आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

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वो ऐसे ही थे (3)

मेरी और बाऊ की उम्र में लगभग 42-43 साल का अंतर था, यानि लगभग दो पीढ़ी जितना. कहते हैं कि एक पीढ़ी के बाद ‘पीढ़ी अंतराल’ समाप्त हो जाता है. इसीलिये दादा-पोते में ज़्यादा पटती है और शायद इसीलिए हम बच्चों की भी बाऊ से खूब बनती थी. मैं उनके ज़्यादा ही मुँह लगी थी.

वे बेहद मस्तमौला थे, ये तो मैं पहले ही बता चुकी हूँ-बेहद निश्चिन्त, फक्कड़ और दूरदर्शी होते हुए भी वर्तमान में जीने वाले. हमें उन्होंने बचपन से ही तर्क और प्रश्न करना सिखाया था और उनसे सबसे ज़्यादा बहस मैं ही करती थी. उनकी हर बात का विरोध करती थी. उन्होंने भी तो यही किया था 🙂

मुझे लेकर वे बहुत निश्चिन्त रहा करते थे. उनका मानना था कि मेरे अंदर बहुत अधिक जिजीविषा है और मैं सारी परेशानियों को झेलते हुए अपने जीवन में कहीं न कहीं पहुँच जाऊँगी. उन्हें मेरी शादी को लेकर भी कभी चिंता नहीं हुयी. शादी की तो खैर घर में बात ही नहीं होती थी, अगर होती भी तो सिर्फ दीदी की शादी की. बाऊ का मानना था कि मेरे लिए लड़का ढूँढना उनके बस की बात नहीं है 🙂

उनके मस्तमौलापन का एक किस्सा है. बाऊ ने अपनी पेंशन उन्नाव से आजमगढ़ ट्रांसफर कराई थी. कागज़ डाक में कहीं खो गया और उन्हें पूरा एक साल लग गया नया कागज़ बनवाने में. उस अवधि में बाऊ को पेंशन नहीं मिल रही थी और हम बहुत ज़बरदस्त आर्थिक संकट में पड़ गए. दीदी की शादी के बाद मैं अकेली पड़ गयी थी और ऊपर से यह मसला. इसके चलते मैं डिप्रेशन में आ गई. कई-कई बार आत्महत्या करने का मन होता था. बटाई पर मिला गेहूँ रखने के लिए घर में सल्फास की गोलियाँ रखी हुयी थीं. दो-तीन बार मैं सल्फास की गोलियों के डब्बे के पास पहुंचकर रुक गयी.

एक दिन मैंने बाऊ से पूछा ‘बाऊ, सल्फास की कितनी गोलियाँ खा लेने पर तुरन्त मौत हो जायेगी. उन्होंने अखबार से मुँह हटाये बगैर कहा “बड़ों के लिए 5-6 गोलियाँ काफी हैं. छोटे 3-4 में ही निपट जाते हैं. तुम चाहो तो दसों एक साथ खा लो, जिससे कहीं कोई कमी न रह जाए” मैं बाऊ का जवाब सुनकर गुस्से में आ गई. सोचा था कुछ सहानुभूति मिलेगी और यहाँ ये ऐसे बातें कर रहे थे, जैसे ‘आत्महत्या विज्ञान’ में डिप्लोमा करके बैठे हों. उसके बाद बाऊ ने कहा “वैसे एक बात याद रखो. सल्फास खाकर मारना बड़ा कष्टकर होता है. कितने लोग तो सल्फास की गोलियाँ खाते ही ‘बचाओ-बचाओ’ चिल्लाने लगते हैं. जहाँ-जहाँ से गोलियाँ जाती हैं, अंग गल जाता है. तुम ऐसा करो, फाँसी लगा लो.” मैंने उनकी बाद की बात ठीक से सुनी ही नहीं. मुझे तो सिर्फ सल्फास खाने के साइड  इफेक्ट सुनाई दे रहे थे. भला कोई अपने बच्चों से ऐसे बात करता है 🙂

बैसवारा और आल्हा-सम्राट लल्लू बाजपेयी

अभी कुछ दिन पहले ‘बैसवारा की शान’ कहे जाने वाले लोकप्रिय आल्हा गायक लल्लू बाजपेयी के देहांत की खबर सुनी तो मन जाने कैसा-कैसा हो गया? शायद पूरे भारत के लोग लल्लू बाजपेयी को न जानते हों, शायद उन्होंने बैसवारा का नाम भी कभी न सुना हो, लेकिन मैं बैसवारा क्षेत्र में ही पली-बढ़ी हूँ, इसलिए मेरा इससे बेहद लगाव है. लल्लू बाजपेयी को दूरदर्शन पर देखते और रमई काका उर्फ ‘बहिरे बाबा’ के किस्से सुन-सुनकर बड़ी होने के कारण मैं बैसवारा को इन दोनों नामों की वजह से ही ज़्यादा जानती हूँ.

मेरे चाचा वसंत सिंह तोमर ने मुझे बैसवारा के इतिहास, साहित्य और संस्कृति आदि के बारे में बताकर मेरी रूचि इस ओर पैदा की थी, लेकिन स्कूली पढ़ाई-लिखाई और जीवन के झंझावातों के चलते मैं इस सम्बन्ध में अधिक अध्ययन नहीं कर पायी. फिर भी जितना जाना-सुना था, उसके अनुसार किसी ज़माने में यह क्षेत्र अपनी पृथक पहचान रखता था. यह पहचान समय के साथ-साथ धीरे-धीरे मिटती गयी. आमतौर पर बैसवारा को लोग रायबरेली से जोड़कर देखते हैं (शायद वहाँ स्थित इसी नाम के रेलवे स्टेशन के कारण), जबकि वास्तविकता यह है कि बैस राजपूतों के प्रभाव के कारण इस क्षेत्र को बैसवारा कहा जाता है. पहले यह क्षेत्र बाईस परगनों में फैला हुआ था. इन बाइस परगनों में आधुनिक उन्नाव, रायबरेली, लखनऊ व बाराबंकी के थोड़े-थोड़े भाग सम्मलित हैं.  दैनिक जागरण में एक बार बैसवारा के इतिहास के बारे में एक मज़ेदार लेख पढ़ा था और उसे बुकमार्क कर लिया था. इस लेख को यहाँ पढ़ा जा सकता है.

हिंदी की एक बोली के रूप में ‘बैसवारी’ का उतना ज़िक्र नहीं होता या हो सकता है कि होता हो, मुझे ही नहीं पता. वैसे भी अवधी खुद एक बोली है और बैसवारा को अवधी से जुड़ी हिंदी की एक ‘उपबोली’ कहा जा सकता है. अवधी के बहुत से शब्दों से और लहजे से बैसवारा में काफी भिन्नता पायी जाती है, लेकिन मुख्यतः बैसवारी बोली से ज़्यादा “बैसवारा” क्षेत्र का अधिक महत्त्व है. किसी युग में इस क्षेत्र से हिंदी साहित्य के बड़े-बड़े नाम जुड़े हुए थे, जिनमें सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, महावीर प्रसाद द्विवेदी, राम विलास शर्मा, शिवमंगल सिंह सुमन, प्रताप नारायण मिश्र, भगवतीचरण वर्मा, रमई काका आदि प्रमुख हैं. अभी कुछ दिन पहले बैसवारा से सम्बन्धित कैलाश बाजपेयी जी का एक लेख अमर उजाला में पढ़ा था- बैसवारा में कविता की खेती ,जिसमें उन्होंने अपने कुछ अनुभवों के साथ बैसवारा की समृद्ध साहित्यिक विरासत पर प्रकाश डाला है.

हमलोग लल्लू बाजपेयी का आल्हा गायन लखनऊ दूरदर्शन के चौपाल कार्यक्रम में बचपन से ही सुनते आये हैं. वे एक ओर तो अपने जोशीले गायन के लिए जाने जाते थे, दूसरी ओर तलवार और मूँछों के लिए. आल्हा गाते हुए वे अपने हाथ में एक तलवार रखते थे और गाते-गाते उसे भाँजते रहते थे. दुबले-पतले शरीर पर खूब बड़ी-बड़ी मूँछें उन्हें एक अलग व्यक्तित्व प्रदान करती थीं. कभी-कभी आल्हा गाते हुए वे स्टेज पर पैर पटकते हुए इतनी आगे बढ़ जाते थे कि हम छोटे बच्चों को लगता था कि अभी तलवार भाँजते हुए टी.वी. के बाहर आ जायेंगे 🙂 शुरू में तो डर लगता था, फिर तो ये हाल था कि इधर उनका आल्हा-गायन शुरू उधर हमलोग पढ़ाई-लिखाई, खेल-कूद छोड़कर टी.वी. के सामने 🙂

माँ चन्द्रिका देवी के उपासक श्री लल्लू बाजपेयी उन्नाव जिले के नारायणदास खेड़ा गाँव के रहने वाले थे. इसी मई के पहले हफ्ते में श्री लल्लू बाजपेयी का देहांत हो गया. यूँ तो उनका असली नाम पं. चन्द्रनाथ था. पर हमलोग तो उन्हें लल्लू बाजपेयी के नाम से ही जानेंगे. उनको हार्दिक श्रद्धांजलि और नमन.

प्रस्तुत है उनके आल्हा-गायन का एक वीडियो-

जंगल जलेबी, स्लेटी रुमाल, नकचढ़ी लड़की और पहाड़ी लड़का

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बचपन की कुछ बातें ऐसी होती हैं, जिनका मतलब उस समय समझ में नहीं आता है. जब हम बड़े हो जाते हैं, तब समझ में आता है कि अमुक काम को करने से, किसी विशेष व्यक्ति से मिलने से या किसी जगह जाने से क्यों रोका गया था? समझ ही कितनी होती है तब? ऐसे ही कुछ दोस्त होते हैं, जो उस समय हमारे दुश्मन लगते हैं, जबकि बाद में पता चलता है कि अगर वो न होते, तो कुछ घटनाओं का मतलब ही बदल जाता. और हमारे बचपन की यादें इतनी खुशनुमा न होतीं.

मैंने जब होश संभाला था, तो खुद को उन्नाव जिले की बाबूगंज रेलवे कालोनी में पाया था. उसके पहले की सारी यादें इतनी धुँधली हैं कि उन्हें मिलाकर एक अब्स्ट्रेक्ट ही बन पाता है. अम्मा-बाऊ की बतायी गयी बातों से ही उन्हें आपस में जोड़ पाती थी. तो अब वे भी नहीं हैं. उस कालोनी में जब हम आये तो मेरी उम्र लगभग पाँच साल रही होगी. और कालोनी में जो सबसे पहला दोस्त बना, वो मुझसे तीन-चार साल बड़ा था. यूँ तो उसका नाम राघवेन्द्र सिंह जलाल था, लेकिन उसके घर में सब उसे राकेश बुलाते थे. चार भाइयों और एक बहन में सबसे छोटा लड़का. उसके पिताजी आर.पी.एफ. में थे. कुमाउँनी थे वे लोग. पता नहीं कब उसके घर से मेरे घर का नाता बन गया और अम्मा उन सभी भाइयों को अपने बेटों जैसे मानने लगीं.

मेरी माता जी की एक विशेषता थी कि जब उनकी किरपा किसी पर बरसती थी, तो उसकी सीमा नहीं होती थी. राकेश पर अम्मा की विशेष कृपा थी. वो हम-दोनों भाई-बहनों से बड़ा और अम्मा की नज़रों में बहुत समझदार था, तो अम्मा ने उसे हमारा अभिभावक नियुक्त कर दिया. क्योंकि उन्हें लगता था कि कालोनी के और सारे लड़के एक नम्बर के गुंडे हैं और उनसे हमारी रक्षा उनके द्वारा नियुक्त सेनापति ही कर सकता था 🙂 वो हमदोनों की हर बदमाशी की खबर अम्मा तक पहुँचाता, अम्मा हमें डाँटती और मैं मन ही मन कुढ़ती रहती थी. अम्मा को पता था कि मैं एक नम्बर की ढीठ और नकचढी लड़की थी, इसलिए मेरे मामले में तो अम्मा मेरा पक्ष भी नहीं सुनती थीं. राकेश ने शिकायत की नहीं कि सीधे डाँट पड़ती (और कभी-कभी मार भी 😦 )

जैसे-जैसे मेरी उम्र बढ़ती जा रही थी, राकेश की रोक-टोक और अम्मा की डाँट भी. उस कालोनी में दो फील्ड थीं, एक छोटी, जो रेलवे की सम्पत्ति थी और एक ठीक उसके बगल में खाली फील्ड, जो उस समय उन्नाव के सबसे बड़े मुहल्लों में से एक मोतीनगर से रेलवे कालोनी को अलग करती थी. राकेश मुझे बड़ी फील्ड में अकेले जाने से रोकता. हम आइस-पाइस खेलते, तो दो-तीन साल बड़े लड़कों के साथ छिपने से रोकता. एक बार जब मैंने उसकी बात नहीं मानीं, तो गुस्से में जाकर अम्मा से शिकायत कर दी. पता नहीं अम्मा के पास जाकर क्या खुसुर-फुसुर की कि अम्मा की बमबारी-गोलाबारी शुरू हो गयी- “कहा था तुमसे कि राकेश की बात माना करो, फिर क्यों उसके मना करने के बाद भी “उस लड़के” के साथ झाड़ी में छिपने गयी.” “तो क्या हुआ? ये कौन होता है मुझे मना करने वाला?” मेरे इतना कहने के साथ दो चांटे पड़े ‘तड़-तड़.’ मैंने रोना शुरू कर दिया. राकेश को भी मेरा मार खाना बुरा लगा. उसने कहा “जाने दो चाची, आगे से नहीं करेगी ऐसा” पर इससे क्या? वो मेरा पक्का दुश्मन बन गया.

इस सबके बावजूद राकेश के साथ रहना मजबूरी थी क्योंकि हमदोनों “बिगड़े हुए” भाई-बहन को बिना उसके साथ के, न खेलने की इजाज़त थी और न कहीं आने-जाने की. दीदी का स्कूल सुबह से शाम तक का होता था और अम्मा को घर के सारे काम करने होते थे. हमारा स्कूल ‘विवेकानंद’ रेलवे कालोनी के पीछे ही था और ग्यारह बजे हम प्राइमरी के बच्चे फ्री हो जाते. हम सारा दिन खेलते रहते. अम्मा हम पर नज़र नहीं रख सकती थीं, इसीलिये राकेश को कह रखा था इस काम के लिए और वो पूरी ईमानदारी से ये ज़िम्मेदारी निभाता था 🙂

मैं उससे कभी सीधे मुँह बात नहीं करती थी, उस समय के अलावा, जब वो हमारे लिए बाऊ की बनायी हुयी लग्गी से बड़ी फील्ड में लगे जंगल जलेबी और खजूर के पेड़ से फल तोड़ता था. जंगल जलेबी के विशालकाय पेड़ की निचली डालियों तक तो लग्गी पहुँच जाती थी, लेकिन ऊपर की डालों पर नहीं. एक दिन एक भी जंगल जलेबी न पाने से मेरा मुँह बन गया, तो राकेश पेड़ पर ही चढ़ गया. मुझे ये घटना पूरी तरह से याद नहीं क्योंकि उस समय मैं सिर्फ आठ या नौ साल की थी, लेकिन इतना याद है कि वो अपनी गंदी सी स्लेटी रुमाल में ऊपर से जंगल जलेबी के फल बाँधकर ले आया था. हम होली जलाने के लिए सूखी लकडियाँ काटकर ले आते, कभी-कभी उपले चुराते 🙂 वो एक काम और मेरी पसन्द का करता था. गर्मी की छुट्टियों में कैरम, लूडो और शतरंज खेलने के अलावा हमें कॉमिक्स पढ़ने का शौक चर्राया. वो पता नहीं कहाँ-कहाँ से प्रति चवन्नी एक दिन के किराए पर कॉमिक्स लेकर आता था और वापस भी वही करता था 🙂

एक-दो साल बाद बाऊ का ट्रांसफर उन्नाव के बगल में स्थित एक छोटे से स्टेशन मगरवारा हो गया. ट्रक में हमारे साथ चन्दन भैय्या भी गए हमें पहुँचाने. बाद में राकेश वहाँ भी आता था और कई बार ‘जंगल जलेबी’ भी लाता था क्योंकि मगरवारा में वो पेड़ नहीं था. कभी-कभी खुमानी वगैरह भी ले आता था, जो उसके गाँव से कोई लाया होता था. पर मुझे वो अच्छी नहीं लगती थी.

मैं बचपन में उससे इतना चिढ़ती थी कि कालोनी के कल्चर के विरुद्ध मैंने उसे राखी कभी नहीं बाँधी. जबकि उसके चन्दन भैया को बांधती थी. मुझसे चार साल बड़ा था, लेकिन मैंने उसे कभी ‘भैय्या’ नहीं कहा. मैं थोड़ी लंबी हो गयी तो वही मुझे चिढ़ाता था “गुड्डू, अब तो तू मुझसे बड़ी हो गयी. अब मैं तुझे ‘दीदी’ कहूँगा- गुड्डू दीदी” तब भी मैं बहुत गुस्सा होती थी- “तुम हमें दीदी कहोगे, तो सबलोग हमें तुमसे बड़ा समझने लगेंगे” और कौन लड़की बड़ी दिखना चाहती है भला 🙂

जब मैंने मगरवारा से उन्नाव ट्रेन से पढ़ने आना-जाना शुरू किया और भीड़ में अनचाहे स्पर्शों का सामना करना पड़ा, तब समझ में आया कि क्यों अम्मा और राकेश मुझे किशोरावस्था के लड़कों के साथ सुनसान जगहों पर जाने से मना करते थे? क्यों कुछ लड़कों के साथ खेलने पर इसलिए पाबंदी थी कि वे “गंदे लड़के” थे और ये बात राकेश अम्मा को बताता रहता था. तब ये भी समझ में आया कि क्यों एक बार एक लड़के के साथ घनी झाडियों में छिपने के कारण राकेश की शिकायत पर अम्मा से दो चांटे खाने पड़े थे और ये भी कि उसने अम्मा के पास जाकर खुसुर-फुसुर करके क्या बताया होगा?

आज मुझे लगता है कि दस-ग्यारह साल की उम्र तक मेरे साथ कोई अप्रिय घटना न होने का सबसे बड़ा कारण अम्मा की सतर्कता के साथ ही राकेश का होना भी था. मैं सोच नहीं सकती कि उसके बगैर मेरा बचपन कैसा होता? यूँ तो नकचढ़ी और ढीठ, लेकिन दुनियादारी की बातों से अनजान मैं निश्चिन्त होकर इसलिए खेल पायी क्योंकि राकेश मेरे साथ होता था. शायद वो नहीं होता, तो अम्मा मुझे बाहर खेलने ही न भेजतीं. डेली पैसेंजरी शुरू करते ही मैं इतनी समझदार हो गयी कि अपनी देखभाल खुद कर सकती थी. अम्मा वैसे भी बहुत सतर्क रहती थीं और मगरवारा की कालोनी भी बहुत छोटी थी. मैं खूब ऊधम मचाती लड़कों के साथ क्योंकि मुझे कभी उनके साथ असहज नहीं लगा. शायद एक अप्रिय घटना मेरी ये सहजता मुझसे छीन लेती.

राकेश और उसके घरवालों से हमारा सम्बन्ध बहुत बाद तक बना रहा. जब बाऊ के रिटायरमेंट के बाद हम गाँव शिफ्ट हुए, तब भी चन्दन भइय्या पहुँचाने गए थे और बाद में अक्सर हमारे गाँव आते रहते थे. हमलोग भी जब उन्नाव जाते थे, तो उनलोगों से मिलते थे. बाद में वो लोग भी नैनीताल शिफ्ट हो गए. केन्द्र सरकार की नौकरी करने वाले लोग जाने कहाँ-कहाँ से आकर मिलते हैं और फिर अपने-अपने देस चले जाते हैं. मेरे बचपन के साथी जाने कहाँ हैं? कुछ की तो बिल्कुल कोई खबर नहीं.

मैं लगभग ग्यारह-बारह साल से राकेश से नहीं मिली हूँ. अभी कुछ दिन पहले चन्दन भइय्या का फोन आया. शायद दीदी से मेरा फोन नम्बर लिया था. उन्होंने बताया कि उनकी अम्मा गुजर गयी हैं. उन्होंने शादी बना ली है (वो लोग ऐसे ही बोलते थे) और टीचर लग गए हैं नैनीताल जिले में ही. राकेश भी वहीं कहीं पढ़ा रहा है. मुझसे भईया ने पूछा “दीदी ने बताया तूने शादी नहीं बनायी. तुम्हारे लोगों को हुआ क्या है? कोई शादी ही नहीं बनाना चाहता. राकेश ने भी नहीं बनायी अब तक.”

काठगोदाम एक्सप्रेस से हल्द्वानी जाते वक्त रास्ते में लालकुआँ पड़ता है. वहीं के एक गाँव में मेरे दोस्त का घर है. उन लोगों ने पता भी दिया था, लेकिन वो घर पर छूटा है और सालों से घर ही नहीं गई. सोच रही हूँ, फिर से पता पूछकर कभी हो ही आऊँ.

खेलों से नाता

बचपन से ही मेरी खेल-कूद में रूचि थी और अम्मा की लाख रोक-टोक के बावजूद मैं रेलवे कालोनी के लड़कों के साथ ऊधम मचाती रहती थी. स्कूल में भी खेलों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती थी और इनाम भी जीतती थी. प्राइमरी तक तो ‘आलू दौड़,’ ‘मेंढक दौड़’, ‘म्यूज़िकल चेयर’ वगैरह जाने कितने अजीब-अजीब से खेल होते थे और प्रतियोगिताएँ भी स्कूल के अन्दर ही होती थीं. लेकिन छठी कक्षा से मैंने एथलेटिक्स में भाग लेना शुरू कर दिया और जिले स्तर की विद्यालयीय प्रतियोगिताओं में जाने लगी.

जिला स्तर की खेल-प्रतियोगिताओं में एथलेटिक्स में सिर्फ तीन खेलों में भाग लेने का नियम था, तो मैं सौ मीटर दौड़, डिस्कस थ्रो (चक्का फ़ेंक) और लंबी कूद में भाग लेने लगी. जब मैंने पहली बार सौ मीटर दौड़ लगाई तो मेरी गेम टीचर सिद्दीकी मैम आश्चर्यचकित रह गयीं क्योंकि मैं फ़्लैट फूटेड थी. मुझे तब समझ में ही नहीं आता था कि इसका मतलब क्या होता है. बहुत बाद में पता चला. मैम को अचरज इस बात पर था कि मैं हर बार फर्स्ट आ जाती थी. ये शारीरिक कमी कभी भी मेरी तेज दौड़ में बाधा नहीं बनी. मज़े की बात की मैं दौड़ने का नियमित अभ्यास कभी नहीं करती थी. शायद अपनी कालोनी में खेलना मेरे काम आता था.

आठवाँ पास करने के बाद मेरे हॉकी के कोच नज़्मी भाई ने मुझे एथलेटिक्स में भाग न लेने का और इनडोर खेलों की ओर ध्यान देने की सलाह दी. क्योंकि उन्हें मालूम था कि मैं खेल के साथ-साथ पढ़ाई भी अच्छे से करना चाहती हूँ और एथलेटिक्स के लिए जितनी मेहनत चाहिए उतनी मैं नहीं कर पाऊँगी. फिर पिताजी के मगरवारा से उन्नाव ट्रांसफर के बाद से मेरा खेल का मैदान भी छिन गया था. उन्नाव की रेलवे कालोनी रेलवे स्टेशन के पास थी और कोई खेल का मैदान नहीं था. लड़के तो स्टेशन के उस पार स्थित जी.आई.सी. ग्रांउड में खेलने चले जाते थे. पर मेरा खेल छूट गया. जब तक स्कूल रहता था, तब तक वहीं खेल लेती थी. लेकिन गर्मियों की छुट्टियों में खेलों से नाता बनाए रखने और खुद को फिट रखने के लिए मैंने भी जी.आई.सी. ग्राउंड हॉकी खेलने जाना शुरू कर दिया. हालांकि हॉकी की प्रतियोगिता में कभी भाग  नहीं लिया.

मेरे लड़कों के साथ हॉकी प्रैक्टिस पर जाने का अम्मा ने बहुत विरोध किया, लेकिन बाऊ की अनुमति तुरंत मिल गयी थी. रेलवे कालोनी के लोग भी बहुत खुसुर-फुसुर करते थे कि ‘चौबे जी ने अपनी लड़की को ज़्यादा ही छूट दे रखी है. अरे बैडमिंटन, टेबल-टेनिस तक तो ठीक है, लेकिन हॉकी? उसमें तो आपस में भिड़ना पड़ता है, और वो भी मुसलमान लड़कों से’ ऐसा लगता था कि मुसलमान लड़कों से भिड़कर मुझे छूत का रोग लग जाएगा 🙂

हॉकी प्रैक्टिस पर मैं सुबह पाँच बजे चल देती थी. मेरे साथ कालोनी की एक और लड़की सुनीता भी जाती थी. उन्नाव जिले की खेल की टीमों के विषय में एक दिलचस्प आँकड़ा ये था कि वहाँ की हॉकी की टीम में मुसलमान लड़कों का प्रतिशत ज़्यादा था और क्रिकेट टीम में हिन्दुओं का. प्रैक्टिस पर आने वाले सारे बड़े-बड़े लड़के थे, जिनको हमलोग भाई कहकर बुलाते थे और वो लोग हमें ‘छोटी’ कहते थे. सिर्फ हमदोनों लड़कियाँ थीं और बाकी लड़के. इसलिए हमें ज़्यादा महत्त्व मिलता था 🙂 कुछ भाई लोगों के नाम तो मुझे अभी भी याद हैं. उरूज़ सर और नज़मी भाई तो हमारे स्कूल के कोच ही थे, इसके अलावा शिबली, सारिक और शाहिद भाई थे. केवल दो लड़के हमारे हमउम्र थे और उनका नाम कैसे भूल सकती हूँ 🙂 एक था शिब्बू और दूसरा राजू.

शिब्बू और राजू से मेरी कभी आमने-सामने बात नहीं हुयी, जबकि सुनीता बराबर बात करती थी. एक तो मैं वैसे ही थोड़ी संकोची और अंतर्मुखी स्वभाव की थी, दूसरे अपने हमउम्र लड़कों (खासकर शिब्बू, मुझे वो अच्छा लगता था 🙂 )से बात करने में और हिचकती थी. बचपन के साथियों की बात दूसरी थी. एक बार शिब्बू और राजू में शर्त लगी मुझसे बात करने की. हमलोग हॉकी प्रैक्टिस के बाद मैदान के बाहर एक बूढ़ी अम्मा की चाय की दुकान पर चाय पीते थे. हम चाय ही पी रहे थे शायद, शिब्बू कुछ देर मेरे पास आकर खड़ा रहा. और मैंने ज्यों पलटकर उसकी ओर देखा, वो भागकर राजू के पास बैठ गया. सबलोग हँसने लगे. जब मैंने प्रश्नवाचक दृष्टि से नज़मी भाई की ओर देखा, तो उन्होंने असल बात बतायी. मैंने मुस्कुरा भर दिया. पर बात नहीं की. कभी भी नहीं.

ओह! क्या मस्ती भरे दिन थे वे. जब खेल छूटा, तो सारे दोस्त भी छूट गए. नज़मी भाई अक्सर मुझसे कहते थे कि हाथ में स्टिक लेकर बिंदास चलने वाली लड़की को कोई छेड़ नहीं सकता. हाँ, हमारे हाथ में स्टिक होती थी, तो हममें एक अलग सा आत्मविश्वास भर जाता था. हम पूरा रेलवे स्टेशन क्रास करके अपनी कालोनी में आते थे. मुसाफिर अचरज भरी निगाहों से हमें देखते थे.

नज़्मी भाई मेरे हॉकी छोड़ने के बाद भी मुझसे मिलते रहते थे. मेरे घर भी आते-जाते थे. मुझे याद है कि चौरानबे में जब हम वैष्णो देवी घूमने गए थे, तो नज़मी भाई ने दीदी को सौ रूपये दिए थे प्रसाद चढ़ाने को. आपको शायद आश्चर्य होगा ये सुनकर कि उन्नाव के कुछ मुस्लिम लोगों की वैष्णो देवी में खासी श्रद्धा थी और वे लोग अक्सर वैष्णो देवी दर्शन के लिए भी जाते थे. खुद नज़मी भाई भी वैष्णो देवी होकर आये थे.

इस बरस उन्नाव गए हुए दस साल हो गए. आजकल नज़्मी भाई की बहुत याद आती है. जाने कैसे होंगे वो ?

बीते हुए दिन… फिर से नॉस्टेल्जिया

नॉस्टेल्जिया बड़ी अजीब सी चीज़ होती है। पता नहीं ये एक मानसिक स्थिति है या मानसिक विकार या बीमारी, लेकिन है अजीब। मुझे लगता है कि कुछ लोग प्रवृत्ति से ही अतीतजीवी होते हैं और ये उनकी बीमारी नहीं होती। या तो शौक होता है या फिर आदत या खुशफहमी कि वो दिन लौटकर आयेंगे, कभी न कभी। ये अलग बात है कि विस्मृति प्रकृति का वरदान है। यदि हमारे अन्दर भूलने की शक्ति न होती, तो हम अपनी ही यादों के बोझ तले घुट-घुटकर दम तोड़ देते या पागल हो जाते। भूलना ज़रूरी है, नई चीज़ें सीखने के लिए, लेकिन स्मृतियाँ भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं होतीं।

कुछ लोगों के लिए यादों का अलग ही मतलब होता है। वे अतीतमोही होते हैं और यादों में ही खुशी ढूँढ़ते रहते हैं। कुछ लोगों को यादें आ-आकर सताती हैं, लेकिन अतीतजीवी लोग तो यादों में ही चले जाते हैं। उनकी ज़िंदगी में अतीत घुस जाता है, वे अतीत में ही रहना पसंद करते हैं। ये सब उलट-पुलट तब चलती है, जब आप खाली बैठे हों और उससे भी अधिक तब, जब आप बेहद उदास अकेले लेटे हों अपने कमरे में और आपके पास परिवार के नाम पर एक कुत्ते के सिवा कोई भी पास न हो…यूँ तो बहुत लोग साथ होने का दावा करते हैं। और जबकि आपका अतीत, वर्तमान से कहीं अधिक हरा-भरा, चहल-पहल वाला और सुनहरा हो। तब यादें बहुत कीमती लगती हैं और आप अक्सर किसी अपने की याद में डूबे रहना चाहते हैं।

दो-तीन दिन से मुझे भी किसी की बहुत याद आ रही है। अम्मा-बाऊ की याद तो साथ रहती ही है, लेकिन इस मौसम में बसंत चाचा की बहुत याद आती है। बसंत पंचमी को उनका जन्मदिन होता है, जैसे बाऊ का कृष्ण जन्माष्टमी को। बाऊ के दोस्त थे बसंत चाचा। हालांकि बाऊ से सात-आठ साल छोटे होने के कारण उनको दद्दू कहते थे, लेकिन दोस्ती बराबर की थी। अम्मा को अपनी माँ मानते थे और अक्सर बाऊ की शिकायत अम्मा से करके बाऊ को डँटवाया करते थे। उनकी बदमाशियों के बारे में मैंने एक पोस्ट भी लिखी थी।

हमलोगों के लिए वो किसी भी तरह अम्मा-बाऊ से कम नहीं थे। जब हम भाई-बहनों से सम्बन्धित किसी निर्णय में अम्मा-बाऊ का एक-एक वोट होता, तो हम चाचा का इंतज़ार करते और अक्सर उनका वोट हमारे पक्ष में होता। मुझे याद है, जब हमारा स्कूल टेबल टेनिस की जिला प्रतियोगिता में जीता था। मैं टी.टी. टीम की मुख्य खिलाड़ी थी और मुझे डिस्ट्रिक्ट की ओर से मंडलीय प्रतियोगिता में लखनऊ जाना था। मैं पहली बार मंडलीय प्रतियोगिता में भाग लेने की कल्पना मात्र से बहुत उत्साहित और प्रसन्न थी। फॉर्म पर अभिभावक के हस्ताक्षर चाहिए थे। अम्मा मुझे बाहर भेजने के पक्ष में बिल्कुल नहीं थी। उनके अनुसार एक तेरह साल की लड़की को बिना माँ-बाप के कहीं नहीं जाना चाहिए। बाऊ की हाँ थी, लेकिन वो अम्मा के खिलाफ कभी नहीं जाते थे। उन्हें लगता था कि अम्मा उनसे ज्यादा समझती हैं, घर-परिवार के बारे में। मैं भी एक नंबर की ज़िद्दी। मेरा रोना-धोना चालू था कि दीदी ने इशारा किया चाचा को बुलाने का। मैं झट से स्टेशन गयी और रेलवे के फोन से चाचा को सन्देश भिजवा दिया। उन दिनों छोटे शहरों में घरों में फोन नहीं हुआ करते थे। रेलवे वाले स्टेशन के फोन से काम चला लिया करते थे। चाचा बगल के स्टेशन गंगाघाट में पोस्टेड थे और सन्देश मिलते ही ड्यूटी खत्म करके अगली गाड़ी से मगरवारा आ गए। उन्होंने अम्मा को बहुत समझाया कि ‘बिटिया अकेली नहीं होगी, तीन टीचर्स साथ जा रही हैं और दो चपरासी। फिर साथ में और लड़कियाँ भी तो होंगी।’ चाचा के आने से दीदी को भी साहस हुआ मेरी ओर से बोलने का और मुझे लखनऊ जाने की अनुमति मिल गयी।

ऐसे और ना जाने कितने ही किस्से हैं। जब उन्होंने अपना वोट हमलोगों के पक्ष में देकर हमारा हौसला बढ़ाया था। बाऊ के रिटायरमेंट के बाद हमलोग उन्हीं के क्वार्टर में एक साथ रहे। उनके तीन बेटे थे, जिनमें से एक गाँव में रहते थे और दो चाचा के साथ। चाचा के घर में बिताए दिन हमलोगों के लिए यादगार हैं। वैसे तो भईया लोगों का बचपन से हमारे घर में  आना-जाना लगा ही रहता था, लेकिन साथ रहने का अलग ही मज़ा था। पूरे घर में चार लड़के- दो चाचा के, एक हमारा भाई और एक हमारे चचेरे भाई, दो लड़कियाँ- मैं और दीदी और दो बाप- बाऊ और चाचा और माँ एक भी नहीं। पूरा हॉस्टल के जैसा माहौल होता था। भैय्या के दोस्त, दीदी के दोस्त और मेरी सहेलियाँ- दिन में कोई न कोई जमा ही रहता था। खूब पढ़ते थे। खूब टी.वी. देखते थे और ग्यारह बजे रात तक गप्पें भी मारते थे।

सबसे बड़ी बात, जो उस घर में थी वो ये थी कि दोनों बुजुर्गों को छोड़कर काम करने की ज़िम्मेदारी सभी पर बराबर थी। बुजुर्ग लोग बेचारे रात-दिन की ड्यूटी से ही हलकान रहते थे। मैं सफाई करती, दीदी खाने में सब्ज़ी बनातीं, तो भईया लोग बर्तन धोते और आटा गूँथते और रोटी सिंकवाते। एक दिन मेरे कज़िन और चाचा के मझले बेटे राजन भैया शायद आपस में बातें कर रहे थे या मैच देख रहे थे, याद नहीं, लेकिन दीदी बर्तन धो रही थीं। अचानक चाचा ड्यूटी से वापस घर आये। बिटिया को झौव्वा भर बर्तन माँजते देख आग-बबूला हो गए। भैय्या लोगों से बोले, “मुस्टंडों, तुम हट्टे-कट्टे बइठ के गप्पें मारि रह्यो और हमार बिटिया अकेले बर्तन मांज रही है। यही मारे तुम पंचन क खवा-पिया के इत्ता बड़ा कीन्हेंन  है।” भइय्या लोगन की तो सिट्टी-पिट्टी गुम। हडबड़ाकर उठे और “अरे दीदी बताईन ही नहीं” कहते हुए, दीदी को उठाकर झट से बर्तन धोने में जुट गए।

तो ऐसे थे हमारे बसंत चाचा। अभी अच्छी-अच्छी बातें लिख लीं, तो आगे लिखने का मन नहीं हो रहा है। आगे सारी दुःख भरी बातें हैं। हमारे उन्नाव छोड़कर आजमगढ़ अपने गाँव शिफ्ट होने की। इस बात से चाचा के डिप्रेशन में जाने की और फिर हमसे सदा के लिए बिछड़ जाने की। मुझसे नहीं कही जायेंगी वो बातें अभी। 2003 में चाचा भी हमें छोड़कर चले गए। उन्हें माउथ कैंसर हो गया था। इस गर्मी में उन्हें गए दस साल हो जायेंगे।

और अंत में ‘देवर’ फिल्म का ये गीत, जो मुझे उन दिनों की याद दिलाता है। रुलाता है, तड़पाता है, बेचैन करता है,  फिर भी बार-बार सुनती हूँ। कहा ना, किसी-किसी को अतीत में जीने की आदत होती है।

खुरपेंचें, खुराफातें…पीढ़ी दर पीढ़ी

जी, खुरपेंची होना हमारे बैसवारा की सबसे बड़ी विशेषता है. बड़े-बड़े लम्बरदार भी इससे बाज नहीं आते. बचपन से ऐसी खुराफातें देखकर बड़ी होने के बाद भी मैं इतनी सीधी (?) हूँ, इससे सिद्ध होता है कि वातावरण हमेशा ही आपके ऊपर ‘बुरा’ असर नहीं डालता 🙂

मेरे बाऊ के दोस्त बसंत चाचा, उम्र में बाऊ से सात-आठ साल छोटे थे और उन्हें ‘दद्दू’ कहते थे, लेकिन थे दोनों पक्के लँगोटिया यार. चाचा के तीन लड़के ही थे, इसलिए हम दोनों बहनों को अपनी बेटी की ही तरह मानते और बाऊ से ज्यादा लाड़ करते थे. अम्मा अक्सर उनकी बदमाशियों के किस्से सुनाती थीं. बाऊ कभी-कभी पान खाते थे और जब खाते, तो घंटों उसे मुँह में चुलबुलाते रहते थे. जितनी देर पान उनके मुँह में रहता था, सबकी बातों का जवाब चेहरा थोड़ा ऊपर करके ‘हूँ-हाँ-उहूँ’ में दिया जाता था. बसंत चाचा बाऊ की इस आदत से तंग रहते थे. एक दिन वो बाऊ से कुछ पूछ रहे थे और वो इसी तरह जवाब दिए जा रहे थे. चाचा को गुस्सा आया तो उन्होंने दोनों हाथों की मुट्ठियाँ बनाकर बाऊ के फूले गालों के ऊपर जड़ दिया. अब क्या था! पान की पीक चाचा की सफ़ेद कमीज़ के ऊपर. पूरी कमीज़ ‘छींट लाल-लाल’ हो गयी 🙂 चाचा को मौका मिला. दौड़कर घर के अन्दर आये और अम्मा से बोले, “देखो भाभी, दद्दू का कीन्हेंन” अम्मा गुस्से में आकर बाऊ को बडबडाने लगीं. अभी आधी पीच बाऊ के मुँह के अन्दर थी, तो बेचारे अपनी सफाई में कुछ बोल ही नहीं पा रहे थे. मुँह ऊपर करके जो भी बोलने की कोशिश करते थे, अम्मा को समझ में नहीं आता. वैसे भी अम्मा गुस्से में आती थीं, तो किसी की नहीं सुनती थीं. जितनी देर में बाऊ पान की पीक थूककर आते, उनकी क्लास लग चुकी थी. और चाचा खड़े-खड़े मुस्कुरा रहे थे.

जब अम्मा को पूरी बात पता चली, तो वो भी मुस्कुरा उठीं. अम्मा ने बड़ी कोशिश की उस पान की पीक का दाग छुड़ाने की, पर वो पूरी तरह नहीं छूटी. हल्का-हल्का दाग उस पर रह ही गया. चाचा तब भी अक्सर वो कमीज़ पहनकर घर आते थे और जब कोई पूछता कि ये दाग कैसे लगा, तो मुस्कुरा के कहते, “दद्दू पान खाकर थूक दिए रहेन”

चाचा की बहू यानी हमारी भाभी (वही जिन्होंने ‘नखलउवा’ का किस्सा सुनाया था) घूंघट नहीं निकालती थीं. कभी-कभी सर पर पल्ला रख लेती थीं बस. गाँव में अडोस-पड़ोस की औरतें इस बात से बहुत नाराज़ रहती थीं. एक दिन राजन भैय्या (चाचा के दूसरे नम्बर के लड़के यानि भाभी के देवर ) ने किसी की बात सुन ली और कहने लगे ‘हमरी भाभी कौनो पाप किये हैं का, जो मुँह छिपावत फिरैं’ ल्यो भाई इहौ कौनो कारन भवा घूंघट न करे का 🙂

तीसरी पीढ़ी यानि चाचा की पोती रूबी बड़ी प्यारी बच्ची थी. घर की इकलौती बेटी थी, सबकी दुलारी. अक्सर घर में सबलोग उसे चिढ़ाया करते थे कि “का करिहो पढ़ि-लिखि के, तुमका बटुइयै तो माँजे क है” जैसा कि आमतौर पर गाँवों में लड़कियों को चिढ़ाया जाता है. रूबी का पढ़ने में बहुत मन भी नहीं लगता था. धीरे-धीरे उसके नम्बर कम आने लगे. एक दिन चाचा ने गुस्से में आकर कहा कि ‘रूबी मन लगाकर क्यों नहीं पढ़ती?’ रूबी जी हाथ चमकाकर बोलीं, “बाबा, का करिबे पढ़ि-लिखि के, हमका बटुइयै तो माँजे क है” चाचा शॉक्ड. तुरंत घर के सदस्यों की ‘अर्जेंट मीटिंग’ बुलाई गयी और सबको अल्टीमेटम दिया गया कि आगे से किसी ने बिटियारानी को ऐसी बातें कहकर चिढ़ाया तो उसे घर से निकाल दिया जाएगा.

चाचा तो अब इस दुनिया में नहीं हैं,बाऊ के जाने से पहले ही चले गए. दस साल से भाभी और रूबी से मिलना नहीं हुआ. मैं याद करती हूँ सबको. बहुत याद करती हूँ. क्या खुशगवार मौसम था उन दिनों! हँसी-मज़ाक, टांग-खिंचाई, खुराफातें, खुरपेंचें…चाचा की आज बहुत याद आ रही है. पर इत्मीनान है कि बाऊ और चाचा दोनों दोस्त मिलकर ऊपर अम्मा की खिंचाई कर रहे होंगे और आज तो पक्का चाचा को हिचकी आ रही होगी 🙂

अँगीठी पर भुने भुट्टे और स्टीम इंजन के दिन

बचपन अलग-अलग मौसमों में अलग खुशबुओं और रंगों के साथ याद आता है। डॉ॰ अनुराग के एक अपडेट ने यादों को क्या छेड़ा, परत दर परत यादें उधड़ती गयीं, जिंदगी के पन्ने दर पन्ने पलटते गए। जैसे बातों से बातें निकलती हैं, वैसे ही यादों से यादें। अब बरसात का मौसम है, तो भुट्टे याद आये, भुट्टे याद आये तो अँगीठी याद आयी, फिर कोयला याद आया, फिर स्टीम इंजन और दिल बचपन की यादों में डुबकियाँ लगाने लगा। बहुत से छूटे हुए शब्द याद आये। बचपन के रहन-सहन का तरीका याद आया। तब की बातें सोचती हूँ और आज को देखती हूँ, तो लगता ही नहीं है कि ये वही दुनिया है… वो दुनिया सपने सी लगती है।

तब छोटे शहरों में खाना मिट्टी के तेल के स्टोव पर या अँगीठी पर बनता था। तब तक वहाँ तक गैस सिलेंडर नहीं पहुँचा था। रेलवे कालोनी के तो सारे घरों में कोयले की अँगीठी पर ही खाना बनता था क्योंकि स्टीम इंजन की वजह से कोयला आराम से मिल जाता था। कच्चा कोयला भी और पक्का कोयला भी।पक्का कोयला आता कहाँ से था, ये शायद नए ज़माने के लोग नहीं जानते होंगे। स्टीम इंजन में इस्तेमाल हुआ कोयला भी आधा जलने पर उसी तरह खाली किया जाता था, जैसे अंगीठी को खोदनी से खोदकर नीचे से खाली करते थे, जिससे राख और अधजला कोयला झड़ जाय और आक्सीजन ऊपर के कोयले तक पहुँचकर उसे ठीक से जला सके।.. इंजन के झड़े कोयले को बीनकर बेचने के लिए रेल विभाग ठेके देता था। बड़े रेलवे स्टेशनों का तो नहीं मालूम, पर छोटे स्टेशनों पर किसी एक ठेकेदार की मोनोपली चलती थी। उस ‘पक्के कोयले’ का इस्तेमाल अँगीठी को तेज करने में होता था और सबकी तरह हमलोग भी किलो के भाव से इसे ठेकेदार से खरीदते थे। बाऊ प्लास्टिक के बोरे में साइकिल के पीछे लादकर इसे घर लाते थे… … आजकल की पीढ़ी ने अपने पापा को साइकिल चलाते देखा है क्या?

बरसात में ये कोयला बड़े काम आता था क्योंकि अक्सर लकड़ी सीली होने के कारण कच्चा कोयला मुश्किल से जलता था। लकड़ी ? अँगीठी सुलगाने के लिए उसके अन्दर पहले लकड़ी अच्छे से जला ली जाती थी, उसके बाद कोयला डाला जाता था।  रेलवे ट्रैक के बीच में पहले पहाड़ की लकड़ी के स्लीपर बिछाये जाते थे, वही खराब होने पर जब निकलते थे, तो रेलवे कर्मचारी सस्ते दामों पर अँगीठी के लिए खरीद लेते थे। ये लकड़ी अच्छी जलती थी और जलते समय उसमें से एक तारपीन के तेल जैसी गंध आती थी। अम्मा या दीदी कुल्हाड़ी से काटकर उसके छोटे-छोटे टुकड़े करती थीं। कितनी मेहनत लगती रही होगी उसमें, मैं नहीं जानती। मैं बहुत छोटी थी, केवल देखती थी। कोयला और लकड़ी आँगन में रखे जाते थे और बरसात में भीग जाते थे। इसलिए बरसात में अँगीठी सुलगाने में बहुत मुश्किल होती थी। जब अँगीठी काम लायक सुलग जाती थी, तो उसे अँगीठी आना कहते थे। तब उसे उठाकर बरामदे में रखा जाता था और उस पर अम्मा भुट्टे भूनती थीं। जब आँगन में झमाझम बारिश होती थी, तब हमलोग बरामदे में अम्मा के चारों ओर बैठकर अपने भुट्टे के भुनने का इंतज़ार करते थे…अभी तो न जाने कितने सालों से आँगन नहीं देखा और ना ही अम्मा के हाथ से ज्यादा अच्छा भुना भुट्टा खाया है… …!

मेरे बाऊ रेलवे क्वार्टर के सामने की जगह को तार से घेरकर क्यारी बना देते थे और उसमें हर साल भुट्टा बोते थे। कभी-कभी तो इतना भुट्टा हो जाता था कि उसे सुखाकर बाँधकर छत पर लगी रॉड में बाँधकर लटका दिया जाता था। फिर हमलोग कभी-कभी उसके दाने छीलकर अम्मा को देते थे और वो लोहे की कड़ाही में बालू डालकर लावा भूनती थीं। एक भी दाना बिना फूटे नहीं रहता था। भुट्टे के खेतों में तोते बहुत नुक्सान करते थे जिस दिन हमारी छुट्टी होती थी, हम सारा दिन तोते भगाते रहते थे 🙂

आज की पीढ़ी ने स्टीम इंजन चलते नहीं देखा। उसके शोर को नहीं सुना। उसके धुएँ से काले हो जाते आसमान को नहीं देखा। बहुत सी और यादें हैं, और भूले हुए शब्द। अनेक लोहे के औजार बाऊ अपने हाथों से बनाते थे और उस पर ‘टेम्पर’ भी खुद ही देते थे। संडसी, बंसुली, खुरपी, कुदाल, फावड़ा, नहन्न्नी, पेंचकस, कतरनी, गँड़ासी, आरी, रेती ... इनके नाम सुने हैं क्या? या सुने भी हैं तो याद हैं क्या?

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