आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

Archive for the tag “गीत”

मैं प्यासी

जब घुमड़ घिरी घनघोर घटा

रह-रहके दामिनी चमक उठी,
उपवन में नाच उठे मयूर
सौंधी मिट्टी की महक बिखरी,
बूँदें बरसीं रिमझिम-रिमझिम
सूखी धरती की प्यास बुझी,
पर मैं बिरहन प्यासी ही रही…
… … …
ये प्रकृति का भरा-पूरा प्याला
हर समय छलकता रहता है,
ऋतुओं के आने-जाने का
क्रम निशदिन चलता रहता है,
सारे के सारे तृप्त हुए
प्याले के अमृतरस को पी,
मैं प्यासी थी, प्यासी ही रही…
… … …
वो मिलन अधूरा मिलन रहा
वो रात अधूरी रात रही,
कुछ भी ना, कहा कुछ भी ना सुना
वो बात अधूरी बात रही,
वो मुझसे कुछ कहते शायद
मैं तो सुध-बुध थी खो बैठी,
मैं प्यासी थी, प्यासी ही रही…
… … …
ये कैसी ठंडी आग है जो
तन-मन में जलती रहती है,
ना मुझे समझ में आती है
ना किसी से कहते बनती है,
जब-जब भी बुझाना चाहा है
ये और बढ़ी,मैं और जली,
मैं प्यासी थी, प्यासी ही रही…
… … …
रातों में बंद पलकों से
ये यूँ ही रिसते रहते हैं,
मैं जानना चाहती हूँ लेकिन
जाने आँसू क्या कहते हैं,
इनके यूँ बहते रहने से
मौसम भीगा, मैं भी भीगी,
मैं प्यासी थी, प्यासी ही रही…
… … …
जलने की चाह रहे यूँ ही
ये प्यास, प्यास ही बनी रहे,
उनसे मिलकर ना मिलने की
ये आस, आस ही बनी रहे,
अपने अंतस की पीड़ा को
मन ही मन में, मैं सहती रहूँ,
मैं तो बस यही चाहती हूँ
मैं प्यासी थी, प्यासी ही रहूँ… …

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“…कचौड़ी गली सून कईलैं बलमू”

आजकल ब्लॉगजगत में फागुन आया हुआ है. कुछ लोगों ने तो अपने ब्लॉग पर चेतावनी भी लगा रखी है कि भई संभल के टिप्पणी देना, इस ब्लॉग पर फागुन आया है. पर, मेरा मन इन दिनों एक कजरी पर अटका हुआ है. डॉ. अरविन्द को शायद यह भी फागुन का ही असर लगे और हो भी सकता है.

असल में, कुछ दिन पहले मेरे एक मित्र ने मुझे कुछ गीत दिये, जिन्हें उस्ताद बिस्मिल्ला खां की शहनाई के साथ शोमा घोष ने अपनी मीठी आवाज़ में गाया है. इन तीन गीतों में मुझे सबसे अधिक अच्छी लगी एक कजरी, जिसे उस्ताद ने “बनारसी कजरी” कहा है. मैंने “मिर्जापुरी कजरी” सुनी है और अक्सर गुनगुनाती भी रहती हूँ. मेरी अम्मा कजरी गाती थीं. मैंने उन्हीं से सीखा था. उनके पास एक डायरी थी, जिसमें बोल और तर्ज़ के साथ बहुत से लोकगीत संकलित थे. मैं सिर्फ़ तेरह साल की थी, जब उनका स्वर्गवास हुआ. इसलिये ज़्यादा कुछ सीख नहीं पायी. मित्र के दिये इन गीतों को सुनकर मैं खो सी गयी.

शोमा घोष के बारे में मैंने बहुत सुना था, पर उन्हें नहीं सुना था. जो कजरी इस संकलन में है, उसके बोल हैं,”मिर्जापुर कईलैं गुलजार हो, कचौड़ी गली सून कईलैं बलमू.” उस्ताद की शहनाई के साथ इसका प्रभाव अद्भुत है. इसी तर्ज़ पर एक कजरी मुझे याद थी, “रिमझिम पड़इलै फुहार हो, सवनवा आइ गइलै गोरिया” इस गीत का एक अतंरा भी याद है. मिर्जापुरी कजरी जो मुझे आधी आती है, उसके बोल हैं,”पिया मेहंदी मँगाइ दा मोतीझील से, जाई के साईकील से ना…पिया मेहंदी तू मँगाइ दा, छोटी ननदी से पिसाई दा, अपने हाथ से लगाई दा कांटा कील से, जाई के साईकील से ना…” इस कजरी की तर्ज़ सामान्यतः प्रसिद्ध कजरी से अलग है. जो कजरी आमतौर पर अधिक प्रचलित है, “झूला पड़ा कदम की डारी, झूलैं राधा प्यारी रे” इसे थोड़े से अलग तर्ज़ से गाते हैं, तो ऐसे बनता है,”अरे रामा बेला फुलै आधी रात, चमेली बड़े भोरे रे हारी” यही “हारी” और “रे” के अन्तर से तर्ज़ में थोड़ा अंतर आ जाता है. इस प्रकार कजरी विधा की कुल चार तर्ज़ मैंने सुनी हैं. मुझे बस इतना ही पता है. और अधिक जानना चाहती हूँ.

सुधीजन कहेंगे कि ब्लॉगजगत इस समय फागुनमय है और कजरी के पीछे पड़ी हूँ. पर क्या करूँ, गीत सुना, तो स्वयं को रोक नहीं पायी अपने अनुभव बाँटने से.


चलो मीठा सा गीत कोई गुनगुनाएं

जाके बीते ज़माने में आज फिर से
चलो बचपन की यादों को बीन लायें,
भूलकर ज़िंदगी की परेशानियाँ,
चलो मीठा सा गीत कोई गुनगुनाएं.
… … … …
चलो पलटें पुरानी किताबों को आज,
बिछड़े यारों की फोटो को फिर से देखें,
बंद हैं घर के बक्से में बरसों से जो,
उन चिठ्ठियों और कार्डों को फिर से देखें,
अपनी बगिया के फूलों को पानी दें फिर,
छत पे जाके कबूतर को दाना खिलाएं,
चलो मीठा सा गीत कोई गुनगुनाएं … …
… … … …
दम घुटता रहा, साँस फूलती रही,
पिछले दरवाजे को कब से खोला नहीं,
रात में आँसू बनकर के बहती है जो,
बात दिल में रही, कभी बोला नहीं,
दिल के दरवाजों को आज फिर खोलकर
ताजी हवा के झोकों में झूम जायें,
चलो मीठा सा गीत कोई गुनगुनाएं … …।

(यह रचना मेरे ब्लॉग फ़ेमिनिस्ट पोएम्स पर पिछले वर्ष प्रकाशित की जा चुकी है.)

ये हवा बसंती गाती है…

मेरे मन से उनके मन तक
एक पतली डोर बँधी सी है,
कुछ बात इधर से चलती है
कुछ याद उधर से आती है…
… … …
उनके अन्तस्‌ की व्याकुलता
मैं यहाँ बैठ गुन लेती हूँ,
मेरी पुकार को बिना कहे
वो वहीं बैठ सुन लेते हैं,
वो करते हैं जब याद मुझे
मेरी नींदें उड़ जाती हैं…
… … …
यह नेह-बंध बाँधा जबसे
दो हृदय एक हो गये तभी,
बन गये वो मेरा ही हिस्सा
मैं उनके रंग में रंगी तभी,
यह बंधन रहे सदा यूँ ही
ये हवा बसंती गाती है…

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