आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

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फूलों वाले कुर्ते

एक लड़की थी. सीधी-सादी सी, जैसी कि अमूमन प्रेम कहानियों में नायिकाएँ हुआ करती हैं- किशोरावस्था को पारकर यौवन की दहलीज पर पाँव रखने वाली, सपनों और उन्हें पूरा करने के जोश से भरी हुयी. एक लड़का था. नौजवान, सजीला और प्रेम-कहानियों के नायकों की तरह ही शरीफ.

लड़की जब लड़के के घर के सामने से निकलती, तो लड़का बैडमिंटन खेल रहा होता और अक्सर उसे देखने के चक्कर में या तो रैकेट को हवा में घुमा देता या इतनी जोर से मारता कि शटल बाहर जा गिरती. लड़की में ऐसा कुछ खास नहीं था कि उसे एक नज़र में चाहने लगा जाय, लेकिन प्रेम की केमिस्ट्री अलग ही होती है, क्या पता कब किससे मिल जाय?

लड़के को लड़की अच्छी लगती थी. वो उसको देखता था और इसका एहसास उसके दोस्तों के साथ-साथ लड़की को भी हो गया था. लड़की को भी लड़का अच्छा लगता था, इसका पता किसी को न था. फिर एक दिन लड़के ने साहस करके उससे उसका नाम पूछ ही लिया…फिर जैसा कि और प्रेम-कहानियों में होता है, उनमें दोस्ती हो गयी.

लड़की ने बताया कि वह छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने जाती है और खुद भी प्राइवेट बी.ए. कर रही है. और कुछ लड़के ने पूछा नहीं और लड़की ने बताया नहीं. लड़का बी.एस.सी. एजी कर रहा था और कॉलेज की ओर से बैडमिंटन खेलता था.  लड़के ने ये खुद बताया, लड़की ने पूछा नहीं.

लड़की ट्यूशन पढ़ाकर घर लौटते समय लड़के के घर के सामने वाले पार्क में रुकती, जहाँ लड़का इंतज़ार कर रहा होता. फिर दोनों खूब ढेर सारी बातें करते. लड़के को बारिश बहुत पसंद थी. सोंधी-सोंधी मिट्टी की खुशबू, मोर का नाचना, पेड़ के पत्तों का धुलकर ताजा हो जाना, अपने घर के बरामदे में बैठकर बारिश देखना और पकौड़े खाना लड़के को बहुत अच्छा लगता था. लड़की को बारिश नहीं पसंद थी. उसे नहीं अच्छा लगता जब पानी में भीगकर कांपते हुए परिंदे सिर छुपाने को ओट ढूँढते फिरते हैं. लड़की की इस बात पर लड़का खूब हँसता था. लड़की को बसंत पसंद था क्योंकि उस समय खूब फूल खिलते हैं.

लड़की को फूल कुछ ज़्यादा ही पसंद थे. वो रोज़ अपने कुर्तों पर तरह-तरह के फूल काढ़ा करती थी. लड़का उससे पूछता कि ये बेतरतीब से क्यूँ हैं, तो वो बताती कि उसे इस तरह बेतरतीब फूल अच्छे लगते हैं. यूँ लगता है मानो अभी-अभी डाली से टूटकर उसके कुर्ते पर बिखर गए हों. लड़के को उसकी बातें बहुत अच्छी लगतीं. उसे ये भी अच्छा लगता कि लड़की गुणी है और अच्छी सिलाई-कढ़ाई कर लेती है.

लड़का, अपनी बातों में कुछ ज़्यादा ही आगे निकल जाता और भविष्य की योजनाएं बनाने लगता. हम एक छोटा सा घर बनाएँगे. ये करेंगे, वो करेंगे. तब लड़की चुप होकर लड़के का चेहरा देखा करती. कभी-कभी वो डर जाती और कभी उसे लगता कि वो सिंड्रेला है और लड़का उसका राजकुमार. लड़के ने लड़की से अपने बारे में सब कुछ बता दिया था कि वह अपने माँ-बाप का इकलौता लड़का है. गाँव में उनकी अच्छी-खासी ज़मीन है. उसके ताऊ ज़मींदार और गाँव के प्रधान हैं. लड़का खेती की बातें करता और कहता कि एग्रीकल्चर की पढ़ाई करके वो बहुत अच्छे से खेती करेगा. लड़की बहुत कुछ सोचती, लेकिन बताती नहीं.

एक दिन लड़की फूलों वाले कुर्ते की जगह नया कुरता पहनकर आयी और खुश होकर बताया कि उसने ट्यूशन के पैसों से नए सूट सिलवाए हैं और अब उसे वो फूलों वाले कुर्ते नहीं पहनने पड़ेंगे. लड़का नाराज़ हो गया. उसने लड़की से वही कुर्ते पहनकर आने को कहा. उसने लड़की को बताया कि उन कुर्तों की वजह से ही तो सबसे अलग दिखती है. वो उससे ज़िद करने लगा कि कल से वही कुर्ते पहनकर आये. लड़की उसके इस व्यवहार से दंग रह गयी. उसने तो सोचा था कि लड़का तारीफ़ करेगा, लेकिन ये तो उल्टे नाराज़ हो गया.

लड़की बहुत भारी मन से वापस लौटी. वो लड़के को कैसे बताए कि उसके कुर्तों के वो फूल, फूल नहीं थे, पैबंद थे, जो वो कपड़ों के फटने पर की गयी रफू को छुपाने के लिए काढ़ दिया करती थी. वो कैसे बताए कि उसके पिता की लंबी बीमारी और मृत्यु के बाद उसकी माँ पाँच बच्चों को किस-किस तरह से पाल रही थी? वो कैसे बताए कि वो कुर्ते, जिन्हें वो इतने खूबसूरत मान रहा है, अब इतने जर्जर हो चुके हैं कि कभी भी फटकर तार-तार हो सकते हैं. वो कैसे बताए कि उन कुर्तों पर अब इतनी जगह भी नहीं बची कि और फूल काढ़े जा सकें.

लड़की को अचानक ये एहसास हुआ कि वो सिंड्रेला नहीं है. और उसने अपना रास्ता बदल दिया.

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बीमारी

सुयश जॉगिंग करते हुए लगातार ऋचा के बारे में सोच रहा था. पिछले कुछ दिनों से वो बीमार सी दिख रही थी. हमेशा खिले-खिले चेहरे वाली तेज-तर्रार लड़की अचानक से निश्तेज लगने लगी थी. सुयश ने कई बार सोचा कि पूछे क्या बात है? उसे कोई परेशानी तो नहीं है, लेकिन हिम्मत नहीं जुटा पाया. जाने क्यों वो लड़की अपने आस-पास एक खोल बनाकर रखती है, जिसके अन्दर कोई प्रवेश नहीं पा सकता. वो कभी-कभी सोचता है कि इतना जिद्दी और खुद्दार भी नहीं होना चाहिए. अरे, अकेली रहती है, अपने पड़ोसी से कभी-कभार तो मदद माँग ही सकती है. लेकिन नहीं, बेकार का स्वाभिमान. अपना सारा काम अकेले करेगी. बीमार है, लेकिन मदद नहीं लेगी…सुयश को गुस्सा आने लगा था ‘जाने कुछ लड़कियाँ अपने-आप को क्या समझती हैं. उसके दोस्तों की गर्लफ्रेंड्स तो सारा काम करवा लेती हैं, पर ये लड़की किसी और ही मिट्टी की बनी हुयी है.’

2677419199_77bbabd9acवो दौड़ते-दौड़ते रुक गया. स्ट्रेचिंग करते हुए उसे ऋचा का फिर ध्यान आया. अगर वो उसकी जगह होता, तो क्या करता? एक अजनबी लड़के से मदद लेता? नहीं, वो भी नहीं लेता. लेकिन वो अजनबी कहाँ रहे अब? दो साल हो गए पड़ोसी बने हुए. कितनी बातें तो करती है, बेहिचक, बिंदास. हमेशा हँसकर मिलती है. पूरी बिल्डिंग में सभी तो उसे पसंद करते हैं. मिलनसार लड़की…बस कोई मदद नहीं लेती किसी से भी.
पर उसने भी तो कभी उससे पूछा नहीं. लेकिन पूछता भी कैसे? पुरुष अहंकार जो आ जाता है सामने. वो किसी से कम है क्या? फिर अगर ऋचा ने उसको ‘चीप टाइप’ का लड़का समझ लिया तो. एक बार सोसाइटी के गेट पर एक छोटे से एक्सीडेंट के बाद फोन नम्बर भी तो दिया था उसे. ज़ोर की मोच आयी थी लड़की को. लेकिन लड़की ने गलती से कभी एक मेसेज भी नहीं किया. हुँह, घमंडी कहीं की…

पर वो इतना सोच क्यों रहा है उसके बारे में? क्या वो भी सोचती होगी? बातें तो प्यार से करती है. हँसी-मज़ाक भी कर लेती है. इतनी बार चाय भी पी चुके हैं दोनों साथ, उसकी बालकनी में. उसकी मुस्कान कितनी प्यारी लगती है. पर उसने एक बार भी ऐसा कोई हिंट नहीं दिया, जिससे ये पता चले कि वो सुयश के बारे में सोचती क्या है?

दो दिनों से कितनी बेहाल लग रही है. ऑफिस जाते हुए और वापस आते हुए, रोज़ ही तो मिलती है. दोनों का ऑफिस टाइम एक ही है. नहीं सुयश का ऑफिस थोड़ी देर से होता है, लेकिन उसके साथ जाने के लिए वो थोड़ा पहले निकल जाता है. वो पसीना पोंछते हुए मुस्कुराया…आज तक किसी लड़की के लिए इतनी ज़हमत नहीं उठायी उसने. अब इस उम्र में टीनेज़र्स जैसा उत्साह रहता है रोज़ ऋचा का चेहरा देखने के लिए. लेकिन उसका चेहरा, इतना बेनूर क्यों दिख रहा है…आज तो ऑफिस भी नहीं गई. क्या हुआ है उसे?

सुयश बेचैन हो गया. उसे पूछना चाहिए कि ऋचा को किसी चीज़ की ज़रूरत तो नहीं है. ठीक है, इसलिए नहीं कि वो अच्छी लगती है, एक पड़ोसी के नाते सही…सुयश ने फोन की ओर हाथ बढ़ाया कि स्क्रीन पर एक अनजान नम्बर फ्लैश हो रहा था. “हैलो” “हाई, सुयश?” ये तो ऋचा की आवाज़ है. सुयश के पूरे शरीर में एक सिहरन सी दौड़ गयी.

“हाँ, मैं सुयश. आप कौन?” उसने जानबूझकर अनजान बनते हुए पूछा.
“…म् मैं ऋचा”
“अरे ऋचा, क्या बात है?”
“सुयश, वो चार-पाँच दिन से मेरी तबीयत ठीक नहीं है”
“अरे, तुमने बताया क्यों नहीं. बोलो डॉक्टर के यहाँ चलना है क्या?”

“नहीं…डॉक्टर को मैंने दिखा दिया. डेंगू है शायद. बहुत वीकनेस लग रही है. तुम एक काम करोगे प्लीज़.”

“अरे, बिल्कुल, तुम बोलो तो.”
“एक दूध का पैकेट लेते आना ग्राउंड से आते समय. और ब्रेड का पैकेट भी. मैं तुमसे नहीं कहती…लेकि…”
“अरे, कोई बात नहीं. आखिर पड़ोसी हूँ तुम्हारा.”

“और प्लीज़, अपने कुक से मेरे लिए खिचड़ी बनवा देना…वो…”

“बिल्कुल…बिल्कुल. तुम चिन्ता मत करो. आकर मिलता हूँ तुमसे.”

“ठीक है…आ जाओ” ऋचा ने फोन रख दिया.

सुयश के चेहरे पर एक मीठी सी मुस्कान थी. कोई बीमार है? भला कभी किसी की बीमारी से कोई इतना खुश हुआ करता है…भला हो डेंगू फैलाने वाले मच्छर का. सुयश मुस्कुराते हुए ग्राउंड से बाहर चल पड़ा- दूध का पैकेट लेने. उसके कान में ऋचा का बोला आख़िरी शब्द गूंज रहा था- “आ जाओ.”

चाकू (एक कहानी )

किसी शहर में एक लड़की अपने पिता के साथ रहती थी. लड़की का पिता था तो किसी फैक्ट्री में चौकीदार, पर उसे लोहारगिरी का शौक था.  वो तरह-तरह के औजार और हथियार बनाता रहता. कुल्हाड़ी, फावड़े, छेनी, हथौड़ी, आरी और तरह-तरह के चाकू.  कुछ छोटे, कुछ बड़े, कुछ लकड़ी के बेंट वाले, कुछ लोहे के, कुछ सीधे, तो कुछ मुड़ने वाले चाकू. लोग कहते थे कि किसी ज़माने में वो जाना-माना चाकूबाज था और पहलवानी भी करता था, इसीलिये उसे आसानी से चौकीदार की पक्की नौकरी मिल गयी थी. लड़की अपने पिता के बनाए चाकुओं को देखकर ललचाती रहती थी. खासकर उसे एक लकड़ी के बेंट वाला मुड़ने वाला (फोल्डिंग) चाकू बेहद पसंद था. वो सोचती थी कि उसके पिता उसे चाकू दें, तो अपनी सहेलियों को दिखायेगी कि वो कितने अच्छे कारीगर हैं. पर जब भी वो माँगती उसका पिता उसे टाल देता. वो चाहता था कि उसकी इकलौती बेटी पढ़ने में मन लगाए.

एक दिन लड़की बिल्कुल ‘चंद खिलौना लैहों’ वाले अंदाज़ में जिद कर बैठी,   “बप्पा, हमें वो मुड़ने वाला चाकू दे दो ना” “पर बिट्टो, तू उसका करेगी क्या?” पिता ने पूछा तो बोली, “बदमाशों को मारूँगी” पिता बड़ी देर तक हँसता रहा, फिर पूछा, “और बदमाश ने तुम्हारी चाकू छीनकर तुम्हें ही मार दिया तो?” लड़की कोई जवाब नहीं दे पायी. उसके पिता ने कहा, “बेटा, हथियार से ज्यादा अपने हौसले पर, अपनी हिम्मत पर भरोसा करना चाहिए. अगर तेरे पास हिम्मत है, तो तू दुश्मन का हथियार छीनकर उसे मार देगी और हिम्मत नहीं है, तो वही तेरा हथियार छीन लेगा.” लड़की को कुछ समझ में नहीं आया. उसने सोचा चाकू तो दिखता है. ये हौसला और हिम्मत कहाँ रहते हैं? जब दिखते ही नहीं तो इन पर कैसे भरोसा करें? उसे लगा उसके पिता फिर उसे टाल रहे हैं, पर पिता ने उसे चाकू दे दिया. लड़की खुश हो गयी.

लड़की हमेशा उस चाकू को अपने पास रखती. यहाँ तक कि चुपके से बस्ते में डालकर स्कूल भी ले जाती थी. पर डाँट पड़ने के डर से अपनी एक-दो सहेलियों के अलावा और किसी को नहीं बताती थी. उसे उस चाकू से बड़ा लगाव था. उसे वो अपना रक्षक समझने लगी थी.

ऊँचे क्लास में पहुंचने के साथ ही लड़की को ट्यूशन भी करना पड़ा. उसे वहाँ से लौटने में देर होती, तो उसका पिता चिंतित हो जाता. इस पर लड़की पिता को बच्चों की तरह बहलाने की कोशिश करती कि अगर कोई बदमाश उस पर हमला करेगा तो उसे चाकू मार देगी. उसका पिता उसके इस भोलेपन पर हँसकर रह जाता. पर लड़की का यही भोलापन  और बचपना उसके पिता की चिंता बढ़ा देता था.

एक दिन ट्यूशन से लौटते हुए लड़की को देर हो गयी. सर्दियों की शाम थी. सारी गलियाँ अँधेरे में डूब गयीं. लड़की ने घर जल्दी पहुँचने के लिए एक छोटा संकरा रास्ता पकड़ा, जो कि काफी सुनसान रहता था. वहीं दो शोहदों ने लड़की को घेर लिया और गंदे-गंदे फिकरे कसने लगे. लड़की बुरी तरह से डर गयी. उसके हाथ-पाँव सुन्न पड़ गए. मारे डर के उसके गले में चीख भी अटक गयी.  अचानक उसे चाकू का ध्यान आया. पर ज्यों ही उसने चाकू निकालने के लिए बैग में हाथ डाला, एक शोहदे ने उससे बैग छीनकर फ़ेंक दिया और दूसरे ने धक्का देकर उसे गिरा दिया. लड़की का सर ज़मीन से टकराया तो एक पल के लिए आँखों के सामने अँधेरा छा गया. उसी अँधेरे में उसे अपने पिता का चेहरा दिखा और उनके शब्द कानों में गूँज गए, “बेटा, हथियार से ज्यादा अपने हौसले पर, अपनी हिम्मत पर भरोसा रखना चाहिए.” लड़की ने तुरंत आँखें खोलीं और एक बदमाश को अपने ऊपर झुका पाया. अचानक लड़की ने अपनी पूरी ताकत लगाकर उस बदमाश की नाक पर घूँसा मारा. वो बदमाश तड़पकर पीछे हट गया. लड़की ने पास ही खड़े दूसरे बदमाश के पेट के निचले हिस्से पर घूँसा जड़ दिया. एक पल के लिए वो दर्द से झुक गया. फिर लड़की उतनी ही फुर्ती से उठी और अपना बैग उठाकर मुख्य सड़क की ओर दौड़ पड़ी. कुछ दूर आकर ही उसके मुँह से चीख निकली, तो उधर से कुछ लोग सहायता के लिए दौड़ पड़े.

बदमाश पकड़े गए. पुलिस, पड़ोसी और जान-पहचान के लोग सभी लड़की की तारीफ़ कर रहे थे. लड़की का पिता अपनी बेटी की बहादुरी पर आश्चर्यचकित था. लड़की को कुछ चोटें आयीं थीं. पिता ने उससे आराम करने को कहा, पर वो नहीं मानी और दूसरे दिन एकदम समय से स्कूल के लिए निकली. उसका चेहरा आत्मविश्वास से चमक रहा था, चाल बदल गयी थी. पिता ने देखा लड़की का मनपसंद चाकू उसकी पढ़ने वाली मेज पर रखा हुआ था. अब उसे इसकी ज़रूरत नहीं थी.

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