभागा किसी की सुनता है क्या?

अब उम्र का तीसरा दशक है और एक-एक करके हटते परदे, रिश्तों पर से, लोगों के चेहरों पर से, कुछ समस्याओं से, कुछ दुनियावी बातों से. जो दोस्त कल इतने करीब थे, आज हिसाब-किताब करके रिश्ते बनाते हैं और आपको छाँटकर अलग कर देते हैं क्योंकि आप दुनिया के ‘नॉर्म’ में फिट नहीं बैठते या आपका स्टैण्डर्ड उनके बराबर नहीं. कल तक जो आपको अपने सबसे बड़े शुभचिन्तक लगते थे, आज पता चलता है कि उनकी शुभचिंता आपके लिए कम, उनके अपने लिए ज्यादा थी. और एक समय आता है कि आप सबको शक की नज़र से देखने लगते हैं.

जो सबसे प्यारा था, उसे दुनिया ने छीन लिया. माँ-बाप को भगवान ने छीन लिया. ऐसे में अपना विश्वास और मासूमियत बचाए रखना दिन पर दिन कठिन होता जा रहा है. डर लगता है कि सबको अपने नॉर्म में ढालने की आदी दुनिया कहीं हमें भी ना बदल डाले. और हम भी इस बड़ी सी मशीन का टूल बनकर रह जाएँ.

किसी से कोई शिकायत तो नहीं है. उससे भी नहीं जिसने सपने देखने की आदत डाली, सपनों की उन ऊँचाइयों में तैरना सिखाया, जिसके ऊपर खुला आसमान होता था, प्यार पर विश्वास करना सिखाया, बेवजह की बातों में खुशी ढूँढना सिखाया, दूसरों के लिए जीना और सबका दिल जीतना सिखाया. लेकिन सपनों की वो ऊँची उड़ान जितनी रूमानी थी, उतनी ही खतरनाक भी. उन सपनों को टूटना ही था. हर सपने की नियति होती है टूटना. इंसान बहुत दिनों तक सो जो नहीं सकता. वो जागता है और फिर सामने होती हैं कड़वी सच्चाइयाँ- तोल-मोल के बनने वाले रिश्ते…हिसाब-किताब से जुड़ते सम्बन्ध.

इन सबके बीच सबसे ज्यादा सुकून की बात है – अकेले होना. इसका सबसे बड़ा फायदा है- आप जी भरकर रो सकते हैं, बिना इस बात की चिंता किये कि कोई आपको देख लेगा या रोक लेगा.

छूटा हुआ कुछ

पिछले कुछ दिनों से मुझे मेरा घर बहुत याद आ रहा है. बाऊ के रहते डेढ़-दो महीने भी जिससे दूर नहीं रह पाती थी, आज उसे छूटे हुए पाँच साल से ज्यादा हो रहे हैं. कितना सोचा कि अब उस घर में लौटकर कभी नहीं जाऊँगी. पर क्या करूँ? इतनी बड़ी दुनिया में उस घर के सिवा और कहीं कोई ठिकाना भी तो नहीं.

कौन कहता है कि बिना घरवालों के घर, घर नहीं मकान होता है. मुझे लगता है कि घर की भी आत्मा होती है, ऐसा लगता है कि वो भी इस समय बहुत अकेला है और मुझे पुकार रहा है. कितना कुछ तो छूटा हुआ है मेरा उस घर में. उसी घर में हमने पहली बार महसूस किया कि अपना घर कैसा होता है? इससे पहले की ज़िंदगी तो हमने रेलवे क्वार्टरों में बिताई थी. उस घर में हम तीनों-भाई बहनों की हँसी छूटी हुयी है. दीदी की शादी के बाद अकेले अपने कमरे में बहाए हुए मेरे आँसू छूटे हुए हैं, हज़ारों ख्याल, सैकड़ों विचार जो दिमाग में उठे और कागज़ पर नहीं उतरे, उस घर के किसी कोने में ही छूट गए हैं. और इन सबसे भी बढ़कर उस घर में बाऊ की आत्मा बसी हुयी है, जिसने चाहे शरीर के.जी.एम्.सी. के ट्रामा सेंटर में छोड़ा हो, पर घूम-फिरकर उसी घर में आ गयी होगी, जिसे बाऊ ने अपनी तैंतीस साल की सर्विस से रिटायरमेंट के बाद ग्रेच्युटी और फंड के पैसों से बनवाया था. कौन जाने बाऊ की आत्मा ही खींच रही हो मुझे वहाँ? उन्हें मालूम था कि तीनों भाई-बहनों में मुझे ही सबसे ज्यादा उस घर से लगाव है.

हाँ, मुझे उस घर से बेहद लगाव है क्योंकि मेरा कोई और घर नहीं है, क्योंकि वो घर मेरे पिताजी की आकांक्षाओं का मूर्त रूप है, उस घर के नक़्शे से लेकर आतंरिक सज्जा तक में सबसे ज्यादा हाथ मेरा ही था और वहाँ मैंने अपनी ज़िंदगी के सबसे बेहतरीन और सबसे अवसाद भरे दिन बिताए हैं. दीदी की शादी के बाद मैं बहुत अकेली हो गयी थी और तब मुझे वहीं पनाह मिलती थी, अपने उस कमरे में, जिसकी खिड़की से दूर-दूर तक फैले धान के खेत दिखते थे, बारिश में नाचते मोर दिखते थे और ठंडी-ठंडी हवा आकर मेरे गालों को सहलाकर मानो सांत्वना देती थी.

मेरे लिए वो घर ही नहीं उसके आस-पास के पेड़-पौधे, पशु-पक्षी सभी मेरे अस्तित्व का हिस्सा थे. घर के अहाते में लगे सागौन पर बया घोंसले बनाया करती थी और बँसवारी में महोख और गौरय्या अपना ठिकाना बनाये हुए थे. बरामदे में लगी बोगनबेलिया और मालती के बेलों को जब बाऊ छाँटते थे, तो मुझसे बर्दाश्त नहीं होता था. मुझे लगता था कि उन्हें दर्द होता है. दक्खिन ओर की बँसवारी भी मैंने लड़-झगड़कर काटने से रोकी थी. बाऊ उसे काटना चाहते थे क्योंकि वहाँ एक धामिन ने अपना घर बना रखा था. पर मुझे ज्यादा चिंता उस पर बसने वाले पंछियों की थी. बाऊ ने सामने की ओर दुआर पर तरह-तरह के आम के पेड़ लगाए थे. जाने कहाँ से आम्रपाली ढूँढकर लाये थे, जिसमें बाऊ के जाने के साल खूब फल लगे थे और बाऊ रोज सुबह उठकर उसके फलों को गिनते थे कि कहीं चाचा की बदमाश पोती ने कुछ टिकोरे तोड़ तो नहीं लिए. अब तो वो पेड़ खूब बड़ा हो गया होगा.

मुझे आज भी याद है कि काँच की एक बोतल में लगाया मनीप्लांट टाँड़ पर से बढ़कर रोशनदान के पास पहुँच जाता था और मैं बार-बार उसे खींचकर नीचे कर देती थी. ऐसा लगता था मानो वो अपनी बाहें फैलाकर रोशनी को अपने अंदर भर लेना चाहता हो. मुझे लगा उसे खुली हवा में साँस लेना है. मैंने उस पौधे को बोतल से निकालकर मिट्टी में लगा दिया और वो थोड़ा बड़ा हुआ तो खिड़की के रास्ते अंदर कमरे की ओर बढ़ने लगा. बिलकुल कुछ ऐसे ही, मैं भी घर लौटना चाहती हूँ.

अम्मा और मैं- एक अनोखा रिश्ता (3.)

कुछ महीने पहले एक कोशिश की थी, अठारह साल पहले इस दुनिया से रूठ गयी अपनी माँ से अपने रिश्ते को समझने की, उसे शब्दों में बाँधने की. सोचा था तीन कड़ियों में कुछ समेट पाऊँगी. वैसे तो माँ की यादों को कुछ शब्दों में नहीं समाया जा सकता, पर ये कोशिश, कुछ लिखने के बहाने इस अनोखे रिश्ते को समझने की थी- माँ-बेटी का रिश्ता, एक अनुशासनप्रिय माँ और एक उद्दंड बेटी का.

पर लिखने का ये सिलसिला साहस की कमी के कारण रुक गया, इस बात के डर से कि अम्मा के इस दुनिया से जाने के बारे में कैसे लिखूँगी? फिर सोचा कि जब खुद ही ये मानती हूँ कि वो हमेशा एक साये की तरह मेरे साथ हैं, तो फिर ये डर कैसा? इसलिए हिम्मत कर पायी कि ये पोस्ट लिखूँ. ये मेरा कन्फेशन होगा … जो शायद मेरे इस अपराधबोध को दूर कर सके कि मैंने उनके जीते जी कभी उन्हें समझने की कोशिश नहीं की, मेरी इस आत्मग्लानि को मिटा सके कि मैं कभी उनकी कोई सेवा नहीं कर सकी. हो सकता है कि इस बहाने मैं अपने आप को माफ़ कर पाऊँ या किसी तरह खुद को समझा पाऊँ.

किसी अपने के चले जाने पर हमें ना सिर्फ़ उसके ना होने का दुःख होता है, बल्कि उन तमाम बातों का भी दुःख होता है, जो उसके होने पर होतीं या जो हमने उससे कही होतीं. अम्मा का जाना अचानक नहीं हुआ. वो अक्सर बीमार रहती थीं. उन्हें आँतों की टी.बी. थी और मारे जिद के कभी ठीक से दवा नहीं कराती थीं. इस कारण बहुत अधिक दुबली हो गयीं और एक दिल के दौरे ने उनकी जान ले ली. पर उनके जाने के ठीक एक दिन पहले तक नहीं मालूम था कि कल वो नहीं होंगी. नहीं तो मैं वो सारी बात कह देती, जो उनके ना होने पर सोच-सोचकर रोती रहती.

मैं उनसे कहती कि मैं पूरी कोशिश करूँगी एक अच्छी लड़की बनने की, मन लगाकर पढूँगी, घर के काम में दीदी का हाथ बटाऊँगी, हमेशा दीदी का कहना मानूँगी, छोटे भाई से लड़ाई नहीं करूँगी, किसी को पलटकर जवाब नहीं दूँगी, लड़कों के साथ नहीं खेलूँगी, ज़ोर-ज़ोर से हँसूँगी नहीं और ऊँची आवाज़ में गाना भी नहीं गाऊँगी और… और भी बहुत कुछ. मैं उनसे बताती कि मैं उनकी बात का जवाब इसलिए देती हूँ कि वो डाँटकर बात करती हैं, अगर वो प्यार से कहें तो मैं हर काम कर दूँगी… अगर मुझे ज़रा सा भी पता होता कि कल वो हमारे बीच नहीं होंगी तो मैं अपने स्वभाव के विपरीत उनके गले लग जाती और कहती कि “अम्मा, तुम हमें सबसे प्यारी हो. हमें छोड़कर मत जाओ. तुम भले ही बिस्तर पर पड़ी रहो. हम तुम्हारी पूरी सेवा करेंगे, पर तुम रहो. तुम्हारा होना ही सब कुछ है.” पर, मैं नहीं कह पायी, कुछ नहीं कह पायी और एक पल में ही मेरे देखते-देखते वो विदा हो गयीं. मुझे लगा मानो वो मेरे ही व्यवहार से रूठकर इस दुनिया से चली गयीं.

किसी के जाने के ठीक पहले तक हमें नहीं पता होता कि कल वो हमारे बीच नहीं रहेगा. किसी के रहने ना रहने की बात छोड़ भी दें, तो भी हमें अपने अगले पलों के बारे में कुछ नहीं पता होता. आज जो हमारे साथ चल रहे हैं, कल रहें ना रहें. हम ही आज जैसे हैं, वैसे कल हों कि नहीं. पता नहीं आज जो हैं, कल वो परिस्थितियाँ रहें ना रहें. पता नहीं कल आज के जैसा हो कि नहीं… तो जब हमें कल का पता नहीं तो आज को क्यों गवाएँ? हमें आज को जीना चाहिए, उसे समझने की कोशिश करनी चाहिए. हमें जिसके लिए जो महसूस होता है कह देना चाहिए, किसी के दिल को दुखाये बिना…कोई काम ऐसा नहीं छोड़ना चाहिए, जिसके ना करने के कारण कल पछताना पड़े…

आज रुककर सोचती हूँ कि ये बातें तब समझ में आ गयी होतीं, तो शायद मुझे इस तरह पछताना नहीं पड़ता. हाँ, मैं छोटी थी, पर इतनी ज्यादा छोटी भी नहीं थी कि ये बातें ना समझ सकती. ये अपराधबोध मुझे अब भी सताता है कि मैंने अम्मा को कभी वो सम्मान नहीं दिया, जिसकी वो हकदार थीं. मैं हमेशा अपने में ही रहती थी. अम्मा के पास जाने से कतराती थी. उनके आख़िरी दिनों में मैंने कभी उनके पास बैठने की ज़रूरत नहीं समझी, कभी नहीं पूछा कि उन्हें किसी चीज़ की ज़रूरत तो नहीं, कि वो कुछ कहना तो नहीं चाहती हैं, और अब ये अपराधबोध मुझे सताता रहता है, ये ग्लानि मुझे परेशान करती रहती है. शायद मेरी ये सज़ा है कि मैं ज़िंदगी भर इस पछतावे में जीती रहूँ.

पिछली कड़ियाँ

अम्मा और मैं- एक अनोखा रिश्ता (1.)

अम्मा और मैं- एक अनोखा रिश्ता (2.)

भागना परछाइयों के पीछे-पीछे

मौत की खामोशी की धुन

अन्तर्जाल की दुनिया… एक आभासी संसार. किसी-किसी के लिये दुनिया से भागने की सबसे अच्छी जगह है ये…पर खुद से भागना हो तो? कोई जगह ही नहीं है, आदमी खुद से भाग ही नहीं सकता, कहीं भी नहीं, कभी भी नहीं. तो करें क्या, जब ये दुनिया बेमानी लगने लगे…कहाँ जायें, जब खुद अपने ही भीतर एक गहरा अकेलापन डराने लगे…??? अपने से डरा हुआ इंसान कितना अकेला होता है… कितना अकेला… हवाओं में भी शोर सुनायी देने लगता है…सन्नाटा लुभाने लगता है…कोई कहता है…
ए हवा, सुन !
उसके पास से धीरे से गुजरना
वो अपने टूटे सपनों को
उम्मीद के धागों से बुन लेना चाहती है
उसे बुनने देना,
ज़िन्दगी के पुराने एलबम में पड़ी
कुछ धुँधली तस्वीरों को
चुनने देना,
तेरी सरसराहट से नहीं सुन पायेगी
वो मौत की खामोशी की धुन
उसे सुनने देना,
उसके पास से धीरे से गुजरना…
… … …
दुख जब हद से गुजर जाता है, तो उसकी आदत पड़ जाती है, उसके बिना अच्छा नहीं लगता… मुझे भी पड़ गयी है… जब कभी वो मुझको अकेला छोड़ जाता है, तो डर जाती हूँ… अकेलेपन से डर लगता है, या दुख के होने से, या ना होने से… कुछ नहीं मालूम… पर अक्सर मैं सबके बीच अकेली पड़ जाती हूँ. दोस्ती, प्यार, स्नेह सब है, पर कुछ भी नहीं… मैं सबका हिस्सा हूँ और नहीं भी… मैं सबके साथ हूँ और नहीं भी… मैं सबके लिये हूँ, पर मेरे लिये??? कोई नहीं.
जब इंसान अंदर से अकेला होता है, तो उसे कोई बाहरी चीज़ बहला नहीं सकती… खुश नहीं कर सकती… कुछ अच्छा नहीं लगता… जो नहीं जानता इस अकेलेपन को, वो समझ भी नहीं सकता और जो महसूस करता है, वो समझा नहीं सकता… मौत की खामोशी की धुन सुनने को दिल करता है… काश कोई दूसरी दुनिया होती… जहाँ कोई भी हमें नहीं जानता… मरने के बाद वापस आया जा सकता, तो एक बार ज़रूर मौत को गले लगा लेती, और तब देखती कि किसी को फ़र्क पड़ता है मेरे होने या ना होने से???

वो ऐसे ही थे (1.)

इस ३० जून को उनको गए पूरे चार साल हो गए… इन सालों में एक दिन भी ऐसा नहीं गुजरा, जब मैंने उन्हें याद ना किया हो… आखिर अम्मा के बाद वही तो मेरे माँ-बाप दोनों थे. परसों उनकी पुण्यतिथि थी और मज़े की बात ये कि मैं उदास नहीं थी. मुझे उनके कुछ बड़े ही मजेदार किस्से याद आ रहे थे… कुछ ऐसी बातें, जो उन्हें एक अनोखा व्यक्तित्व बनाती थीं… ऐसे व्यक्ति, जिनके बारे में लोग कहते थे कि वह अपने समय से पचास साल से भी आगे की सोच रखने वाले थे.

वे बहुत मस्तमौला थे,ये तो मैं पहले भी बता चुकी हूँ… बेहद निश्चिन्त, फक्कड़, दूरदर्शी, पर भविष्य की चिंता ना करने वाले . मेरी और उनकी उम्र में लगभग बयालीस-तैंतालीस साल का अंतर था. कहते हैं कि एक पीढ़ी के बाद ‘जेनरेशन गैप’ मिट सा जाता है, इसीलिये बाबा-दादी की पोते-पोतियों से ज्यादा पटती है. हमारी भी बाऊ से खूब जमती थी. हम उनसे इतने घुले-मिले थे कि उन्हें ‘तुम’ कहकर ही संबोधित करते थे. आमतौर पर बच्चे माँ को तुम और पिता को आप कहते हैं.  इसका एक कारण यह भी था कि उन्हें अम्मा की भूमिका भी निभानी पड़ रही थी और उन्होंने हमें अम्मा से कम प्यार नहीं दिया.

बाऊ 2005 (दीदी के यहाँ भरूच में ली गयी आख़िरी फोटोग्राफ)

हमें बचपन से ही उन्होंने तर्क करना सिखाया था और उनसे सबसे ज्यादा बहस मैं ही करती थी. उनकी हर वो बात, जो मुझे सही नहीं लगती, मैं काट देती थी, उसका विरोध करती थी, उन्होंने भी तो यही किया था… बस कोई बात इसलिए ना मान लेना कि उसे बड़े हमेशा से मानते आये हैं. मेरे तर्क करने पर वो खुश होते थे. मुझे लेकर बहुत निश्चिन्त भी थे. अक्सर कहते थे कि बाकी दो बच्चों की शादी-ब्याह की चिंता है, इसके लिए वर ढूँढना मेरे बस की बात नहीं… मेरे कॅरियर को लेकर भी उन्हें अधिक चिंता नहीं थी. ना जाने क्यों इतनी आश्वस्ति थी मेरे बारे में???

उनके मस्तमौलापन का एक किस्सा है. बाऊ ने अपनी पेंशन उन्नाव से आज़मगढ़ ट्रांसफर करवाई थी. डाक की लापरवाही से कागज़ कहीं खो गया और फिर से कागज़ बनवाने की औपचारिकता में पूरे एक साल उन्हें पेंशन नहीं मिली. अपनी जमा-पूँजी तो दीदी की शादी में लगा दी थी. पेंशन से ही घर चल रहा था. मैं पहले ही दीदी की शादी के बाद अकेली पड़ गयी थी. इस फाइनेंसियल क्राइसिस की वजह से भयंकर डिप्रेशन में चली गयी. अक्सर मैं ‘सुसाइडल’ हो जाती थी, हालांकि कभी सीरियस अटेम्प्ट नहीं किया… गेहूं में रखने के लिए लाई गयी सल्फास की गोलियों के पास जा-जाकर लौट आती थी. एक दिन बाऊ से पुछा कि “बाऊ, कितनी सल्फास की गोलियाँ खाने पर तुरंत मौत आ जायेगी.” उन्होंने अखबार पढ़ते-पढ़ते ही जवाब दिया, “बड़ों के लिए चार-पाँच काफी हैं, छोटे दो-तीन में ही भगवान को प्यारे हो जाते हैं. तुम चाहो तो दसों खा लो, जिससे कोई कमी ना रह जाए.” वे ऐसे बोल रहे थे, जैसे आत्महत्या विज्ञान में पीएच.डी. कर रखी हो… फिर अखबार हटाकर कहने लगे, “वैसे सल्फास खाकर मरना बहुत तकलीफ देता है. तुम ऐसा करो फाँसी लगा लो. वो जो तुम्हारे कमरे में पंखा है ना, उसी से लटक जाओ.” … बताओ, अपने बच्चों से कोई ऐसे कहता है… और मेरा क्या हाल हुआ होगा???… मैंने इतनी सीरियसली पूछा था. सोचा था कि दौड़े चले आयेंगे और कहेंगे “क्यों गुड्डू बेटा, तुम मरना क्यों चाहती हो” पर सब कचरा करके रख दिया… मुझे तब बड़ा गुस्सा आ रहा था, अब हँसी आती है.

मैं थोड़ी देर तक वहीं खड़ी रही. वो वापस अखबार पढ़ने लगे और थोड़ी देर बाद बोले, “तुम्हारे मरने से सारी समस्याएँ हल नहीं हो जायेंगी और ना दुनिया रुक जायेगी, बस तुम्हारा नुक्सान होगा. इतनी प्यारी चीज़ तुमसे छिन जायेगी और दोबारा कभी नहीं मिलेगी … तुम्हारी ज़िंदगी.” उसके बाद मैंने आत्महत्या के बारे में कभी नहीं सोचा… वो ऐसे ही थे.

जारी…


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