आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

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खतरा कहीं भी हो सकता है

आज मेरे साथ एक ऐसी घटना हुयी, जिसने मुझे कुछ विचलित कर दिया और थोड़ा दहला भी दिया. मैं अक्सर शाम को सोना को लेकर अपने मोहल्ले के पीछे की खाली जगह पर टहलने जाती हूँ. शाम को वहाँ बहुत भीड़ होती है. यहाँ औरतें और वृद्धजन टहलते हुए और बच्चे और युवा खेलते नज़र आते हैं. ये ज़मीन काफी लंबी-चौड़ी है, जिसे ‘धीरपुर विलेज प्रोजेक्ट’ के नाम पर छोड़ा गया है. पिछले दो दिन से मैं शाम को घूमने नहीं गयी, तो सोचा कि आज सोना को रात में घुमा दूँ क्योंकि वो बड़ी तेजी से बड़ी हो रही है और उसके खेलने के लिए मेरा कमरा बहुत छोटा पड़ता है.

तो रात को करीब साढ़े दस बजे मैं टहलने पीछे गयी. इस समय भी यहाँ लोग सपरिवार टहलते हैं, लेकिन सिर्फ़ सड़क पर. सड़क से लगे पार्क और अन्य खाली जगहों पर इक्का-दुक्का लोग ही जाते हैं क्योंकि वहाँ स्ट्रीट लाईट न पहुंचने के कारण अँधेरा रहता है. पर सोना को मिट्टी में खेलना पसंद  है, इसलिए मैं मैदान की तरफ चली गयी और सोना की लीश को खोल दिया. अपनी आदत के मुताबिक़ उसने दौड़-भाग करना शुरू कर दिया.

उसको पकड़ने की कोशिश करते-करते मैं सड़क से काफी दूर आ गयी. तभी मैंने देखा कि तीन लोग सड़क से मैदान में उतरकर तेजी से मेरी ओर बढ़ रहे हैं. मैंने सोना को पकड़कर वहाँ से निकलने में ही भलाई समझी. पर सोना कहाँ हाथ आने वाली? उसने सोचा कि मैं खेल रही हूँ और इधर-उधर दौडना शुरू कर दिया. आखिर मैंने सोना को छोड़ दिया और तेजी से तिरछे चलकर सड़क पर पहुँच गयी. पलटकर देखा कि वो लोग सोना से खेल रहे हैं. अब मुझे सोना की चिंता हो गयी क्योंकि लेब्रेडोर सीधे होने के कारण बड़ी जल्दी अपरिचितों से घुलमिल जाते हैं और अक्सर चोरी हो जाते हैं. मैंने जोर से सोना को बुलाया तो वो मेरे पास आ गयी. इसी बीच मैंने देखा कि मैं जिस जगह सोना के साथ खेल रही थी, ठीक वहाँ से कुछ दूरी पर एक कार और एक ऑटो खड़े थे. वैसे ये वहाँ के लिए कोई अटपटी बात नहीं थी क्योंकि खाली जगह होने के कारण आसपास के मोहल्लों से लोग अक्सर कार या ऑटो सीखने आते रहते हैं. लेकिन रात को कोई गाड़ी पहली बार दिखी. मेरा दिल किसी अनहोनी के बारे में सोचकर धक् से रह गया. खैर, मैंने सोना की लीश पकड़ी और अपने आपको संतुलित करते हुए आराम से चलने लगी.

थोड़ी देर बाद मैंने देखा कि उनमें से एक आदमी तेजी से चलते हुए मेरे पास आकर बगल में चलने लगा. इसी बीच मेरे भाई कृष्णा का फोन आ गया और मैं उससे बात करने लगी. उस आदमी ने कुछ कहा. शायद ये कि मेरा कुत्ता बहुत सुन्दर है. मैंने फोन पर बात का बहाना करते हुए उसकी बात को अनसुना करने का नाटक किया. मुझे डर तो नहीं लग रहा था क्योंकि वहाँ बहुत से लोग टहल रहे थे, पर फिर भी मैं सावधान थी. भाई से बात करने के बाद मैंने देखा कि वो कार जो पीछे अँधेरे में खड़ी थी, मेरे बगल में सड़क के दूसरी ओर आकर रुकी. वो आदमी उसमें बैठ गया. वो लोग गाड़ी में से भी सोना को पुचकार रहे थे और  मैं ध्यान ना देने का नाटक कर रही थी.

मैं अब भी डरी तो नहीं हूँ, लेकिन अनेक सवाल मेरे दिमाग में उथल-पुथल मचाये हुए हैं. हो सकता है, जो कुछ भी हुआ, उसमें अनहोनी की आशंका मेरा भ्रम रहा हो. हो सकता है कि उन्हें सच में मेरे कुत्ते के साथ खेलना रहा हो. हो सकता है कि वो वहाँ गाड़ी चलाना सीखने ही आये हों और उनका कोई और इरादा ना रहा हो. पर फिर भी कहीं भी कुछ भी हो सकता है. ये बात मुझे ध्यान में रखनी चाहिए. माना कि मेरे मोहल्ले में आज तक इस तरह की घटना नहीं हुयी. माना कि मेरा मोहल्ला इतना सुरक्षित लगता है कि रात में ग्यारह बजे भी मैं दूसरे ब्लाक में कूड़ा फेंकने चली जाती हूँ. मैं अकेली ही कहीं भी आती जाती हूँ, साथ की अपेक्षा नहीं रखती, लेकिन इस एक घटना ने मुझे बहुत सावधान कर दिया है. शायद मैं अति आत्मविश्वासी हो रही थी, और इस घटना ने मेरे आत्मविश्वास को हिलाकर मुझे चेतावनी दे दी.

मैंने निश्चित किया है कि अकेली रात में बाहर घूमने नहीं जाऊँगी. अगर कभी गयी भी तो सड़क पर ही टहलूँगी, पार्क में नहीं. कभी भी सुनसान जगह पर नहीं जाऊँगी. वैसे तो मैं बेफिक्र टहलते हुए भी अगल-बगल का ध्यान रखती हूँ, शायद यह गुण महिलाओं में इनबिल्ट होता है, लेकिन अब से मैं और भी सावधान रहूँगी.

मुझे मालूम है कि मैं ये पोस्ट प्रकाशित करके मुसीबत मोल लेने वाली हूँ क्योंकि मेरे मित्र और शुभचिंतक मुझे अच्छा-ख़ासा लेक्चर पिलायेंगे. पर फिर भी मैंने ये पोस्ट लिखी, इसलिए कि आज बहुत दिनों बाद मुझे एहसास हुआ कि लाख आत्मविश्वासी हूँ, निडर हूँ, बोल्ड हूँ, लेकिन फिर भी मैं एक लड़की हूँ और दिल्ली में रहती हूँ. मुझे अतिरिक्त रूप से सावधान रहना चाहिए.

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आस-पड़ोस की बातें

मेरा मोहल्ला संभवतः दिल्ली का सबसे इंटरेस्टिंग मोहल्ला होगा. इसके ऊपर मैंने कुछ दिन पहले एक लेख भी लिखा था मोहल्ला मोहब्बत वाला 🙂 . यहाँ पिछले पाँच सालों से रह रही हूँ. इसलिए काफी लोगों से परिचय भी हो गया है. लोगों से मेरा मतलब दुकानदारों से है, बकिया दोस्त-वोस्त तो हैं ही.

यहाँ सुबह से ही सब्जी की दुकानें लग जाती हैं, पर शाम को काफी ठेले होते हैं, जिनमें हर तरह की मौसमी सब्जियां मिल जाती हैं. एक दिन एक सब्जी वाले के पास हरी-हरी भिन्डी देखकर ठिठक गयी. उसके पास कुछ ही भिन्डी बची थी. मैंने दाम पूछा तो बोला, “वइसे तो आठ रूपिया पौव्वा हैं. मुला किलो-खांड लेइहो तो सस्ता लगा देबे.” (वैसे तो आठ रूपये पाव हैं, पर अगर किलो के लगभग लेना हो तो सस्ता लगा दूँगा.) मैं अपनी परिचित बोली सुनकर चौंकी. मैंने झट से पूछा, “उन्नाव के हो का भईया?”  “हाँ, मुला आपका कईसे मालूम?” वो आश्चर्य से पूछने लगा. मैंने कहा, “हमहूँ हुवन कि अहिन. पर तुम  हियाँ का करि रह्यो? उन्नावे के बगल मा तो कानपुर-लखनऊ जइसे बड़े सहर हैं.”( मैं भी वहीं की हूँ, पर तुम यहाँ क्या कर रहे हो. उन्नाव के बगल में तो वैसे भी लखनऊ-कानपुर जैसे शहर हैं?) तो बोला, “वी हमरी सास रहती रहैं हियाँ, तौ बुला लिहिन कि आओ हियाँ कमाव-खाव आके.” (मेरी सास रह रही थीं यहाँ पर, तो हमें भी बुला लिया कि तुम भी यहीं आकर कमाओ)  इस तरह मुझे मेरे बचपन के शहर का एक आदमी मिला और मुझे उससे वैसा ही अपनापन महसूस हुआ जैसा लड़कियों-औरतों को अपने पीहर के किसी भी व्यक्ति से होता है 🙂 . वो मेरा दोस्त बन गया था. पर इधर कई दिनों से वो नहीं दिख रहा है. लगता है कहीं और चला गया कमाने-खाने.

एक सेबवाला है. मुझे देखते ही बुलाता है, “बहिनजी, आपकी पसंद वाला जूस वाला किन्नौर सेब आया है.” एक-दो बार तो झेंप जाती हूँ कि कमबख्त को इतनी ज़ोर से चिल्लाकर बताने की क्या ज़रूरत है? पर उस बेचारे की गलती नहीं है. उससे बहुत दिनों से सेब खरीद रही हूँ. पर जब वो सुनहरे शिमला वाले सेब लाता है, तब नहीं लेती. मुझे वो खुसखुसे होने के कारण अच्छे नहीं लगते. तो जब वो लाल वाले जूसी सेब लाता है तो चिल्लाकर बताता है और गारंटी भी देता है कि अगर सेब में जूस नहीं हुआ तो वापस ले लेगा :-). है ना मजेदार इंसान?

एक आंटी हैं, जिनकी वीडियो लाइब्रेरी है. किराए पर सी.डी. देती हैं. उनके यहाँ से इतनी पिक्चरें लेती हूँ कि उन्हें मेरे घर का नम्बर तो याद ही हो गया है, ये भी याद है कि मैं कौन-कौन सी पिक्चरें देख चुकी हूँ? ( ये अलग बात है कि मेरा नाम नहीं मालूम :-)) एक-दो बार वो खुद ही मेरी पसंद की फ़िल्में सजेस्ट कर देती हैं. एक दिन उन्होंने मुझे “रेड एलर्ट” फिल्म देखने का सुझाव दिया. ये एकदम नयी फिल्म है और नक्सलवाद पर बनी ठीक-ठाक फिल्म है और मज़े की बात ये कि फिल्मों की इतनी शौक़ीन होने के बाद भी मैंने इसका नाम तक नहीं सुना था. जब उनके यहाँ मोज़रबियर की  पुरानी क्लासिक हिन्दी फिल्म की सी.डी. आती है, तो मुझे बता देती हैं. आज ही उन्होंने ‘नया-दिन नयी रात’ और ‘गोदान’ की सी.डी. दिखाई. उनके पास और भी कई पुरानी फिल्मों की सी.डी. हैं, जो मुझे देखनी हैं.

एक फ्रूटी है, जो अपने पति पेप्सी के साथ कोने के एक घर में पाली हुयी है. हाँ, क्योंकि वो एक डॉगी है. प्यारी सी फ्रूटी के यहाँ पिछले साल जब हम उसकी पपी “कली” को लेने गए थे, तो इतनी नाराज़ हुयी थी कि भौंक-भौंककर पूरे मोहल्ला सर पर उठा लिया था. पर अब मुझे देखकर भौंकती नहीं है. आकर मेरे पैरों पर खड़ी हो जाती है और कूँ-कूँ करती है, जैसे पूछती हो कि “मैंने अपनी बच्ची तुम्हें दी थी, देखभाल के लिए. अब वो कहाँ है बताओ?” कौन कहता है कि जानवर बोल नहीं सकते? वो बोलते हैं, अपनी आँखों से, अपने हाव-भाव से. फ्रूटी ने जब पहली बार मेरे पैरों पर खड़े होकर मेरी आँखों में प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा था, तो मैं उससे आँखें नहीं मिला पायी, मेरी आँखें भीग गयीं थीं…

मेरा मोहल्ला मोहब्बत वाला

कभी-कभी मेरा किसी विषय पर लिखने का जोर से मन होता है और मैं लिख जाती हूँ. कुछ दिन पहले अपने मोहल्ले पर एक लेख लिख डाला, लेकिन पोस्ट नहीं किया. ऐसा मैंने पहली बार किया. अमूमन तो मैं सीधे डैशबोर्ड पर टाइप करती हूँ और पोस्ट कर देती हूँ. कभी ड्राफ्ट नहीं बनाती, पर ये लेख मैंने बारहा पैड पर लिखकर सेव कर लिया था. अब पोस्ट कर रही हूँ. सधी-सादी वर्णनात्मक सी पोस्ट है.

असल में मुझे अपना मोहल्ला बहुत अच्छा लगता है. थोड़े लोवर इनकम वाले लोगों का है, थोड़ा गन्दा भी है. पर माहौल अच्छा है. कुछ बातें ऐसी हैं, जो इसे और मोहल्लों से अलग करती हैं. खासकर के मिश्रित संस्कृति.

प्यार के पंछी

उत्तरी दिल्ली के इस मोहल्ले का नाम गाँधीविहार है. यहाँ से थोड़ी दूर मुखर्जीनगर में सिविल सर्विसेज़ की बहुत सी कोचिंग हैं.दिल्ली यूनिवर्सिटी पास में है. इस कारण यहाँ विद्यार्थी और प्रतियोगी परीक्षार्थी काफी संख्या में रहते हैं. भारत का कोई कोना ऐसा नहीं है, जहाँ के लड़के-लड़कियाँ यहाँ न रहते हों. स्वयं मेरे दोस्तों में महाराष्ट्रियन भी हैं और बिहार के (‘बिहारी’ नहीं कहूँगी, यहाँ इसे गाली की तरह इस्तेमाल करते हैं) भी और दक्षिण भारतीय भी.

अपना देश इतनी विविध संस्कृतियों वाला है कि यहाँ प्रदेश, महानगर, नगर, कस्बे, मोहल्लों की ही नहीं, एक मोहल्ले की हर गली का अपना कल्चर है. यही हाल गाँधीविहार का है. यहाँ का ‘ई’ ब्लॉक अपने को पॉश कालोनी से कम नहीं समझता और ‘सी’ ब्लॉक को सी ग्रेड का समझता है. फिर भी सब मिलजुलकर रहते हैं. क्रिकेट मैच के समय यहाँ की एकता देखते बनती है. बीच के बड़े से पार्क में चंदा इकट्ठा करके बड़ी सी एल.सी.डी. टी.वी. लगवाते हैं. कुछ लोग अपने घरों से कुर्सियाँ ले जाकर तो कुछ खड़े होकर मैच देखते हैं, सब्ज़ी वाले, भावी आई.ए.एस. ऑफ़िसर के साथ; लोकल लोग, आउटसाइडर्स के साथ; अनपढ़ लोग, पी.एच.डी. वाले लोगों के साथ.

मज़े की बात यह है कि इस छोटे से मोहल्ले में लगभग सभी धर्मों के लोग ही नहीं रहते, बल्कि अधिकांश धर्मों के धर्मस्थल भी यहाँ उपस्थित हैं. मन्दिर, मस्जिद, गुरुद्वारा ही नहीं बौद्धमठ भी है. चर्च शायद नहीं है, पर ईसाई लोग बहुत हैं.

वो बात, जो इस मोहल्ले को आसपास के मोहल्लों से विशिष्ट बनाती है, वह है यहाँ पूर्वोत्तर के लोगों का बहुसंख्या में होना. देश के इस कोने के विद्यार्थी तो बहुसंख्या में हैं ही, बहुत से पूर्वोत्तरी यहाँ घर लेकर स्थाई रूप से रहने भी लगे हैं. इसके अतिरिक्त बिहार के लोग भी बहुतायत में हैं. इससे यहाँ का कल्चर खिचड़ी बन गया है… एक दही, पापड़, सलाद और अचार वाली खिचड़ी. पर विशेषता पूर्वोत्तर के लोगों के कारण ही है. यह बात मैं बार-बार इसलिये कह रही हूँ क्योंकि इनकी संस्कृति थोड़ी अलग सी है.

यहाँ रहने वाले पूर्वोत्तर के विद्यार्थी लोकल लोगों (दिल्ली वालों) से अधिक घुलते-मिलते नहीं. वे अपने में ही मस्त रहते हैं. दिल्ली वाले भी इन्हें ‘चिंकी’ कहकर बुलाते हैं, जिससे ये लोग चिढ़ते हैं. पूर्वोत्तर के ये विद्यार्थी अधिकतर एस.टी. कैटेगरी के हैं. अच्छी खासी स्कालरशिप मिलती है. सीधे-सादे होते हैं. इन बातों के कारण कुछ लोग इन्हें कमरा किराये पर आसानी से दे देते हैं. पर जिन लोगों के घर पर किशोर युवक-युवतियाँ हैं. वे लोग इन्हें रूम नहीं देना चाहते, कारण – ये लोग वो सब करते हैं, जो ‘बच्चों को बिगाड़ने’ में सहायक है. पूर्वोत्तरी लोग ड्रिंक करते हैं, लेट नाइट पार्टीज़ में जाते हैं, हर तरह का नॉनवेज खाते हैं और सबसे अलग बात, बिना शादी के लड़का-लड़की साथ-साथ रहते हैं. गर्मी की शामों को पीछे के खुले मैदान में खुलेआम, हाथों में हाथ लिये घूमते हैं…ना किसी बात का डर, ना किसी चीज़ की फ़िक्र…तब प्यार यहाँ हवाओं में तैरता है… फिज़ाओं में बहता है… बिना रोकटोक.

ऐसा नहीं है कि लोकल या अन्य राज्यों के लड़के-लड़कियाँ ऐसा नहीं करते हैं, पर पूर्वोत्तरी लोग यह सब खुलेआम करते हैं क्योंकि यह खुलापन उनकी संस्कृति का हिस्सा है और पूर्वोत्तर की संस्कृति, भारतीय संस्कृति का अभिन्न भाग है. ये बात यहाँ के लोगों को समझ में नहीं आती… और भारतीय संस्कृति के ठेकेदारों को भी जाने कब समझ में आएगी ?

तो ऐसा है हमारा गाँधीविहार, मेरा मोहल्ला मोहब्बत वाला. एक मिनी इण्डिया, एक “लघु भारत”, जहाँ लोग एक-दूसरे को गरियाते भी हैं और साथ रहते भी हैं और वो भी मिलजुलकर, तब तक, जब तक कि कोई उन्हें यह कहकर भड़का ना दे कि “उठो ! तुम्हारी संस्कृति खतरे में है…”


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