आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

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झूमना अंतरिक्ष में नक्षत्रों के बीच

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तुमसे मिलना है फूलों की घाटी में होना,
असंख्य पुष्पों की हज़ारों खुशबुओं और सैकड़ों रंगों के बीच डूब जाना,
ढाँप लेना मुँह को शीतल परागकणों से,
घास के मखमली कालीन पर लोट लगाना….
ताकना तुम्हारी आँखों में, गहरे नीले आसमान को …

तुमसे मिलना है झूमना अंतरिक्ष में नक्षत्रों के बीच
हलके और भारहीन होकर,
बिना आक्सीजन के भरना गहरी आहें,
बर्फ से भी कहीं ठन्डे अंतरिक्ष में
गर्मी तुम्हारे प्यार की…

तुमसे मिलना अथाह समुद्र में गोते लगाने सा है…
उस जगह पहुँचना, जहाँ दिखते हैं -अनदेखे रंग-बिरंगे जीव,
धुँधली सी रोशनी, थोड़ी गर्मी, हल्की सिहरन,
अतुलनीय दबाव में घुटता है दम
और रंगीन बुलबुले आने नहीं देते ऊपर…

तुमसे मिलना खो जाना है जंगल में,
चारों ओर -घना-काला घुप्प अँधियारा,
कँटीली झाडियों की चुभन, हरीतिमा की महक,
वहाँ से जाते हैं सारे रास्ते तुम्हारी तरफ
कोई रास्ता लौटकर नहीं आता…

तुमसे मिलना है स्वयं से ‘स्व’ का मिलना
जीवन में पहली बार खुद से प्यार हुआ।

दीवाने लोग

दीवाने लोग पड़ ही जाते हैं अक्सर किसी न किसी के प्यार में
अफ़सोस ये कि जिससे प्यार है, उसे पता ही नहीं,
जाने क्या मिलता है और जाने क्या खो जाता है,
रात आती है, मगर नींद गुमशुदा है कहीं,
जागकर लिखते हैं कुछ-कुछ डायरी में दीवाने
दूसरे ही पल काटकर उसे, लिखते हैं फिर मिटाते हैं
बंद कर डायरी या फिर, लेट जाते हैं मुँह ढँककर
देखते हैं अँधेरे में कभी एकटक सामने की दीवार,

कट जाती है यूँ ही हर रात नींद के इंतज़ार में
दीवाने लोग जब भी पड़ जाते हैं किसी के प्यार में।
*** ***

3341375526_a6d60049d5काश कोई लौटा पाता वो पल, जब देखा था पहली बार तुम्हें
कि चीज़ें सभी उलट-पुलट हो गयीं है तभी से
रातें रतजगा कराने लगीं, दिनों पर पड़ गया मनों बोझ,
कुछ और आता नहीं दिमाग में तुम्हारे सिवा
मासूम छलिये,
ये तुमने क्या किया अनजाने में?
या कि जानबूझकर ?
नहीं तो नज़रें चुराकर देखते क्यों रहे बार-बार
और नज़र मिलने पर यूँ देखा दूसरी ओर, ज्यों कुछ हुआ ही नहीं,
तुम्हारी हर नज़र धंस गयी है सीने में काँटों की तरह
अब वहाँ अनगिनत काँटे हैं और असह्य चुभन

नहीं सोचा था उम्र के इस मोड़ पर भी हुआ करता है दीवानों सा प्यार
काश कोई लौटा पाता वो पल, जब देखा था तुम्हें पहली बार।
*** *** ***
जानती हूँ तुम्हारी कविताओं में मेरा ज़िक्र नहीं होता
जाने क्यों ढूँढती फिरती हूँ उन शब्दों में अपनी गुंजाइश,

मासूम छलिये, ये तुम अच्छा नहीं करते
कि प्यार से भरे शब्द यूँ उछाल देते हो अपने दीवानों में
ज्यों कोई शादी में उछाल देता है गरीबों में सिक्के,
गरीब टूट पड़ते हैं सिक्कों पर, दीवाने शब्दों पर
कि शब्द कीमती हैं उनके लिए सिक्कों की तरह,
वो ढूँढते हैं उनमें अपने होने का अर्थ-
कहीं कोई ज़िक्र, कोई हल्का सा इशारा कि तुमने याद किया
भूले से भी कौंधा तुम्हारे ज़ेहन में उनका नाम कभी,
दीवाने ढूँढते हैं और निकाल ही लेते हैं कोई अर्थ अपने मतलब का,

मासूम छलिये,
यूँ अपने दीवानों का तमाशा बनाना अच्छा है क्या?

घर और महानगर

घर

(१.)
शाम ढलते ही
पंछी लौटते हैं अपने नीड़
लोग अपने घरों को,
बसों और ट्रेनों में बढ़ जाती है भीड़
पर वो क्या करें ?
जिनके घर
हर साल ही बसते-उजड़ते हैं,
यमुना की बाढ़ के साथ.

(२.)
चाह है एक छोटे से घर की
जिसकी दीवारें बहुत ऊँची न हो,
ताकि हवाएँ बेरोक-टोक
इधर से उधर आ-जा सकें.

*** *** ***

महानगर

(१.)
मन घबराता है,
समझ में नहीं आता कहाँ जायें ?
महानगर के आकाश में
चाँद भी साफ नहीं दिखता,
जिसे देखकर कोई
कविता लिखी जाये.

(२.)
छोटे शहरों में
छोटी-छोटी बातें भी
बड़ी हो जाती हैं
महानगरों में,
बड़ी बातों पर भी
ध्यान नहीं देता कोई.


एक सुबह, एक शाम, एक रात

एक सुबह,
बांस की पत्ती के कोने पर अटकी
ओस की बूँद
कैद कर ली थी
आँखों के कैमरे में
आज भी कभी-कभी वो
बंद पलकों में
उतरती है,
… …
एक शाम,
पक्षियों के कलरव को
सुना था बैठकर
छत की मुंडेर पर,
जिसकी धुन
मन में अब भी
जलतरंग सी
बजती है,
… …
एक रात
तुम्हारी तपती हथेलियों का स्पर्श
महसूस किया था
अपने गालों पर,
कानों के नीचे वो छुअन
आज भी
धधकती है,
… …
नहीं सही आज
वो सुबह, वो शाम, वो रात,
वो ओस,वो पंछी,
वो तुम्हारी छुअन
पर उनकी यादें अब भी
सीने में
करकती है.

(photo by fotosearch.com)

गुनगुनी धूप

गुनगुनी धूप
कल उतरी मेरी बालकनी में,
जैसे अम्मा ने
हौले से
दुलार दिया हो मुझे,
इससे पहले तो
धूप में
न था इतना अपनापन …
क्या भेजा है कोई संदेश
उसने स्वर्ग से?

अवसाद-२ (साँझ की धूप)

धान के खेतों पर
दूर तक फैली,
थकी, निढाल पीली-पीली
साँझ की धूप,
आ जाती है खिड़की से
मेरे कमरे में,
और भर देती है उसे
रक्ताभ पीले रंग से,
… …
इस उदास पीले रंग की
अलौकिक आभा से
मिल जाता है
मेरे उदास मन का पीला रंग,
और चल देता है
मेरा मन
साँझ की धूप के सहारे
एक अनन्त यात्रा की ओर,
यह निर्जन स्थान
शायद सूरज है या
आकाश का दूसरा छोर,
जहाँ चारों ओर
प्रकाश ही प्रकाश है…
स्वर्णिम पीला प्रकाश,
… …
मैं आँखे खोलती हूँ
और पाती हूँ अपने आपको
अपने कमरे में
जहाँ अब…
अंधेरा फैल चुका होता है,
अपना चेहरा देखती हूँ
आईने में,
मेरी आँखें उदास और थकी हैं,
उनमें पीलापन है
शायद… …
साँझ की धूप का पीलापन…

अवसाद-1 (अकेलापन)

अखरने लगता है अकेलापन
शाम को…
जब चिड़ियाँ लौटती हैं
अपने घोसलों की ओर,
और सूरज छिप जाता है
पेड़ों की आड़ में,
मैं हो जाती हूँ
और भी अकेली.
… …
मैं अकेली हूँ…
सामने पेड़ की डाल पर बैठे
उस घायल पक्षी की तरह,
जो फड़फड़ाता है पंख
उड़ने के लिये
पर… उड़ नहीं पाता,
और हताश होकर
बैठ जाता है शांत,
… …
अचानक कोई आहट हुई
मैं उठ बैठी,
शायद… दरवाजे पर कोई है
नहीं…वहाँ कोई नहीं…
कोई भी नहीं,
… …
मैं लेट जाती हूँ वापस
बिस्तर पर,
और फिर देखने लगती हूँ
खिड़की के बाहर
उस पक्षी को,
जो उसी डाल पर बैठा
सूनी नज़रों से
ताक रहा है आकाश को…
(photo by fotosearch.com)

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