आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

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शुक्रिया दोस्त, इंसानियत पर मेरा भरोसा बनाये रखने के लिए

बात तब की है, जब मैं इलाहाबाद में पढ़ती थी और वहाँ से आजमगढ़ के गाँव में स्थित अपने घर अक्सर अकेली आती-जाती थी. मैं बचपन से एक छोटे शहर में पली-बढ़ी थी, और वह भी रेलवे स्टेशन के आसपास जहाँ कभी रात नहीं होती. मेरे लिए बहुत मुश्किल था बस से इलाहाबाद से आजमगढ़ और वहाँ से तीस किलोमीटर दूर एकदम धुर गाँव में जाना. शाम होते ही कस्बों और गाँव में चहल-पहल कम होने लगती थी. सर्दियों में काफी परेशानी होती थी क्योंकि गाँव पहुँचते-पहुँचते अक्सर अँधेरा हो जाता था. और उस पर भी शहर से गाँव जाने में कम से कम तीन जगह सवारियाँ बदलनी पड़तीं. जल्दी सवारियाँ मिलती नहीं थीं. कभी-कभी घंटों इंतज़ार करना पड़ता. इन सब कठिनाइयों से बचने के लिए मैं इलाहाबाद से एकदम सुबह लगभग साढ़े पाँच-छः बजे निकलती, लेकिन तब भी देर हो ही जाती.

उस दिन भी ऐसा ही हुआ. मैं अकेली गाँव से लगभग पन्द्रह किलोमीटर दूर स्थित एक कस्बे में पहुँच गयी, लेकिन वहाँ से कोई सवारी नहीं मिल रही थी. मैं टैक्सी स्टैंड (टैक्सी का मतलब उस क्षेत्र में जीप ही होता है) पर खड़ी थी. अचानक एक जीप मेरे पास आकर रुकी. ड्राइवर ने पूछा कहाँ जाना है. मैंने गंतव्य बताया तो बोला ‘बैठ जाइए, हम उधर ही जा रहे हैं. छोड़ देंगे.’ उनका कहने का मतलब शायद यह था कि वे रोज़ सवारियाँ नहीं ढोते. जीप में और भी कई लोग बैठे थे. एक महिला भी थीं, तो मैं बैठ गयी.

मुश्किल तब शुरू हुयी, जब धीरे-धीरे एक-एक करके सारी सवारियाँ रास्ते में उतर गयीं. सर्दियों का समय था. साढ़े छः बजे से ही अँधेरा घिरने लगा था. मैं अपने गंतव्य से आधी दूरी पर ही थी कि जीप पूरी खाली हो गयी और बाहर अँधेरा भी हो गया. जीप में केवल ड्राइवर, क्लीनर और मैं बची. एक ओर तो मन में धुकधुकी लगी थी ऊपर से ड्राइवर की वेशभूषा और डरा रही थी. वह एक छः फुट का लंबा-तगड़ा नौजवान था. मूंछें तो उधर मर्द होने की निशानी मानी ही जाती हैं, उस पर भी जनाब पान चबाये जा रहे थे…मतलब विलेन के सारे गुण मौजूद थे बंदे में.

पता नहीं उन्हें खुद के बारे में बताने का शौक था या मुझे थोड़ा सकुचाया हुआ देखकर उन्होंने बात करनी शुरू कर दी. बताया कि यह जीप उन्हीं की है (कहने का मतलब यह कि “ड्राइवर” नहीं है) उनकी कई जीपें इलाके में सट्टे पर जाती हैं. रोज़ वाली सवारियाँ ढोने के लिए के जीप नहीं देते क्योंकि उससे गाड़ी कबाड़ा हो जाती है और बहुत झंझटी काम है . मुझे उनकी बातें सुनने में कोई दिलचस्पी नहीं थी, लेकिन इससे माहौल तो कुछ हल्का हो ही रहा था.

बता दूँ कि मैं जब शुरू में गाँव गयी थी तो मुझे उस क्षेत्र के लड़कों से एक चिढ़ जैसी हो गयी थी. लड़कियों को देखते ही उनकी निगाहें मधुमक्खी की तरह उनसे चिपक जाया करती हैं. मुझे सारे ही बड़े ‘चीप’ लगते थे. क्षेत्रवाद मेरे अंदर कूट-कूटकर भरा था. मुझे लगता था कि लखनऊ के आसपास के लड़के ज़्यादा सभ्य होते हैं. ये तो बहुत बाद में पता चला कि लड़के हर जगह के एक ही जैसे होते हैं. लेकिन इसमें गलती उनकी नहीं उनकी ‘कंडीशनिंग’ की होती है. जी हाँ, ‘नारीवाद’ का अध्ययन करने के बाद मुझे अक्ल आयी कि लड़कों का छिछोरापन भी समाजीकरण की देन है.

पर उस समय मुझे वे महाशय एकदम “छिछोरे,” मुम्बईया बोली में “टपोरी” और दिल्ली की भाषा में “वेल्ले” लग रहे थे. मुझे लग रहा था कि ये अपनी कहानी सुनाने के बाद मेरे बारे में ज़रूर पूछेंगे और वैसा ही हुआ. मैंने उनके सभी सवालों के जवाब दिए क्योंकि मेरे पास और कोई चारा ही नहीं था. पहले उनको लग रहा था कि मैं आजमगढ़ शहर से ही अपने गाँव आ रही हूँ. जब उन्होंने यह सुना कि मैं इलाहाबाद में पढ़ती हूँ तो खुश हो गए. उन्हें बहुत अच्छा लगा कि एकदम इंटीरियर के एक गाँव की लड़की इलाहाबाद जैसे बड़े विश्वविद्यालय में पढ़ती है क्योंकि मैंने उन्हें यह नहीं बताया था कि यहाँ पली-बढ़ी ही नहीं हूँ. गाँव में होती तो शायद सर पटककर मर जाती और कभी वहाँ पढ़ने का सपना पूरा न होता.

वे पलट-पलटकर बातें कर रहे थे और मैं डर रही थी कि कहीं जीप ही न पलट जाए. अब भी मेरा डर पूरी तरह गया नहीं था. मैं अपने गंतव्य से कुछ ही किलोमीटर दूर थी कि उन्होंने गाँव का नाम पूछा. पहले मैं थोड़ा हिचकी लेकिन फिर बता दिया. मेरा गंतव्य गाँव से तीन किलोमीटर पहले था, फिर वहाँ से मुझे पैदल घर तक जाना था. तब मेरे गाँव के पास तक जीपें जाती ही नहीं थीं क्योंकि सड़क बहुत खराब थी और गाँव एक तरफ पड़ जाता था किसी मुख्य सड़क से नहीं जुड़ा था. ड्राइवर साहब ने मुझसे कहा कि उन्हें भी उधर ही जाना है और वे मुझे गाँव के बगल में छोड़ देंगे. मैंने उन्हें मना भी किया पर वे माने नहीं.

जब तक मैं अपने गाँव पहुँच नहीं गयी, मेरा डर दूर नहीं हुआ. आश्वस्त मैं तब हुयी, जब उन्होंने मुझे गाँव के बगल में छोड़ा और मेरे थोड़ी दूर निकल जाने पर जीप घुमा ली. तब मुझे पता चला कि उन्होंने मुझसे झूठ कहा था कि मुझे उसी तरफ जाना है. वे सिर्फ मुझे छोड़ने मेरे गाँव तक आये और मेरी कृतघ्नता देखिये कि मैंने उनका आभार नहीं व्यक्त किया. बातचीत में वे तीन-चार बार कह चुके थे कि अपने इलाके की हैं तो आप बहन ही हुईं न और मैंने उन्हें पलटकर एक बार भी “हाँ, भईया” नहीं कहा. पता नहीं क्या हुआ कि इस बात से मेरी आँखों में आँसू आ गए. कृतज्ञता के आँसू. मानव के प्रति सहज प्रेम के आँसू. मुझे उन पर विश्वास नहीं था, या घर पहुँचने की जल्दी थी या उस क्षेत्र के लड़कों के प्रति मेरी नफ़रत , किसने मुझे रोका? मैं नहीं जानती लेकिन मुझे आभार व्यक्त करना चाहिए था.

न जाने कितनी बार ऐसे ही बिना स्वार्थ के लड़कों ने मेरी मदद की है. आजमगढ़ से इलाहाबाद और इलाहाबाद से आजमगढ़ की यात्राएँ ऐसी तमाम कहानियाँ समेटे हुए हैं. पर यह कहानी सबसे अलग है. इसने मुझे पुरुषों को एक अलग नज़रिए से देखने की नयी दृष्टि दी. यह सिखाया कि वेशभूषा हमेशा ही चरित्र का आइना नहीं हुआ करती. यह बताया कि सभी बक-बक करने वाले गहराई से सोचते न हों, ऐसा नहीं होता. और यह भी जनाया कि मदद करने वाले कहीं भी मिल जाते हैं. इस घटना को याद करके आज भी दिल में टीस उठती है कि काश वे फिर मिल जाते और मैं उनसे कह पाती “शुक्रिया दोस्त, इंसानियत में मेरा भरोसा बनाए रखने के लिए.”

वो ऐसे ही थे (3)

मेरी और बाऊ की उम्र में लगभग 42-43 साल का अंतर था, यानि लगभग दो पीढ़ी जितना. कहते हैं कि एक पीढ़ी के बाद ‘पीढ़ी अंतराल’ समाप्त हो जाता है. इसीलिये दादा-पोते में ज़्यादा पटती है और शायद इसीलिए हम बच्चों की भी बाऊ से खूब बनती थी. मैं उनके ज़्यादा ही मुँह लगी थी.

वे बेहद मस्तमौला थे, ये तो मैं पहले ही बता चुकी हूँ-बेहद निश्चिन्त, फक्कड़ और दूरदर्शी होते हुए भी वर्तमान में जीने वाले. हमें उन्होंने बचपन से ही तर्क और प्रश्न करना सिखाया था और उनसे सबसे ज़्यादा बहस मैं ही करती थी. उनकी हर बात का विरोध करती थी. उन्होंने भी तो यही किया था 🙂

मुझे लेकर वे बहुत निश्चिन्त रहा करते थे. उनका मानना था कि मेरे अंदर बहुत अधिक जिजीविषा है और मैं सारी परेशानियों को झेलते हुए अपने जीवन में कहीं न कहीं पहुँच जाऊँगी. उन्हें मेरी शादी को लेकर भी कभी चिंता नहीं हुयी. शादी की तो खैर घर में बात ही नहीं होती थी, अगर होती भी तो सिर्फ दीदी की शादी की. बाऊ का मानना था कि मेरे लिए लड़का ढूँढना उनके बस की बात नहीं है 🙂

उनके मस्तमौलापन का एक किस्सा है. बाऊ ने अपनी पेंशन उन्नाव से आजमगढ़ ट्रांसफर कराई थी. कागज़ डाक में कहीं खो गया और उन्हें पूरा एक साल लग गया नया कागज़ बनवाने में. उस अवधि में बाऊ को पेंशन नहीं मिल रही थी और हम बहुत ज़बरदस्त आर्थिक संकट में पड़ गए. दीदी की शादी के बाद मैं अकेली पड़ गयी थी और ऊपर से यह मसला. इसके चलते मैं डिप्रेशन में आ गई. कई-कई बार आत्महत्या करने का मन होता था. बटाई पर मिला गेहूँ रखने के लिए घर में सल्फास की गोलियाँ रखी हुयी थीं. दो-तीन बार मैं सल्फास की गोलियों के डब्बे के पास पहुंचकर रुक गयी.

एक दिन मैंने बाऊ से पूछा ‘बाऊ, सल्फास की कितनी गोलियाँ खा लेने पर तुरन्त मौत हो जायेगी. उन्होंने अखबार से मुँह हटाये बगैर कहा “बड़ों के लिए 5-6 गोलियाँ काफी हैं. छोटे 3-4 में ही निपट जाते हैं. तुम चाहो तो दसों एक साथ खा लो, जिससे कहीं कोई कमी न रह जाए” मैं बाऊ का जवाब सुनकर गुस्से में आ गई. सोचा था कुछ सहानुभूति मिलेगी और यहाँ ये ऐसे बातें कर रहे थे, जैसे ‘आत्महत्या विज्ञान’ में डिप्लोमा करके बैठे हों. उसके बाद बाऊ ने कहा “वैसे एक बात याद रखो. सल्फास खाकर मारना बड़ा कष्टकर होता है. कितने लोग तो सल्फास की गोलियाँ खाते ही ‘बचाओ-बचाओ’ चिल्लाने लगते हैं. जहाँ-जहाँ से गोलियाँ जाती हैं, अंग गल जाता है. तुम ऐसा करो, फाँसी लगा लो.” मैंने उनकी बाद की बात ठीक से सुनी ही नहीं. मुझे तो सिर्फ सल्फास खाने के साइड  इफेक्ट सुनाई दे रहे थे. भला कोई अपने बच्चों से ऐसे बात करता है 🙂

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