आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

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अकेली औरत

शीर्षक पढ़कर ही अजीब सा एहसास होता है ना? कैसे गंदे-गंदे ख़याल आ जाते हैं मन में.  “एक तो औरत, ऊपर से अकेली. कहाँ है, कैसी है, मिल जाती तो हम भी एक चांस आजमा लेते.” … ऐसा ही होता है. अकेली औरत के साथ सबसे बड़ी समस्या ये होती है कि उसे सब सार्वजनिक संपत्ति समझ लेते हैं. बिना जाने कि वह किन परिस्थितियों में अकेले रहने को मजबूर है, लोग ये समझ लेते हैं कि वो अत्यधिक स्वच्छंद प्रवृत्ति की है और इसीलिये किसी एक के साथ बंधकर नहीं रह सकती. जो लोग थोड़े भले होते हैं वो शादी ना करने के नुकसान बताकर शादी करने की सलाह देने लगते हैं. जैसे वो औरत इतनी बेवकूफ है कि उसे शादी के फायदे-नुकसान के बारे में पता ही नहीं है.

दो-तीन दिन पहले मैंने एक ब्लॉग पर टिप्पणी में ये बात कही थी और फिर यहाँ दोहरा रही हूँ कि अकेले रहना ना पूरी तरह मेरी मजबूरी है और ना ही मेरी इच्छा. बेशक मैंने बचपन से ही और लड़कियों की तरह कभी दुल्हन बनने के सपने नहीं संजोये. मैंने हमेशा ये सोचा कि मुझे कुछ अलग करना है. और ससुराल का इतना डर बिठा दिया जाता है हमारे यहाँ कि मुझे लगता था मैं जो कुछ भी करना चाहती हूँ, वो ससुराल वाले नहीं करने देंगे. इसलिए मैंने सोच लिया था कि कभी शादी नहीं करूँगी. बचपन में माँ के देहांत के बाद तो मेरा ये इरादा और पक्का हो गया था. लेकिन मैंने अकेले रहने के बारे में कभी नहीं सोचा था. मैं चाहती थी कि मैं अपने पैरों पर खड़ी हो जाऊँ और पिताजी के साथ रहूँ. हालांकि पिताजी मुझे आत्मनिर्भर देखना चाहते थे और हमेशा कहते थे कि मेरी चिंता मत करो, बस आगे बढ़ती रहो.

ऐसा नहीं है कि मैंने कभी प्यार के बारे में नहीं सोचा. और लड़कियों की तरह मैंने भी प्यार किया और हर एक उस पल को पूरी शिद्दत के साथ जिया, ये सोचकर कि पता नहीं आने वाला कल कैसा हो? लेकिन फिर भी शादी मेरे एजेंडे में नहीं थी. मुझे हर समय पिताजी की चिंता लगी रहती थी. वे घर पर अकेले रहते थे और मैं इलाहाबाद हॉस्टल में. मैं जल्द से जल्द कोई नौकरी पाकर उन्हें अपने पास बुला लेना चाहती थी. लेकिन, 2006 में पिताजी के देहांत के बाद मेरा ये सपना टूट गया. अकेले रहना मेरी मजबूरी हो गई. मैं दिल्ली आ चुकी थी और महानगरीय जीवन को काफी कुछ समझ चुकी थी. ये जानते हुए कि इलाहाबाद जैसे शहर में किसी लड़की का अकेले रहना आज भी दूभर है, मैंने दिल्ली में रहने का फैसला कर लिया.

यहाँ कम से कम आपको हर वक्त लोगों की प्रश्नवाचक दृष्टि का सामना नहीं करना पड़ता. हर तीसरा आदमी आपसे ये जानने की कोशिश नहीं करता कि आपने शादी की या नहीं, नहीं तो क्यों नहीं. कुल मिलाकर ना किसी के पास इतनी फुर्सत है और ना गरज कि वो आपके व्यक्तिगत जीवन में ताँक-झाँक करे. हाँ, कुछ महिलाओं ने ये जानने की कोशिश ज़रूर की कि मेरी ‘मैरिटल स्टेटस’ क्या है? पर मैंने किसी को कोई सफाई नहीं दी. बस  मुस्कुराकर इतना कहा कि इससे क्या फर्क पड़ता है? और आगे किसी ने कुछ नहीं पूछा.

जब आप अकेले होते हैं और आपके ऊपर कोई बंधन नहीं होता, तो खुद ही कुछ बंधन लगाने पड़ते हैं. कुछ सीमाएं खींचनी पड़ती हैं, कुछ नियम बनाने पड़ते हैं. सभी को चाहे आदमी हो या औरत. बस ये खुद पर निर्भर करता है कि कहाँ और कितनी लंबी रेखा खींचनी है. और ये बात सबको मालूम होती है अपने बारे में, कोई दूसरा ये तय नहीं कर सकता. ऐसा इसलिए ज़रूरी हो जाता है कि हर एक बात की एक सीमा होती है. अगर आप खुद से ये तय नहीं करते तो दूसरे तय करने लग जाते हैं और फिर आपके हाथ में कुछ नहीं रहता.

मैंने भी अपनी कुछ सीमाएं तय कर रखी हैं. अब चूँकि मैं अकेली हूँ और बीमार पड़ने पर कोई देखभाल करने वाला नहीं है, तो भरसक खाने-पीने का ध्यान रखती हूँ. व्यायाम करने की भी कोशिश करती हूँ. बाहर का खाना नहीं खाती, जिससे संक्रामक रोगों से बची रहूँ. मैं बहुत कम लोगों को अपना फोन नंबर देती हूँ, यहाँ तक कि अपने बेहद करीबी रिश्तेदारों को भी नहीं.  मेरा पता भी बहुत कम लोगों को मालूम है और बेहद करीबी दोस्तों के अलावा किसी को भी मैं अपने कमरे पर मिलने को नहीं बुलाती. चूँकि मुझे अपनी सुरक्षा के साथ, स्वतंत्रता का भी ध्यान रखना पड़ता है, इसलिए ये और भी ज़रूरी हो जाता है कि मैं फोन नंबर, पता ई-मेल आदि गिने-चुने लोगों को दूँ.

मेरा बहुत मन करता है रात में सड़कों पर टहलने का, पर मैंने कभी अपनी ये इच्छा पूरी करने की हिम्मत नहीं की. मैं जब भी अकेली बाहर जाती हूँ तो कोशिश करती हूँ कि  आठ-साढ़े आठ बजे तक  घर पहुँच जाऊँ. नौ बजे के बाद मोहल्ले से बाहर नहीं जाती. हमेशा ये याद रखती हूँ कि ये दिल्ली है, औरतों के लिए सबसे अधिक असुरक्षित महानगर. हाँ, अपने मोहल्ले में ग्यारह बजे तक टहल सकती हूँ क्योंकि यहाँ ज्यादातर स्टूडेंट्स रहते हैं जिनके कारण बारह-एक बजे तक चहल-पहल रहती है.

अब मैं अपनी सबसे पहली बात पर आती हूँ. अकेली औरत को प्रायः लोग सहज प्राप्य वस्तु समझ लेते हैं. अगर वो थोड़ी निडर और बोल्ड हो तो और मुसीबत. मेरे साथ दिक्कत ये है कि मैं अमूमन तो किसी से बात करती नहीं, लेकिन जब दोस्ती हो जाती है, तो एकदम से खुल जाती हूँ. मुझे जो अच्छा लगता है बेहिचक कह देती हूँ. अगर किसी पर प्यार आ गया है, तो ‘लव यू डियर’ कहने में कोई संकोच नहीं होता. मैं बहुत भावुक हूँ और उदार भी. मेरे दोस्त कई बार मुझे इस बात के लिए टोक चुके हैं कि किसी पर सिर्फ़ इसलिए प्यार मत लुटाने लग जाओ कि उसे इस प्यार की ज़रूरत है. ऐसे तो तुम प्यार बाँटते-बाँटते थक जाओगी. लेकिन चूँकि मैं बहुत कम लोगों से घुलती-मिलती हूँ, इसलिए आज तक मुझे लेकर किसी को कोई गलतफहमी नहीं हुयी.

लेकिन पिछले कुछ दिनों से ये सोच रही हूँ कि अपनी बोल्डनेस थोड़ा कम करूँ? क्या फायदा किसी को निःस्वार्थ भाव से ‘लव यू’ कह देने का या ‘लोड्स ऑफ हग्स एंड किसेज़’ दे देने का जब सामने वाला उसे लेकर भ्रमित हो जाय. मेरे ख्याल से हमारे समाज में लोग (विशेषकर पुरुष) अभी इतने परिपक्व नहीं हुए हैं कि इस तरह के प्यार को समझ पायें. उन्हें लगता है कि स्त्री-पुरुष के बीच सहज स्नेह सम्बन्ध जैसा कुछ नहीं होता. अगर होता है तो बस आदिम अवस्था वाला विपरीतलिंगी प्रेम होता है. जबकि मैं ऐसा मानती हूँ कि ऐसा प्रेम एक समय में एक ही के साथ संभव है, चाहे वो पति हो, पत्नी हो या प्रेमी. पर जब तक कि हमारा समाज इतना परिपक्व नहीं हो जाता कि सहज स्नेह को समझ सके, मेरा और सम्बन्ध बनाना स्थगित रहेगा.

अकेले रहने का इतना तो खामियाजा भुगतना ही पड़ेगा.

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बाऊजी की बातें

मेरे बाऊजी बहुत दिलचस्प इंसान थे. चीज़ों को देखने का उनका खुद का नजरिया होता था और वो बड़ा अलग और अनोखा था. किसी भी विषय में मेरी उत्सुकता का उत्तर वे बहुत तार्किक ढंग से देते थे. ऐसे कि बात समझ में आ जाती थी और मनोरंजक भी लगती थी.

बुद्ध की ज्ञानप्राप्ति के विषय में मेरी जिज्ञासा के समाधान में उनका एक बड़ा मजेदार किस्सा याद आता है. सातवीं-आठवीं कक्षा में कुछ धर्मों के विषय में पढ़ाया गया. बुद्ध के बारे में मैंने पढ़ा कि सालों साल तपस्या करने के बाद एक दिन बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ. मेरे मन में एक प्रश्न उठा और सारा ध्यान उसी पर अटक गया. प्रश्न यह था कि ज्ञान कोई एक दिन में अर्जित करने वाली चीज़ तो है नहीं, तो बुद्ध को एक दिन में ज्ञान कैसे प्राप्त हो गया? मैंने बाऊ से पूछा कि बुद्ध ने जो शिक्षाएं दी थीं, वे या तो उन्हें पहले से मालूम रही होंगी या बाद में दिमाग में आयी होंगी. ज्ञान तो अध्ययन-चिंतन और मनन से ही होता है. तपस्या करने से ज्ञान कैसे प्राप्त हो सकता है? और वो भी एक दिन में. बाऊजी  जल्दी जवाब भी नहीं देते थे, पहले तो टालते रहे. आखिर मेरे बार-बार पूछने पर कि “बुद्ध को एक दिन में ज्ञान कैसे प्राप्त हुआ?” बाऊ ने कुछ इस तरह समझाया.

सिद्धार्थ बचपन से बड़े संवेदनशील थे. जीवन की हर घटना-दुर्घटना उनके मन पर प्रभाव डालती थी. राजभवन में रहकर भी वे सन्यासियों की तरह विरक्त थे. आखिर एक दिन उन्होंने घर छोड़ दिया और ज्ञान की तलाश में भटकने लगे. अपनी जिज्ञासा के समाधान के लिए वे जगह-जगह भटके. कई विद्वानों से मिले. फिर कठोर तपस्या आरम्भ की. कई वर्ष बीत गए, सिद्धार्थ तप से कृशकाय हो गए, पर कोई लाभ नहीं हुआ. एक दिन बुद्ध को समझ में आया कि “हिंसा बहुत बुरी चीज़ है और अपने शरीर के साथ भी हिंसा नहीं करनी चाहिए. इसलिए ये तपस्या वगैरह बेकार है. ढोंग है. ईश्वर यदि कहीं होता तो इतनी कठोर तपस्या के बाद अवश्य प्रकट होता. इसलिए ईश्वर का भी अस्तित्व नहीं है.” दिमाग में ये बात आने के बाद उनके सामने सारी बातें स्पष्ट होती चली गयीं. इसे ही ‘ज्ञान-प्राप्ति’ कहा गया.

जो भी है बस यही जीवन है. इसमें बहुत दुःख और कष्ट हैं, लेकिन उन्हें कुछ बातों का ध्यान रखते हुए सहन किया जा सकता है. यदि हम भोगों में पूर्णतः आसक्त ना हों, तो उनकी कमी से होने वाला कष्ट नहीं होगा. इसी तरह कठोर तप भी कष्ट का कारण होता है. इसलिए उन्होंने सीधे-सादे मध्यममार्गी जीवन की शिक्षा दी, जो ना अधिक कठोर हो और ना ही असंयमित.

बाऊजी की बातें सुनकर मेरी समझ में बहुत कुछ आया, थोड़ा-बहुत नहीं भी. वो जो कि बहुत गूढ़ दार्शनिक विषय था और उस उम्र में समझ में नहीं आ सकता था. लेकिन मेरे बार-बार जिद करने पर बाऊजी ने मुझसे कहा था कि ‘क्या नचिकेता की तरह पीछे पड़ गई हो?’ अब एक नया प्रश्न मेरे सामने था  ‘नचिकेता कौन है?’ 🙂

इस मोड़ से जाते हैं …

बहुत-बहुत मुश्किल होता है अपने ही फैलाए हुए जाल से बाहर निकलना. पहले तो हम चीज़ों को सीरियसली लेते ही नहीं, हर काम पेंडिंग में डालते चलते हैं और जब यही पेंडिंग बातें, मसले, फैसले आपस में उलझ जाते हैं, तो उन्हें सुलझाना मुश्किल से मुश्किलतर होता जाता है. कुल मिलाकर मुझे लगता है कि हिसाबी लोग अपनी ज़िंदगी में सबसे ज्यादा सफल होते हैं, हाँ खुश रहने की कोई गारंटी नहीं है क्योंकि खुशी की परिभाषा सबके लिए अलग-अलग होती है. हिसाबी लोग अपना हर काम एक निश्चित कायदे से, निश्चित समय पर निपटाते जाते हैं. उनके यहाँ चीज़ों का ढेर नहीं लगता. हर बात की, काम की एक निश्चित जगह होती है- पढ़ाई, नौकरी, शादी, फिर बच्चे…

हर उम्र की एक तासीर हुआ करती है. मेरे एक टीचर अक्सर एक कहावत दोहराते थे कि “तीस की उम्र तक जो मार्क्सवादी ना हो, उसके पास दिल नहीं होता और तीस के बाद भी जो मार्क्सवादी बना रहता है, उसके पास दिमाग नहीं होता.” सच वो दिल वाली उम्र भी क्या उम्र होती है. ग्यारह- बारह से लेकर सत्रह-अठारह तक तो अगला अपने शरीर को लेकर ही परेशान रहता है. दिल-दिमाग-शरीर का संतुलन ही गड़बड़ाया रहता है. सोचो, … अपने ही शरीर पर कंट्रोल ना हो तो. पर उसके बाद मानो दिल और शरीर ठीक-ठाक होकर दिमाग को परे धकेल देते हैं. तब शुरू होती है रूमानियत भरी एक ज़िंदगी. दुनिया का कोई ऐसा असंभव काम नहीं, जो उस उम्र में संभव ना लगे. सब तोड़ डालेंगे, फोड़ डालेंगे, दुनिया को इधर से उधर कर देंगे, पर काम तो हम अपना करके ही रहेंगे.

आज उम्र के इस पड़ाव पर आकर ज़िंदगी मानो ठिठक सी गयी है. क्या हमने जो सपनों के महल बनाए थे, वो सच में  थे या सिर्फ़ … क्या प्यार नाम की कोई चीज़ होती है दुनिया में? या ये सब सिर्फ़ ‘हार्मोन्स’ का ‘केमिकल इम्बैलेंस’ है? अगर नहीं है, तो उन दिनों ये इतना सच्चा कैसे लगता था? आखिर कोई तो चीज़ होगी परीलोक की दुनिया, जो सपनों में ही सही, कहीं तो सच्ची होगी. आखिर प्यार कुछ तो होता ही होगा… ईश्वर की तरह- कि जो मानता है, उसके लिए है और जो नहीं मानता, उसके लिए नहीं. पर ये ‘जो’ तो एक ही है ना. बस उम्र का फर्क है. यही दिल जो पहले प्यार के नाम पर मर मिटने को तैयार था, अब उसके अस्तित्व पर ही संदेह कर रहा है.

अब लगता है कि क्या क्रान्ति सच में संभव है? अगर नहीं तो हम क्यों इसके लिए अपना प्यार, अपना कैरियर, सुख-सुविधा की चीज़ें सब छोड़ने को तैयार थे? क्यों सुबह से शाम इधर-उधर घूम-घूमकर पोस्टर चिपकाया करते थे? तेज लू में भी धरना-आन्दोलन पर उतर आते थे? कड़ी धूप में भी जुलूस में निकल पड़ते थे. अब ये धूप इतना काटती क्यों है? वो सारी बातें अब फालतू क्यों लगती हैं? हम सब इतने समझदार क्यों हो गए?

सब लोग कहते हैं कि ‘तुम्हारे अंदर इतनी ऊर्जा है, इतना पोटेंशियल है. तुम चाहो तो कुछ भी कर सकती हो, पर तुम अपनी सारी ऊर्जा को ऐसी जगह पर झोंके जा रही हो, जहां ब्लैकहोल की तरह चीज़ें जाकर वापस नहीं आतीं.’ दोस्त हैं, मेरा भला चाहते हैं तो मुझे ‘रैशनल’ होने की सलाह देते हैं. पर मैं नहीं हो पा रही हूँ. मुझे पहले ही मालूम था कि मैं एक ऐसी राह पर चल पड़ी  हूँ, जहां हर कदम पर दोराहा आ जाएगा और मेरी चलने की गति धीमी हो जायेगी. मैं थोड़ी देर तो रुककर सोचूँगी ही कि अब किस ओर आगे बढूँ? नतीजतन, सब आगे बढ़ते जायेंगे और मैं पीछे छूटती जाऊंगी. ज़िंदगी से भी पीछे. पर, मैं आज भी ‘रैशनल’ नहीं हो पा रही हूँ. बड़ा मुश्किल होता है ये, जब आपमें अपार ऊर्जा हो, क्षमता हो और दिल अक्सर दिमाग पर हावी हो जाता हो. ऊपर बेकार ही ये कहा मैंने कि ‘हम सब क्यों समझदार हो गए हैं?’ कम से कम मैं तो अब भी समझदार नहीं हो सकी हूँ.

एक बैचलर का कमरा, धुआँ और दर्शन

१.

कमरे का एक कोना. ज़मीन पर बिछा बिस्तर. उसके बगल में फर्श पर राख से पूरी भरी हुयी ऐश ट्रे और उसमें जगह न पाकर इधर-उधर छिटकी अधजली सिगरटें. एक कॉफी मग, जिसमें एक तरफ  रखी हुयी इमर्सन राड. गद्दे पर अधखुली रजाई, जिस पर पड़ता एक धूप का टुकड़ा रजाई के बैंगनी रंग को पूरे कमरे में बिखेर रहा था. तकिये के एक ओर औंधी रखी एक किताब.

कमरे में हल्का-हल्का सा फैला बैंगनी रंग का धुआँ दर्शन से धुएँ के शाश्वत सम्बन्ध को दर्शा रहा था (‘यत्र यत्र धूमस्तत्र तत्र वह्नि:”) मतलब ‘जहाँ धुआँ है, वहाँ आग भी होगी’. यहाँ आग नहीं है, सिर्फ़ धुआँ है क्योंकि सिगरेटें बुझी हैं. इससे ये सिद्ध होता है कि कभी-कभी दर्शन की स्थापनाएँ गलत भी हो सकती हैं. इसके उलट एक नयी स्थापना सामने आती है कि जहाँ धुआँ है, वहाँ सिगरेट भी होगी और जहाँ सिगरेट है, वहाँ दार्शनिक भी होगा क्योंकि दार्शनिकों का सिगरेट से गहरा नाता होता है.

२.

कमरे का दूसरा कोना. पढ़ने की एक मेज, जिसके एक किनारे रखे दो स्पीकर. दूसरे कोने पर एक छोटा सा टेबल लैम्प. एक खाली पेन स्टैंड और उसके बगल में मेज पर पड़ी तीन-चार कलमें. मेज के बीचोंबीच एक लैपटॉप, जो नेट पर दोस्तों से चैट करने के और गाने सुनने के काम आता है.

मेज के बगल में एक लकड़ी का रैक. उस पर करीने से सजी किताबें (कमरे की एकमात्र सलीके की चीज़) कुछ नोट्स. और एक बड़ी सी अलार्म घड़ी (जितनी बड़ी हो सकती है उतनी बड़ी). रैक के बगल में ज़मीन पर पड़ा एक अधखुला सूटकेस (जो अक्सर अधखुला ही रहता है) और उसमें से बेतरतीब झाँकते कुछ कपड़े (कमरे के मालिक की लापरवाही के गवाह). सूटकेस के ऊपर सूखने को पड़ी एक गीली अंडरवियर (एक और गवाह).

३.

रसोई. प्लेटफार्म पर चूल्हे के साथ एक छोटा सिलेंडर. रायल स्टैग की एक मझोली खाली बोतल और एक छोटी भरी बोतल. तीन खाली ‘फ्यूल’ की बोतलें. ये ‘फ्यूल’ किसी ‘इंजन’ को ‘स्टार्ट’ करने में काम आया होगा और उससे उत्पन्न ‘ऊर्जा’ अपने नष्ट न होने के नियम का पालन करती हुयी किसी और ‘पदार्थ’ में परिवर्तित होकर पर्यावरण में विलीन हो गयी होगी.

टेटली के टी-बैग्स का खुला पैक. चार-पाँच मैगी के पैकेट. सिंक के नीचे डस्टबिन में पड़ी आधा दर्जन गोल्ड फ्लैक की खाली डिब्बियाँ, जो कि कमरे में फैले शाश्वत धुएँ के साथ कार्य-कारण सम्बन्ध स्थापित कर रही थीं.

समाज को बदलने का सारा विमर्श, इतिहास को पलट देने के संकल्प,  संसार को समझने का सारा दर्शन इसी डस्टबिन के हवाले…

निष्कर्ष – धुआँ धुआँ…

चलत की बेरिया

हमारा देश दार्शनिकों का देश है, दर्शन का देश है. दर्शन यहाँ के जनमानस के अन्तर्मन में समाया हुआ है, जनजीवन में प्रतिबिम्बित होता है. कुछ लोग कर्मवादी हैं, तो कुछ लोग भाग्यवादी. पर समन्वय इतना कि कर्मवादी लोग भी भाग्य पर विश्वास करते हैं…और भाग्यवादी लोग भी कर्म करते हैं. लगभग सभी ये मानते हैं कि यह संसार मोहमाया है, यह शरीर भी नश्वर है. न यहाँ कोई कुछ लेकर आया है और न लेकर जायेगा. अनपढ़ लोगों को भी पता नहीं कहाँ से इस दिव्य ज्ञान की प्राप्ति हो जाती है…?

बस, जीवन जीने का तरीका सबका अलग-अलग होता है. कुछ मानते हैं कि जब हम यहाँ कुछ दिनों के लिये आये हैं, तो इस संसार से मोह कैसा? इसकी वस्तुओं में रमना कैसा? रमना है तो भगवान की भक्ति में रमो…तो कुछ लोग यह मानते हैं कि एक दिन सभी को जाना है, छोटा-बड़ा, शिक्षित-अनपढ़, गरीब-अमीर, सेठ-साहूकार, सभी चले जायेंगे…इस मामले में कोई भेदभाव नहीं…अगर एक दिन ये जीवन नष्ट हो जायेगा तो इसे भरपूर जियो. चार्वाक इसी दर्शन के प्रतिपादक थे. मेरे पिताजी ये मानते थे कि यही हमारे लोकदर्शन का आधार है. लोकदर्शन क्या होता है? मुझे नहीं मालूम, पर, एक अनपढ़ देहाती व्यक्ति भी कैसे दर्शन का गूढ़ तत्व सरल शब्दों में समझा देता है, ये देखना कभी-कभी बहुत रोचक होता है. इसी सन्दर्भ में एक घटना का उल्लेख कर रही हूँ.

फसल कटाई के समय गाँवों के खेतों-खलिहानों में उत्सव का सा माहौल हो जाता है. हमारे चाचा का खलिहान उनके दुआरे पर ही है. ये घटना धान की कटाई के समय की है. चाचा के घर के सामने धान की पिटाई हो रही थी. मज़दूरों की भीड़ थी. रस-दाना, खाना और मीठा आदि चल रहा था. मुझे ये चीज़ें बहुत आकर्षित करती हैं. ग्राम्यजीवन की सुन्दरता अपने कठोरतम रूप में… मज़दूर-मज़दूरिनों की जीवन्तता…फसल के एक गट्ठर या कुछ सेर अनाज और कुछ रुपयों के लिये जी-तोड़ परिश्रम करना, कठिन श्रम में भी खिलखिलाकर हँसना…तो, धूल से एलर्जी होने के बावजूद मैं वहाँ जमी थी.

मेरे चाचा के बड़े लड़के मज़दूरों से कुछ खफा से रहते हैं. उनके अनुसार जबसे बसपा का शासन हुआ है मज़दूरों के भाव बढ़ गये हैं. बहुत नखरे करने लगे हैं. कुछ मज़दूरों के लड़के छोटी-मोटी सरकारी नौकरी पा गये हैं, … वो सब लम्बी-लम्बी फेंकते हैं. तो भैय्या इन लोगों को इनकी औकात बताने में जुटे थे. वो अपने हवेलीनुमा घर, ज़मीन-जायदाद, खेत-खलिहान, ट्रक, ट्यूबवेल, बैंक-बैलेंस, यहाँ तक गोरू-बछरू आदि के बारे में बता-बताकर अपनी हैसियत का परिचय दिये जा रहे थे. जैसे किसी को इसके बारे में मालूम ही न हो. अरे गाँव में तो कोसों दूर तक लोग एक-दूसरे को जानते हैं, पर हमारे भैय्या…ऐसे ही हैं.

किसी को भी उनका इस तरह से डींगे हाँकना अच्छा नहीं लग रहा था, मुझे भी नहीं. पर मैं तो बोल नहीं सकती थी… बड़े भैय्या जो ठहरे. बाउ ने एक-दो बार टोका, पर वो नहीं माने. मज़दूरों को उनकी औकात बताने का काम चालू रखा. थोड़ी देर बाद एक मज़दूर महिला हँसकर भैय्या से बोली, “ए बाबा, ( हमारे यहाँ ब्राह्मणों को बाबा कहते हैं) काहे भभकत हउआ फुटही ललटेन मतिन. इ कुल तोहरे साथ न जाई चलत की बेरिया” (फूटी हुई लालटेन की तरह भभक क्यों रहे हो? ये सब संसार छोड़ते समय तुम्हारे साथ नहीं जायेगा). भैय्या एक क्षण के लिये अवाक रह गये, फिर बड़बड़ाते हुये घर के भीतर चले गये…कौन बोल सकता है भला इसके आगे ???


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