आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

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पंखुरियाँ

एक पत्थर पर थोड़ी चोट लगी थी. उस पर मिट्टी जम गयी. बारिश हुयी और कुछ दिन बाद उस मिट्टी में जंगली फूल खिल गए. उन फूलों पर मँडराती हैं पीले रंग की तितलियाँ और गुनगुनाते हैं भवँरे. उन्हें देख मुझे तुम्हारी याद आती है.

तुम्हीं ने तो बताया था सबसे पहली बार कि फूल की पंखुरियाँ पिघला सकती हैं पत्थर का दिल भी.

*** *** ***

वो दिन ‘कुछ अलग’ होते हैं. जब फ्रिज की सारी बोतलों में पानी भरा होता है. मैं पढ़ती रहती हूँ और दोनों टाइम का खाना मेरी टेबल पर सज जाया करता है. कोई प्यार से कहता है, ‘चलो, किताब हटाओ और खाना खा लो.’ रात में पढ़ते-पढ़ते इधर-उधर बिखरी किताबें, सुबह करीने से मेज पर सजी होती हैं.

नहीं, ये कोई सपना नहीं. ये वो दिन हैं, जब तुम साथ होते हो.

*** *** ***

मेरी ज़िंदगी की सबसे खूबसूरत सुबहें वो होती हैं, जब सुबह-सुबह तुम चाय बनाते हो. मेरे सिर पर हाथ फेरकर और माथा चूमकर मुझे उठाते हो, ‘उठो, चाय पी लो’ मैं घड़ी देखती हूँ. सुबह के दस बज गए होते हैं.

और मुझे पता है कि तुम सात बजे से जाग रहे हो.

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हम रात-दिन की तरह हैं. मैं रात की तरह शांत, ठंडी, डार्क और रहस्यों से भरी हुयी. तुम दिन की तरह प्रकाशवान, पारदर्शी, ओजस्वी और ऐक्टिव. हम अलग-अलग होते हुए भी सुबह और शाम के जरिये मिले हुए हैं. जैसे तुम मुझे सबसे पहले बचपन में मिले थे. खेलते-खेलते मैंने तुम्हें धक्का मारकर गिरा दिया था और तुम्हारा घुटना छिल गया था.

और अभी कुछ दिन पहले तुमने कहा ‘हम अभी साथ हों न हों. बुढ़ापे में साथ-साथ ही रहेंगे.’ तबसे मुझे बुढ़ापे से डर नहीं लगता, बल्कि वो पहले से अधिक रूमानी लगता है.(हाँ, मैं उन पागल लोगों में से हूँ, जिन्हें बुढ़ापा अट्रैक्ट करता है)

मैं बुढ़ापे के आने का इंतज़ार करती हूँ और तबके लिए मैंने कोई इंश्योरेंस पालिसी नहीं ली है.

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ब्लू

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ज़िंदगी, एक कैनवस पर बनी इन्द्रधनुषी तस्वीर है, जिसमें बैंगनी और हरे के बीच नीला रंग आता है। वही नीला रंग जो आकाश, समुद्र और पहाड़ों को अपने रंग में रंग लेता है। मेरा मनपसंद उदासी का गहरा नीला रंग, जितना उदास, उतना ही सुकून देने वाला भी।

वैसे  तो और भी बहुत से रंग हैं ज़िंदगी में, लेकिन ब्लू इतना ज्यादा है कि सबको अपने प्रभाव में ले लेता है। हर ओर नीला, नीला और नीला। कल कई बार इस रंग ने पूरी तरह भिगोकर रख दिया। ऐसा लग रहा था कि होली आ गयी। पर होली में नीला रंग कौन खेलता है भला…?

एक दोस्त है। बहुत परेशान है। दूर विदेश में अकेला और बीमार। रात में फोन किया उसने। अक्सर करता है। मैं उसकी बात सुनती हूँ क्योंकि उसको बहुत मानती हूँ। वो कहता जाता है अपनी बातें। कई बार रोता है। मैं बस सुनती हूँ।  इसलिए कि वो अकेला है। मैं खुद परेशान हूँ, लेकिन वो मुझे खुद से ज़्यादा परेशान लगता है। उसके दिमाग में खून के थक्के हैं। कई आपरेशन हो चुके हैं और भी कई होने हैं। हमारे देश में इस बीमारी का कोई स्थायी इलाज नहीं है शायद और अगर होगा भी तो बहुत मँहगा।

वो फोन करता है और मुझसे कुछ पूछता है। एक ऐसी बात, जो मैं उसे बता नहीं सकती। वो मुझे वास्ता देता है अपनी अपनी ज़िंदगी का, जो कि बिल्कुल अनिश्चित है…मैं तब भी नहीं बता सकती। मैं कुछ नहीं कर सकती। उदासी का गहरा रंग घेर लेता है मुझको। वो उधर रोता है, मैं इधर रोती हूँ। वो बार-बार पूछता है, पर मैं नहीं बताती। छः बार फोन करने पर भी नहीं। आखिर मैं फोन काटकर ऑफ कर देती हूँ…और सारी रात गहरे नीले रंग में डूबी रहती हूँ…

एक बहन है। गाँव में रहती है। उसकी कहानी लिखी थी मैंने अपनी पोस्ट पर। वो वहाँ घुट-घुटकर जीती है और उसकी घुटन मैं यहाँ महसूस करती हूँ। वो निकलने की कोशिश कर रही है एक अंधे कुँए से। छटपटाती है, कुछ ऊपर चढ़ती है और फिर फिसलकर वापस कुँए में गिर जाती है। कल एक फोन आया। शायद फिर वो बाहर निकलने की सोच रही है। एक सीढ़ी लगाने की कोशिश की है, देखो क्या होता है? मैं बस इतना कर सकती हूँ। मैंने परसों अपने एक दोस्त से कहा था कि मैं दूसरों की चिन्ता ज़्यादा करती हूँ। इसलिए दुखी रहती हूँ। सिर्फ अपने बारे में सोचने वाले लोग खुश रहते हैं या नहीं… पता नहीं…

एक सहली है। ज़िंदगी के दोराहे पर भ्रमित। दो रास्तों से एक रास्ता चुनना था उसे। अक्सर लड़कियों के पास विकल्प बहुत कम होते हैं और जो विकल्प होते भी हैं, उनमें से किसी एक को चुनना बहुत कठिन होता है। लड़कियाँ निश्चित दायरों में पाली-पोसी जाती हैं। उन्हें बहुत सीमित आज़ादी मिली होती है। बस ये समझ लो कि एक छोटे पिंजरे से निकालकर बड़े पिंजरे में डाल दिया जाता है। इस पिंजरे में वो थोड़े बड़े दायरे में उड़ान भरती हैं। ज़्यादा उड़ने की कोशिश करती हैं, तो पिंजरे की दीवारों से टकराकर खुद ही गिर जाती हैं। पर दरवाजे नहीं खुलते। उन्हें उसी दायरे में अपनी दुनिया बनानी होती है। जो लड़कियाँ खुला आकाश देखकर आहें भरती है, वो खुद को परेशान करती हैं। कुछ मिलने वाला नहीं होता इस चाहत से। एक और चिड़िया पिंजरे की दीवार से टकराकर गिर पड़ी और हार मान ली। शायद उसे लगा हो कि पिंजरे की गुलामी से कहीं ज़्यादा खतरनाक नीले आकाश की आज़ादी है…या शायद कुछ और…

एक दोस्त ने लंबे समय बाद फोन किया। वो बड़ा अफसर बन गया है और तबसे उसकी दुनिया दिन पर दिन चमकीली होती जा रही है। उसकी ज़िंदगी में उदासी के गाढ़े नीले रंग की कोई जगह नहीं। उसे मेरा एक काम करना था। चार महीने हो गए, काम नहीं हुआ। वो मुझे बता रहा था कि वो कितना व्यस्त है। मैं बेमन से सुन रही थी अपने नीले वालपेपर को देखते हुए….मेरे साथ बहुत बड़ी दिक्कत ये है कि जब कोई दोस्त सिर्फ अपनी खुशी के लिए मुझसे बात करता है, तो मुझे लगता है कि वो मतलबी है और जब सिर्फ मेरी हालचाल लेने के लिए फोन करता है, तो लगता है कि मेरे ऊपर एहसान कर रहा है। खासकर ऐसे बड़े अफसर बन गए दोस्तों के बारे में न चाहते हुए भी ऐसा सोचने लगती हूँ। दोस्त ऐसे हैं नहीं, मुझे ऐसा लगता है, ये मेरी प्रॉब्लम है। मुझे ये लगता है कि इस ‘सिर्फ’ को दोस्ती के बीच में नहीं होना चाहिए। खैर…

कल फिर देर रात तक नींद नहीं आयी। एक कोरे हैंडमेड कागज़ पर एक लैंडस्केप बनाया, और अधूरा छोड़ दिया। फिर कभी शायद उसे पूरा कर सकूँ…और फिर रंग भर सकूँ…अपना मनपसंद नीला रंग…

लिखि लिखि पतियाँ

सुनो प्यार,

तुमने कहा था जाते-जाते कि शर्ट धुलवाकर और प्रेस करवाकर रख देना। अगली बार आऊंगा तो पहनूँगा। लेकिन वो तबसे टंगी है अलगनी पर, वैसी ही गन्दी, पसीने की सफ़ेद लकीरों से सजी। मैंने नहीं धुलवाई।

उससे तुम्हारी खुशबू जो आती है।

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तुम्हारा रुमाल, जो छूट गया था पिछली बार टेबल पर। भाई के आने पर उसे मैंने किताबों के पीछे छिपा दिया था। आज जब किताबें उठाईं पढ़ने को, वो रूमाल मिला।

मैंने किताबें वापस रख दीं। अब रूमाल पढ़ रही हूँ।

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तुम्हारी तस्वीर जो लगा रखी है मैंने दीवार पर, उसे देखकर ट्यूशन पढ़ने आये लड़के ने पूछा, “ये कौन हैं आपके” मुझसे कुछ कहते नहीं बना।

सोचा कि अगली बार आओगे, तो तुम्हीं से पूछ लूँगी।

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सुनो, पिछली बार तुमने जो बादाम खरीदकर रख दिए थे और कहा था कि रोज़ खाना। उनमें घुन लग गए थे, फ़ेंक दिए। अगली बार आना तो फिर रख जाना।

खाऊँगी नहीं, तो देखकर याद ही करूँगी तुम्हें।

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तुमने फोन पर कहा था, “अब भी दिन में पाँच बार चाय पीती हो। कम कर दो। देखो, अक्सर एसिडिटी हो जाती है तुम्हें।” मैंने कहा, “कम कर दी।”

पता है क्यों? खुद जो बनानी पड़ती है।

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हम अक्सर उन चीज़ों को ढूँढ़ते हैं, जो मिल नहीं सकतीं और उनकी उपेक्षा कर देते हैं, जो हमारे पास होती हैं। मैंने कभी तुम्हारे प्यार की कद्र नहीं की। सहज ही मिल गया था ना।

अब नहीं करूँगी नाराज़ तुम्हें, तुम्हारी कसम। एक बार लौट आओ।

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इस दुनिया में कोई शान्ति ढूँढ़ता है, कोई ज्ञान, कोई भक्ति, कोई मुक्ति, कोई प्रेम। मैं तुमसे तुम्हारा ही पता पूछकर तुमको ढूँढ़ती हूँ और खुद खो जाती हूँ।

मुझे ढूँढ़ दो ना।

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धूसर

दुनिया को जिस रंग के चश्मे से देखो, उस रंग की दिखती है. अभी धूसर रंग छाया हुआ है. जैसे अभी-अभी आँधी आयी हो और सब जगह धूल पसर गई हो या कहीं आग लगने पर धुँआ फैला हो या सूरज डूब चुका हो और चाँद अभी निकला ना हो.

उम्र का तीसरा दशक होता ही कुछ ऐसा है. एक-एक करके सारे रूमानी सपने चिंदी-चिंदी करके बिखरने लगते हैं और उड़ती हुयी चिन्दियाँ सब कुछ धुँधला कर देती हैं. फिर धीरे-धीरे एक खोल सा उतरने लगता है. परत-दर परत दुनिया की सच्चाइयाँ सामने आने लगती हैं. मधुर सपनों के बीच रहने वाला सुकुमार मन इन सच्चाइयों की गर्मी को सह नहीं पाता. आँखें बंद कर लेता है. लेकिन इसकी जलन से बचकर कहाँ जाय? इसमें एक बार तो झुलसना ही पड़ेगा. हो सकता है कई बार भी…

कितना तो समझाया था मन को, सावधान किया था कि मत ओढ़ सपनों की ये मखमली चादर. इसमें भले ही कितना सुकून हो, पर इसे हटना ही है एक दिन. कितना कहा था कि मत चल इस राह पर. यहाँ दिखने वाले फूल असल में पत्थर हैं. जहाँ आगे बढ़े कदम लहूलुहान हो जायेंगे. पर मन अभागा किसी की सुनता है क्या?

अब उम्र का तीसरा दशक है और एक-एक करके हटते परदे, रिश्तों पर से, लोगों के चेहरों पर से, कुछ समस्याओं से, कुछ दुनियावी बातों से. जो दोस्त कल इतने करीब थे, आज हिसाब-किताब करके रिश्ते बनाते हैं और आपको छाँटकर अलग कर देते हैं क्योंकि आप दुनिया के ‘नॉर्म’ में फिट नहीं बैठते या आपका स्टैण्डर्ड उनके बराबर नहीं. कल तक जो आपको अपने सबसे बड़े शुभचिन्तक लगते थे, आज पता चलता है कि उनकी शुभचिंता आपके लिए कम, उनके अपने लिए ज्यादा थी. और एक समय आता है कि आप सबको शक की नज़र से देखने लगते हैं.

जो सबसे प्यारा था, उसे दुनिया ने छीन लिया. माँ-बाप को भगवान ने छीन लिया. ऐसे में अपना विश्वास और मासूमियत बचाए रखना दिन पर दिन कठिन होता जा रहा है. डर लगता है कि सबको अपने नॉर्म में ढालने की आदी दुनिया कहीं हमें भी ना बदल डाले. और हम भी इस बड़ी सी मशीन का टूल बनकर रह जाएँ.

किसी से कोई शिकायत तो नहीं है. उससे भी नहीं जिसने सपने देखने की आदत डाली, सपनों की उन ऊँचाइयों में तैरना सिखाया, जिसके ऊपर खुला आसमान होता था, प्यार पर विश्वास करना सिखाया, बेवजह की बातों में खुशी ढूँढना सिखाया, दूसरों के लिए जीना और सबका दिल जीतना सिखाया. लेकिन सपनों की वो ऊँची उड़ान जितनी रूमानी थी, उतनी ही खतरनाक भी. उन सपनों को टूटना ही था. हर सपने की नियति होती है टूटना. इंसान बहुत दिनों तक सो जो नहीं सकता. वो जागता है और फिर सामने होती हैं कड़वी सच्चाइयाँ- तोल-मोल के बनने वाले रिश्ते…हिसाब-किताब से जुड़ते सम्बन्ध.

इन सबके बीच सबसे ज्यादा सुकून की बात है – अकेले होना. इसका सबसे बड़ा फायदा है- आप जी भरकर रो सकते हैं, बिना इस बात की चिंता किये कि कोई आपको देख लेगा या रोक लेगा.

इस मोड़ से जाते हैं …

बहुत-बहुत मुश्किल होता है अपने ही फैलाए हुए जाल से बाहर निकलना. पहले तो हम चीज़ों को सीरियसली लेते ही नहीं, हर काम पेंडिंग में डालते चलते हैं और जब यही पेंडिंग बातें, मसले, फैसले आपस में उलझ जाते हैं, तो उन्हें सुलझाना मुश्किल से मुश्किलतर होता जाता है. कुल मिलाकर मुझे लगता है कि हिसाबी लोग अपनी ज़िंदगी में सबसे ज्यादा सफल होते हैं, हाँ खुश रहने की कोई गारंटी नहीं है क्योंकि खुशी की परिभाषा सबके लिए अलग-अलग होती है. हिसाबी लोग अपना हर काम एक निश्चित कायदे से, निश्चित समय पर निपटाते जाते हैं. उनके यहाँ चीज़ों का ढेर नहीं लगता. हर बात की, काम की एक निश्चित जगह होती है- पढ़ाई, नौकरी, शादी, फिर बच्चे…

हर उम्र की एक तासीर हुआ करती है. मेरे एक टीचर अक्सर एक कहावत दोहराते थे कि “तीस की उम्र तक जो मार्क्सवादी ना हो, उसके पास दिल नहीं होता और तीस के बाद भी जो मार्क्सवादी बना रहता है, उसके पास दिमाग नहीं होता.” सच वो दिल वाली उम्र भी क्या उम्र होती है. ग्यारह- बारह से लेकर सत्रह-अठारह तक तो अगला अपने शरीर को लेकर ही परेशान रहता है. दिल-दिमाग-शरीर का संतुलन ही गड़बड़ाया रहता है. सोचो, … अपने ही शरीर पर कंट्रोल ना हो तो. पर उसके बाद मानो दिल और शरीर ठीक-ठाक होकर दिमाग को परे धकेल देते हैं. तब शुरू होती है रूमानियत भरी एक ज़िंदगी. दुनिया का कोई ऐसा असंभव काम नहीं, जो उस उम्र में संभव ना लगे. सब तोड़ डालेंगे, फोड़ डालेंगे, दुनिया को इधर से उधर कर देंगे, पर काम तो हम अपना करके ही रहेंगे.

आज उम्र के इस पड़ाव पर आकर ज़िंदगी मानो ठिठक सी गयी है. क्या हमने जो सपनों के महल बनाए थे, वो सच में  थे या सिर्फ़ … क्या प्यार नाम की कोई चीज़ होती है दुनिया में? या ये सब सिर्फ़ ‘हार्मोन्स’ का ‘केमिकल इम्बैलेंस’ है? अगर नहीं है, तो उन दिनों ये इतना सच्चा कैसे लगता था? आखिर कोई तो चीज़ होगी परीलोक की दुनिया, जो सपनों में ही सही, कहीं तो सच्ची होगी. आखिर प्यार कुछ तो होता ही होगा… ईश्वर की तरह- कि जो मानता है, उसके लिए है और जो नहीं मानता, उसके लिए नहीं. पर ये ‘जो’ तो एक ही है ना. बस उम्र का फर्क है. यही दिल जो पहले प्यार के नाम पर मर मिटने को तैयार था, अब उसके अस्तित्व पर ही संदेह कर रहा है.

अब लगता है कि क्या क्रान्ति सच में संभव है? अगर नहीं तो हम क्यों इसके लिए अपना प्यार, अपना कैरियर, सुख-सुविधा की चीज़ें सब छोड़ने को तैयार थे? क्यों सुबह से शाम इधर-उधर घूम-घूमकर पोस्टर चिपकाया करते थे? तेज लू में भी धरना-आन्दोलन पर उतर आते थे? कड़ी धूप में भी जुलूस में निकल पड़ते थे. अब ये धूप इतना काटती क्यों है? वो सारी बातें अब फालतू क्यों लगती हैं? हम सब इतने समझदार क्यों हो गए?

सब लोग कहते हैं कि ‘तुम्हारे अंदर इतनी ऊर्जा है, इतना पोटेंशियल है. तुम चाहो तो कुछ भी कर सकती हो, पर तुम अपनी सारी ऊर्जा को ऐसी जगह पर झोंके जा रही हो, जहां ब्लैकहोल की तरह चीज़ें जाकर वापस नहीं आतीं.’ दोस्त हैं, मेरा भला चाहते हैं तो मुझे ‘रैशनल’ होने की सलाह देते हैं. पर मैं नहीं हो पा रही हूँ. मुझे पहले ही मालूम था कि मैं एक ऐसी राह पर चल पड़ी  हूँ, जहां हर कदम पर दोराहा आ जाएगा और मेरी चलने की गति धीमी हो जायेगी. मैं थोड़ी देर तो रुककर सोचूँगी ही कि अब किस ओर आगे बढूँ? नतीजतन, सब आगे बढ़ते जायेंगे और मैं पीछे छूटती जाऊंगी. ज़िंदगी से भी पीछे. पर, मैं आज भी ‘रैशनल’ नहीं हो पा रही हूँ. बड़ा मुश्किल होता है ये, जब आपमें अपार ऊर्जा हो, क्षमता हो और दिल अक्सर दिमाग पर हावी हो जाता हो. ऊपर बेकार ही ये कहा मैंने कि ‘हम सब क्यों समझदार हो गए हैं?’ कम से कम मैं तो अब भी समझदार नहीं हो सकी हूँ.

दर्दे-ए-हिज्र बेहतर है फिर तो तेरे पास होने से

मुझे तारीखें याद नहीं रहतीं. पिछली दफा तुम किस तारीख को आये, कब गए, अगली बार कब आओगे, कुछ भी नहीं. मैं कैलेण्डर के पन्ने नहीं पलटती, जिससे तुम्हारे जाने का दिन याद रहे… और जब तुम आते हो, तो अपने हाथों से नयी तारीख लगाते हो.

तुम्हारे जाने से ज़िंदगी ठहर सी जाती है. यूँ लगता है कोई हलचल ही नहीं. ना सुबह उठने की जल्दी, ना कोई काम करने का मन. बस पड़े रहने का जी करता है, जिससे ठहरी हुयी ज़िंदगी से तालमेल बिठाया जा सके.

तुम्हारे आने के ठीक पहले परदे धो दिए जाते हैं, चादरें बदल दी जाती हैं, घर के सामानों पर पड़ी धूल पोछकर साफ़ कर दी जाती है, गुलदान में नए फूल लगा दिए जाते हैं.  बस, तारीख नहीं बदली जाती, क्योंकि उसका रुके रहना या बदलना तुम तय करते हो.

और फिर…

तुम्हारे आने पर महक उठते हैं मुरझाए हुए फूल, उनके रंग चटख हो उठते हैं, पत्ते अधिक हरे हो जाते हैं, खिड़की के बाहर का आसमान गहरा नीला हो जाता है. पर… मैं ये सब नहीं देखना चाहती. मैं तुम्हारे होने को किसी और से बाँटना नहीं चाहती. फिर गहरा सन्नाटा. सुकून देता हुआ. बहुत देर तक…

‘कब जाना है?’

‘परसों’

…सुनकर लगा ज्यों दिल ने अपनी जगह छोड़ दी हो, पर काम दोगुना कर दिया. अब धडकन गले में सुनायी दे रही है और भी तेज…आँखें दो दिन बाद की घटनाएँ देखने लग जाती हैं. कान बीस डेसीबल से भी कम की आवाज सुन सकते हैं.  सन्नाटा और भी गहरा हो जाता है, पर सुकून नहीं देता. बेचैन कर देता है.

अड़तालीस घंटे अभी बाकी हैं. पर खर्चूं कैसे ? हिसाब जो नहीं आता. मुझे मालूम है मैं खर्चीली इन्हें यूँ ही गँवा दूँगी. हमारे दिल की धडकनें कुछ सोचने भी तो नहीं देतीं…

अजीब सी स्थिति है. इसे समझना मुश्किल है. गणित के सवाल हल करने से भी ज्यादा.  मुझे खुद नहीं मालूम कि मेरी हालत कैसी हो गयी?

…पता है …?

इस समय मैं दुखी नहीं हूँ. बिल्कुल नहीं. क्योंकि तुम पास हो,  लेकिन …

तुम्हें जाना है… इसलिए मैं खुश भी नहीं…

नए साल का उपहार ‘सोना’

कभी-कभी लगता है कि ज़िंदगी कितनी बकैत चीज़ है. कितनी बेरहम. किसी की नहीं सुनती. कभी नहीं रुकती. लोग आयें, बिछड़ जाएँ. साल आयें, बीत जाएँ.  ये चलती ही जाती है. सब कुछ रौंदती. किसी बुलडोज़र की तरह अपना रास्ता बनाती.

तो ये चल रही है. तारीखों के आने-जाने का इस पर कोई असर नहीं. कुछ खास तारीखें बस एक मौका देती हैं, मुड़कर एक बार देख लेने का कि ज़िंदगी कितनी बीती, कैसे बीती? कुछ हिसाब-किताब खोने-पाने का. कुछ अफ़सोस, कुछ खुशियाँ. नए साल की पूर्व संध्या भी ऐसी ही एक तारीख है जो अचानक मानो अपनी धुन में चल रही ज़िंदगी को एक झटका देती है कि ‘देख, तू बीत रही है. धीरे-धीरे रीत रही है और एक दिन खाली हो जायेगी, चुक जायेगी.’ तब होश आता है कि दोस्तों, ये ज़िंदगी तो ऐसी ही है. इसे लाइन पर लाना पड़ेगा. क्यों भाग रही है दुनिया से रेस मिलाने को? रोको इसे. कुछ लम्हें चुरा लो, कुछ खुशियाँ झटक लो. नहीं तो ये बीत जायेगी और हम हाथ मलते रह जायेंगे.

तो मैंने भी इस साल कुछ खुशियाँ झटकने की कोशिश की है. एक नया ब्लॉग बनाया है कि मैं नए-नए लोगों के विचार और भावनाएँ जान सकूँ और उसे अपने दोस्तों को बता सकूँ. … और एक पपी पाली है ‘सोना.’ ये मेरा खुद से खुद को क्रिसमस और नए साल का उपहार है. खुशियाँ कहीं बाहर नहीं होतीं, अपने ही अंदर होती हैं, बस उनको खींचकर बाहर निकालना होता है, नहीं तो ये बेरहम ज़िंदगी उन्हें अपने साथ ही लिए जायेगी.  खुशियाँ मनाने का ये मेरा अपना तरीका है. अपने जन्मदिन पर अकेली थी, तो खुद ही जाकर पेस्ट्री ले आयी और रात में एक मूवी देखते हुए पेस्ट्री खाई और आज मैं अपनी पपी के साथ नए साल की खुशियाँ मना रही हूँ. उसे पेस्ट्री नहीं खिला सकती तो उसका हिस्सा भी खुद खा रही हूँ   🙂

सोना येलो लेब्रेडोर है. अभी सिर्फ़ सैंतीस दिन की है, इसलिए मुझे उसको ठण्ड से बचाने के लिए अपने पास सुलाना पड़ता है और वो किसी छोटे बच्चे की तरह मेरी बाँह पर सर रखकर सो जाती है. मेरे हिलने-डुलने पर अजीब सी आवाज़ निकालती है गूं-गूं करके   🙂

ये रही उसकी कुछ फोटोग्राफ्स

इससे मिलती-जुलती कड़ियाँ:

मेरे घर आयी एक नन्हीं कली

अब सब कुछ पहले जैसा है

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