आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

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आदत

उस घर में सिर्फ एक कमरा था, जिसमें एक रोशनदान था, एक खिड़की और एक ही दरवाजा. खिड़की के उस ओर दूसरी बिल्डिंग की दीवार होने की वजह से उससे उतनी रोशनी नहीं आती थी, जितनी आनी चाहिए. रोशनदान से थोड़ा सा आसमान दिखता था.  उसके साथ ही एक टाँड़ थी, जिस पर पिछले किरायेदार कुछ चीज़ें छोड़कर गये थे.

वो जबसे इस घर में आयी थी, एक अजीब सी बेचैनी घेरे रहती थी उसे. रात में सोते हुए भी बीच-बीच में नींद खुल जाती और उसे महसूस होता कि कोई उसे देख रहा है. हर वक्त  किसी की नज़रें अपने ऊपर चिपके रहने का एहसास होता रहता. कभी-कभी वो बेहद डर जाती थी, दूसरा घर ढूँढने के बारे में सोचती, लेकिन ये घर काफी सस्ता था और दूसरा ढूँढने के लिए न उसके पास पैसे थे और न ही फुर्सत.

एक बार रात के तीन बजे उसकी नींद खुली तो उसे महसूस हुआ कि कमरे में धुंआ फैला हुआ है. वो हडबड़ाकर उठी कि कहीं कुछ जल तो नहीं रहा, लेकिन कुछ नहीं मिला. आखिर उसने अपने मन को यह कहकर समझाया कि नीचे की बालकनी में लड़के सिगरेट पी रहे होंगे. उसने सोने की बहुत कोशिश की, पर नींद नहीं आयी. आखिर उसने एक कप चाय बनायी और पीते हुए एक किताब उठा ली.

दो-तीन दिन बाद उसे रात में पढ़ते हुए किसी की खुसुर-फुसुर सुनायी दी. ‘बगल के घर से आ रही होगी आवाज़’ उसने सोचा. पर धीरे-धीरे आवाज़ बढ़ती गयी और एकदम रसोई से आती सुनायी देने लगी. उसके रोंगटे खड़े हो गए डर के मारे. उसने ध्यान लगाकर सुनना चाहा. कोई और भाषा थी शायद.  उसने रजाई में मुँह छुपा लिया. कुछ देर बाद आवाजें बंद हो गयीं. जब उसने मुँह पर से रजाई हटाकर देखा तो टाँड़ पर एक साया सा नज़र आया. लगा कि कोई उकडूँ बैठा है. अगले ही पल उसे लगा कि बहुत अधिक डर जाने के कारण उसे भ्रम हुआ है. वहाँ कोई भी नहीं है. आखिर उसने अपना ध्यान बँटाने के लिए टी.वी. खोल लिया.

एक दिन दोपहर में उसे सोते हुए  महसूस हुआ कि किसी ने उसकी चोटी खींची. रजाई हटाने पर कोई नहीं था. वो थोड़ी परेशान हो गयी. ‘पहले तो रात में ही ये सब होता था और अब दिन में भी’ उसने सोचा. भूत-प्रेत में उसका बिलकुल विश्वास नहीं था. तो उसे ऐसे अनुभव क्यों हो रहे थे, ये समझ में नहीं आ रहा था. इस नए शहर में उसका कोई दोस्त भी नहीं था और किसी को फोन पर बताकर वो परेशान नहीं करना चाहती थी. उसे इसी कमरे में रहना था, इन्हीं अजीब हालात के साथ. उसने सोचा कि हो सकता है कि नयी जगह के साथ एडजस्टमेंट होने में अभी थोड़ा और समय लगे. उसने इन बातों पर ध्यान न देने का निश्चय किया.

उसके बाद भी अजीब घटनाएँ घटनी बंद नहीं हुईं. कभी उसे किसी चीज़ के जलने की गंध आती, कभी रसोई गैस की, तो कभी किसी के बात करने की आवाज़. पर उसे कोई परेशानी नहीं होती थी. हाँ, कभी-कभार बर्तनों के टूटने पर दुःख ज़रूर होता था. जब कांच के सभी कप और गिलासें टूट गयीं, तो वो स्टील की गिलास ले आयी और उसी में चाय पीना शुरू किया. चीनी-मिट्टी के प्लेट भी उसने दुबारा नहीं खरीदे. उसे आदत हो गयी थी रात में अचानक जल गयी बत्ती या अचानक खुल गए बाथरूम के नल को बंद करने की. बस, उसे कभी भी किसी भी घटना से नुकसान नहीं पहुँचा. ऐसा लगता था कि कोई अपनी उपस्थिति जताना चाहता है.

कोई सहेली या दोस्त आते तो असुविधा ज़रूर होती. उनके सवालों का जवाब उसे झूठ बोलकर देना पड़ता. ‘स्विच खराब है’ ‘नल ढीला है’ ‘नीचे वाले लड़के सिगरेट बहुत पीते हैं’ ‘बगल वाले बातें बहुत करते हैं’ वगैरह-वगैरह…उसने खुद को भी यही समझा लिया था कि ये घर थोड़ा डिस्टर्बिंग है, लेकिन कुल मिलाकर अच्छा है.

उसे इस घर में रहते हुए पूरा एक साल हो चुका था. एक दिन किसी ने कॉलबेल बजाई. उसने दरवाजा खोला तो देखा कि एक लड़का खड़ा है.

“आपको किससे मिलना है?” उसने पूछा.

“जी, दरअसल मैं इस घर में आपसे पहले कुछ दिन रहा था. एक दो फॉर्म में मैंने यहीं का एड्रेस दे दिया था, तो बीच-बीच में लेटर के लिए पूछने आ जाता हूँ.” लड़के ने बताया.

“पर मैंने तो आपको पहले कभी नहीं देखा”

“जी, अक्सर मैं फर्स्ट फ्लोर से ही लौट जाता हूँ. उन्हीं से मैंने कह रखा है कि मेरे नाम का लेटर आये तो वो रख लें. आज कोई नहीं था तो मैं यहाँ आ गया. आप यहाँ कबसे रह रही हैं?”

“एक साल से”

“क्या?” लड़के ने चौंककर पूछा.

“इसमें इतनी चौंकने वाली कौन सी बात है?”

“न…नहीं. ये घर तो…मेरा मतलब है…ये बहुत अजीब है. मैं यहाँ एक महीना नहीं रह पाया.”

“आप भूत-प्रेतों में विश्वास करते हैं?”

“नहीं…लेकिन…फिर भी इतने अजीब इंसिडेंट्स…पता नहीं आपको ऐसा महसूस हुआ या नहीं…जैसे…”

“जैसे धुएँ की गंध, अजीब आवाजें, कुछ साये दिखाई पड़ना”

“ह…हाँ, देखा ना…आपको भी महसूस होता है…प्रापर्टी एजेंट मान ही नहीं रहा था. कह रहा था कि मैं पागल हूँ”

“नहीं, आप पागल नहीं है, लेकिन भूतों से डरते हैं”

“मैं भूतों में बिलकुल विश्वास नहीं करता” लड़के ने खीझकर कहा.

“आप करते हैं और उनसे डरते भी हैं. मैं नहीं डरती. आपका कोई लेटर नहीं आया है. सॉरी” कहकर उसने दरवाजा बंद कर दिया.

अन्दर आकर उसने केतली से एक गिलास में अपने लिए चाय निकाली और दूसरी गिलास में निकालकर मेज के दूसरी ओर रख दिया. फिर उसने इत्मीनान से किताब उठाते हुए मुस्कुराकर रोशनदान की ओर देखा. कमरे में हल्का-हल्का धुँआ फैला हुआ था.

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छूटा हुआ कुछ

पिछले कुछ दिनों से मुझे मेरा घर बहुत याद आ रहा है. बाऊ के रहते डेढ़-दो महीने भी जिससे दूर नहीं रह पाती थी, आज उसे छूटे हुए पाँच साल से ज्यादा हो रहे हैं. कितना सोचा कि अब उस घर में लौटकर कभी नहीं जाऊँगी. पर क्या करूँ? इतनी बड़ी दुनिया में उस घर के सिवा और कहीं कोई ठिकाना भी तो नहीं.

कौन कहता है कि बिना घरवालों के घर, घर नहीं मकान होता है. मुझे लगता है कि घर की भी आत्मा होती है, ऐसा लगता है कि वो भी इस समय बहुत अकेला है और मुझे पुकार रहा है. कितना कुछ तो छूटा हुआ है मेरा उस घर में. उसी घर में हमने पहली बार महसूस किया कि अपना घर कैसा होता है? इससे पहले की ज़िंदगी तो हमने रेलवे क्वार्टरों में बिताई थी. उस घर में हम तीनों-भाई बहनों की हँसी छूटी हुयी है. दीदी की शादी के बाद अकेले अपने कमरे में बहाए हुए मेरे आँसू छूटे हुए हैं, हज़ारों ख्याल, सैकड़ों विचार जो दिमाग में उठे और कागज़ पर नहीं उतरे, उस घर के किसी कोने में ही छूट गए हैं. और इन सबसे भी बढ़कर उस घर में बाऊ की आत्मा बसी हुयी है, जिसने चाहे शरीर के.जी.एम्.सी. के ट्रामा सेंटर में छोड़ा हो, पर घूम-फिरकर उसी घर में आ गयी होगी, जिसे बाऊ ने अपनी तैंतीस साल की सर्विस से रिटायरमेंट के बाद ग्रेच्युटी और फंड के पैसों से बनवाया था. कौन जाने बाऊ की आत्मा ही खींच रही हो मुझे वहाँ? उन्हें मालूम था कि तीनों भाई-बहनों में मुझे ही सबसे ज्यादा उस घर से लगाव है.

हाँ, मुझे उस घर से बेहद लगाव है क्योंकि मेरा कोई और घर नहीं है, क्योंकि वो घर मेरे पिताजी की आकांक्षाओं का मूर्त रूप है, उस घर के नक़्शे से लेकर आतंरिक सज्जा तक में सबसे ज्यादा हाथ मेरा ही था और वहाँ मैंने अपनी ज़िंदगी के सबसे बेहतरीन और सबसे अवसाद भरे दिन बिताए हैं. दीदी की शादी के बाद मैं बहुत अकेली हो गयी थी और तब मुझे वहीं पनाह मिलती थी, अपने उस कमरे में, जिसकी खिड़की से दूर-दूर तक फैले धान के खेत दिखते थे, बारिश में नाचते मोर दिखते थे और ठंडी-ठंडी हवा आकर मेरे गालों को सहलाकर मानो सांत्वना देती थी.

मेरे लिए वो घर ही नहीं उसके आस-पास के पेड़-पौधे, पशु-पक्षी सभी मेरे अस्तित्व का हिस्सा थे. घर के अहाते में लगे सागौन पर बया घोंसले बनाया करती थी और बँसवारी में महोख और गौरय्या अपना ठिकाना बनाये हुए थे. बरामदे में लगी बोगनबेलिया और मालती के बेलों को जब बाऊ छाँटते थे, तो मुझसे बर्दाश्त नहीं होता था. मुझे लगता था कि उन्हें दर्द होता है. दक्खिन ओर की बँसवारी भी मैंने लड़-झगड़कर काटने से रोकी थी. बाऊ उसे काटना चाहते थे क्योंकि वहाँ एक धामिन ने अपना घर बना रखा था. पर मुझे ज्यादा चिंता उस पर बसने वाले पंछियों की थी. बाऊ ने सामने की ओर दुआर पर तरह-तरह के आम के पेड़ लगाए थे. जाने कहाँ से आम्रपाली ढूँढकर लाये थे, जिसमें बाऊ के जाने के साल खूब फल लगे थे और बाऊ रोज सुबह उठकर उसके फलों को गिनते थे कि कहीं चाचा की बदमाश पोती ने कुछ टिकोरे तोड़ तो नहीं लिए. अब तो वो पेड़ खूब बड़ा हो गया होगा.

मुझे आज भी याद है कि काँच की एक बोतल में लगाया मनीप्लांट टाँड़ पर से बढ़कर रोशनदान के पास पहुँच जाता था और मैं बार-बार उसे खींचकर नीचे कर देती थी. ऐसा लगता था मानो वो अपनी बाहें फैलाकर रोशनी को अपने अंदर भर लेना चाहता हो. मुझे लगा उसे खुली हवा में साँस लेना है. मैंने उस पौधे को बोतल से निकालकर मिट्टी में लगा दिया और वो थोड़ा बड़ा हुआ तो खिड़की के रास्ते अंदर कमरे की ओर बढ़ने लगा. बिलकुल कुछ ऐसे ही, मैं भी घर लौटना चाहती हूँ.

खुश रहने की कुछ वजहें

मुझे आज भी याद है, जब उसका जन्म होने वाला था और दीदी हॉस्पिटल में थीं, तो मैं तीन-चार दिन तक रोज़ सपने में एक छोटी सी गुड़िया देखती थी, पंखुरी सी कोमल, पालने में लेटी अपने नन्हे-नन्हे हाथों से मेरी उँगली पकड़ने की कोशिश करती हुयी. मैंने दीदी से कहा भी था कि ‘देखना लड़की ही होगी.’ दीदी भी बेटी ही चाहती थीं और जीजाजी जी की भी यही तमन्ना थी कि एक बेटी हो और वो भी मेरे जैसी क्योंकि वो मुझे भी बेटी की ही तरह मानते हैं.

फिर चार अक्टूबर सन 2000 का वो दिन आया जब उसने इस दुनिया में कदम रखा. मैंने हॉस्टल के अपने ब्लाक में शोर मचा दिया कि मैं मौसी बन गयी हूँ. जीजाजी से फोन पर बात हुयी और उन्होंने कहा ‘गुड्डू, उसके चेहरे पर तुम्हारे जैसा तेज है.’ हाँ, उसमें मेरा भी तो अंश है. वो अपने ददिहाल और ननिहाल दोनों जगह की पहलौठी की बिटिया है. हमारे यहाँ पहली लड़की का होना बहुत शुभ माना जाता है. कहा जाता है कि पहलौठी लड़की घर में लक्ष्मी की तरह आती है. जो भी हो, वो दोनों ही जगह खुशियाँ लेकर आयी और आज भी उसके होने से रौनक है. उसकी पैदाइश के समय नौरात्र चल रहे थे और उस दिन शीतला माता का दिन था, इसलिए उसका नाम शीतल पड़ा.

वो मुझे बहुत प्यार करती है. उसके अनुसार उसके मम्मी-पापा से ज्यादा, जबकि मुझे मालूम है कि कोई भी बच्चा अपने माँ-बाप से ज्यादा किसी को प्यार नहीं कर सकता. बस कभी-कभी ऐसा महसूस होता है. पर उनकी अहमियत उनसे दूर होकर ही पता चलती है. एक बार मैंने दीदी से कहा कि मैं एक बच्चा गोद लेना चाहती हूँ. दीदी ने शीतल की ओर इशारा करके कहा, ‘इसे ही ले जाओ’ और वो तुरंत तैयार भी हो गयी. अपना बैग-वैग पैक करने लगी. मैंने कहा, ‘अभी तो बड़ी खुश हो. दिल्ली पहुंचकर दूसरे ही दिन से मम्मी-मम्मी चिल्लाने लगोगी.’ ‘नहीं’ उसने बड़े दृढ़ होकर कहा. उसे लगता है कि उसकी मम्मी उसके छोटे भाई को ज्यादा प्यार करती है. जब वो ऐसा कहती है तो उसमें मुझे अपना अक्स दिखता है. मैं भी तो यही सोचती थी. घर में छोटा बच्चा आ जाने पर हर बड़ा बच्चा यही सोचता है. कभी-कभी डर लगता है कि वो भी कहीं भावनात्मक रूप से अपनी माँ से दूर ना हो जाए. लेकिन आजकल की पीढ़ी अपना प्यार अभिव्यक्त करने में ज्यादा उदार है और माँ-बाप भी. शीतल बड़े प्यार से बताती है कि उसका नाम ‘रानी’ है क्योंकि उसकी मम्मी उसे ‘रानी बिटिया’ कहती है. जब उसकी मम्मी उसे प्यार से बुलाती है तो उनके गले से लटक जाती है और कहती है ‘मम्मी, आई लव यू’ … नहीं,  वो मेरे जैसी नहीं है, बिल्कुल नहीं और ना ही उसकी मम्मी मेरी अम्मा जैसी. हमसे पहले की पीढ़ी जाने किस हिचक से अपने प्रेम को व्यक्त नहीं करती थी और हमारी पीढ़ी जाने किस अकड़ में इस बात को स्वीकार ही नहीं करना चाहती थी कि वो हमसे प्यार करते थे और उनके जाने के बाद अकल आती थी… तब तक देर हो चुकी होती थी.

वो अपनी हर भावना बेहिचक व्यक्त करती है- प्यार, गुस्सा, जलन सब कुछ. पिछली बार मैं अपना लैपटॉप लेकर गयी थी. ऑरकुट पर अपने बचपन की एक सहेली की बिटिया की फोटो दीदी को दिखाते हुए मैंने कहा, ‘देखो कितनी क्यूट है. स्वीटी पाई’ बस, शीतल का मुँह फूल गया, ‘ये स्वीटी पाई है तो मैं क्या हूँ?’ मैंने कहा, ‘तुम तो मेरी बिटिया हो, मेरी गुड़िया’ बस फिर क्या था? खुश. मेरे गाल पर पप्पी लेकर अपना गाल आगे कर दिया, ‘अच्छा, तो पप्पी दो’ उसके साथ रहते-रहते मुझे भी प्यार जताना आ गया है.

एक बार वो अपने भाई के साथ मार-कुटाई का खेल रही थी. मैंने कहा ‘अरे, लग जायेगी उसको.’ वो तुरंत वहाँ से चली गयी दूसरे कमरे में. मैं पीछे-पीछे गयी तो देखा कि आँखों में आँसू लेकर मखाकर बैठी हुयी थी. बोली, ‘ आप भी मम्मी की तरह शशांक को ज्यादा प्यार करती हो’ मुझे उसको समझाने के लिए जाने कितने तर्क देने पड़े. ‘वो तुमसे छोटा है’ ‘उसको अकल नहीं है’ ‘नादान है अभी’ जब मैंने कहा, ‘तुम तो सयानी बिटिया हो ना’ तब मान गयी.

उसका भाई उसके एकदम उलट एक नम्बर का बदमाश है. अभी दो दिन पहले इन लोगों से बात हुयी. शीतल ने बड़े प्यार से पूछा, ‘मौसी कब आ रही हो?’ मैंने कहा ‘तुम्हारे एक्ज़ाम के बाद’ तो शशांक बोला, ‘अब्भी आओ’ मैंने पूछा ‘कैसे?’ तो बोला ‘प्लेन छे…’ जीजाजी ने कहा प्लेन तो कबका चला गया. तो कहने लगा, ‘मौछी, आप अब्भी आओ नहीं तो फोन तोल दूँगा.’ अब बताओ, इसमें फोन की क्या गलती? पर शीतल ऐसी नहीं है. वो मेरी जूही की कली है.

आज उसकी बड़ी याद आ रही है… सुबह उठते ही उससे बात करूँगी.

घर और महानगर

घर

(१.)
शाम ढलते ही
पंछी लौटते हैं अपने नीड़
लोग अपने घरों को,
बसों और ट्रेनों में बढ़ जाती है भीड़
पर वो क्या करें ?
जिनके घर
हर साल ही बसते-उजड़ते हैं,
यमुना की बाढ़ के साथ.

(२.)
चाह है एक छोटे से घर की
जिसकी दीवारें बहुत ऊँची न हो,
ताकि हवाएँ बेरोक-टोक
इधर से उधर आ-जा सकें.

*** *** ***

महानगर

(१.)
मन घबराता है,
समझ में नहीं आता कहाँ जायें ?
महानगर के आकाश में
चाँद भी साफ नहीं दिखता,
जिसे देखकर कोई
कविता लिखी जाये.

(२.)
छोटे शहरों में
छोटी-छोटी बातें भी
बड़ी हो जाती हैं
महानगरों में,
बड़ी बातों पर भी
ध्यान नहीं देता कोई.


मिट्टी का घर, आम का पेड़, झूले, कजरी…सब बीती बातें

मेरे गाँव में बरसों पहले हमारा एक मिट्टी का घर था. आँगन, ओसार, दालान और छोटे-छोटे कमरों वाले उस बड़े से घर से धुँए, सौंधी मिट्टी, गुड़(राब) और दादी के रखे- उठे हुए सिरके की मिली-जुली गंध आती थी. घर के पश्चिम में एक बैठक थी. बैठक और घर के बीच के बड़े से दुआर में कई छोटे-बड़े पेड़ों के साथ मीठे फल और ठंडी छाँव वाला एक विशाल आम का पेड़ था, जिसके बारे में अम्मा बताती थीं कि जब वो नयी-नयी ब्याह के आयी थीं, तो सावन में उस पर झूला पड़ता था. गाँव की बहुएँ और लड़कियाँ झूला झूलते हुए कजरी गाती थीं. हमने न कजरी सुना और न झूला झूले, पर आम के मीठे फल खाये और उसकी छाया का आनंद उठाया. तब हर देसी आम के स्वाद के आधार पर अलग-अलग नाम हुआ करते थे. उस पेड़ के दो नाम थे “बड़कवा” और “मिठउआ.” घर के बँटवारे के बाद मिट्टी का घर ढहा दिया गया. उसकी जगह पर सबके अपने-अपने पक्के घर बन गये. बड़कवा आम का पेड़ पड़ा छोटे चाचा के हिस्से में. उन्होंने उसे कटवाकर अपने घर के दरवाजे बनवा दिये. वो पेड़, जो सालों से घर की छाया बना हुआ था, उसके गिरने का खतरा था…बूढ़े लोग अनुपयोगी हो जाते हैं…मँझले चाचा के हिस्से का मिट्टी का घर अभी बचा हुआ है, पर कुछ दिनों में वो भी उसे गिरवाकर ईंट और प्लास्टर का घर बनवाएंगे. एक-एक करके यूँ ही गाँव के सारे मिट्टी के घर मिट्टी में मिल जायेंगे. कभी हुआ करते थे मिट्टी के भी घर, हम अपनी आने वाली पीढ़ी को बताएंगे. जैसा कि हमारी अम्मा उस आम के पेड़ के बारे में बताती थीं कि कभी उस पर पड़ते थे सावन में झूले, कभी इस गाँव की लड़कियाँ और बहुयें कजरी गाती थीं.

गाँव की सर्दियाँ

दिल्ली की सर्दी भी हाड़ कँपा देने वाली होती है. कोहरा, धुन्ध और ठन्डी हवाओं से बचने के कुछ ही उपाय होते हैं- रजाई, चाय और हीटर. पर इस बार फिर मुझे गाँव की सर्दियों की बहुत याद आ रही है. गाँव की सर्दी का अलग स्वाद होता है, एक अपने तरह का आनंद.

हमलोग बचपन से ही शहर में पले-बढ़े, पर हमारे बाबूजी ने पहले से ही बता दिया था कि घर तो वो गाँव में ही बनवायेंगे. और  रिटायरमेंट के  बाद उन्होंने वही किया. लेकिन हम भाई-बहनों को भी गाँव से बचपन से ही लगाव था. खासकर मुझे वहाँ का वातावरण, सादगी, शान्ति बहुत अधिक रोमांचित करती थी. सर्दियों में शाम होते ही सभी घरों के दुआर पर कौड़े जल जाते थे और बच्चे-बूढ़े सभी उसके चारों ओर इकट्ठे होकर बतकही में पूरी शाम बिताते थे. बच्चों को आग तापने से कम, कौड़े में पड़ी आलू और शकरकन्द के भुनने से ज़्यादा मतलब होता था.

सुबह-सुबह नाश्ते में मटर की घुँघनी और गुड़ की चाय या ताज़े गन्ने का रस मिलता था. दुनिया का कोई भी फ़ास्टफ़ूड इस नाश्ते की बराबरी नहीं कर सकता. गुड़ की भेली बनाने के लिये जब चाचा और भाई लोग कड़ाह में गन्ने का रस पकाते थे, तो उसकी सोन्धी खुशबू दूर-दूर तक फैल जाती थी. ताज़ी भेली खाने के चक्कर में बच्चे भी भेली बँधवाने के लिये तैयार हो जाते थे. हथेली जलती रहती थी, पर क्या मज़ाल उफ़ तक कर दें. पर मेरी हिम्मत कभी भी हाथ जलाने की नहीं हुई.

मेरे बाबूजी हाते में बैठकर धूप लेते रहते थे. उस पुराने हाते को घर बनवाने के बाद भी वैसे ही छोड़ दिया गया था, बाबूजी की बागवानी का शौक पूरा करने के लिये. सोचती हूँ कि वो होते तो इस समय पूरे हाते में छोटी-छोटी क्यारियाँ बनाकर गाजर, मूली, धनिया वगैरह बो रखी होती. पता नहीं वो हाता वैसा ही होगा या उसमें बड़ी-बड़ी घासें उग आयी होंगी. बाबूजी की तेरही के बाद से घर नहीं गयी हूँ. साढ़े तीन साल हो गये अब तो. कभी-कभी मन होता है उस घर को देखने का जिसे बाबूजी ने बड़े मन से बनवाया था और जो अब सिर्फ़ मकान होकर रह गया है. पर मैं जा नहीं सकती. कैसे जाउँगी? वहाँ जाकर बाबूजी को चारपाई पर बैठकर अपनी राह ताकते नहीं पाउँगी तो क्या टिक पाउँगी एक भी पल वहाँ.

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