आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

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अकेली औरत

शीर्षक पढ़कर ही अजीब सा एहसास होता है ना? कैसे गंदे-गंदे ख़याल आ जाते हैं मन में.  “एक तो औरत, ऊपर से अकेली. कहाँ है, कैसी है, मिल जाती तो हम भी एक चांस आजमा लेते.” … ऐसा ही होता है. अकेली औरत के साथ सबसे बड़ी समस्या ये होती है कि उसे सब सार्वजनिक संपत्ति समझ लेते हैं. बिना जाने कि वह किन परिस्थितियों में अकेले रहने को मजबूर है, लोग ये समझ लेते हैं कि वो अत्यधिक स्वच्छंद प्रवृत्ति की है और इसीलिये किसी एक के साथ बंधकर नहीं रह सकती. जो लोग थोड़े भले होते हैं वो शादी ना करने के नुकसान बताकर शादी करने की सलाह देने लगते हैं. जैसे वो औरत इतनी बेवकूफ है कि उसे शादी के फायदे-नुकसान के बारे में पता ही नहीं है.

दो-तीन दिन पहले मैंने एक ब्लॉग पर टिप्पणी में ये बात कही थी और फिर यहाँ दोहरा रही हूँ कि अकेले रहना ना पूरी तरह मेरी मजबूरी है और ना ही मेरी इच्छा. बेशक मैंने बचपन से ही और लड़कियों की तरह कभी दुल्हन बनने के सपने नहीं संजोये. मैंने हमेशा ये सोचा कि मुझे कुछ अलग करना है. और ससुराल का इतना डर बिठा दिया जाता है हमारे यहाँ कि मुझे लगता था मैं जो कुछ भी करना चाहती हूँ, वो ससुराल वाले नहीं करने देंगे. इसलिए मैंने सोच लिया था कि कभी शादी नहीं करूँगी. बचपन में माँ के देहांत के बाद तो मेरा ये इरादा और पक्का हो गया था. लेकिन मैंने अकेले रहने के बारे में कभी नहीं सोचा था. मैं चाहती थी कि मैं अपने पैरों पर खड़ी हो जाऊँ और पिताजी के साथ रहूँ. हालांकि पिताजी मुझे आत्मनिर्भर देखना चाहते थे और हमेशा कहते थे कि मेरी चिंता मत करो, बस आगे बढ़ती रहो.

ऐसा नहीं है कि मैंने कभी प्यार के बारे में नहीं सोचा. और लड़कियों की तरह मैंने भी प्यार किया और हर एक उस पल को पूरी शिद्दत के साथ जिया, ये सोचकर कि पता नहीं आने वाला कल कैसा हो? लेकिन फिर भी शादी मेरे एजेंडे में नहीं थी. मुझे हर समय पिताजी की चिंता लगी रहती थी. वे घर पर अकेले रहते थे और मैं इलाहाबाद हॉस्टल में. मैं जल्द से जल्द कोई नौकरी पाकर उन्हें अपने पास बुला लेना चाहती थी. लेकिन, 2006 में पिताजी के देहांत के बाद मेरा ये सपना टूट गया. अकेले रहना मेरी मजबूरी हो गई. मैं दिल्ली आ चुकी थी और महानगरीय जीवन को काफी कुछ समझ चुकी थी. ये जानते हुए कि इलाहाबाद जैसे शहर में किसी लड़की का अकेले रहना आज भी दूभर है, मैंने दिल्ली में रहने का फैसला कर लिया.

यहाँ कम से कम आपको हर वक्त लोगों की प्रश्नवाचक दृष्टि का सामना नहीं करना पड़ता. हर तीसरा आदमी आपसे ये जानने की कोशिश नहीं करता कि आपने शादी की या नहीं, नहीं तो क्यों नहीं. कुल मिलाकर ना किसी के पास इतनी फुर्सत है और ना गरज कि वो आपके व्यक्तिगत जीवन में ताँक-झाँक करे. हाँ, कुछ महिलाओं ने ये जानने की कोशिश ज़रूर की कि मेरी ‘मैरिटल स्टेटस’ क्या है? पर मैंने किसी को कोई सफाई नहीं दी. बस  मुस्कुराकर इतना कहा कि इससे क्या फर्क पड़ता है? और आगे किसी ने कुछ नहीं पूछा.

जब आप अकेले होते हैं और आपके ऊपर कोई बंधन नहीं होता, तो खुद ही कुछ बंधन लगाने पड़ते हैं. कुछ सीमाएं खींचनी पड़ती हैं, कुछ नियम बनाने पड़ते हैं. सभी को चाहे आदमी हो या औरत. बस ये खुद पर निर्भर करता है कि कहाँ और कितनी लंबी रेखा खींचनी है. और ये बात सबको मालूम होती है अपने बारे में, कोई दूसरा ये तय नहीं कर सकता. ऐसा इसलिए ज़रूरी हो जाता है कि हर एक बात की एक सीमा होती है. अगर आप खुद से ये तय नहीं करते तो दूसरे तय करने लग जाते हैं और फिर आपके हाथ में कुछ नहीं रहता.

मैंने भी अपनी कुछ सीमाएं तय कर रखी हैं. अब चूँकि मैं अकेली हूँ और बीमार पड़ने पर कोई देखभाल करने वाला नहीं है, तो भरसक खाने-पीने का ध्यान रखती हूँ. व्यायाम करने की भी कोशिश करती हूँ. बाहर का खाना नहीं खाती, जिससे संक्रामक रोगों से बची रहूँ. मैं बहुत कम लोगों को अपना फोन नंबर देती हूँ, यहाँ तक कि अपने बेहद करीबी रिश्तेदारों को भी नहीं.  मेरा पता भी बहुत कम लोगों को मालूम है और बेहद करीबी दोस्तों के अलावा किसी को भी मैं अपने कमरे पर मिलने को नहीं बुलाती. चूँकि मुझे अपनी सुरक्षा के साथ, स्वतंत्रता का भी ध्यान रखना पड़ता है, इसलिए ये और भी ज़रूरी हो जाता है कि मैं फोन नंबर, पता ई-मेल आदि गिने-चुने लोगों को दूँ.

मेरा बहुत मन करता है रात में सड़कों पर टहलने का, पर मैंने कभी अपनी ये इच्छा पूरी करने की हिम्मत नहीं की. मैं जब भी अकेली बाहर जाती हूँ तो कोशिश करती हूँ कि  आठ-साढ़े आठ बजे तक  घर पहुँच जाऊँ. नौ बजे के बाद मोहल्ले से बाहर नहीं जाती. हमेशा ये याद रखती हूँ कि ये दिल्ली है, औरतों के लिए सबसे अधिक असुरक्षित महानगर. हाँ, अपने मोहल्ले में ग्यारह बजे तक टहल सकती हूँ क्योंकि यहाँ ज्यादातर स्टूडेंट्स रहते हैं जिनके कारण बारह-एक बजे तक चहल-पहल रहती है.

अब मैं अपनी सबसे पहली बात पर आती हूँ. अकेली औरत को प्रायः लोग सहज प्राप्य वस्तु समझ लेते हैं. अगर वो थोड़ी निडर और बोल्ड हो तो और मुसीबत. मेरे साथ दिक्कत ये है कि मैं अमूमन तो किसी से बात करती नहीं, लेकिन जब दोस्ती हो जाती है, तो एकदम से खुल जाती हूँ. मुझे जो अच्छा लगता है बेहिचक कह देती हूँ. अगर किसी पर प्यार आ गया है, तो ‘लव यू डियर’ कहने में कोई संकोच नहीं होता. मैं बहुत भावुक हूँ और उदार भी. मेरे दोस्त कई बार मुझे इस बात के लिए टोक चुके हैं कि किसी पर सिर्फ़ इसलिए प्यार मत लुटाने लग जाओ कि उसे इस प्यार की ज़रूरत है. ऐसे तो तुम प्यार बाँटते-बाँटते थक जाओगी. लेकिन चूँकि मैं बहुत कम लोगों से घुलती-मिलती हूँ, इसलिए आज तक मुझे लेकर किसी को कोई गलतफहमी नहीं हुयी.

लेकिन पिछले कुछ दिनों से ये सोच रही हूँ कि अपनी बोल्डनेस थोड़ा कम करूँ? क्या फायदा किसी को निःस्वार्थ भाव से ‘लव यू’ कह देने का या ‘लोड्स ऑफ हग्स एंड किसेज़’ दे देने का जब सामने वाला उसे लेकर भ्रमित हो जाय. मेरे ख्याल से हमारे समाज में लोग (विशेषकर पुरुष) अभी इतने परिपक्व नहीं हुए हैं कि इस तरह के प्यार को समझ पायें. उन्हें लगता है कि स्त्री-पुरुष के बीच सहज स्नेह सम्बन्ध जैसा कुछ नहीं होता. अगर होता है तो बस आदिम अवस्था वाला विपरीतलिंगी प्रेम होता है. जबकि मैं ऐसा मानती हूँ कि ऐसा प्रेम एक समय में एक ही के साथ संभव है, चाहे वो पति हो, पत्नी हो या प्रेमी. पर जब तक कि हमारा समाज इतना परिपक्व नहीं हो जाता कि सहज स्नेह को समझ सके, मेरा और सम्बन्ध बनाना स्थगित रहेगा.

अकेले रहने का इतना तो खामियाजा भुगतना ही पड़ेगा.

धूसर

दुनिया को जिस रंग के चश्मे से देखो, उस रंग की दिखती है. अभी धूसर रंग छाया हुआ है. जैसे अभी-अभी आँधी आयी हो और सब जगह धूल पसर गई हो या कहीं आग लगने पर धुँआ फैला हो या सूरज डूब चुका हो और चाँद अभी निकला ना हो.

उम्र का तीसरा दशक होता ही कुछ ऐसा है. एक-एक करके सारे रूमानी सपने चिंदी-चिंदी करके बिखरने लगते हैं और उड़ती हुयी चिन्दियाँ सब कुछ धुँधला कर देती हैं. फिर धीरे-धीरे एक खोल सा उतरने लगता है. परत-दर परत दुनिया की सच्चाइयाँ सामने आने लगती हैं. मधुर सपनों के बीच रहने वाला सुकुमार मन इन सच्चाइयों की गर्मी को सह नहीं पाता. आँखें बंद कर लेता है. लेकिन इसकी जलन से बचकर कहाँ जाय? इसमें एक बार तो झुलसना ही पड़ेगा. हो सकता है कई बार भी…

कितना तो समझाया था मन को, सावधान किया था कि मत ओढ़ सपनों की ये मखमली चादर. इसमें भले ही कितना सुकून हो, पर इसे हटना ही है एक दिन. कितना कहा था कि मत चल इस राह पर. यहाँ दिखने वाले फूल असल में पत्थर हैं. जहाँ आगे बढ़े कदम लहूलुहान हो जायेंगे. पर मन अभागा किसी की सुनता है क्या?

अब उम्र का तीसरा दशक है और एक-एक करके हटते परदे, रिश्तों पर से, लोगों के चेहरों पर से, कुछ समस्याओं से, कुछ दुनियावी बातों से. जो दोस्त कल इतने करीब थे, आज हिसाब-किताब करके रिश्ते बनाते हैं और आपको छाँटकर अलग कर देते हैं क्योंकि आप दुनिया के ‘नॉर्म’ में फिट नहीं बैठते या आपका स्टैण्डर्ड उनके बराबर नहीं. कल तक जो आपको अपने सबसे बड़े शुभचिन्तक लगते थे, आज पता चलता है कि उनकी शुभचिंता आपके लिए कम, उनके अपने लिए ज्यादा थी. और एक समय आता है कि आप सबको शक की नज़र से देखने लगते हैं.

जो सबसे प्यारा था, उसे दुनिया ने छीन लिया. माँ-बाप को भगवान ने छीन लिया. ऐसे में अपना विश्वास और मासूमियत बचाए रखना दिन पर दिन कठिन होता जा रहा है. डर लगता है कि सबको अपने नॉर्म में ढालने की आदी दुनिया कहीं हमें भी ना बदल डाले. और हम भी इस बड़ी सी मशीन का टूल बनकर रह जाएँ.

किसी से कोई शिकायत तो नहीं है. उससे भी नहीं जिसने सपने देखने की आदत डाली, सपनों की उन ऊँचाइयों में तैरना सिखाया, जिसके ऊपर खुला आसमान होता था, प्यार पर विश्वास करना सिखाया, बेवजह की बातों में खुशी ढूँढना सिखाया, दूसरों के लिए जीना और सबका दिल जीतना सिखाया. लेकिन सपनों की वो ऊँची उड़ान जितनी रूमानी थी, उतनी ही खतरनाक भी. उन सपनों को टूटना ही था. हर सपने की नियति होती है टूटना. इंसान बहुत दिनों तक सो जो नहीं सकता. वो जागता है और फिर सामने होती हैं कड़वी सच्चाइयाँ- तोल-मोल के बनने वाले रिश्ते…हिसाब-किताब से जुड़ते सम्बन्ध.

इन सबके बीच सबसे ज्यादा सुकून की बात है – अकेले होना. इसका सबसे बड़ा फायदा है- आप जी भरकर रो सकते हैं, बिना इस बात की चिंता किये कि कोई आपको देख लेगा या रोक लेगा.

नए साल का उपहार ‘सोना’

कभी-कभी लगता है कि ज़िंदगी कितनी बकैत चीज़ है. कितनी बेरहम. किसी की नहीं सुनती. कभी नहीं रुकती. लोग आयें, बिछड़ जाएँ. साल आयें, बीत जाएँ.  ये चलती ही जाती है. सब कुछ रौंदती. किसी बुलडोज़र की तरह अपना रास्ता बनाती.

तो ये चल रही है. तारीखों के आने-जाने का इस पर कोई असर नहीं. कुछ खास तारीखें बस एक मौका देती हैं, मुड़कर एक बार देख लेने का कि ज़िंदगी कितनी बीती, कैसे बीती? कुछ हिसाब-किताब खोने-पाने का. कुछ अफ़सोस, कुछ खुशियाँ. नए साल की पूर्व संध्या भी ऐसी ही एक तारीख है जो अचानक मानो अपनी धुन में चल रही ज़िंदगी को एक झटका देती है कि ‘देख, तू बीत रही है. धीरे-धीरे रीत रही है और एक दिन खाली हो जायेगी, चुक जायेगी.’ तब होश आता है कि दोस्तों, ये ज़िंदगी तो ऐसी ही है. इसे लाइन पर लाना पड़ेगा. क्यों भाग रही है दुनिया से रेस मिलाने को? रोको इसे. कुछ लम्हें चुरा लो, कुछ खुशियाँ झटक लो. नहीं तो ये बीत जायेगी और हम हाथ मलते रह जायेंगे.

तो मैंने भी इस साल कुछ खुशियाँ झटकने की कोशिश की है. एक नया ब्लॉग बनाया है कि मैं नए-नए लोगों के विचार और भावनाएँ जान सकूँ और उसे अपने दोस्तों को बता सकूँ. … और एक पपी पाली है ‘सोना.’ ये मेरा खुद से खुद को क्रिसमस और नए साल का उपहार है. खुशियाँ कहीं बाहर नहीं होतीं, अपने ही अंदर होती हैं, बस उनको खींचकर बाहर निकालना होता है, नहीं तो ये बेरहम ज़िंदगी उन्हें अपने साथ ही लिए जायेगी.  खुशियाँ मनाने का ये मेरा अपना तरीका है. अपने जन्मदिन पर अकेली थी, तो खुद ही जाकर पेस्ट्री ले आयी और रात में एक मूवी देखते हुए पेस्ट्री खाई और आज मैं अपनी पपी के साथ नए साल की खुशियाँ मना रही हूँ. उसे पेस्ट्री नहीं खिला सकती तो उसका हिस्सा भी खुद खा रही हूँ   🙂

सोना येलो लेब्रेडोर है. अभी सिर्फ़ सैंतीस दिन की है, इसलिए मुझे उसको ठण्ड से बचाने के लिए अपने पास सुलाना पड़ता है और वो किसी छोटे बच्चे की तरह मेरी बाँह पर सर रखकर सो जाती है. मेरे हिलने-डुलने पर अजीब सी आवाज़ निकालती है गूं-गूं करके   🙂

ये रही उसकी कुछ फोटोग्राफ्स

इससे मिलती-जुलती कड़ियाँ:

मेरे घर आयी एक नन्हीं कली

अब सब कुछ पहले जैसा है

उलझन-उलझन ज़िंदगी …

उलझन-उलझन ज़िंदगी… सुलझती ही नहीं… सुलझाने के चक्कर में हम और भी उलझते जाते हैं…एक धागा सुलझाते हैं कि कोई दूसरा उलझ जाता है. कभी हांफते, कभी थक जाते … हम सभी अपनी उलझनों को सुलझा लेना चाहते हैं, पर ये नहीं सोचना चाहते कि ये उलझन पैदा कहाँ से हुई… सिरा ही तो नहीं मिलता…

कभी-कभी लगता है कि मैं सबसे अधिक परेशान हूँ, तो कभी दूसरों की मुश्किलें खुद से ज्यादा बड़ी लगती हैं. मैं सोचती हूँ कि मुझे अफ़सोस नहीं होना चाहिए  क्योंकि इस उलझन को मैंने खुद चुना था… ‘उलटी धारा में तैरेंगे, फिर चाहे तो बह जाएँ या डूब जाएँ’, ये जिद अपनी ही थी…पर क्या सच में?…ये हमारी पसंद थी या मजबूरी?  अगर विकल्प होते तो क्या हम वही चुनते, या कुछ और?

हमारी ज़िंदगी के फैसले लेने में विकल्पों की कमी क्या सिर्फ मुझे ही सालती है या और लोगों को भी? क्या मेरे पास सारे संसाधन होते तो मैं वही करती, जो अभी कर रही हूँ? या कुछ और करती. बहुत कोशिश करने पर भी समझ में नहीं आता, पर, अब समझ में आकर भी क्या करेगा? जब समझ में आना चाहिए था, तब पहली बात तो विकल्प ही नहीं थे, और जो थोड़े विकल्प थे भी, उनमें से क्या चुनें, इसकी समझ नहीं थी.

हम सभी की ज़िंदगी में एक समय ऐसा आता है, जब रूककर खुद को, अपनी ज़िंदगी को, समझने की ज़रूरत महसूस होती है. ऐसा तब होता है, जब हम अपने बहुत करीब होते हैं… हममें से सभी खुद से बातें करते होंगे, खुद को समझने की कोशिश करते होंगे, पर समझ में कभी नहीं आता. कोई भी अतीत के बारे में परिकल्पना का सहारा लेकर किसी परिणाम पर नहीं पहुँच सकता कि यूँ होता तो क्या होता, वैसा होता तो क्या होता…हम आज जो हैं जैसे हैं, वैसे होते या कुछ और? बहुत सी बातों पर हम पछताते हैं, बहुत सी बातों पर राहत की साँस लेते हैं, पर, हम उसे बदल नहीं सकते और ना ही ये जान सकते हैं कि अगर वैसा ना होता जैसा कि हुआ है, तो कैसा होता? संभाविता की ये बातें आदमी को हमेशा तंग करती रही हैं और करती रहेंगी…

हम कभी ये नहीं जान सकते कि अमुक समय पर अगर हम वो निर्णय ना लेते, तो परिणाम क्या होता…? हम बस अपनी उलझनों में उलझे रहेंगे …इन उलझनों को हम सुलझा पायें या नहीं, पर कोशिश करते ही रहेंगे… हो सकता है कि हम आने वाली पीढ़ी को कुछ बेहतर विकल्प दे पायें या कोई अनचाहा निर्णय लेने से रोक पायें.

वो ऐसे ही थे (1.)

इस ३० जून को उनको गए पूरे चार साल हो गए… इन सालों में एक दिन भी ऐसा नहीं गुजरा, जब मैंने उन्हें याद ना किया हो… आखिर अम्मा के बाद वही तो मेरे माँ-बाप दोनों थे. परसों उनकी पुण्यतिथि थी और मज़े की बात ये कि मैं उदास नहीं थी. मुझे उनके कुछ बड़े ही मजेदार किस्से याद आ रहे थे… कुछ ऐसी बातें, जो उन्हें एक अनोखा व्यक्तित्व बनाती थीं… ऐसे व्यक्ति, जिनके बारे में लोग कहते थे कि वह अपने समय से पचास साल से भी आगे की सोच रखने वाले थे.

वे बहुत मस्तमौला थे,ये तो मैं पहले भी बता चुकी हूँ… बेहद निश्चिन्त, फक्कड़, दूरदर्शी, पर भविष्य की चिंता ना करने वाले . मेरी और उनकी उम्र में लगभग बयालीस-तैंतालीस साल का अंतर था. कहते हैं कि एक पीढ़ी के बाद ‘जेनरेशन गैप’ मिट सा जाता है, इसीलिये बाबा-दादी की पोते-पोतियों से ज्यादा पटती है. हमारी भी बाऊ से खूब जमती थी. हम उनसे इतने घुले-मिले थे कि उन्हें ‘तुम’ कहकर ही संबोधित करते थे. आमतौर पर बच्चे माँ को तुम और पिता को आप कहते हैं.  इसका एक कारण यह भी था कि उन्हें अम्मा की भूमिका भी निभानी पड़ रही थी और उन्होंने हमें अम्मा से कम प्यार नहीं दिया.

बाऊ 2005 (दीदी के यहाँ भरूच में ली गयी आख़िरी फोटोग्राफ)

हमें बचपन से ही उन्होंने तर्क करना सिखाया था और उनसे सबसे ज्यादा बहस मैं ही करती थी. उनकी हर वो बात, जो मुझे सही नहीं लगती, मैं काट देती थी, उसका विरोध करती थी, उन्होंने भी तो यही किया था… बस कोई बात इसलिए ना मान लेना कि उसे बड़े हमेशा से मानते आये हैं. मेरे तर्क करने पर वो खुश होते थे. मुझे लेकर बहुत निश्चिन्त भी थे. अक्सर कहते थे कि बाकी दो बच्चों की शादी-ब्याह की चिंता है, इसके लिए वर ढूँढना मेरे बस की बात नहीं… मेरे कॅरियर को लेकर भी उन्हें अधिक चिंता नहीं थी. ना जाने क्यों इतनी आश्वस्ति थी मेरे बारे में???

उनके मस्तमौलापन का एक किस्सा है. बाऊ ने अपनी पेंशन उन्नाव से आज़मगढ़ ट्रांसफर करवाई थी. डाक की लापरवाही से कागज़ कहीं खो गया और फिर से कागज़ बनवाने की औपचारिकता में पूरे एक साल उन्हें पेंशन नहीं मिली. अपनी जमा-पूँजी तो दीदी की शादी में लगा दी थी. पेंशन से ही घर चल रहा था. मैं पहले ही दीदी की शादी के बाद अकेली पड़ गयी थी. इस फाइनेंसियल क्राइसिस की वजह से भयंकर डिप्रेशन में चली गयी. अक्सर मैं ‘सुसाइडल’ हो जाती थी, हालांकि कभी सीरियस अटेम्प्ट नहीं किया… गेहूं में रखने के लिए लाई गयी सल्फास की गोलियों के पास जा-जाकर लौट आती थी. एक दिन बाऊ से पुछा कि “बाऊ, कितनी सल्फास की गोलियाँ खाने पर तुरंत मौत आ जायेगी.” उन्होंने अखबार पढ़ते-पढ़ते ही जवाब दिया, “बड़ों के लिए चार-पाँच काफी हैं, छोटे दो-तीन में ही भगवान को प्यारे हो जाते हैं. तुम चाहो तो दसों खा लो, जिससे कोई कमी ना रह जाए.” वे ऐसे बोल रहे थे, जैसे आत्महत्या विज्ञान में पीएच.डी. कर रखी हो… फिर अखबार हटाकर कहने लगे, “वैसे सल्फास खाकर मरना बहुत तकलीफ देता है. तुम ऐसा करो फाँसी लगा लो. वो जो तुम्हारे कमरे में पंखा है ना, उसी से लटक जाओ.” … बताओ, अपने बच्चों से कोई ऐसे कहता है… और मेरा क्या हाल हुआ होगा???… मैंने इतनी सीरियसली पूछा था. सोचा था कि दौड़े चले आयेंगे और कहेंगे “क्यों गुड्डू बेटा, तुम मरना क्यों चाहती हो” पर सब कचरा करके रख दिया… मुझे तब बड़ा गुस्सा आ रहा था, अब हँसी आती है.

मैं थोड़ी देर तक वहीं खड़ी रही. वो वापस अखबार पढ़ने लगे और थोड़ी देर बाद बोले, “तुम्हारे मरने से सारी समस्याएँ हल नहीं हो जायेंगी और ना दुनिया रुक जायेगी, बस तुम्हारा नुक्सान होगा. इतनी प्यारी चीज़ तुमसे छिन जायेगी और दोबारा कभी नहीं मिलेगी … तुम्हारी ज़िंदगी.” उसके बाद मैंने आत्महत्या के बारे में कभी नहीं सोचा… वो ऐसे ही थे.

जारी…


उनकी ज़िंदगी के वो रूमानियत भरे दिन (2.)

हिन्दी सिनेमा का स्वर्णकाल (पचास और साठ के दशक) पिताजी के जीवन का भी स्वर्णकाल था क्योंकि वे उस समय युवा थे और नयी-नयी शादी हुयी थी. अपने खानदान क्या, पूरे गाँव में अपनी पत्नी को अपने साथ शहर लाने वाले पिताजी पहले युवक थे. नहीं तो उस समय पिया लोग कमाने रंगून और कलकतवा चले जाते थे और पियानियाँ (मतलब पत्नियाँ) घर बैठकर विरह में कजरी और बिदेसिया गाती थीं–“चार रे महीना कहि के गइलैं कलकतवा बीति गइलैं बारह बरीस रे बिदेसिया” इससे ये पता चलता है कि पिया लोग बरसों घर नहीं जाते थे और पत्नियाँ सौतन की कल्पना कर-करके जल-जलकर राख होती थीं और “कोयला भई न राख” वाली गति बना लेती थीं. पिताजी ने अम्मा को बिरहगीत गाने का मौका ज्यादा नहीं दिया और शादी के लगभग तीन साल बाद(तीन साल तब भी लगा दिये) अम्मा को लेकर उन्नाव आ गये, जहाँ वे उस समय पोस्टेड थे.

दरअसल अम्मा को साथ ले जाने का एक विशेष कारण था. उन दिनों बिजली आदि से चलने वाली चक्की नहीं होती थी. औरतें घर में ही जांता (हाथ चक्की) चलाकर आटा पीसती थीं और दाल दरती थीं. इसलिये सुबह-सुबह मुँह अँधेरे उठना पड़ता था. अम्मा को ये सब करने में कोई परेशानी नहीं थी. पर भयंकर जाड़े में भी भोर में नहाकर और एक कपड़ा पहनकर ही खाना बनाना पड़ता था (जैसा कि मैं पहले बता चुकी हूँ खाना बनाते और खाते समय दर्जी का सिला कपड़ा पहनने की अनुमति नहीं थी). अम्मा का जब ब्याह हुआ था, तो वो सिर्फ़ 15 साल की थी. बेहद दुबली-पतली बेचारी अम्मा की हड्डियाँ काँप जाती थीं जाड़े में. घर की बड़ी बहू होने के कारण सारे घर की ज़िम्मेदारी भी अम्मा पर ही थी. इतना सारा काम करने के कारण अम्मा बीमार रहने लगीं. उस पर भी कोई उन पर ध्यान नहीं देता था. घर की बहुओं की औकात ही क्या होती है? उन्हीं दिनों हमारी छोटी बुआ का टी.बी. का रोग लगने से देहांत हो गया. उन दिनों ये एक घातक बीमारी थी और इसका कोई इलाज नहीं था. अम्मा ने उनकी बड़ी सेवा की थी. पिताजी को जब अम्मा की बीमारी का पता लगा, तो उन्हें लगा कि कहीं अम्मा को भी ये रोग न लग जाये. तो उन्होंने फिर से घर वालों का विरोध करते हुये अम्मा को साथ ले जाने का फ़ैसला कर लिया. ले गये थे वो अम्मा का इलाज कराने, पर वापस पहुँचाने नहीं गये.

जैसा कि मैंने पहले भी बताया है कि अम्मा-पिताजी की शादी के लगभग ग्यारह साल बाद दीदी का जन्म हुआ था. इस बीच अम्मा रह रहकर बीमार पड़ जाती थीं और उनका इलाज चलता रहता था. अम्मा-पिताजी ने बाल-बच्चे न होने का खूब फ़ायदा उठाया. खूब घूमे-फिरे, फ़िल्में देखीं, बाहर खाना खाया(अम्मा ने नहीं, वो बाहर का नहीं खाती थीं, मरते दम तक नहीं खाया) रेडियो पर खूब गाने सुने( उन दिनों किसी के पास रेडियो होना बड़ी बात थी) और खूब गप्पें हाँकीं. कुल मिलाकर वो दिन उनकी ज़िन्दगी के रूमानियत भरे दिन थे.

वो समय हिन्दी सिनेमा का ही नहीं, भोजपुरी सिनेमा का भी स्वर्णकाल था. भोजपुरी की पहली फ़िल्म थी “गंगा मैया तोहैं पियरी चढ़इबौं.” अम्मा को ये फ़िल्म बहुत पसन्द थी और इसके गाने वो अक्सर गुनगुनाया करती थीं. इसके अलावा “बिदेसिया” और “लागी नहीं छूटे रामा” फ़िल्मों की भी अम्मा बहुत प्रशंसा करती थीं. बिदेसिया का गाना “हंसि-हंसि पनवा खिअउलै बेइमनवा” अम्मा का मनपसंद गाना था. इसके अलावा जो गाना उन्हें अच्छा लगता था–“लाले-लाले ओठवा से बरसै ललइया, हो कि रस चुऐला, जइसै अमवा की डरिया से रसा चुऐला”(ये गाना तलत महमूद और लता जी ने गाया है). सब लोग बताते हैं कि जब मैं छोटी थी, तो अम्मा के गाने दोहराती थी. मेरी तोतली बोली में भोजपुरी गाने सबको बहुत अच्छे लगते थे. मज़े की बात कि मैं भोजपुरी न तब बोल पाती थी और न अब बोल पाती हूँ, पर गाने गा लेती हूँ.

अम्मा-पिताजी फ़िल्मों के इतने दीवाने थे कि कभी-कभी एक सिनेमाहाल से निकलते थे फ़िल्म देखकर और दूसरे में घुस जाते थे. लोग कहते हैं कि आजकल समाज पर फ़िल्मों का कुछ ज्यादा ही असर दिख रहा है, तो वो तब भी कम नहीं था. उसी समय देवानंद के सफेद शर्ट और काली पैंट के साथ काली कोट पहनने पर पाबंदी लग गयी थी क्योंकि कुछ लड़कियों ने उन्हें इस पोशाक में देखकर आत्महत्या कर ली थी. मेरे पिताजी भी बहुत ही हैंडसम थे. पाचँ फिट ग्यारह इंच की लम्बाई, गोरा-चिट्टा रंग और छरहरा शरीर. कोई उन्हें देवानंद कहता था, तो कोई सुनील दत्त और मेरी अम्मा पिताजी पर वारी-वारी जाती थीं.


उनकी ज़िन्दगी के वो रूमानियत भरे दिन (1.)

पिताजी ने पढ़ाई पूरी करते ही घर छोड़ दिया था. वे वहाँ से बाहर निकलकर कुछ करना चाहते थे और अपनी ज़िन्दगी अपने ढंग से जीना चाहते थे. गाँव की कुरीतियों और अन्धविश्वासों से उनका मन भी ऊबा  था. फिर तब खेती में बहुत श्रम करने पर भी कम आय होती थी और सिर्फ़ लोगों का पेट भर पाता था.

पिताजी जब अपनी युवावस्था के दिनों के बारे में बताते थे तो हमें लगता था कि हम कोई पुरानी रोमैंटिक हिन्दी फ़िल्म देख रहे हों. पिताजी की शादी उस ज़माने के और लोगों की ही तरह माता-पिता की इच्छा से हुयी थी. फ़र्क सिर्फ़ इतना था कि उन दिनों शादी के पहले जब लड़की-लड़का एक-दूसरे को देखने के बारे में सोच भी नहीं सकते थे, पिताजी ने अम्मा को देखकर शादी की थी. और उसकी भी एक मज़ेदार कहानी थी.

पिताजी उन दिनों रेलवे में शंटमैन थे. यद्यपि उनकी शिक्षा के हिसाब से वो नौकरी नहीं थी, पर गाँव से बाहर निकले, अपने दम पर अपनी जगह बनाने वाले लोगों को संघर्ष तो करना ही पड़ता है. उन दिनों लोग रेलवे में कच्चे में काम करने लगते थे और कुछ दिन काम करने के बाद उन्हें परमानेंट कर दिया जाता था. तो पिताजी कच्चे में लगे थे. उनकी शिक्षा और स्वभाव के कारण लोग उनका बहुत सम्मान करते थे. वे मालीपुर नाम के एक स्टेशन पर पोस्टेड थे. कच्चे कर्मचारियों को रेलवे का घर तो मिलता नहीं था. इसलिये एक जन के यहाँ किराये पर रहते थे. आस-पड़ोस के लोग उन साहब से कहने लगे कि वो अपनी लड़की का ब्याह चौबे से करा दें. अब क्या था ? पिताजी के मित्रगण उनको चिढ़ाने लगे. वो लड़की भी पिताजी से अपनी शादी के सपने सजाने लगी. पर वो लोग कान्यकुब्ज़ ब्राह्मण थे और हम सरयूपारीण. हमारे समाज में आज भी दोनों कैटेगरी के ब्राह्मण अपने आपको स्वघोषित रूप से श्रेष्ठ मानते हैं और एक-दूसरे के यहाँ शादी नहीं करते हैं, तो उस ज़माने में तो सवाल ही नहीं उठता था.

पिताजी के ममेरे भाई वहीं रहते थे. जब उन्हें पता चला तो भड़क गये. उन्हीं दिनों घर पर अम्मा का रिश्ता आया पिताजी के लिये. पिताजी के ममेरे भाई उन्हें धोखे से अम्मा के गाँव ले गये और उन्हें अम्मा के दर्शन करा दिये. तब अगर कोई लड़का, लड़की को शादी के लिये देख लेता था, तो ना नहीं कर सकता था. पिताजी को तो मालूम भी नहीं था और उनके ममेरे भाई ने ये बात फैला दी कि कृष्णदेव ने लड़की देखकर पसंद कर ली है. तो इस तरह उनको अम्मा से शादी करनी पड़ी.

पिताजी बताते थे कि उन्हें पहली नज़र में अम्मा अच्छी नहीं लगी थीं. उनकी नज़र में तो गोरी-चिट्टी मालीपुर वाली बसी थीं और अम्मा थी साँवली. पर जब पिताजी ने अम्मा को देखा था, तो नानी उनके बालों में तेल लगा रही थीं और पिताजी की नज़र उनके काले-घने और लम्बे बालों में अटक गयी थी. पिताजी अक्सर बाद में अम्मा को छेड़ते थे कि “मेरी शादी मालीपुर वाली से होती तो मेरे बच्चे गोरे-चिट्टे होते” और मैं अम्मा का बचाव करते हुये तपाक से कहती कि “इतने बुद्धिमान न होते” फिर दीदी कहती और “इतने लम्बे भी नहीं.” पिताजी कहते कि “वो सीधी-सादी थी, तुम्हारी अम्मा की तरह झगड़ालू नहीं” और हम कहते “भोदू रही होगी, इतनी तेज-तर्रार नहीं” अम्मा मुस्कुराकर रह जाती थीं.


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