आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

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शुक्रिया दोस्त, इंसानियत पर मेरा भरोसा बनाये रखने के लिए

बात तब की है, जब मैं इलाहाबाद में पढ़ती थी और वहाँ से आजमगढ़ के गाँव में स्थित अपने घर अक्सर अकेली आती-जाती थी. मैं बचपन से एक छोटे शहर में पली-बढ़ी थी, और वह भी रेलवे स्टेशन के आसपास जहाँ कभी रात नहीं होती. मेरे लिए बहुत मुश्किल था बस से इलाहाबाद से आजमगढ़ और वहाँ से तीस किलोमीटर दूर एकदम धुर गाँव में जाना. शाम होते ही कस्बों और गाँव में चहल-पहल कम होने लगती थी. सर्दियों में काफी परेशानी होती थी क्योंकि गाँव पहुँचते-पहुँचते अक्सर अँधेरा हो जाता था. और उस पर भी शहर से गाँव जाने में कम से कम तीन जगह सवारियाँ बदलनी पड़तीं. जल्दी सवारियाँ मिलती नहीं थीं. कभी-कभी घंटों इंतज़ार करना पड़ता. इन सब कठिनाइयों से बचने के लिए मैं इलाहाबाद से एकदम सुबह लगभग साढ़े पाँच-छः बजे निकलती, लेकिन तब भी देर हो ही जाती.

उस दिन भी ऐसा ही हुआ. मैं अकेली गाँव से लगभग पन्द्रह किलोमीटर दूर स्थित एक कस्बे में पहुँच गयी, लेकिन वहाँ से कोई सवारी नहीं मिल रही थी. मैं टैक्सी स्टैंड (टैक्सी का मतलब उस क्षेत्र में जीप ही होता है) पर खड़ी थी. अचानक एक जीप मेरे पास आकर रुकी. ड्राइवर ने पूछा कहाँ जाना है. मैंने गंतव्य बताया तो बोला ‘बैठ जाइए, हम उधर ही जा रहे हैं. छोड़ देंगे.’ उनका कहने का मतलब शायद यह था कि वे रोज़ सवारियाँ नहीं ढोते. जीप में और भी कई लोग बैठे थे. एक महिला भी थीं, तो मैं बैठ गयी.

मुश्किल तब शुरू हुयी, जब धीरे-धीरे एक-एक करके सारी सवारियाँ रास्ते में उतर गयीं. सर्दियों का समय था. साढ़े छः बजे से ही अँधेरा घिरने लगा था. मैं अपने गंतव्य से आधी दूरी पर ही थी कि जीप पूरी खाली हो गयी और बाहर अँधेरा भी हो गया. जीप में केवल ड्राइवर, क्लीनर और मैं बची. एक ओर तो मन में धुकधुकी लगी थी ऊपर से ड्राइवर की वेशभूषा और डरा रही थी. वह एक छः फुट का लंबा-तगड़ा नौजवान था. मूंछें तो उधर मर्द होने की निशानी मानी ही जाती हैं, उस पर भी जनाब पान चबाये जा रहे थे…मतलब विलेन के सारे गुण मौजूद थे बंदे में.

पता नहीं उन्हें खुद के बारे में बताने का शौक था या मुझे थोड़ा सकुचाया हुआ देखकर उन्होंने बात करनी शुरू कर दी. बताया कि यह जीप उन्हीं की है (कहने का मतलब यह कि “ड्राइवर” नहीं है) उनकी कई जीपें इलाके में सट्टे पर जाती हैं. रोज़ वाली सवारियाँ ढोने के लिए के जीप नहीं देते क्योंकि उससे गाड़ी कबाड़ा हो जाती है और बहुत झंझटी काम है . मुझे उनकी बातें सुनने में कोई दिलचस्पी नहीं थी, लेकिन इससे माहौल तो कुछ हल्का हो ही रहा था.

बता दूँ कि मैं जब शुरू में गाँव गयी थी तो मुझे उस क्षेत्र के लड़कों से एक चिढ़ जैसी हो गयी थी. लड़कियों को देखते ही उनकी निगाहें मधुमक्खी की तरह उनसे चिपक जाया करती हैं. मुझे सारे ही बड़े ‘चीप’ लगते थे. क्षेत्रवाद मेरे अंदर कूट-कूटकर भरा था. मुझे लगता था कि लखनऊ के आसपास के लड़के ज़्यादा सभ्य होते हैं. ये तो बहुत बाद में पता चला कि लड़के हर जगह के एक ही जैसे होते हैं. लेकिन इसमें गलती उनकी नहीं उनकी ‘कंडीशनिंग’ की होती है. जी हाँ, ‘नारीवाद’ का अध्ययन करने के बाद मुझे अक्ल आयी कि लड़कों का छिछोरापन भी समाजीकरण की देन है.

पर उस समय मुझे वे महाशय एकदम “छिछोरे,” मुम्बईया बोली में “टपोरी” और दिल्ली की भाषा में “वेल्ले” लग रहे थे. मुझे लग रहा था कि ये अपनी कहानी सुनाने के बाद मेरे बारे में ज़रूर पूछेंगे और वैसा ही हुआ. मैंने उनके सभी सवालों के जवाब दिए क्योंकि मेरे पास और कोई चारा ही नहीं था. पहले उनको लग रहा था कि मैं आजमगढ़ शहर से ही अपने गाँव आ रही हूँ. जब उन्होंने यह सुना कि मैं इलाहाबाद में पढ़ती हूँ तो खुश हो गए. उन्हें बहुत अच्छा लगा कि एकदम इंटीरियर के एक गाँव की लड़की इलाहाबाद जैसे बड़े विश्वविद्यालय में पढ़ती है क्योंकि मैंने उन्हें यह नहीं बताया था कि यहाँ पली-बढ़ी ही नहीं हूँ. गाँव में होती तो शायद सर पटककर मर जाती और कभी वहाँ पढ़ने का सपना पूरा न होता.

वे पलट-पलटकर बातें कर रहे थे और मैं डर रही थी कि कहीं जीप ही न पलट जाए. अब भी मेरा डर पूरी तरह गया नहीं था. मैं अपने गंतव्य से कुछ ही किलोमीटर दूर थी कि उन्होंने गाँव का नाम पूछा. पहले मैं थोड़ा हिचकी लेकिन फिर बता दिया. मेरा गंतव्य गाँव से तीन किलोमीटर पहले था, फिर वहाँ से मुझे पैदल घर तक जाना था. तब मेरे गाँव के पास तक जीपें जाती ही नहीं थीं क्योंकि सड़क बहुत खराब थी और गाँव एक तरफ पड़ जाता था किसी मुख्य सड़क से नहीं जुड़ा था. ड्राइवर साहब ने मुझसे कहा कि उन्हें भी उधर ही जाना है और वे मुझे गाँव के बगल में छोड़ देंगे. मैंने उन्हें मना भी किया पर वे माने नहीं.

जब तक मैं अपने गाँव पहुँच नहीं गयी, मेरा डर दूर नहीं हुआ. आश्वस्त मैं तब हुयी, जब उन्होंने मुझे गाँव के बगल में छोड़ा और मेरे थोड़ी दूर निकल जाने पर जीप घुमा ली. तब मुझे पता चला कि उन्होंने मुझसे झूठ कहा था कि मुझे उसी तरफ जाना है. वे सिर्फ मुझे छोड़ने मेरे गाँव तक आये और मेरी कृतघ्नता देखिये कि मैंने उनका आभार नहीं व्यक्त किया. बातचीत में वे तीन-चार बार कह चुके थे कि अपने इलाके की हैं तो आप बहन ही हुईं न और मैंने उन्हें पलटकर एक बार भी “हाँ, भईया” नहीं कहा. पता नहीं क्या हुआ कि इस बात से मेरी आँखों में आँसू आ गए. कृतज्ञता के आँसू. मानव के प्रति सहज प्रेम के आँसू. मुझे उन पर विश्वास नहीं था, या घर पहुँचने की जल्दी थी या उस क्षेत्र के लड़कों के प्रति मेरी नफ़रत , किसने मुझे रोका? मैं नहीं जानती लेकिन मुझे आभार व्यक्त करना चाहिए था.

न जाने कितनी बार ऐसे ही बिना स्वार्थ के लड़कों ने मेरी मदद की है. आजमगढ़ से इलाहाबाद और इलाहाबाद से आजमगढ़ की यात्राएँ ऐसी तमाम कहानियाँ समेटे हुए हैं. पर यह कहानी सबसे अलग है. इसने मुझे पुरुषों को एक अलग नज़रिए से देखने की नयी दृष्टि दी. यह सिखाया कि वेशभूषा हमेशा ही चरित्र का आइना नहीं हुआ करती. यह बताया कि सभी बक-बक करने वाले गहराई से सोचते न हों, ऐसा नहीं होता. और यह भी जनाया कि मदद करने वाले कहीं भी मिल जाते हैं. इस घटना को याद करके आज भी दिल में टीस उठती है कि काश वे फिर मिल जाते और मैं उनसे कह पाती “शुक्रिया दोस्त, इंसानियत में मेरा भरोसा बनाए रखने के लिए.”

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कहा जा सकता था, लेकिन…

मैंने कई बार सोचा कि इस घटना के बारे में लिखूँ या ना लिखूँ. जब लिख लिया तो इस कश्मकश में पड़ गयी कि इसे ब्लॉग पर पोस्ट करूँ या नहीं. मैं ऐसा इसलिए सोच रही थी कि इसे सार्वजनिक करने के बाद बहुत से रिश्ते प्रश्नों के दायरे में आ सकते हैं और कुछ लोगों के अजीब से सवालों का जवाब भी देना पड़ सकता है. लेकिन फिर ये सोचा कि ऐसी घटनाओं को सामने आना ही चाहिए, जो अक्सर किसी एक की ज़िंदगी पर बहुत बुरा प्रभाव डालने के बावजूद, परिवार की बदनामी और रिश्ते बिगड़ने के डर से दबा दी जाती हैं. मैं इसे ज्यों का त्यों लिख रही हूँ, हालांकि नाम नहीं दे रही हूँ.

बात उन दिनों की है, जब मेरे बाऊ जी उन्नाव जिले के मगरवारा रेलवे स्टेशन पर पोस्टेड थे. हमलोग रोज़ ट्रेन से मगरवारा से उन्नाव पढ़ने के लिए आते-जाते थे. एक दिन सुबह-सुबह हम घर से निकले तो दरवाजे पर गाँव का एक चचेरा भाई खड़ा था. हमलोग गाँव कम जाते थे, इसलिए उसे पहचान नहीं पाये, लेकिन दीदी पहचान गयी. गाँव से किसी के आने पर हम भाई-बहन बहुत खुश होते थे. उसके आने के कुछ दिन बाद ही होली की छुट्टियाँ हो गयीं, तो हमें अपने कज़िन के साथ वक्त बिताने का मौक़ा मिल गया. मेरी और छोटे भाई की उससे खूब जमती थी. हमारा कोई बड़ा भाई नहीं था, इसलिए एक ‘बड़ा भाई’ मिलने की ज़्यादा खुशी थी. हमने सोचा था कि वह हमसे मिलने इतनी दूर आया है, लेकिन बाद में पता चला था कि वह हाईस्कूल का इम्तहान देने के डर से घर से भागकर आया था. अम्मा ने समझाया कि वह छुट्टियों के बाद घर चला जाय, तो वो मान गया.

हालांकि उसकी कुछ बातें मुझे अच्छी नहीं लगती थीं. मैंने उन दिनों सातवीं का इम्तहान दिया था, लेकिन मेरी ड्राइंग अच्छी होने के कारण कालोनी के हाईस्कूल में पढ़ने वाले लड़के अपनी साइंस की फ़ाइल के चित्र मुझसे बनवाते थे. ऐसे ही एक लड़के ने मुझे फ़ाइल दी, तो मेरे उस कज़िन ने उसका एक-एक पन्ना पलटकर चेक करना शुरू कर दिया. मुझे बहुत बुरा लगा. मैंने सोचा कि मेरा दोस्त क्या सोचेगा ? कि इसका ‘भाई’ जासूसी कर रहा है. मैंने घर वापस आकर अम्मा से शिकायत भी की. पर अम्मा ने समझाया कि ‘जाने दो, बड़ा भाई है. उसे तुम्हारी चिन्ता होती होगी.’ इसके अलावा उसने कई बार कालोनी के लड़कों के साथ मेरे बात करने और खेलने के बारे में भी टोका. मुझे इन बातों पर गुस्सा आता था, लेकिन अम्मा की वजह से मैं कुछ नहीं कहती. कुछ दिन बाद वो वापस गाँव लौट गया.

उसी साल गर्मियों की छुट्टी में गाँव में एक चचेरी बहन की शादी पड़ी. अम्मा घर की देखभाल के लिए रुक गयीं और घर के बाकी सदस्य- मैं, छोटा भाई, दीदी और बाऊ चारों लोग गाँव गए. हमलोग लगभग पाँच साल बाद गाँव गए थे, मैं और मेरा भाई किसी और को तो पहचानते नहीं थे, तो उसी कज़िन से बातें करते थे.

पहले दिन तो सब ठीकठाक था, लेकिन दूसरे दिन से कज़िन ने अजीब सी हरकतें शुरू कर दीं. गाँव का घर बहुत बड़ा था, बिजली तब थी नहीं, तो अधिकतर जगहों पर अँधेरा रहता था. वो जब अँधेरे में मेरे पास से गुजरता तो हाथ छूते हुए निकलता. पहले तो मैंने सोचा कि गलती से हाथ लग गया होगा, लेकिन जब कई बार यही हरकत दोहराई तो मेरा दिमाग ठनका. वैसे भी लड़कियों की सिक्स्थ सेन्स इतनी प्रबल होती है कि उन्हें ‘स्पर्श-स्पर्श’ में अंतर पता चला जाता है. मैंने उससे बचना शुरू कर दिया. मैं या फिर बाऊ के पास बाहर बैठी रहती या दीदी और बुआ लोगों के साथ घर के भीतर.

लेकिन उसने परेशान करने की नयी तरकीब निकाली. उसने एक छोटे भतीजे को भेजकर मुझे हाते में बुलवाया. अब जब सबके सामने आकर कोई कह रहा है कि ‘फलाने चाचा’ बुला रहे हैं और मैं न जाती, तो लोगों को शक होता कि बात क्या है? मेरी समझ में कुछ नहीं आया. मैं गयी तो लेकिन एक छड़ी लेकर. मैं दूर खड़ी हो गयी, और धमकी दी कि ‘अगर आपने मुझे हाथ लगाने की कोशिश की तो मैं खींचकर छड़ी मार दूँगी.’ मेरे पीछे-पीछे भतीजी-भांजियों की फौज भी आ गयी थी, इसलिए उसे कुछ कहने का मौका नहीं मिला.

मैं रात में चाचा की छत पर सोती थी दीदी, बुआ, कुछ भतीजे-भतीजियों और बड़े भईया के साथ. उस दिन मुझे बहुत नींद आ रही थी, तो दीदी से पहले ही मैं छत पर चली गयी. सोचा बड़े भईया तो हैं ही. गाँव में शादी-ब्याह में कई दिन तक गवनई चलती है, तो दीदी और बुआ उसी में व्यस्त थीं. मुझे पहली ही झपकी आयी थी कि अचानक लगा कि कोई मेरी चादर खींच रहा है. मेरी नींद बहुत कच्ची है, इसलिए तुरंत उठ गयी. सामने देखा तो वही कज़िन था. मैंने ज़ोर से पूछा “क्या है?” तो वो डर गया और तेजी से नीचे भाग गया. मैंने बगल में देखा कि भतीजे वगैरह तो गहरी नींद में सो रहे थे और भईया नहीं थे. शायद भाभी के पास चले गए थे. मुझे उसके बाद नींद नहीं आयी. मैं उकडूँ बैठी रही, जब तक दीदी और बुआ नहीं आ गयीं.

उस दिन के बाद से मैं बेहद डर गयी. मुझे रात होते ही डर लगने लगता. मैं उस समय सिर्फ बारह साल की थी और एकाकी परिवार में पली-बढ़ी. मुझे समझ में ही नहीं आ रहा था कि ‘भईया ऐसा कर क्यों रहे हैं?’ दीदी मुझे अकेली मिल ही नहीं रही थीं. हर समय उनके साथ या तो बुआ होतीं, या भाभी या कोई बहन. दूसरे दिन मैंने बाऊ से वापस चलने की रट लगा दी. और कुछ तो कह नहीं सकती थी. बस बार-बार यही कह रही थी कि “अम्मा की याद आ रही है” एक-दो बार तो आँसू भी छलछला आये. मुझे सच में अम्मा की बहुत याद आ रही थी. अम्मा सच कहती हैं, ‘जब कोई आदमी ज़्यादा प्यार से बोलने लगे, तो समझो कि कुछ गडबड है. ऐसे लोग लड़कियों को उठा ले जाते हैं और उनसे खूब काम कराते हैं.’ पर ऐसा तो अम्मा ने ‘आदमियों’ के लिए कहा था ‘भाइयों’ के लिए तो नहीं. मेरा मन इससे अधिक कुछ नहीं सोच पा रहा था. मैं उस समय कैसा महसूस कर रही थी, इस समय नहीं बताया जा सकता.

हमारे गाँव के घर का आहाता बहुत बड़ा था. उसमें उस समय कुछ सब्जियाँ उगाई जाती थीं. उस दिन शाम के समय भाभी के कहने पर मैं हाते से कुछ सब्ज़ी तोड़ने गयी थी कि उसने मुझे रोक लिया. मैं बेहद डर गयी कि अभी तक तो इसकी हरकतें रात में शुरू होती थीं. अब दिन में भी? मैं रो पड़ी. मैंने पूछा, “आप मुझे क्यों परेशान कर रहे हैं?” उसने जवाब दिया, “हम तुम्हें पसंद करते हैं. जो कह रहे हैं वो मानो और किसी से कुछ कहना मत, नहीं तो हम तुमको पूरे गाँव में बदनाम कर देंगे.” मुझे “बदनाम” शब्द का मतलब मालूम था. ऐसी लड़कियाँ जो गंदी होती हैं, उन्हें बदनाम कहा जाता है. मैं और डर गयी और वहाँ से तेजी से भाग आयी.

अब मुझसे बर्दाश्त नहीं हो रहा था ये सब. मेरे दिमाग में उसके कहे शब्द गूंज रहे थे. लेकिन करती भी तो क्या? संयोग से रात को गाँव के ही एक नातेदार के यहाँ घरभोज में जाने को मिला. दीदी हमेशा बुआ से बातें किया करती थीं. वो बतियाते हुए ही जा रही थीं कि मैंने उन्हें रोका कि कुछ बात कहनी है. दीदी ज्यों रुकीं, मैंने त्यों रोना शुरू कर दिया. रो-रोकर मैंने सारी बात बतायी और ये भी कहा कि ‘वो मुझे बदनाम कर देगा.’ दीदी भी अवाक् रह गयीं. उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था कि कोई भाई ऐसा कर सकता है. उन्होंने मुझसे कहा, ‘वो उससे और उसकी माँ से बात करेंगी.’

दूसरे दिन दीदी ने मुझसे कहा कि ‘उन्होंने चाची से सारी बात बताई, और कज़िन को भी डाँट पिलाई. लेकिन चाची ने अपने लड़के की गलती नहीं मानी. उन्होंने कहा कि कोई गलतफहमी हुयी होगी.’ चाहे जो भी हुआ हो, उस दिन के बाद से कज़िन ने ऐसी-वैसी कोई हरकत नहीं की. दो दिन के बाद हम वापस घर आ गए. बात आयी-गयी हो गयी. दीदी ने न ये बात अम्मा को बतायी और न बाऊ को. दीदी भी छोटी ही थीं, वो इस बात का निर्णय नहीं ले पाईं कि अम्मा-बाऊ को बताकर बात बढ़ानी चाहिए या नहीं.

लेकिन जब हम किसी सड़ांध को ढककर छिपाना चाहते हैं, तो उसकी दुर्गन्ध फैलती ही है. किसी की एक गलती पर यदि उसे रोक न दिया जाय, या सज़ा न दी जाय, तो वो दूसरी गलती करेगा ही.

इन घटनाओं के चार-पाँच साल बाद बाऊ के रिटायरमेंट के बाद जब हम गाँव शिफ्ट हुए, तो मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि मुझे क्या करना चाहिए. उस कज़िन से बात करनी चाहिए या नहीं. दिन में लगभग तीन-चार बार उससे सामना होता, लेकिन मैं बात नहीं करती थी. एक दिन भाभी ने मुझसे कहा कि ‘फलाने’ को खाने के लिए बुला दो. मैंने कहा कि मैं उससे बात नहीं करती. भाभी ने जब कई बार मुझसे कारण पूछा तो मैंने पूरी बात बता दी. इसके बाद उन्होंने जो बात बतायी, तो मैं दंग रह गयी. उन्होंने कहा कि “उसने मेरे साथ भी ऐसी हरकत करने की कोशिश की थी. और तो और एक बार अपनी सगी बहन के साथ भी ज़बरदस्ती करने की कोशिश की. इसके बाद उसकी उसके पिताजी ने जमकर पिटाई की.” ये बात सुनकर मेरे पैरों के तले से तो ज़मीन ही निकल गयी. मैं तो उससे सिर्फ दो-तीन साल छोटी थी, लेकिन उसकी छोटी बहन तो बहुत छोटी थी. मैंने कहा, ‘”भाभी, अगर उसको तभी रोक दिया गया होता, जब उसने मेरे साथ बदतमीजी की थी, तो कम से कम उस छोटी लड़की को और आपको तो ये सब न झेलना पड़ता.”

हाँ, ये सच है कि उसे उसी समय रोक देना चाहिए था. उसे सबके सामने शर्मिंदा करना चाहिए था, ‘घर-खानदान की बदनामी’ के डर से डरे बगैर…लेकिन ऐसा नहीं हुआ. मैं बहुत छोटी थी और दीदी बहुत सीधी. हम साहस ही नहीं कर पाये उसके खिलाफ ‘ज़ोर से’ अपनी बात कहने का. और शायद कहते भी तो दोनों परिवार में झगड़े और मनमुटाव के अतिरिक्त और कुछ न होता.

मुझे ये लगा था कि ये मेरे जीवन की ऐसी घटना है, जिसके बारे में मैं किसी से कभी नहीं कह पाऊँगी. लगता था कि मैं ही ऐसी अभागी हूँ, जिसे ये सब झेलना पड़ा है. लेकिन जब हॉस्टल में और लड़कियों से इस पर खुलकर बातचीत होने लगी, तो पता चला कि लगभग सत्तर प्रतिशत लड़कियाँ बचपन या टीनेज में अपने किसी न किसी नातेदार-रिश्तेदार के द्वारा ‘सेक्सुअल अब्यूज़’ झेल चुकी हैं.

इसका कारण क्या है, इसके लिए लंबे-चौड़े तर्क दिए जा सकते हैं, शोध किये जा सकते हैं, लेकिन एक बड़ा कारण यह भी है कि ऐसी घटनाएँ बाहर नहीं आ पातीं, इसलिए इस तरह की हरकतें करने वालों की हिम्मत बढ़ती जाती है. उन्हें पता होता है कि एक छोटी लड़की ऐसी घटना का जिक्र किसी से नहीं कर पायेगी. इसलिए वो बड़ी बेशर्मी से लड़कियों और छोटे लड़कों के साथ यौन-दुर्व्यवहार करते हैं. ज़रूरत है कि इस पर खुलकर बात हो. कानूनी कार्रवाई के अतिरिक्त ऐसे लोगों को सार्वजनिक रूप से शर्मिंदा किया जाय. उन्हें समाज से बहिष्कृत किया जाय, तो शायद ऐसी घटनाओं पर कुछ हद तक रोक लग पाये.

दुनिया रंगीन सपनों वाली फूलों की सेज नहीं

नहीं समझ में आ रहा है बात शुरू कहाँ से करूँ? शीर्षक देने का भी मन नहीं हो रहा। मेरी समस्या ये है कि मैं अति संवेदनशील हूँ। कोई भी समस्या सुनती हूँ, तो परेशान हो जाती हूँ। ये परेशान होना उसके हल के लिए इतना बल देने लगता है कि समस्या की जड़ ढूँढने की कोशिश करने लगती हूँ और उसके समाधान को खोजने की भी। पर इस समस्या का कोई हल मुझे नहीं मिल रहा। बहुत सोचा पर कभी-कभी ये खुद के बस में होता ही नहीं।

ये एक  कहानी है। गल्प नहीं। वास्तविक कहानी। वास्तविकता, जो कभी-कभी कल्पना से बहुत अधिक भयावह होती है। एक झटके में आपके आगे से एक पर्दा हटता है और आपको सच्चाई का वो घिनौना चेहरा दिखता है, कि खून के रिश्तों से नफ़रत होने लगती है, दुनिया कपटी-छली लोगों से भरी लगती है और ईश्वर के अस्तित्व पर संदेह होने लगता है।

कहानी एक लड़की की है, जो शहर से कहीं दूर एक गाँव में रहती है। उसके पिता सरकारी कर्मचारी थे, जो अब रिटायर हो गए हैं। लड़की चार बहनों में से एक थी। बाकी सबकी शादी हो चुकी थी। पहले तो पिता ने लड़की को आठवाँ पास कराके घर में बिठा दिया था, लेकिन कुछ पढ़े-लिखे लोगों के समझाने पर पढ़ाने को राजी हो गए। लड़की होशियार थी, पढ़ती गयी। उसने एम.ए. किया बी.एड. किया। जब दूसरे शहर जाकर नौकरी करने की सोची, तो उसे मना कर दिया गया। कहा गया कि तुम्हारी शादी हो जाय, तो पति और ससुराल वाले नौकरी करवाएं तभी करना।

पिता के रिटायर होने के बाद से छोटा भाई घर का मालिक बन गया। ग्रेच्युटी और फंड के पैसों को देखकर उसे लालच आ गया। भाई ज़्यादा दहेज देना नहीं चाहता। इसलिए ऐसे-ऐसे रिश्ते खोजकर लाता, जो लड़की को पसन्द ही नहीं आते। लड़की ने जब एक-दो बार मना कर दिया, तो भाई कहने लगा कि लड़की शादी करना ही नहीं चाहती। रिश्ते अब भी आते हैं। लड़के वाले दहेज माँगते हैं, लड़की वाले देना नहीं चाहते। बिना दहेज के वही लड़का शादी करने को तैयार होता है, जो या फिर विधुर है या तलाकशुदा या उसमें कोई शारीरिक कमी है। लड़की इस तरह के लड़कों को अपना मुँह दिखा-दिखाकर थक गयी है।

पिछले छः साल से लड़की इसी स्थिति में है। उसकी आयु बत्तीस साल हो गयी है। न उसकी शादी हो रही है और न उसे नौकरी करने दी जा रही है। लड़की कहीं भाग न जाय, इसलिए उस पर कड़ा पहरा है। उसके बाहर निकलने पर नज़र रखी जाती है। हालत ये है कि लड़की ना किसी गाँववाले से बात करना चाहती है और न किसी रिश्तेदार से। वो भयंकर डिप्रेशन में है। हाँ, उसके भाई ने ये ज़रूर कहा है कि वो आत्महत्या कर ले, तो सारी समस्या हल हो जायेगी क्योंकि भागने पर प्रतिष्ठा धूमिल होगी, जबकि आत्महत्या करने पर ये कहा जा सकता है कि डिप्रेशन में थी। इसलिए खुद को खत्म कर लिया।

लड़की के घरवाले इतने गरीब नहीं हैं कि दहेज ना दे सकें। उनके पास अच्छी-खासी खेत की ज़मीन भी है और आबादी की भी। कुछ ज़मीन सड़क किनारे भी है, जिसका कमर्शियल इस्तेमाल हो सकता है। यहाँ शायद लड़की का ब्राह्मण परिवार का होना बहुत से लोगों को प्रासंगिक न लगे, लेकिन मेरे विचार से है क्योंकि तथाकथित सवर्ण परिवारों में प्रतिष्ठा, कभी-कभी व्यक्ति के जीवन से कहीं ज़्यादा बढ़कर हो जाती है। पश्चिमी यू.पी. में होने वाली ऑनर किलिंग और हमारे पूर्वी यू.पी. में लड़कियों को घर से बाहर खेतों तक भी न जाने देना, इसी प्रतिष्ठा से जुड़े हैं। दूर-दराज के गाँवों में ऐसी एक नहीं, कई कहानियाँ हैं, जहाँ अभी तक इक्कीसवीं सदी की किरण तक नहीं पहुँची है। लोग लड़कियों को पढ़ा तो देते हैं, लेकिन उन्हें अपने फैसले खुद लेने की आज़ादी नहीं है।

लड़की ने कुछ शुभचिंतकों से मदद माँगी। कहा कि मेरी यहाँ से निकलने में मदद करो। शादी करवा दो या नौकरी लगवा दो, बस इस “शादी के इंतज़ार” से मुक्ति दिलवा दो। लेकिन उन्होंने उल्टा उसे ही समझा दिया कि ‘दुनिया बहुत खराब है। बाहर भेडिये घूम रहे हैं। तुम कहाँ जाओगी? घर से भागी हुयी लड़कियों की कोई कीमत नहीं होती। सब उनका इस्तेमाल करना चाहते हैं.’ गाँवों में वैसे भी कोई किसी की दुश्मनी मोल नहीं लेना चाहता। लड़कियों के मामले में तो और नहीं पड़ना चाहता। उन्हें कोई घर में भी नहीं रखना चाहता कि कहीं लड़की के माँ-बाप अपहरण का केस न करा दें।

मैं अगर इस समस्या का हल पूछूँ तो शायद कुछ लोग ये कहें कि लड़की के घरवालों को दहेज दे देना चाहिए, लेकिन क्या ये दहेज प्रथा का समर्थन करना नहीं हुआ? जब भी मैं सम्पत्ति में अधिकार की बात करती हूँ, तो लोग भाई-बहन के सम्बन्धों की दुहाई देने लगते हैं। इस मामले के बारे में उनका क्या कहना है? अगर लड़की भी लड़कों की तरह ही सम्पत्ति में बराबर की हकदार होती, तो क्या भाई को इस तरह से घर का मालिक बन जाने की हिम्मत होती?

मैं नहीं कहती कि सारे भाई ऐसे होते हैं। मैं ये भी नहीं कहती कि सारे माँ-बाप ऐसे होते हैं। सारी लड़कियों की कहानी भी ऐसी नहीं होती। मुश्किल उनकी नहीं है, जिन्होंने रोशनी देखी ही नहीं है। मुश्किल उनके लिए है, जिन्होंने रोशनी देख ली है, लेकिन अँधेरे में रहने को मजबूर हैं। मैं शाम से बहुत दुखी हूँ। प्रेम का सारा सुरूर हवा हो गया है, फागुनी हवाएँ काटने को दौड़ रही हैं। मैं दुखी हूँ। बहुत दुखी।

छूटा हुआ कुछ

पिछले कुछ दिनों से मुझे मेरा घर बहुत याद आ रहा है. बाऊ के रहते डेढ़-दो महीने भी जिससे दूर नहीं रह पाती थी, आज उसे छूटे हुए पाँच साल से ज्यादा हो रहे हैं. कितना सोचा कि अब उस घर में लौटकर कभी नहीं जाऊँगी. पर क्या करूँ? इतनी बड़ी दुनिया में उस घर के सिवा और कहीं कोई ठिकाना भी तो नहीं.

कौन कहता है कि बिना घरवालों के घर, घर नहीं मकान होता है. मुझे लगता है कि घर की भी आत्मा होती है, ऐसा लगता है कि वो भी इस समय बहुत अकेला है और मुझे पुकार रहा है. कितना कुछ तो छूटा हुआ है मेरा उस घर में. उसी घर में हमने पहली बार महसूस किया कि अपना घर कैसा होता है? इससे पहले की ज़िंदगी तो हमने रेलवे क्वार्टरों में बिताई थी. उस घर में हम तीनों-भाई बहनों की हँसी छूटी हुयी है. दीदी की शादी के बाद अकेले अपने कमरे में बहाए हुए मेरे आँसू छूटे हुए हैं, हज़ारों ख्याल, सैकड़ों विचार जो दिमाग में उठे और कागज़ पर नहीं उतरे, उस घर के किसी कोने में ही छूट गए हैं. और इन सबसे भी बढ़कर उस घर में बाऊ की आत्मा बसी हुयी है, जिसने चाहे शरीर के.जी.एम्.सी. के ट्रामा सेंटर में छोड़ा हो, पर घूम-फिरकर उसी घर में आ गयी होगी, जिसे बाऊ ने अपनी तैंतीस साल की सर्विस से रिटायरमेंट के बाद ग्रेच्युटी और फंड के पैसों से बनवाया था. कौन जाने बाऊ की आत्मा ही खींच रही हो मुझे वहाँ? उन्हें मालूम था कि तीनों भाई-बहनों में मुझे ही सबसे ज्यादा उस घर से लगाव है.

हाँ, मुझे उस घर से बेहद लगाव है क्योंकि मेरा कोई और घर नहीं है, क्योंकि वो घर मेरे पिताजी की आकांक्षाओं का मूर्त रूप है, उस घर के नक़्शे से लेकर आतंरिक सज्जा तक में सबसे ज्यादा हाथ मेरा ही था और वहाँ मैंने अपनी ज़िंदगी के सबसे बेहतरीन और सबसे अवसाद भरे दिन बिताए हैं. दीदी की शादी के बाद मैं बहुत अकेली हो गयी थी और तब मुझे वहीं पनाह मिलती थी, अपने उस कमरे में, जिसकी खिड़की से दूर-दूर तक फैले धान के खेत दिखते थे, बारिश में नाचते मोर दिखते थे और ठंडी-ठंडी हवा आकर मेरे गालों को सहलाकर मानो सांत्वना देती थी.

मेरे लिए वो घर ही नहीं उसके आस-पास के पेड़-पौधे, पशु-पक्षी सभी मेरे अस्तित्व का हिस्सा थे. घर के अहाते में लगे सागौन पर बया घोंसले बनाया करती थी और बँसवारी में महोख और गौरय्या अपना ठिकाना बनाये हुए थे. बरामदे में लगी बोगनबेलिया और मालती के बेलों को जब बाऊ छाँटते थे, तो मुझसे बर्दाश्त नहीं होता था. मुझे लगता था कि उन्हें दर्द होता है. दक्खिन ओर की बँसवारी भी मैंने लड़-झगड़कर काटने से रोकी थी. बाऊ उसे काटना चाहते थे क्योंकि वहाँ एक धामिन ने अपना घर बना रखा था. पर मुझे ज्यादा चिंता उस पर बसने वाले पंछियों की थी. बाऊ ने सामने की ओर दुआर पर तरह-तरह के आम के पेड़ लगाए थे. जाने कहाँ से आम्रपाली ढूँढकर लाये थे, जिसमें बाऊ के जाने के साल खूब फल लगे थे और बाऊ रोज सुबह उठकर उसके फलों को गिनते थे कि कहीं चाचा की बदमाश पोती ने कुछ टिकोरे तोड़ तो नहीं लिए. अब तो वो पेड़ खूब बड़ा हो गया होगा.

मुझे आज भी याद है कि काँच की एक बोतल में लगाया मनीप्लांट टाँड़ पर से बढ़कर रोशनदान के पास पहुँच जाता था और मैं बार-बार उसे खींचकर नीचे कर देती थी. ऐसा लगता था मानो वो अपनी बाहें फैलाकर रोशनी को अपने अंदर भर लेना चाहता हो. मुझे लगा उसे खुली हवा में साँस लेना है. मैंने उस पौधे को बोतल से निकालकर मिट्टी में लगा दिया और वो थोड़ा बड़ा हुआ तो खिड़की के रास्ते अंदर कमरे की ओर बढ़ने लगा. बिलकुल कुछ ऐसे ही, मैं भी घर लौटना चाहती हूँ.

किस्सा नखलऊवा का…

नखलऊवा की कहानी में मैंने अपनी ओर से कोई मिलावट नहीं की है. ये ऐसे ही मिली थी मुझे मय नमक-मिर्च और बैसवारे के आमों से बने अमचूर पड़े अचार की तरह, चटपटी और जायकेदार. इसका महत्त्व इस बात में नहीं कि ये बनी कैसे ? इस बात में है कि हमारे सामने परोसी कैसे गयी?

ये कहानी सच्ची है. उतनी ही सच्ची जितनी कि ये बात कि लखनऊ के गाँवों में बहुत से लोग अब भी उसे ‘नखलऊ’ कहते हैं, जितना कि बैसवारे का ठेठपना और वहाँ के लोगों की बड़ी सी बड़ी समस्या को हँसी-हँसी में उड़ा देने की फितरत.

मेरे पिताजी के अभिन्न मित्र थे हमारे बसंत चाचा. उनका गाँव जैतीपुर में था, जो कि लखनऊ और उन्नाव के बीच में एक छोटा सा रेलवे स्टेशन है. हमलोग अक्सर वहाँ चले जाते थे. दूर तक फैली ऊसर ज़मीन, उस पर खजूर के पेड़ और एक बरसाती नाला मिलकर हमें अपनी ओर खींचते थे. ऐसे ही एक बार मैं और मेरी दीदी पहुँचे चाचा के गाँव. स्टेशन तक पैसेंजर गाड़ी से और उसके बाद बैलगाड़ी से.

चाचा की बहू बहुत ही हंसमुख थीं. जब हम घर पहुँचे तो आँगन में चारपाई पर बैठी सरौते से सुपारी काट रही थीं. भईयल (चाचा के बड़े लड़के) बरामदे में बैठे थे. हम दोनों को देखकर मुस्कुराए तो लगा जैसे कोई उनकी कनपटी पर कट्टा लगाकर उन्हें ऐसा करने के लिए विवश कर रहा हो. हमने भाभी से इशारों में पूछा तो बोलीं, “बेचारे परेसान हैं नखलऊवा वाली बात ते.” “ए” भैय्यल गुर्राए. भाभी हँसकर हमलोगों के लिए चाय बनाने चली गयीं.

चाय पीते-पीते हमने पूछा, “भाभी, ये नखलऊवा कौन है?” तो झपटकर जवाब भैय्यल ने दिया, “अरे कउनो नहीं बिटिया (वहाँ छोटी बहन को बिटिया कहते हैं) इ तुम्हरी भाभी के दिमाग का फितूर है” इस पर भाभी बोलीं, “अच्छा, तुम जाव हियाँ ते. बाहर बइठो” “बिटिया होरी, इनकी बातन में ना आयो. दिमाग फिरा परा है आजकल इनका” कहते हुए भैय्यल चले गए. बस फिर क्या था? भाभी शुरू हो गयीं कहानी कहने, “बिट्टी का देखे हो तुम पंचिन?”

“कौन ? वो जो लखनऊ में पढ़ती हैं. कलंदर चाचा की बिटिया?”

“हाँ, उनही का टांका याक लरिका ते भिड़िगा नखलऊ मा”

“हैं ?”

“गरमी की छुट्टी मा जब बिट्टी घरे आयीं. तो पीछे-पीछे नखलऊवौ चला आवा”

“फिर?”

“बिट्टी चुप्पे ते वहिका ख्यात (खेत) वाले घर कै चाबी दई दिहिन.”

“?”

“बिट्टी रोज सुबे-साम नखलऊवा का खाना देवै और और वहिसे मिलै खातिर जात रहिन. तो तुम्हरे भैया और इनके दोस्तन का सक हुईगा.”

“फिर?”

“फिर का ? इ लोग याक दिन बिट्टी के पीछे गयेन और ज्यों बिट्टी नखलऊवा ते मिलिके वापस गयिन. इ लोग नखलऊवा पे टूट परेन और वहिकै कम्बल परेड करि डारिन.”

“क्यों?” हमदोनों एक साथ बोले.

“अरे ! इन लोगन से बरदास्त नहीं हुआ कि इनके गाँव की लड़की कौनो बाहरी ते नैन-मटक्का करै.”

“हाँ-हाँ, खूब नमक-मर्चा लगाके सुनाव बिटियन का.” भैय्यल फिर टपक पड़े.

“तुम फिर आ गयो?” भाभी बोलीं.

“अउर का? तुम हमरी बदनामी काहे करि रही हो सबते?”

“तुम बड़े नाम वाले हो ना? तुम ते कहा ना, बाहर जाओ. हमका बिटियन ते कुछ पराइवेट बात करै का है.”

भैय्यल ने बरामदे में ताक पर रखा पान-मसाले का डिब्बा उठाया और उसमें से एक चुटकी मसाला मुँह में दबाकर बाहर चले गए. उनके बाहर जाते ही भाभी ने फुर्ती से बाहर का दरवाजा अंदर से बंद कर दिया. भैय्यल जब खटखटाने लगे, तो भाभी बोलीं, “जाओ, नहीं तो दद्दा से सिकायत करि देबे.” भाभी ‘दद्दा’ हमारे चाचा (यानी उनके ससुर जी) को कहती थीं. हमलोगों को भैया-भाभी की आँख-मिचौली देखने में खूब मज़ा आ रहा था. बेचारे भैय्यल को मन मारकर बाहर बैठना पड़ा. अब हमारी उत्सुकता चरम पर थी. दीदी ने झट से पूछा, “भाभी, फिर क्या हुआ?”

“इ लोग टूटे-फूटे नखलऊवा का नखलऊ जाए वाली पसिंजर मा बइठा दिहिन. इधर जब बिट्टी का पता चला तो वी धरना पर बइठ गयीं. कहीं ‘बिहाव करिबे तो परनब (नखलऊवा का नाम) ते नहीं तो बिहावै ना करिबे”

“वाह! क्या बात है!” मैंने कहा. दीदी ने आँखे तरेरकर मुझे देखा.

“तुम्हरी पंचिन तो जनती ही हो कि कलंदर चाचा की इकलौती लाड़ली बिटिया हैं बिट्टी. तो कलंदर चाचा मानि गएँ.”

“तो क्या बिट्टी की शादी उसी से हुयी है?” दीदी ने पूछा.

“अउर का? और तुम्हरे भईया लोगन जउने नखलऊवा का तोड़-फोड़ के नखलऊ पठाए रहेन, वही की पाँव पुजाही करै का पड़िगा”

“ओह तो इसीलिये भैय्यल इतना चिढ़ रहे हैं?”

तभी दरवाजा खटखटाने की आवाज़ आयी. मैंने लपककर दरवाजा खोला. इस किस्से के बाद भैय्यल का चेहरा देखने का बड़ा मन कर रहा था. वो “हें हें” करते आये, “बताय दिहिन पूरी इस्टोरी तुम्हरी भाभी” “हाँ” मैंने कहा. “तुम्हरी भाभी का बंबई भेज दिहा जाए तो इस्टोरी लिखिके खूब पईसा कमइहैं.”  भाभी के सर पर एक चपत लगाते हुए जाकर बरामदे में बैठे. भाभी बोलीं, “चैन नहीं परा नखलऊवा कै जूता चुराई करिके. दद्दा ते मार खइहो? चले रहें बिटियन की चौकीदारी करै.” भैय्यल ने तकिया उठाकर भाभी के ऊपर फेंका तो वो भागकर रसोई में छिप गईं.  बाद में पता चला कि पूरे गाँव में नखलऊवा, भैय्यल एंड पार्टी और भाभी को छोड़कर कोई नहीं जानता था कि कम्बल परेड की किसने? और भाभी इस बात का फायदा उठाकर भैय्यल को ये कहकर ब्लैकमेल करती थीं, “दद्दा से बता देबे.” बेचारे भैय्यल.

नखलऊवा की कहानी आज भी वहाँ से हमारे तार जोड़े हुए है. इस बार दीदी के यहाँ भरूच जाना हुआ, तो हमदोनों “नखलऊवा” का किस्सा याद करके खूब हँसे.

चलत की बेरिया

हमारा देश दार्शनिकों का देश है, दर्शन का देश है. दर्शन यहाँ के जनमानस के अन्तर्मन में समाया हुआ है, जनजीवन में प्रतिबिम्बित होता है. कुछ लोग कर्मवादी हैं, तो कुछ लोग भाग्यवादी. पर समन्वय इतना कि कर्मवादी लोग भी भाग्य पर विश्वास करते हैं…और भाग्यवादी लोग भी कर्म करते हैं. लगभग सभी ये मानते हैं कि यह संसार मोहमाया है, यह शरीर भी नश्वर है. न यहाँ कोई कुछ लेकर आया है और न लेकर जायेगा. अनपढ़ लोगों को भी पता नहीं कहाँ से इस दिव्य ज्ञान की प्राप्ति हो जाती है…?

बस, जीवन जीने का तरीका सबका अलग-अलग होता है. कुछ मानते हैं कि जब हम यहाँ कुछ दिनों के लिये आये हैं, तो इस संसार से मोह कैसा? इसकी वस्तुओं में रमना कैसा? रमना है तो भगवान की भक्ति में रमो…तो कुछ लोग यह मानते हैं कि एक दिन सभी को जाना है, छोटा-बड़ा, शिक्षित-अनपढ़, गरीब-अमीर, सेठ-साहूकार, सभी चले जायेंगे…इस मामले में कोई भेदभाव नहीं…अगर एक दिन ये जीवन नष्ट हो जायेगा तो इसे भरपूर जियो. चार्वाक इसी दर्शन के प्रतिपादक थे. मेरे पिताजी ये मानते थे कि यही हमारे लोकदर्शन का आधार है. लोकदर्शन क्या होता है? मुझे नहीं मालूम, पर, एक अनपढ़ देहाती व्यक्ति भी कैसे दर्शन का गूढ़ तत्व सरल शब्दों में समझा देता है, ये देखना कभी-कभी बहुत रोचक होता है. इसी सन्दर्भ में एक घटना का उल्लेख कर रही हूँ.

फसल कटाई के समय गाँवों के खेतों-खलिहानों में उत्सव का सा माहौल हो जाता है. हमारे चाचा का खलिहान उनके दुआरे पर ही है. ये घटना धान की कटाई के समय की है. चाचा के घर के सामने धान की पिटाई हो रही थी. मज़दूरों की भीड़ थी. रस-दाना, खाना और मीठा आदि चल रहा था. मुझे ये चीज़ें बहुत आकर्षित करती हैं. ग्राम्यजीवन की सुन्दरता अपने कठोरतम रूप में… मज़दूर-मज़दूरिनों की जीवन्तता…फसल के एक गट्ठर या कुछ सेर अनाज और कुछ रुपयों के लिये जी-तोड़ परिश्रम करना, कठिन श्रम में भी खिलखिलाकर हँसना…तो, धूल से एलर्जी होने के बावजूद मैं वहाँ जमी थी.

मेरे चाचा के बड़े लड़के मज़दूरों से कुछ खफा से रहते हैं. उनके अनुसार जबसे बसपा का शासन हुआ है मज़दूरों के भाव बढ़ गये हैं. बहुत नखरे करने लगे हैं. कुछ मज़दूरों के लड़के छोटी-मोटी सरकारी नौकरी पा गये हैं, … वो सब लम्बी-लम्बी फेंकते हैं. तो भैय्या इन लोगों को इनकी औकात बताने में जुटे थे. वो अपने हवेलीनुमा घर, ज़मीन-जायदाद, खेत-खलिहान, ट्रक, ट्यूबवेल, बैंक-बैलेंस, यहाँ तक गोरू-बछरू आदि के बारे में बता-बताकर अपनी हैसियत का परिचय दिये जा रहे थे. जैसे किसी को इसके बारे में मालूम ही न हो. अरे गाँव में तो कोसों दूर तक लोग एक-दूसरे को जानते हैं, पर हमारे भैय्या…ऐसे ही हैं.

किसी को भी उनका इस तरह से डींगे हाँकना अच्छा नहीं लग रहा था, मुझे भी नहीं. पर मैं तो बोल नहीं सकती थी… बड़े भैय्या जो ठहरे. बाउ ने एक-दो बार टोका, पर वो नहीं माने. मज़दूरों को उनकी औकात बताने का काम चालू रखा. थोड़ी देर बाद एक मज़दूर महिला हँसकर भैय्या से बोली, “ए बाबा, ( हमारे यहाँ ब्राह्मणों को बाबा कहते हैं) काहे भभकत हउआ फुटही ललटेन मतिन. इ कुल तोहरे साथ न जाई चलत की बेरिया” (फूटी हुई लालटेन की तरह भभक क्यों रहे हो? ये सब संसार छोड़ते समय तुम्हारे साथ नहीं जायेगा). भैय्या एक क्षण के लिये अवाक रह गये, फिर बड़बड़ाते हुये घर के भीतर चले गये…कौन बोल सकता है भला इसके आगे ???


मिट्टी का घर, आम का पेड़, झूले, कजरी…सब बीती बातें

मेरे गाँव में बरसों पहले हमारा एक मिट्टी का घर था. आँगन, ओसार, दालान और छोटे-छोटे कमरों वाले उस बड़े से घर से धुँए, सौंधी मिट्टी, गुड़(राब) और दादी के रखे- उठे हुए सिरके की मिली-जुली गंध आती थी. घर के पश्चिम में एक बैठक थी. बैठक और घर के बीच के बड़े से दुआर में कई छोटे-बड़े पेड़ों के साथ मीठे फल और ठंडी छाँव वाला एक विशाल आम का पेड़ था, जिसके बारे में अम्मा बताती थीं कि जब वो नयी-नयी ब्याह के आयी थीं, तो सावन में उस पर झूला पड़ता था. गाँव की बहुएँ और लड़कियाँ झूला झूलते हुए कजरी गाती थीं. हमने न कजरी सुना और न झूला झूले, पर आम के मीठे फल खाये और उसकी छाया का आनंद उठाया. तब हर देसी आम के स्वाद के आधार पर अलग-अलग नाम हुआ करते थे. उस पेड़ के दो नाम थे “बड़कवा” और “मिठउआ.” घर के बँटवारे के बाद मिट्टी का घर ढहा दिया गया. उसकी जगह पर सबके अपने-अपने पक्के घर बन गये. बड़कवा आम का पेड़ पड़ा छोटे चाचा के हिस्से में. उन्होंने उसे कटवाकर अपने घर के दरवाजे बनवा दिये. वो पेड़, जो सालों से घर की छाया बना हुआ था, उसके गिरने का खतरा था…बूढ़े लोग अनुपयोगी हो जाते हैं…मँझले चाचा के हिस्से का मिट्टी का घर अभी बचा हुआ है, पर कुछ दिनों में वो भी उसे गिरवाकर ईंट और प्लास्टर का घर बनवाएंगे. एक-एक करके यूँ ही गाँव के सारे मिट्टी के घर मिट्टी में मिल जायेंगे. कभी हुआ करते थे मिट्टी के भी घर, हम अपनी आने वाली पीढ़ी को बताएंगे. जैसा कि हमारी अम्मा उस आम के पेड़ के बारे में बताती थीं कि कभी उस पर पड़ते थे सावन में झूले, कभी इस गाँव की लड़कियाँ और बहुयें कजरी गाती थीं.

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